सरोकार की मीडिया

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Thursday, May 30, 2019

ईमानदार लोग आज भी हैं


ईमानदार लोग आज भी हैं
कहते हैं कि कोई भी विभाग घूसखोरी से अछुता नहीं है। गाहे-बगाहे लेन-देन की प्रक्रिया का संचालन होता रहता है। कभी दबाव में, तो कभी अपना काम निकलवाने के एवज में हथेलियां गर्म होती रहती है। इन सबके बावजूद हर विभाग में सभी घूसखोर नहीं हैं बहुत से ऐसे कर्मचारी/अधिकारी आज भी मौजूद हैं जो अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हैं चाहे उनके ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव क्‍यों ना पड़े। यह सब मैं किसी विभाग के कर्मचारी/अधिकारी की चापलूसी के कारण नहीं बल्कि, ईमानदार व्‍यक्ति से सबको परिचित करवाने के लिए लिख रहा हूं।
दिनांक 28 मई को शाम के लगभग 7-8 बज रहे होगें मैं किसी काम से घंटाघर पर खड़ा हुआ था और अपने एक मित्र से बात कर रहा था। तभी यातायात पुलिस की जीप सायरन बजाती हुई सावरकार चौक से घंटाघर आ रही थी, तो वहा पर खड़े फल ठेले वाले और भी अन्‍य ठेले वाले अपने-अपने ठेले को साइड में करने लगे। तभी यातायात पुलिस की जीप घंटाघर पर आ पहुंची। तो उसमें बैठे दरोगा नरेंद्र सिंह ने देखा कि एक झांसी की गाड़ी जिसका मालिक उसे अपनी सुविधा के अनुसार रोड़ के बीचों बीच खड़ा करके चला गया था। कुछ देर देखने के उपरांत जब गाड़ी मालिक नहीं आता दिखा तो दरोगा के अपने साथी सिपाही से उस गाड़ी में कब्‍जा लगाने को कहा। दरोगा का आदेश मिलते ही सिपाही ने उस गाड़ी में कब्‍जा लगा दिया। तभी कुछ देर बाद उक्‍त गाड़ी मालिक आया तो देखा कि गाड़ी में कब्‍जा लगा हुआ है। गाड़ी मालिक ने दरोगा से कब्‍जा हटाने के लिए कहा तो दरोगा नरेंद्र सिंह ने कहा कि पहले अपनी गाड़ी देखिए कैसी खड़ी है। इसके एवज में आपको अर्थ दंड का भुगतान करना पड़ेगा ताकि आप पुन: ऐसा न करे। तो गाड़ी मालिक ने कुछ ले देकर कब्‍जा हटाने को कहा, तब दरोगा नरेंद्र सिंह ने साफ-साफ कहा कि यह पैसा मेरी जेब में नहीं जा रहा, यह पैसा सरकार के खाते में जमा होगा।
कुछ देर बातचीत होने के बाद उक्‍त गाड़ी मालिक ने अपने पिता को फोन करके बुला लिया। गाड़ी मालिक के पिता आ गए तो उन्‍होंने पहले तो मामले को रफादफा करने के लिए कहा। फिर कहने लगे कि मेरी जानपहचान उक्‍त मंत्री से है कहिए तो मैं आपकी बात करवा देता हूं। गाड़ी छोड़ दो। मुझे लगा कि दरोगा जी मंत्री के दबाव में आकर गाड़ी को छोड़ देगें, या रूपया लेकर गाड़ी को जाने देगें। परंतु में गलत था। सब कुछ देखा रहा था। उक्‍त व्‍यक्ति ने पूरी तरह दबाव बनाने, व कुछ कम ले देकर मामला निपटाने की पूरी कोशिश की। परंतु दरोगा जी टस से मस नहीं हुए। और कहा कि अर्थ दंड का भुगतान करों और रसीद लो। मैं आप लोगों को भुगतान की रसीद दे रहा हूं। जब उक्‍त गाड़ी मालिक की कहीं से दाल गलती नजर नहीं आई तो उन्‍हें अर्थ दंड का भुगतान करना ही पड़ा। दरोगा जी ने अर्थदंड रसीद देकर पुन: ऐसी पार्किग न करने की हिदायत देते हुए गाड़ी में लगा कब्‍जा निकलवा दिया।
यह सब देखकर आर्श्‍चय हुआ कि दरोगा जी चाहते तो कुछ लेकर भी गाड़ी छोड़ सकते थे, परंतु नहीं उन्‍होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उक्‍त दरोगा जी को देखकर लगता है कि ईमानदार लोग आज भी हैं।

