सरोकार की मीडिया

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Wednesday, July 29, 2020

कोरोना वायरस की आड़ में कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र तो नहीं चल रहा


कोरोना वायरस की आड़ में कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र तो नहीं चल रहा
अब दिमाग लगाकर सोचिए :: अगर कोरोना संक्रमित बीमारी है तो परिंदे और जानवर को अभी तक कैसे नहीं हुआ . यह कैसी बीमारी है जिसमें  सरकारी लोग और हीरो ठीक हो जाते हैं और आम जनता मर जाती है .. कोई भी घर में या रोड पर तड़प कर नहीं मरता हॉस्पिटल में ही क्यों मौत आती है..
यह कैसी बीमारी है ...कोई आज पॉजिटिव है तो कल बिना इलाज कराए नेगेटिव हो जाता है..
कोरोना संक्रमित बीमारी है…..जो जलसे में / रैली में/ और लाखों के प्रोटेस्ट में नहीं जाता, लेकिन गरीब नॉर्मल खांसी चेक कराने जाए तो 5 दिन बाद लाश बनकर आता है..
गजब का कोरोना वायरस है ...जिस की कोई दवा नहीं.बनीफिर भी लोग 99% ठीक हो रहे हैं..
यह कौन सी जादुई बीमारी है......जिसके आने से सब बीमारी खत्म हो गई अब जो भी मर रहा है कोरोना से ही मर रहा है.???
जरा सोचिये…साबुन और सैनिटाइजर से कोरोना मर जाता है तो इस को मारने की दवाई क्यों नहीं बनाई
यह कैसा कोरोना है….हॉस्पिटल में गरीब आदमी के  जिस्म का महंगा पार्ट निकालकर लाश को ताबूत में छुपा कर खोल कर नहीं देखने का हुक्म देकर बॉडी दी जाती है..
#है_कोई_जवाब ::????  अगर है जरूरदेना,अगर नहीं है तो सोचना कोरोना की आड़ में क्या चल रहा है ::::
कुछ हास्पिटल से न्यूज आ रहीं हैं कि सुबह मरीज़ को भर्ती किया जाता है और शाम को न्यूज मिलती है कि मरीज़ की करोना से मौत हो गई...(क्या सुबह से शाम तक करोना की रिपोर्ट भी आ गयी और शाम को करोना से डेथ भी हो गयी, और लाश का अंतिम संस्कार भी हो गया) इनके हिसाब से तो करोना की कोई स्टेज ही नहीं होती, जो पहले पाजिटिव से नेगटीव हुए, वो कैसे ठीक हुए, 15-20 दिन मे तो कनीका कपूर भी ठीक होकर घर चली गयी, आखिर ऐसा कौनसा इलाज था जो कनीका की 5 रिपोर्ट पोजिटिव आई और 6 रिपोर्ट मे नेगटीव आई.. और गरीबो की सुबह रिपोर्ट पोजिटिव आती है और शाम को उसकी डेथ हो जाती है.. क्या गरीब और माध्यम बर्ग की सिर्फ एक ही रिपोर्ट आती है positive या negative या डेथ?  हैरानी की बात है की कोई खांसी, जुकाम, बुखार और कोई लक्षण नहीं फिर भी रिपोर्ट पॉजिटिव कहीं कोई किडनी स्कैम तो नहीं हो रहा है...?.
किडनी ही क्यों आंख, लीवर, ब्लड, प्लाजमा और भी बहुत पार्ट हैं क्या कोई बहुत बड़ा झोल हो रहा है अंतराष्ट्रीय बाजार में व्यक्ति के पार्टस की कीमत करोड़ो रूपये हैं,  क्या कोरोना की आड़ में कोई षड्यंत्र चल रहा है क्योंकि  मृत देह को घरवालों को देते नहीं ना ही कोरोना के नाम से घर वाले बॉडी लेते हैं  और बंद लिफाफे में क्या हुआ है बॉडी के साथ किसे पता। सबको मिलकर ऐसा कदम उठाना होगा जिससे कम से कम S.C. की निगरानी में जांच हो, ताकि हकीकत सामने आए...साभार अज्ञात

