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Saturday, April 11, 2026

आईआईएमसी की बार-बार निकलती और रद्द होती भर्तियाँ: अभ्यर्थियों के साथ अन्याय, प्रशासनिक विफलता या पारदर्शिता का अभाव?

 आईआईएमसी की बार-बार निकलती और रद्द होती भर्तियाँ: अभ्यर्थियों के साथ अन्याय, प्रशासनिक विफलता या पारदर्शिता का अभाव?

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है, जहाँ नौकरी प्राप्त करना हजारों योग्य युवाओं का सपना होता है। जब भी इस संस्थान में किसी पद के लिए भर्ती निकलती है, तो दूर-दराज़ के शहरों और गाँवों से लेकर महानगरों तक के अभ्यर्थी उम्मीद के साथ आवेदन करते हैं। वे अपने वर्षों की मेहनत, अनुभव और योग्यता के आधार पर चयन की आशा रखते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जो स्थिति सामने आई है, उसने इन उम्मीदों को बार-बार तोड़ा है। भर्ती विज्ञापन जारी होते हैं, अभ्यर्थियों से आवेदन लिए जाते हैं, शुल्क जमा कराया जाता है, आवश्यक दस्तावेज़ों की फोटोकाॅपी मांगी जाती है, और फिर कुछ समय बाद अचानक यह सूचना जारी कर दी जाती है कि भर्ती प्रक्रिया “प्रशासनिक कारणों” से रद्द कर दी गई है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कुछ समय बाद वही या उससे मिलती-जुलती भर्ती फिर से निकाली जाती है और पुनः किसी कारण से रद्द कर दी जाती है। यह सिलसिला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रह गया है, बल्कि हजारों युवाओं के भविष्य, उनकी मेहनत, उनकी आर्थिक स्थिति और मानसिक संतुलन से जुड़ा एक गंभीर जनहित का मुद्दा बन गया है। जब कोई अभ्यर्थी आवेदन करता है, तो वह केवल एक फार्म नहीं भरता, बल्कि अपनी उम्मीदों और सपनों को उस आवेदन में जोड़ देता है। आवेदन शुल्क जमा करने के साथ-साथ वह दस्तावेज़ों की फोटोकाॅपी तैयार कराने में खर्च करता है, कई बार नोटरी या प्रमाणन करवाता है, डाक खर्च करता है या ऑनलाइन शुल्क देता है, और कई मामलों में परीक्षा या साक्षात्कार की तैयारी के लिए अतिरिक्त सामग्री खरीदता है। जब भर्ती रद्द होती है, तो यह सारा खर्च व्यर्थ चला जाता है और सबसे अधिक पीड़ा इस बात की होती है कि इस नुकसान की जिम्मेदारी कोई स्वीकार नहीं करता। केवल एक पंक्ति में “प्रशासनिक कारण” लिख देना क्या वास्तव में हजारों अभ्यर्थियों के साथ हुए आर्थिक और मानसिक नुकसान का पर्याप्त उत्तर है? यह प्रश्न केवल अभ्यर्थियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है, क्योंकि जब एक प्रतिष्ठित संस्थान अपनी ही घोषित प्रक्रियाओं को बार-बार रद्द करता है, तो उसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है और यह संस्थागत जवाबदेही का विषय बन जाता है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चर्चा आवेदन शुल्क और दस्तावेज़ों के उपयोग को लेकर हो रही है। हर भर्ती के साथ एक निश्चित आवेदन शुल्क लिया जाता है, जो किसी एक अभ्यर्थी के लिए भले ही छोटी राशि लगे, लेकिन जब हजारों अभ्यर्थी आवेदन करते हैं, तो यह राशि लाखों या कभी-कभी करोड़ों तक पहुँच सकती है। यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि जब भर्ती रद्द हो जाती है, तो उस शुल्क का क्या होता है? क्या उसे वापस किया जाता है या संस्थान के पास ही रखा जाता है? यदि शुल्क वापस नहीं किया जाता, तो क्या उसकी उपयोगिता का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाता है? इसके साथ ही यह भी एक विचारणीय विषय है कि इतनी बड़ी राशि बैंक खाते में जमा रहने पर उस पर ब्याज भी प्राप्त होता होगा। उस ब्याज का क्या होता है, वह किस खाते में जाता है और उसका उपयोग किस कार्य में किया जाता है—क्या इन सभी बातों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाती है? यदि नहीं, तो यह पारदर्शिता के अभाव की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार, आवेदन के साथ जमा की जाने वाली दस्तावेज़ों की फोटोकाॅपी को लेकर भी अभ्यर्थियों के मन में गहरी चिंता है। इन दस्तावेज़ों में अभ्यर्थियों की व्यक्तिगत और शैक्षणिक जानकारी होती है, जो अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। जब भर्ती रद्द हो जाती है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इन दस्तावेज़ों का क्या किया जाता है—क्या उन्हें सुरक्षित रखा जाता है, क्या किसी निर्धारित अवधि के बाद नष्ट किया जाता है, या कहीं उनका दुरुपयोग होने की संभावना तो नहीं है? आज के डिजिटल युग में पहचान और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। यदि इस विषय में स्पष्ट दिशा-निर्देश और पारदर्शी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो शंकाएँ और आशंकाएँ जन्म लेना स्वाभाविक है। बिना प्रमाण के किसी भी प्रकार के आरोप लगाना उचित नहीं है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि संस्थान स्वयं स्पष्ट रूप से बताए कि दस्तावेज़ों का प्रबंधन कैसे किया जाता है, ताकि अभ्यर्थियों के मन में उठ रही आशंकाएँ समाप्त हो सकें और विश्वास की स्थिति पुनः स्थापित हो सके।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का प्रश्न नहीं, बल्कि जनहित और सामाजिक न्याय का विषय बन चुका है। बार-बार भर्ती रद्द होने से केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि अभ्यर्थियों का आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। वे महीनों तक तैयारी करते हैं, अपने परिवार की उम्मीदों को साथ लेकर चलते हैं और कई बार अन्य अवसरों को छोड़कर एक विशेष भर्ती की तैयारी करते हैं। जब अचानक भर्ती रद्द हो जाती है, तो उनका मनोबल टूट जाता है और उनके सामने भविष्य की अनिश्चितता खड़ी हो जाती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। यदि किसी कारण से भर्ती रद्द करनी पड़े, तो उसका स्पष्ट और विस्तृत कारण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। केवल “प्रशासनिक कारण” लिख देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही आवेदन शुल्क वापसी की स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए और दस्तावेज़ों के प्रबंधन से संबंधित नियमों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यह भी समय की मांग है कि अभ्यर्थियों को सूचना का अधिकार (RTI) जैसे कानूनी प्रावधानों का उपयोग करने के लिए जागरूक किया जाए, ताकि वे अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त कर सकें और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। अंततः यह कहा जा सकता है कि आईआईएमसी जैसी प्रतिष्ठित संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में भी एक आदर्श प्रस्तुत करे। बार-बार भर्ती निकालना और फिर उसे रद्द कर देना केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है। अब समय आ गया है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए, जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया जाए और ऐसी प्रणाली विकसित की जाए, जिसमें अभ्यर्थियों का विश्वास बना रहे और संस्थान की गरिमा भी सुरक्षित रह सके।

 

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