Friday, May 3, 2019

तुम्‍हारी औकात से परे


तुम्‍हारी औकात से परे
2019 के लोक सभा चुनाव के चार चरण संपन्‍न हो चुके है बाकि तीन चरणों के चुनाव होना बाकि है। यह सात चरणों के चुनावों के परिणाम क्षेत्रों के सांसदों व प्रधानमंत्री का फैसला करेंगे, यह सब जानते हैं। इसमें नया क्‍या है। सही है नया तो कुछ भी नहीं, और नया क्‍या हो सकता है। मैं तो बस चुनाव में खड़े कुछ दिग्‍गज उम्‍मीदवारों की चर्चा कर रहा हूं। राहुल गांधी जो अमेठी और रायबरेली के इतर और कहीं चुनाव नहीं लड़ते। वही मुलायम सिंह और अखिलेश मैनपुरी व सैफई छोड़कर कहीं अपना दांव नहीं अजमाते। इसके साथ ही इस सूची में और भी उम्‍मीदवार हैं जिनकी अपनी अपनी मांद है। और यह अपनी माद छोड़कर और कहीं शिकार खेलने नहीं जाते। डर लगता है कहीं और इनका शिकार न कर ले जाए। और वर्षों से कमाई इज्‍जत मिट्टी में न मिल जाए। यही सब मोदी के अंदर भी देखा गया है कि वह वाराणसी के इतर और कहीं अपनी किस्‍मत नहीं आजमा रहे। यानि अपनी अपनी मांद छोड़कर कहीं और शिकार करना नहीं चाहते....... यदि वास्‍तव में आपने विकास किया है तो अपनी मांद को छोड़कर राहुल, मुलायम, मायावती, अखिलेश, ममता, लालू के गढ़ में जाकर सेंघ लगाए तो जाने कि वास्‍तव में आप शिकारी हो। अपनी-अपनी गली में तो कुत्‍ता भी शेर होता है। छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़ों से लड़ने में क्‍या विकासगिरी है। लड़ना है तो दूसरों के घर में घुसकर लड़ों, सबको उनकी औकात समझ आ जाएगी। कौन कितने पानी में है।
अब करते हैं विकास की बात तो विकास के नाम पर जो चस्‍मा सरकार ने जनता की आंखों पर पहना रखा है उससे सिर्फ कालपनिक विकास दिखाई देता है वास्‍तविक विकास तो कोसों दूर है। यदि बड़े-बड़े उद्योगपतियों की जेबों को भरना विकास है तो हम जरूर कहेंगे कि विकास हुआ है। और यदि नहीं तो जरा गरीब किसानों और मजदूरों की जिंदगी का अवलोकन करें तो आपका विकास जमीन पर धूल चाटता नजर आएगा। खैर विकास तो हुआ है देशभर में लाखों टेक्‍सी की बिक्री हुई है जो आपने बेरोजगारों को रोजगार मुहैया करवाया है साथ ही पकौड़े जैसी विघा जो कम पढ़े-लिखे गरीब तबकों तक ही सीमित थी उस तुमने उच्‍च शिक्षित वर्गों के लिए भी खोल दी है। इसी का नाम विकास है। तो विकास तो हो रहा है।
खैर चुनाव के परिणाम 26 मई को आ जाएंगे कि किसकी कितनी औकात थी और उसने क्‍या-क्‍या हासिल कर लिया। विकास के नाम पर हो, धर्म जाति के नाम पर, गरीबों के नाम पर, आपने वोट हासिल किए हो परंतु देखना तो अब है कि तुम्‍हारी औकात कितनी है। क्‍या विकास तुम्‍हारी औकात से परे है या फिर दूसरे की मांद में सेंध लगाना।