Thursday, May 14, 2020

इतिहास का एक पृष्ठ


इतिहास  का एक पृष्ठ

 सन 2014 से पहले  तक इतिहास का वो दौर था, जब 'हम भारत के  लोग' बहुत दुखी थे। एक तरफ तो फैक्ट्रियों में काम चल रहा था और कामगार काम से दुखी थे अपनी मिलने वाली पगार से दुखी थे। सरकारी बाबू की तन्ख्वाह समय-समय पर आने वाले वेतन आयोगों से बढ़ रही थी,  हर छ: महीने-साल भर में 10% तक के मंहगाई भत्ते मिल रहे थे, नौकरियां खुली हुईं थीं। 
अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित सबके लिये यू.पी.एस.सी. था, एस.एस.सी था, रेलवे थी,  बैंक की नौकरियां थीं। प्राईवेट सेक्टर उफान पर था। मल्टी नेशनल कम्पनियां आ रहीं थी। जाब दे रहीं थीं। हर छोटे-बड़े शहर मे ऑडी और जगुआर जैसी कारों के शो रूम खुल रहे थे । हर घर में एक से लेकर तीन-चार तक अलग-अलग माडलों की कारें हो रही थीं।  प्रॉपर्टी में बूम था। नोयडा से लेकर पुणे बंगलौर तक, कलकत्ता से बंबई तक फ्लैटों की मारा-मारी मची हुई थी। मतलब हर तरफ हर जगह अथाह दुख-ही-दुख पसरा हुआ था।  लोग नौकरी मिलने से,  तन्ख्वाह पेन्शन और मंहगाई भत्ता मिलने से दुखी थे।  प्राईवेट सेक्टर आई टी सेक्टर में मिलने वाले लाखों के पैकेज से लोग दुखी थे। कारों से ,प्रॉपर्टी से लोग दुखी थे।
फिर क्या था ...................प्रभु  से भारत की जनता का यह दुख देखा न गया।  तब उन्होंने  'अच्छे दिन' का एक वेदमंत्र लेकर भारत की पवित्र भूमि पर अवतार लिया। 
भये प्रकट कृपाला दीन दयाला ।
जनता ने कहा - कीजे प्रभु लीला अति प्रियशीला।
प्रभु ने चमत्कार दिखाने आरंभ किये। जनता चमत्कृत हो कर देखती रही। तमाम संवैधानिक संस्थायें रेलवे, एअरपोर्ट, दूरसंचार, बैंक आदि  जो नेहरू और इंदिरा  नाम के  क्रूर शासकों ने बनायीं थीं। उनका ध्वंस किया और उन्हें संविधान, कानून  और नैतिकता के पंजे से मुक्त किया। 
रिजर्व बैंक नाम की एक ऐसी ही संस्था  थी जो पैसों पर किसी नाग की भाँति  कुंडली मार कर बैठी रहती थी । प्रभु ने उसका तमाम पैसा,  जिसे जनता अपना समझने की भूल करती थी, तमाम प्रयासों से बाहर निकाल कर उस रिजर्व बैंक को पैसों के भार से  मुक्त किया। प्रजा को इन सब कार्यवाहियों से बड़ा आनन्द मिला और करतल ध्वनि से जनता ने आभार व्यक्त किया।  और प्रभु के  गुणगान में लग गयी।
प्रभु ने ऐसे अनेक लोकोपकारी काम किये। जैसे सरकारी नौकरियां खत्म करने का पूर्ण  प्रयास,  बिना यूपीएससी सीधा उप सचिव, संयुक्त सचिव नियुक्त करना, मंहगाई भत्ता रोकना, आदि। पहले सरकारी कर्मचारी  वेतन आयोगों में 30 से 40% तक की वृद्धि से दुखी रहते थे। फिर सातवें वेतन आयोग में जब मात्र  13% की वृद्धि ही मिली तब जा के कहीं  सरकारी कर्मचारियों को संतुष्टि मिली । वरना मनमोहन सिंह नामक क्रूर शासक ने  तो कर्मचारियों को तनख्वाह में बढ़ोतरी और मंहगाई भत्ता की मद में  पैसे दे-देकर बिगाड़ रहा था।
प्रभु जब अपनी लीला मे व्यस्त थे तभी कोरोना नामक एक देवी चीन से प्रभु की मदद को आ गयीं। अब सारे शहर गाँव गली कूचे में ताला लगा दिया गया। लोगों को तालों मे बंद करके आराम करने का आदेश हो गया। अब सर्वत्र शान्ति थी। लोग घरों मे बंद होकर चाट पकौड़ी, जलेबी, मिठाई  का आनंद उठाने लगे। 
घर-घर रामायण पाठ और दर्शन होने लगा। रेलगाड़ी और हवाई जहाज जैसी विदेशी म्लेच्छों के साधन छोड़कर लोग पैदल ही सैकड़ों हजारो मील की यात्रा पर निकल पड़े। फैक्ट्रियां, दुकानें सब बंद कर दी गयी । कामगारों को नौकरियों से निजात दे दी गयी। सबको गुलामों और घोड़ों की तरह मुँह पर पट्टा बाधना अनिवार्य किया गया, जो लोग 2014 के पहले के तमाम लौकिक सुखों से दुखी थे उनमें प्रसन्नता का सागर हिलोरे मारने लगा। सर्वत्र रामराज छा गया। 
 यदि प्रभु के  सारे कृत्य वर्णन किये जाये तो सारे भारत की भूमि और सारी नदियों का जल भी लिखने के लिये कम पड़  जाये। थोड़ा लिखना बहुत  समझना आप तो खुद  समझदार हैं । आगे की लीला के लिए प्रभु के दूरदर्शन पर प्रकट होने की प्रतीक्षा करें उसके बाद करतल ध्वनि से स्वागत करते रहिये। जय हो त्रिकाल महराज की जय ।

Wednesday, February 19, 2020

मीडिया ट्रायल: एक विश्लेषण


मीडिया ट्रायल: एक विश्लेषण
भूमिका
मीडिया एक ऐसा नाम जो किसी पहचान का मोहताज नहीं है, इसकी ताकत को मापकर किसी ने इसे चौथे खंभे की उपाधि से नवाजा, तो वहीं किसी ने इसे समाज के आईने का तमगा दे दिया। यह वह आईना है जिसने देखते ही देखते वक्त के बदलते हालात के साथ-साथ मीडिया के सारे सरोकार ही बदल कर रख दिए। भूमंडलीकरण के अंधे दौर में मीडिया भी बाजार के साथ दो-दो हाथ करता नजर आया। साम- दंड, भेद -भाव, पैसा, यह सब मीडिया के लिए अनैतिक होने के बजाए हालात का प्रतीक चिह्न बन गए। जिसे समाज ने भी कबूलने में कोई कोताही नहीं की। इस बदलते परिवेश की ही देन रही कि वक्त के बदलते पगडंड़ियों पर चलते-चलते मीडिया ने खबरों को वही पुराने मिजाज से दिखने के बजाए इस चटकारे और मसाले में भुजना ही बेहतर जाना।
वर्तमान में तेजी से उभरती मीडिया ट्रायल की संकल्पना बहुत हद तक इसी की देन है। मीडिया ट्रायल को टी.वी. अधिक कवरेज मिलने के पीछे इसी बाजारवाद का स्वरूप ही प्रमुख रहा। संवेदनशील खबरों को ब्रेकिंग व एक्सक्लूसिव में गढ़कर दर्शकों के कमरे तक पहुंचाया गया। रहस्यमय हत्या की वारदातें, हाई प्रोफाइल, दंपत्तियों की खबरें, अभिनेता, राजनेता, इस मीडिया ट्रायल के प्यादे बने, जिसे मीडिया जब चाहे जिधर चाहे दौड़ा सकता था। ठीक वैसे ही जिस तरह किसी सतरंज की बाजी में प्यादे भागे फिरते हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में बात करे तो वक्त-वे-वक्त मीडिया ट्रायल को एक गुनहगार की तरह सवालों के कटघरे में खड़ा किया गया है। कुछ हद तक इसका दोषी खुद मीडिया है। मगर ज्यादातर मामलों में राजनेता और व्यक्ति विशेष अपनी लुटती साख बचाने के लिए मीडिया ट्रायल को हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने को लेकर कई दफा आदालत/कानून का दरवाजा बेवजह ही खटखटा चुके हैं।
वैसे मीडिया ट्रायल के संदर्भ में साफ और सटीक विश्लेषण किया जाए तो, मीडिया पर यह आरोप अक्सर लगता है कि किसी अपराध को सनसनीखेज बनाकर मीडिया खुद ही जांचकर्ता, वकील और जज बन जाता है, जबकि पुलिस अभी दूर-दूर तक मामले की सच्चाई के आसपास भी नहीं पहुंचती। यानि मीडिया जब किसी खास मामले की ज्यादा-से-ज्यादा कवरेज और उसकी तह में जाने की हद से ज्यादा कोशिशें होने लगती है और सच्चाई का खुलासा करने की होड़ में आरोपियों और मामले से जुड़े लोगों की सरेआम कैमरे पर इस तरह जिरह होने लगती है जैसे अदालत में कोई मुकदमा चल रहा हो। ऐसी स्थिति में मीडिया न्यायालय के विचाराधीन किसी प्रकरण के होते हुए भी न्यायपालिका के फैसले से पूर्व ही अपना फैसला अपने कार्यक्रमों, बहस और खबरों जरिए तय कर देना ‘मीडिया ट्रायल’ कहलाता है। 
मीडिया ट्रायल, इस बहुप्रचारित शब्द को लेकर काफी लंबी-चैड़ी बहस हो चुकी है और अभी भी हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में खूब सारे तर्क भी दिए जा रहे हैं। दरअसल, किसी भी निर्णय तक पहुंचने से पहले हमें इससे जुड़ी हर एक बारीकी और अर्थ को समझना होगा। सबसे पहले सवाल यह उठता है कि मीडिया ट्रायल जैसा शब्द आया कहां से? यह एक नई अवधारणा है या तबसे इसका अस्तित्व है जबसे चैथे स्तंभ की शुरुआत हुई? कोई यह तर्क भी दे सकता है कि मांग के हिसाब से ही इस दुनिया में कोई चीज अस्तित्व में आती है। इसलिए यदि मीडिया ट्रायल शुरू हुआ तो इसके लिए व्यवस्था में शामिल संस्थाओं की निष्क्रियता या असफलता जैसे तर्क ही सूझते हैं। एक ऐसे वक्त में, जब अन्य संस्थाएं असफल हो रही हों, तब न्यायपालिका की तरह मीडिया खुद को सामने खड़ा कर अपने तरह से उस शून्य को भरने की कोशिश करता है, जो अन्य संस्थाओं की असफलता की वजह से पैदा हुआ है और इस तरह न्यायिक सक्रियता या मीडिया ट्रायल जैसी अवधारणाओं का जन्म होता है.
एक तरह से देखें तो ऐसा नहीं कहा जा सकता। पुलिस-प्रशासन, अदालत सभी अपने दायरे में अपने तरीके से किसी भी मामले पर कार्रवाई करते हैं। यहां सवाल पक्षपात या निष्पक्षता का नहीं है, ये एक प्रक्रिया है, जिसका पालन तमाम जांच एजेंसियां और कानूनी पक्ष करते हैं और इसमें जो भी समय लगे, उसके बाद नतीजा निकलकर सामने आता है, जो किसी के पक्ष में होता है और किसी के खिलाफ। अब नतीजा सही होता है या गलत, ये अलग चर्चा और बहस का विषय है। लेकिन किसी मामले में मीडिया, खासकर टेलीविजन की दिलचस्पी और अति-सक्रियता क्यों होती है? और क्यों स्थिति ‘मीडिया ट्रायल’ के स्तर तक पहुंचती है? ये पहलू विचारणीय है।
शोध का उद्देश्य-
1.मीडिया ट्रायल को परिभाषित करना।
2.मीडिया ट्रायल द्वारा न्यायालय पर दबाव बनाता है का अध्ययन करना।
3.मीडिया ट्रायल की उपयोगिता का विश्लेषण करना।
शोध की उपकल्पना-
1.मीडिया ट्रायल द्वारा न्यायालय के साथ-साथ जांच आयोगों पर भी दबाव बनने का कार्य करता है।
2.वर्तमान में समाज से जुड़ी समस्याओं पर मीडिया ट्रायल आम तौर पर नदारत देखा जा सकता है।  
शोध प्रविधि-
·       निदर्शन प्रविधि- निदर्शन प्रविधि का प्रयोग करते हुए मीडिया ट्रायल के संबंध में जानकारी प्राप्त करने हेतु ऑन लाइन 200 लोगों का चयन किया गया है। 
·       प्रश्नावली प्रविधि- डेटा संकलन हेतु प्रश्नावली प्रविधि का प्रयोग किया गया है।
·       अवलोकन प्रविधि- डेटा  संकलन हेतु अवलोकन प्रविधि का प्रयोग किया गया है।
शोध सीमा-
प्रस्तुत शोध पत्र के अंतर्गत केवल ऑन लाइन लोगों का चयन कर उनके मतों का समावेश किया गया है। 
उत्तरदाताओं से प्राप्त उत्तर का विश्लेषण-
ग्राफ संख्या:- 1


उपरोक्त ग्राफ से यह ज्ञात होता है 200 उत्तरदाताओं में से 52 (26 प्रतिशत) ने माना कि  मीडिया न्यायालय में विचाराधीन प्रकरणों पर टी.आर.पी के लिए ट्रायल चलाता है, जबकि 36 उत्तरदाताओं (18 प्रतिशत) ने कहा कि विज्ञापन के लिए। वहीं 21 उत्तरदाताओं (10.5 प्रतिशत) ने कहा कि खबरों के प्रसारण हेतु मीडिया ट्रायल चलाता है तथा 91 उत्तरदाताओं (45.5 प्रतिशत) ने कहा कि न्यायालय पर दबाव हेतु मीडिया ट्रायल चलाता है। अतः आंकड़ों से ज्ञात होता है कि मीडिया न्यायालय पर दबाव हेतु न्यायालय में विचाराधीन प्रकरणों पर ट्रायल चलाता है।
ग्राफ संख्या:- 2


उपरोक्त ग्राफ से यह ज्ञात होता है 68 (34 प्रतिशत) ने माना कि मीडिया आपराधिक मामलों पर ट्रायल चलाता है, जबकि 119 उत्तरदाताओं (59.5 प्रतिशत) ने कहा कि सनसनीखेज मामलों पर मीडिया ट्रायल चलाने का कार्य करता है। वहीं 13 उत्तरदाताओं (6.5 प्रतिशत) ने कहा कि समाज से जुड़े हुए मुद्दों को उठाने के लिए मीडिया ट्रायल चलाता है। अतः आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि मीडिया सनसनीखेज मामलों पर सबसे ज्यादा मीडिया ट्रायल चलाता है।
ग्राफ संख्या:- 3