Thursday, April 25, 2019

आधार कार्ड, जियो सिम और नोटबंदी का त्रिकोणीय संबंध


आधार कार्ड, जियो सिम और नोटबंदी का त्रिकोणीय संबंध

आधार कार्ड  भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को जारी किया जाने वाला पहचान पत्र है। इसकी स्‍थापना 28 जनवरी, 2009 को एक अधिसूचना के द्वारा योजना आयोग के  संबद्ध कार्यालय के रूप में 115 अधिकारियों और स्टाफ की कोर टीम के साथ की गई। वही जियो मुकेश अंबानी की कंपनी जिसका पूरा नाम (रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड, RJIL) है। इसकी शुरूआत 27 दिसंबर, 2015 धीरूभाई अंबानी के 83वें जन्‍म दिवस के अवसर पर की थी। रिलायंस जियो ने 4 सितंबर, 2016  सोमवार से सभी यूजर के लिए इसे लॉच कर दिया। और वेलकम ऑफर के साथ जियो कंपनी ने सभी यूजरों को 31 दिसंबर 2016 तक जियो की सर्विस को पूरी तरह से मुफ्त दिया। जिस बढ़कार 31 मार्च, 2017 कर दिया गया था। मुफ्त में सिम और कॉलिंग मिलने के एवज में हर छोटे-बड़े राज्‍यों में मारामारी देखी गई। इस सिम को पाने के लिए उपभोक्‍ता को आधार कार्ड की छायाप्रति लगानी अनिवार्य थी।  
अब बात करते हैं नोटबंदी की, तो भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया ने छोटे रूप में नोटबंदी कहा, जिसकी घोषणा 8 नवबंर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किए गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया। इस घोषणा में 8 नवबंर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया।  हालांकि भारतीय इतिहास में यह पहली बार नोटबंदी नहीं हुई है इससे पहले भी दो बार नोटबंदी हो चुकी है। अगर इसके इतिहास में जाए तो जनवरी 1946 में, 1000 और 10,000 रुपए के नोटों को वापस ले लिया गया था और 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नए नोट 1954 में पुनः शुरू किये गए थे। 16 जनवरी 1978 को जनता पार्टी की गठबंधन सरकार ने फिर से 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नोटों का विमुद्रिकरण किया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके।
सरकार ने कहा कि आप बैंकों से अपने पुराने नोट 30 दिसबंर, 2016 तक बदल सकते हैं। एक बार में आप 4000 रूपए तक बैंक से बदल सकते हैं। नोटों को बदलने के लिए आपको आधार कार्ड की एक फोटो कॉपी तथा एक फॉर्म भरने के उपरांत आपके पुराने नोट बदले गए। नोट बदलने की तारीख को 30 दिसबंर, 2016 से बढ़ाकर 31 मार्च 2017 तक कर दिया गया था।
अब आते हैं मूल मुद्दे पर..... एक तरफ मुकेश अंबानी की जियो जो मुफ्त में अपनी सेवाएं दे रही थी जिसके लिए आपको आधार कार्ड की जरूरत थी, वहीं नोट बदलने के लिए भी आधार कार्ड जरूरी था। एक तरफ जियो के लिए लोग लाइनों में लगे देखे गए, वहीं दूसरी ओर अपने पुराने नोटों को बदलने के लिए भी पूरा देश लाईन में लगा दिखाई दिया। अब इसको इत्‍तेफाक कहें यह एक सोची समझी साजिश कि दोनों की तिथियों एक ही थी.......जियो ने पहले 31 दिसंबर, 2016 तक अपनी सेवाएं मुफ्त में दी। वहीं नोटों का पहले बदलने की तिथि 30 दिसंबर, 2016 ही थी। जियो ने इसे बढ़कार 31 मार्च, 2017 कर दिया गया तो भारत सरकार ने भी नोटों को बदलने की तिथि भी 30 दिसंबर से बढ़ाकर 31 मार्च, 2017 तक कर दी थी।
मुझे तो यह बहुत ही बड़ा आधार कार्ड घोटाला नजर आता है कि तत्‍कालीन सरकार द्वारा काला धन का हावाला देते हुए 500 और 1000 रूपए के नोट बंद किया गए थे और यह भी कहा गया था कि नोटबंदी से आतंकवाद का खात्‍मा हो जाएगा। ना तो काला धन नजर आया और न ही आतंकवाद खत्‍म हुआ। फिर नोटबंदी का फायदा आखिर हुआ क्‍या.... हुआ बहुत फायदा हुआ.. हम और आपको नहीं बल्कि मुकेश अंबानी को....  क्‍योंकि सरकार ने कहा कि आप एक दिन में 4000 रूपए आधार कार्ड लगाकर कर बदल सकते हैं वहीं जियो ने सिम के एवज में लोगों से आधार कार्ड एकृत्रित किए। मुकेश अंबानी ने स्‍वयं कहा था कि 31 मार्च, 2017 तक 15 करोड़ लोग जियो का इस्‍तेमाल करने लगे हैं।
अब आते है गणीतीय सिद्धांत पर तो ज्ञात होता है कि एक आधार कार्ड पर आप 4000 रूपए बदल सकते थे तो 15 करोड़ आधार कार्ड यानि 15 करोड़ x 4000 =  600000000000 रूपए काला धन सफेद हो गया। सरकार द्वारा लागू नोटबंदी से मुकेश अंबानी ने अपना सारा काला धन सफेद कर लिया। और आम जनता मुफ्त मे सिम पाने के लिए और अपने नोट बदलने के लिए लाइनों में खड़ी रही। दूसरी तरफ अंदर ही अंदर खेल होता रहा। इस खेल की पृष्‍ठभूमि की स्किप्‍ट एक दिन में नहीं लिखी गई होगी। काफी गुणा गणित कर इसे तैयार किया गया होगा। तब जाकर मुकेश अंबानी जैसे खरबपतियों का पैसा सफेद हो गया। क्‍योंकि देखा गया था कि बैंक किसी और के आधार कार्ड पर रूपया नहीं बदल रही थी। तो मुकेश अंबानी जैसे लोगों का पैसा कैसे बदल गया जबकि एक दिन में मात्र 4000 रूपए ही बदल सकते थे। और 250000 रूपए के पुराने नोट ही जमा कर सकते थे। तो अंबानी जैसे लोग लाइनों तो खड़े नजर नहीं आए। फिर इनका पुराने रूपया कहां से और कैसे बदला गया सोचने वाली बात है। इसके साथ-साथ आप इस बात पर भी गौर कीजिए कि 31 मार्च, 2017 तक जियो कंपनी ने सिम देने के लिए आधार की फोटो कॉपी ली फिर बाद में ऑन लाइन वैरिफीकेशन करवाया गया। इस खेल में सरकार और रिर्जब बैंक का किरदार मुख्‍य भूमिका में है। यदि और अंदर धुसा जाए तो रघुराम राजन को 4 सितंबर, 2016 को इस्‍तीफा दिलाकर 5 सितंबर, 2016 को उर्चित पटेल (अंबानी के रिश्‍तेदार) को भारतीय रिर्जब बैंक का गर्वनर नियुक्‍त किया गया।
इस आधार कार्ड, जियो सिम और नोट बंदी का त्रिकणम वाकई चाणक्‍य बुद्धि की देन रहा है। बस आप आंकड़ों और तारीखों पर गौर कीजिए आप खुद ब खुद समझ जाएंगे कि सरकार और रिर्जब बैंक की मिलीभगत द्वारा किस-किस का रूपया काला से सफेद हुआ है और जनता तो है ही उल्लू... खड़ी हो गई लाइन में। सही बात है यह भारत है यहां मुफ्त में गू (पैकिंग कर) (लेवल लगाकर) मिलने लगे तो लोग उसके लिए भी लाइन में खड़े हो जाएंगे क्‍योंकि मुफ्त की आदत हो गई है।