उपरोक्त ग्राफ से यह ज्ञात होता है 200 उत्तरदाताओं में से 16 (8 प्रतिशत) का मत है कि मीडिया ट्रायल में शिक्षा से संबंधित खबरों का अभाव रहता है। 18 उत्तरदाताओं (9 प्रतिशत) ने कहा कि कृषि से संबंधित खबरों का, जबकि 82 उत्तरदाताओं (41 प्रतिशत) ने नारी सशक्तिकरण की खबरों का अभाव कहा। वहीं 84 उत्तरदाताओं (42 प्रतिशत) ने कहा कि मीडिया ट्रायल में विकास से संबंधित खबरों का अभाव देखा जा सकता है। अतः ग्राफ से स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल में नारी सशक्तिकरण एवं विकास से संबंधित खबरों का ज्यादा अभाव रहता है।
ग्राफ संख्या:- 4


उपरोक्त ग्राफ से यह ज्ञात होता है 200 उत्तरदाताओं में से (17.5 प्रतिशत) का मत है कि मीडिया ट्रायल का पुलिस कार्यवाही पर अधिक प्रभाव पड़ता है, जबकि (6 प्रतिशत) ने अभियुक्तों पर प्रभाव के पक्ष में अपना मत दिया। वहीं (38.5 प्रतिशत) ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली प्रभावित होने के पक्ष में मत दिया तथा (38 प्रतिशत) ने कहा कि जांच आयोगों पर मीडिया ट्रायल का प्रभाव ज्यादा पड़ता है। अतः स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल का न्यायापालिका के साथ-साथ जांच आयोगों पर भी ज्यादा प्रभाव पड़ता है।
निष्कर्ष
मीडिया द्वारा इस स्थिति में खबरों की खबर लेने की कोई सीमा नहीं होती और कवरेज और प्रसारण का दायरा इतना बढ़ता हुआ नजर आता है कि उसे रिपोर्टिंग से हटकर ‘मीडिया ट्रायल’ का दर्जा दे दिया जाता है। ये काफी हद तक ऐसी मुहिम की स्थिति है, जिसे कई टेलीविजन समाचार चैनल बाकायदा घोषित रूप से चलाते रहे हैं। भारत में प्रियदर्शिनी मट्टू, जेसिका लाल, नीतीश कटारा, बीजल जोशी, रुचिका गिरहोत्रा, आरुषि तलवार हत्याकांड जैसे आपराधिक मुद्दे हों, या भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरों के मुद्दे- जिन पर टेलीविजन समाचारों की सबसे ज्यादा कवरेज हुई है और इनकी कवरेज बहस और विवादों का भी मुद्दा रही है। ये कहना सही नहीं होगा कि ऐसे तमाम मामलों को टेलीविजन पर उठाए जाने की वजह से ही इनके दोषियों को सजा हुई। मीडिया के जोर के चलते, समाचार चैनलों की मुहिम के चलते पीड़ितो को इंसाफ मिला? ये सिर्फ एक सोच भर है और इंसाफ की जंग लड़ने वालों को भी लगता है कि मीडिया का उन्हें साथ मिला है, मीडिया उनका सहारा बना रहा है। गालिबन, ये दिल को बहलाने को एक अच्छा ख्याल  हो सकता है, लेकिन खबरों के प्रसारण का कोई ज्यादा दबाव मामलों के फैसलों पर पड़ता हो, ऐसा कम ही लगता है।
एक तरह से यह भी देखें तो ‘मीडिया ट्रायल’ एक कानूनी जुमला है, जिसका मतलब प्रसारण के जरिए न्याय दिलाने की प्रक्रिया से है। व्यावहारिक और वैधानिक तौर पर पीड़ित को न्याय दिलाना तो मीडिया पर खबर दिखाकर असंभव है, क्योंकि मुकदमे का ‘ट्रायल’ कानूनी प्रक्रिया है और किसी को दोषी ठहराना, उसे सजा देना और किसी को बरी करना अदालतों का ही काम है। लेकिन ‘मीडिया ट्रायल’ के जुमले का इस्तेमाल ‘Fair trial’ के रास्ते में बाधा मानकर किसी भी खबर के मामले में कवरेज को सीमित करने के लिए किया जा सकता है। जिन मामलों को बेहद संवेदनशील माना जाता है, उनकी कवरेज पर मीडिया को संयमित रहने की सलाह दी जाती है। अदालतों में भी कई बार मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी लग जाती है क्योंकि वहां से निकलने वाली खबरों के सीधे प्रसारण से पब्लिक या पब्लिक की नुमाइंदगी करने का दावा करने वाले संगठनों, पार्टियों, गैरसरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं या किसी समुदाय विशेष की भावनाएं भड़कने का अंदेशा रहता है जिसकी प्रतिक्रिया हिंसा में तब्दील होने का खतरा बना होता है। इस दौरान आरोपियों, दोषियों, गवाहों और न्यायाधीशों पर भी खतरे का अंदेशा होता है, लिहाजा समाचारों के प्रसारण में संयम की अपील की जाती है और कई बार पाबंदियां भी अदालतों की ओर से लगा दी जाती है।
आंकड़ों से प्राप्त निष्कर्ष से स्पष्ट होता है कि मीडिया 34 प्रतिशत आपराधिक मामलों पर तथा 59.5 प्रतिशत सनसनीखेज मामलों पर मीडिया ट्रायल चलाने का कार्य करता है। जिनमें 41 प्रतिशत तक नारी सशक्तिकरण और 42 प्रतिशत तक विकास से संबंधित खबरों का अभाव रहता है। मीडिया जब ट्रायल चलाता है तो 45.5 प्रतिशत ने उत्तरदाताओं ने कहा कि वह न्यायालय पर दबाव हेतु मीडिया ट्रायल चलाता है। जिससे 38.5 प्रतिशत न्यायपालिका की कार्यप्रणाली के साथ-साथ 38 प्रतिशत जांच आयोगों पर भी मीडिया ट्रायल का प्रभाव ज्यादा पड़ता है।
वैसे यह कहना गलत नहीं होगा कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका Watch Dog की तरह मानी गई है और टेलीविजन समाचार चैनल तो आज के दौर में इस भूमिका को बिलकुल सही तरीके से निभाते दिख रहे हैं, क्योंकि कैमरे से समाज की कोई बात छिपती नहीं और सच हर रोज सामने दिखता है। लिहाजा समाज में क्या चल रहा है वो सब दिखाना तो टेलीविजन समाचार चैनलों की जिम्मेदारी है। पब्लिक के विचारों और उनकी आवाज को सामने लाना भी इसका हिस्सा है, जो कई खबरों के मामलों में इतना तेज होकर उभरता है कि उससे प्रभावित होने वाले कई पक्षों को उसके विपरीत असर का भय सताने लगता है और मुझे लगता है कि यही स्थिति ‘मीडिया ट्रायल’ का एक ऐसा आवरण खड़ा करती है, जिसका हव्वा खड़ा करके मुद्दे की ज्यादा चर्चा को रोका जा सके।
बहरहाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर क्षेत्र के रेगुलेशन, उसके कामकाज के तौर-तरीके और उसे कानूनी दायरे में रखने की प्रक्रिया है, चाहे वो कार्यपालिका हो, विधायिका हो, न्यायपालिका या मीडिया ही क्यों न हो। ऐसे में अगर ‘मीडिया ट्रायल’ जैसा कोई संकट व्यवस्था को लगता है, तो उस पर नियंत्रण, उसकी दिशा तय करने के लिए उपाए किए जा सकते हैं, उस पर भी बहस हो सकती है और अदालत या अदालत से बाहर ये बातें हो सकती हैं और होती भी हैं कि किस तरह की खबर को दिखाने और उस पर चर्चा का क्या तरीका होना चाहिए। कभी सरकार और सूचना और प्रसारण मंत्रालय, तो कभी खुद समाचार चैनलों के प्रसारकों की संस्थाएं, तो कभी खुद अदालतों की ओर से ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती रहती है।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1.जोशी रामशरण, (2006) मीडिया विमर्श, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
2.नन्दा, वर्तिका, उदय सहाय, (2009) मीडिया और जन संवाद, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
3.पचौरी, सुधीशए (2003) साइबरस्पेस और मीडिया, प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली
4.पाण्डेय, डॉ. रतन कुमार (2008) मीडिया का यथार्थ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
5.मंडल दिलीप, (2011) मीडिया का अंडरवल्र्ड, राधाकृष्ण, नई दिल्ली
6.शर्मा, कुमुद (2009)समाचार बाजार की नैतिकता, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली
7. http://aaakashkshiteeja.blogspot.in/2016/04/blog-post_15.html
8-http://mkgbloger.blogspot.in/2012/10/blog-post_29.html
9-http://www.amarujala.com/india-news/media-trial-needs-to-be-curbed-supreme-court
10-http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-truth-of-media-trial-12894773.html
11-https://gulabkothari.wordpress.com
12-https://hindi.news18.com/news/city-khabrain/217478.html
13-https://khabar.ndtv.com/news/blogs/prime-time-intro-on-public-trial-of-media-760476
14-https://navbharattimes.indiatimes.com/india/supreme-court-hints-at-end-to-media-trial/articleshow/57031083.cms
15-https://sapneaursapne.wordpress.com

Thursday, May 30, 2019

ईमानदार लोग आज भी हैं


ईमानदार लोग आज भी हैं
कहते हैं कि कोई भी विभाग घूसखोरी से अछुता नहीं है। गाहे-बगाहे लेन-देन की प्रक्रिया का संचालन होता रहता है। कभी दबाव में, तो कभी अपना काम निकलवाने के एवज में हथेलियां गर्म होती रहती है। इन सबके बावजूद हर विभाग में सभी घूसखोर नहीं हैं बहुत से ऐसे कर्मचारी/अधिकारी आज भी मौजूद हैं जो अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हैं चाहे उनके ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव क्‍यों ना पड़े। यह सब मैं किसी विभाग के कर्मचारी/अधिकारी की चापलूसी के कारण नहीं बल्कि, ईमानदार व्‍यक्ति से सबको परिचित करवाने के लिए लिख रहा हूं।
दिनांक 28 मई को शाम के लगभग 7-8 बज रहे होगें मैं किसी काम से घंटाघर पर खड़ा हुआ था और अपने एक मित्र से बात कर रहा था। तभी यातायात पुलिस की जीप सायरन बजाती हुई सावरकार चौक से घंटाघर आ रही थी, तो वहा पर खड़े फल ठेले वाले और भी अन्‍य ठेले वाले अपने-अपने ठेले को साइड में करने लगे। तभी यातायात पुलिस की जीप घंटाघर पर आ पहुंची। तो उसमें बैठे दरोगा नरेंद्र सिंह ने देखा कि एक झांसी की गाड़ी जिसका मालिक उसे अपनी सुविधा के अनुसार रोड़ के बीचों बीच खड़ा करके चला गया था। कुछ देर देखने के उपरांत जब गाड़ी मालिक नहीं आता दिखा तो दरोगा के अपने साथी सिपाही से उस गाड़ी में कब्‍जा लगाने को कहा। दरोगा का आदेश मिलते ही सिपाही ने उस गाड़ी में कब्‍जा लगा दिया। तभी कुछ देर बाद उक्‍त गाड़ी मालिक आया तो देखा कि गाड़ी में कब्‍जा लगा हुआ है। गाड़ी मालिक ने दरोगा से कब्‍जा हटाने के लिए कहा तो दरोगा नरेंद्र सिंह ने कहा कि पहले अपनी गाड़ी देखिए कैसी खड़ी है। इसके एवज में आपको अर्थ दंड का भुगतान करना पड़ेगा ताकि आप पुन: ऐसा न करे। तो गाड़ी मालिक ने कुछ ले देकर कब्‍जा हटाने को कहा, तब दरोगा नरेंद्र सिंह ने साफ-साफ कहा कि यह पैसा मेरी जेब में नहीं जा रहा, यह पैसा सरकार के खाते में जमा होगा।
कुछ देर बातचीत होने के बाद उक्‍त गाड़ी मालिक ने अपने पिता को फोन करके बुला लिया। गाड़ी मालिक के पिता आ गए तो उन्‍होंने पहले तो मामले को रफादफा करने के लिए कहा। फिर कहने लगे कि मेरी जानपहचान उक्‍त मंत्री से है कहिए तो मैं आपकी बात करवा देता हूं। गाड़ी छोड़ दो। मुझे लगा कि दरोगा जी मंत्री के दबाव में आकर गाड़ी को छोड़ देगें, या रूपया लेकर गाड़ी को जाने देगें। परंतु में गलत था। सब कुछ देखा रहा था। उक्‍त व्‍यक्ति ने पूरी तरह दबाव बनाने, व कुछ कम ले देकर मामला निपटाने की पूरी कोशिश की। परंतु दरोगा जी टस से मस नहीं हुए। और कहा कि अर्थ दंड का भुगतान करों और रसीद लो। मैं आप लोगों को भुगतान की रसीद दे रहा हूं। जब उक्‍त गाड़ी मालिक की कहीं से दाल गलती नजर नहीं आई तो उन्‍हें अर्थ दंड का भुगतान करना ही पड़ा। दरोगा जी ने अर्थदंड रसीद देकर पुन: ऐसी पार्किग न करने की हिदायत देते हुए गाड़ी में लगा कब्‍जा निकलवा दिया।
यह सब देखकर आर्श्‍चय हुआ कि दरोगा जी चाहते तो कुछ लेकर भी गाड़ी छोड़ सकते थे, परंतु नहीं उन्‍होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उक्‍त दरोगा जी को देखकर लगता है कि ईमानदार लोग आज भी हैं।

Friday, May 3, 2019

तुम्‍हारी औकात से परे


तुम्‍हारी औकात से परे
2019 के लोक सभा चुनाव के चार चरण संपन्‍न हो चुके है बाकि तीन चरणों के चुनाव होना बाकि है। यह सात चरणों के चुनावों के परिणाम क्षेत्रों के सांसदों व प्रधानमंत्री का फैसला करेंगे, यह सब जानते हैं। इसमें नया क्‍या है। सही है नया तो कुछ भी नहीं, और नया क्‍या हो सकता है। मैं तो बस चुनाव में खड़े कुछ दिग्‍गज उम्‍मीदवारों की चर्चा कर रहा हूं। राहुल गांधी जो अमेठी और रायबरेली के इतर और कहीं चुनाव नहीं लड़ते। वही मुलायम सिंह और अखिलेश मैनपुरी व सैफई छोड़कर कहीं अपना दांव नहीं अजमाते। इसके साथ ही इस सूची में और भी उम्‍मीदवार हैं जिनकी अपनी अपनी मांद है। और यह अपनी माद छोड़कर और कहीं शिकार खेलने नहीं जाते। डर लगता है कहीं और इनका शिकार न कर ले जाए। और वर्षों से कमाई इज्‍जत मिट्टी में न मिल जाए। यही सब मोदी के अंदर भी देखा गया है कि वह वाराणसी के इतर और कहीं अपनी किस्‍मत नहीं आजमा रहे। यानि अपनी अपनी मांद छोड़कर कहीं और शिकार करना नहीं चाहते....... यदि वास्‍तव में आपने विकास किया है तो अपनी मांद को छोड़कर राहुल, मुलायम, मायावती, अखिलेश, ममता, लालू के गढ़ में जाकर सेंघ लगाए तो जाने कि वास्‍तव में आप शिकारी हो। अपनी-अपनी गली में तो कुत्‍ता भी शेर होता है। छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़ों से लड़ने में क्‍या विकासगिरी है। लड़ना है तो दूसरों के घर में घुसकर लड़ों, सबको उनकी औकात समझ आ जाएगी। कौन कितने पानी में है।
अब करते हैं विकास की बात तो विकास के नाम पर जो चस्‍मा सरकार ने जनता की आंखों पर पहना रखा है उससे सिर्फ कालपनिक विकास दिखाई देता है वास्‍तविक विकास तो कोसों दूर है। यदि बड़े-बड़े उद्योगपतियों की जेबों को भरना विकास है तो हम जरूर कहेंगे कि विकास हुआ है। और यदि नहीं तो जरा गरीब किसानों और मजदूरों की जिंदगी का अवलोकन करें तो आपका विकास जमीन पर धूल चाटता नजर आएगा। खैर विकास तो हुआ है देशभर में लाखों टेक्‍सी की बिक्री हुई है जो आपने बेरोजगारों को रोजगार मुहैया करवाया है साथ ही पकौड़े जैसी विघा जो कम पढ़े-लिखे गरीब तबकों तक ही सीमित थी उस तुमने उच्‍च शिक्षित वर्गों के लिए भी खोल दी है। इसी का नाम विकास है। तो विकास तो हो रहा है।
खैर चुनाव के परिणाम 26 मई को आ जाएंगे कि किसकी कितनी औकात थी और उसने क्‍या-क्‍या हासिल कर लिया। विकास के नाम पर हो, धर्म जाति के नाम पर, गरीबों के नाम पर, आपने वोट हासिल किए हो परंतु देखना तो अब है कि तुम्‍हारी औकात कितनी है। क्‍या विकास तुम्‍हारी औकात से परे है या फिर दूसरे की मांद में सेंध लगाना।


Thursday, April 25, 2019

आधार कार्ड, जियो सिम और नोटबंदी का त्रिकोणीय संबंध


आधार कार्ड, जियो सिम और नोटबंदी का त्रिकोणीय संबंध

आधार कार्ड  भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को जारी किया जाने वाला पहचान पत्र है। इसकी स्‍थापना 28 जनवरी, 2009 को एक अधिसूचना के द्वारा योजना आयोग के  संबद्ध कार्यालय के रूप में 115 अधिकारियों और स्टाफ की कोर टीम के साथ की गई। वही जियो मुकेश अंबानी की कंपनी जिसका पूरा नाम (रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड, RJIL) है। इसकी शुरूआत 27 दिसंबर, 2015 धीरूभाई अंबानी के 83वें जन्‍म दिवस के अवसर पर की थी। रिलायंस जियो ने 4 सितंबर, 2016  सोमवार से सभी यूजर के लिए इसे लॉच कर दिया। और वेलकम ऑफर के साथ जियो कंपनी ने सभी यूजरों को 31 दिसंबर 2016 तक जियो की सर्विस को पूरी तरह से मुफ्त दिया। जिस बढ़कार 31 मार्च, 2017 कर दिया गया था। मुफ्त में सिम और कॉलिंग मिलने के एवज में हर छोटे-बड़े राज्‍यों में मारामारी देखी गई। इस सिम को पाने के लिए उपभोक्‍ता को आधार कार्ड की छायाप्रति लगानी अनिवार्य थी।  
अब बात करते हैं नोटबंदी की, तो भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया ने छोटे रूप में नोटबंदी कहा, जिसकी घोषणा 8 नवबंर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किए गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया। इस घोषणा में 8 नवबंर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया।  हालांकि भारतीय इतिहास में यह पहली बार नोटबंदी नहीं हुई है इससे पहले भी दो बार नोटबंदी हो चुकी है। अगर इसके इतिहास में जाए तो जनवरी 1946 में, 1000 और 10,000 रुपए के नोटों को वापस ले लिया गया था और 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नए नोट 1954 में पुनः शुरू किये गए थे। 16 जनवरी 1978 को जनता पार्टी की गठबंधन सरकार ने फिर से 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नोटों का विमुद्रिकरण किया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके।
सरकार ने कहा कि आप बैंकों से अपने पुराने नोट 30 दिसबंर, 2016 तक बदल सकते हैं। एक बार में आप 4000 रूपए तक बैंक से बदल सकते हैं। नोटों को बदलने के लिए आपको आधार कार्ड की एक फोटो कॉपी तथा एक फॉर्म भरने के उपरांत आपके पुराने नोट बदले गए। नोट बदलने की तारीख को 30 दिसबंर, 2016 से बढ़ाकर 31 मार्च 2017 तक कर दिया गया था।
अब आते हैं मूल मुद्दे पर..... एक तरफ मुकेश अंबानी की जियो जो मुफ्त में अपनी सेवाएं दे रही थी जिसके लिए आपको आधार कार्ड की जरूरत थी, वहीं नोट बदलने के लिए भी आधार कार्ड जरूरी था। एक तरफ जियो के लिए लोग लाइनों में लगे देखे गए, वहीं दूसरी ओर अपने पुराने नोटों को बदलने के लिए भी पूरा देश लाईन में लगा दिखाई दिया। अब इसको इत्‍तेफाक कहें यह एक सोची समझी साजिश कि दोनों की तिथियों एक ही थी.......जियो ने पहले 31 दिसंबर, 2016 तक अपनी सेवाएं मुफ्त में दी। वहीं नोटों का पहले बदलने की तिथि 30 दिसंबर, 2016 ही थी। जियो ने इसे बढ़कार 31 मार्च, 2017 कर दिया गया तो भारत सरकार ने भी नोटों को बदलने की तिथि भी 30 दिसंबर से बढ़ाकर 31 मार्च, 2017 तक कर दी थी।
मुझे तो यह बहुत ही बड़ा आधार कार्ड घोटाला नजर आता है कि तत्‍कालीन सरकार द्वारा काला धन का हावाला देते हुए 500 और 1000 रूपए के नोट बंद किया गए थे और यह भी कहा गया था कि नोटबंदी से आतंकवाद का खात्‍मा हो जाएगा। ना तो काला धन नजर आया और न ही आतंकवाद खत्‍म हुआ। फिर नोटबंदी का फायदा आखिर हुआ क्‍या.... हुआ बहुत फायदा हुआ.. हम और आपको नहीं बल्कि मुकेश अंबानी को....  क्‍योंकि सरकार ने कहा कि आप एक दिन में 4000 रूपए आधार कार्ड लगाकर कर बदल सकते हैं वहीं जियो ने सिम के एवज में लोगों से आधार कार्ड एकृत्रित किए। मुकेश अंबानी ने स्‍वयं कहा था कि 31 मार्च, 2017 तक 15 करोड़ लोग जियो का इस्‍तेमाल करने लगे हैं।
अब आते है गणीतीय सिद्धांत पर तो ज्ञात होता है कि एक आधार कार्ड पर आप 4000 रूपए बदल सकते थे तो 15 करोड़ आधार कार्ड यानि 15 करोड़ x 4000 =  600000000000 रूपए काला धन सफेद हो गया। सरकार द्वारा लागू नोटबंदी से मुकेश अंबानी ने अपना सारा काला धन सफेद कर लिया। और आम जनता मुफ्त मे सिम पाने के लिए और अपने नोट बदलने के लिए लाइनों में खड़ी रही। दूसरी तरफ अंदर ही अंदर खेल होता रहा। इस खेल की पृष्‍ठभूमि की स्किप्‍ट एक दिन में नहीं लिखी गई होगी। काफी गुणा गणित कर इसे तैयार किया गया होगा। तब जाकर मुकेश अंबानी जैसे खरबपतियों का पैसा सफेद हो गया। क्‍योंकि देखा गया था कि बैंक किसी और के आधार कार्ड पर रूपया नहीं बदल रही थी। तो मुकेश अंबानी जैसे लोगों का पैसा कैसे बदल गया जबकि एक दिन में मात्र 4000 रूपए ही बदल सकते थे। और 250000 रूपए के पुराने नोट ही जमा कर सकते थे। तो अंबानी जैसे लोग लाइनों तो खड़े नजर नहीं आए। फिर इनका पुराने रूपया कहां से और कैसे बदला गया सोचने वाली बात है। इसके साथ-साथ आप इस बात पर भी गौर कीजिए कि 31 मार्च, 2017 तक जियो कंपनी ने सिम देने के लिए आधार की फोटो कॉपी ली फिर बाद में ऑन लाइन वैरिफीकेशन करवाया गया। इस खेल में सरकार और रिर्जब बैंक का किरदार मुख्‍य भूमिका में है। यदि और अंदर धुसा जाए तो रघुराम राजन को 4 सितंबर, 2016 को इस्‍तीफा दिलाकर 5 सितंबर, 2016 को उर्चित पटेल (अंबानी के रिश्‍तेदार) को भारतीय रिर्जब बैंक का गर्वनर नियुक्‍त किया गया।
इस आधार कार्ड, जियो सिम और नोट बंदी का त्रिकणम वाकई चाणक्‍य बुद्धि की देन रहा है। बस आप आंकड़ों और तारीखों पर गौर कीजिए आप खुद ब खुद समझ जाएंगे कि सरकार और रिर्जब बैंक की मिलीभगत द्वारा किस-किस का रूपया काला से सफेद हुआ है और जनता तो है ही उल्लू... खड़ी हो गई लाइन में। सही बात है यह भारत है यहां मुफ्त में गू (पैकिंग कर) (लेवल लगाकर) मिलने लगे तो लोग उसके लिए भी लाइन में खड़े हो जाएंगे क्‍योंकि मुफ्त की आदत हो गई है।




Thursday, February 14, 2019

सप्‍ताह भर की मोहब्‍बतें.....


सप्‍ताह भर की मोहब्‍बतें.....
सभी को प्रेम दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..... आशा है आप सभी का प्रेम सप्‍ताह अच्‍छी तरह गुजरा होगा....क्‍या यह आपका प्रेम का हफ्ता था या फिर सिर्फ हफ्ते भर का प्रेम था। खैर इस प्रेम दिवस (पश्चिमी सभ्‍यता की चासनी में डुबा हुआ) के उपलक्ष्‍य पर नए प्रेमी-प्रेमिकाओं की उत्‍पत्ति हुई होगी, वहीं पुराने प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रेम में असीमित बढ़ोत्‍तरी हुई होगी...... ऐसा महौल देखकर प्रतीत होता नहीं... वहीं कुछ लोगों के दिल (बिना हड्डी वाला) टूटा भी होगा और कुछ प्रेमी-प्रेमिकाओं की शादी (किसी और से) हो चुकी होगी। अन्‍य से विवाह का कारण तरह-तरह की बंदिंशें, जाति, धर्म, परिजनों का न मानना आदि बहाने ....यह सब जब भी प्रेमी-प्रेमिकाओं को आपस में शादी करने की बात आती है तब ही उत्‍पन्‍न होते हैं, प्रेम के नाम पर नहीं.... प्रेम के नाम पर न तो ऊंच-नीच देखी जाती है, न ही जाति-धर्म.... यह हर बंदिंशों से परे होता है। ऐसा कहा जा सकता है, परंतु इसके पीछे की पृष्‍ठभूमि से सभी भली-भांति परिचित होते हैं। परंतु अंजान बनने, या अंजान बने रहने का दिखावा करते रहते हैं। दिखावे-सा ही तो हो गया है आज का प्‍यार..... जानू, बेबी, सोना, जान, लव यू... लव यू कहते रहो (झूठा ही सही, पल भर के लिए प्‍यार तो करो) तो समझों आप प्‍यार करते हैं, अपनी प्रेमी-प्रेमिकाओं की नजरों में.... और आज के प्रेम से कौन-सा शख्‍स परिचित नहीं है कि यह सिर्फ-सिर्फ किसकी पूर्ति हेतु किया जा रहा है.... पूर्ति हुई नहीं कि प्रेम गंधे के सिर से सींग की भांति गायब हो जाता है। इसके  बाद भी प्रेम, प्‍यार, लव, चाहत, मोहब्‍बत आदि का दिखावा करना पड़ता है ताकि पूर्ति होती रहे।  और जब ....खत्म हो जाता है इश्क़ जिस्मों का.... फिर लोग तोहफे को सड़कों पर यूँ ही  छोड़ जाते है। या फिर आप सभी जानते हैं कि क्‍या-क्‍या होता है। कहने की जरूरत नहीं है। इसे सिर्फ समझा जा सकता है।
हालांकि आंकड़ों से प्रेम को नापा जाए तो 97 प्रतिशत मामलों में पूर्ति के उपरांत प्रेम नदारत हो जाता है। और उनके बीच इसके कुछ समय सीमा तक ही प्रेम संबंध बने रहते हैं फिर वह किसी न किसी कारण को बता कर एक-दूसरे से किनार कर लेते हैं। हां मात्र 3 प्रतिशत ही लोगों अपने प्रेम को कोई नाम दे पाते हैं। वहीं इन 3 प्रतिशत लोगों में वो लोग भी शामिल हो जाते हैं जो प्रेम को नाम देने के उपरांत अपने जीवन साथी से तालुकात ही नहीं रखना चाहते... और वह विवाह-विच्‍छेद कर दूसरे के साथ प्रेम में बंध जाते हैं। सोचने वाली बात है कि अब आपका प्रेम कहां नदारत हो गया। देखा तो यहां तक गया है कि एक प्रेमी-प्रेमिकाओं के न जाने कितने लोगों से प्रेम संबंध होते हैं, यह कौन-सा प्रेम होता है समझ से परे हैं.....शायद पश्चिमी सभ्‍यता से और कुछ नहीं बस यही सीखा गया है। हालांकि जितना मुझे समझ आता है यह सब मांग और पूर्ति का खेल है (इक्‍नोमिक्‍स में पढ़ा था)। जहां जितनी मांग होती है पूर्ति होने की संभावनाएं उतनी ही प्रबल होने लगती है। चाहे कैसे भी और किसी से भी। ।
अब बहुत सारे लोग यह कह सकते हैं कि मेरा प्रेम तो सच्‍चा है....आप हमारे प्रेम पर तोहमत लगा रहे हैं, तो सच्‍चे होने की कोई परिभाषा नहीं होती..... अपने गिरवाने में एक बार जरूर झांक कर देखिए कि कभी आपने अपने प्रेमी-प्रेमिका के इतर किस अन्‍य को उस नजर से नहीं देखा, तो वास्‍तविकता से स्‍वयं परिचित हो जाएंगे। क्‍योंकि इंसान दूसरों पर झूठ का पर्दा डाल सकता है परंतु खुद को धोखें में ज्‍यादा देर तक नहीं रख सकता।  
वैसे भी झूठ का पर्दा ज्‍यादा दिनों तक नहीं ठहरता। चाहे आपे कसमें खा लीजिए, वादे कर लीजिए... झूठ एक-न-एक दिन झाड बनकर आपके समक्ष परिलक्षित जरूर हो जाएगा। अगर प्रेम सिर्फ शादी के बंधन में बंधना मात्र है तो शादी से पहले और बाद के अपने-अपने रिश्‍तों को (जिन पर राख चढ़ा रखी है) गौर जरूर फरमाइएगा.... शायद अतीत के रिश्‍तों की आग आज भी धधक रही होगी। जिस चाह कर भी आप आज तक बुझा नहीं पाएं हैं। .. तो साथी को भम्रित कर, झूठ बोल सकते हैं कि नहीं मेरा आपके पहले किसी और से कोई रिश्‍ता नहीं था... विश्‍वास रखने वाला मान लेता है, परंतु सभी को ज्ञात है कि ऐसा कोई पेड़ नहीं जिसको हवा नहीं लगी हो। वैसे इसमें बुराई क्‍या है, लगनी भी चाहिए... जरूरत और मांग जो है... परंतु इसमें छुपाने वाली बात भी नहीं होनी चाहिए.... किया है तो खुलकर स्‍वीकार करें....यदि आपका साथी वास्‍तव में आपसे प्‍यार करता है तो स्‍वीकार करेगा.... नहीं तो अपने अतीत में उड़ाए गुर्लछारे आपके जीवन को छलनी जरूर कर देंगे... फिर आप सोच रहे हैं छुपाना चाहिए.... पर कब तक... राज को राज रहने दो...... परंतु भेद तो आज नहीं कल खुल ही जाएगा....फिर क्‍या मुंह दिखाया जाएगा... इसका परिणाम सिर्फ और सिर्फ विच्‍छेद होता है.... आप अपने रास्‍ते हम अपने रास्‍ते। अब सारी की सारी मोहब्‍बत चुल्‍हें में चली जाती है और रह जाती है प्रेम की राख मात्र।
मैं प्रेम का विरोध नहीं कर रहा हूं... मात्र यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि प्रेम हर बंधनों से परे होता है.... और एक प्रेम दुबारा नहीं होता......जिनको प्रेम दुबारा हो जाता है, उनका प्रेम प्रेम नहीं रहता.. मात्र जरूरत होता है, आज इससे कल उससे.....खैर सभी समझदार हैं जो प्रेम में चाहे, वह कर सकते हैं... बस अपने वर्तमान और भविष्‍य को मददेनजर रखते हुए..... एक बार पुन: सभी को हफ्ते भर का प्रेम दिवस मुबारक....