Thursday, February 14, 2019

सप्‍ताह भर की मोहब्‍बतें.....


सप्‍ताह भर की मोहब्‍बतें.....
सभी को प्रेम दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..... आशा है आप सभी का प्रेम सप्‍ताह अच्‍छी तरह गुजरा होगा....क्‍या यह आपका प्रेम का हफ्ता था या फिर सिर्फ हफ्ते भर का प्रेम था। खैर इस प्रेम दिवस (पश्चिमी सभ्‍यता की चासनी में डुबा हुआ) के उपलक्ष्‍य पर नए प्रेमी-प्रेमिकाओं की उत्‍पत्ति हुई होगी, वहीं पुराने प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रेम में असीमित बढ़ोत्‍तरी हुई होगी...... ऐसा महौल देखकर प्रतीत होता नहीं... वहीं कुछ लोगों के दिल (बिना हड्डी वाला) टूटा भी होगा और कुछ प्रेमी-प्रेमिकाओं की शादी (किसी और से) हो चुकी होगी। अन्‍य से विवाह का कारण तरह-तरह की बंदिंशें, जाति, धर्म, परिजनों का न मानना आदि बहाने ....यह सब जब भी प्रेमी-प्रेमिकाओं को आपस में शादी करने की बात आती है तब ही उत्‍पन्‍न होते हैं, प्रेम के नाम पर नहीं.... प्रेम के नाम पर न तो ऊंच-नीच देखी जाती है, न ही जाति-धर्म.... यह हर बंदिंशों से परे होता है। ऐसा कहा जा सकता है, परंतु इसके पीछे की पृष्‍ठभूमि से सभी भली-भांति परिचित होते हैं। परंतु अंजान बनने, या अंजान बने रहने का दिखावा करते रहते हैं। दिखावे-सा ही तो हो गया है आज का प्‍यार..... जानू, बेबी, सोना, जान, लव यू... लव यू कहते रहो (झूठा ही सही, पल भर के लिए प्‍यार तो करो) तो समझों आप प्‍यार करते हैं, अपनी प्रेमी-प्रेमिकाओं की नजरों में.... और आज के प्रेम से कौन-सा शख्‍स परिचित नहीं है कि यह सिर्फ-सिर्फ किसकी पूर्ति हेतु किया जा रहा है.... पूर्ति हुई नहीं कि प्रेम गंधे के सिर से सींग की भांति गायब हो जाता है। इसके  बाद भी प्रेम, प्‍यार, लव, चाहत, मोहब्‍बत आदि का दिखावा करना पड़ता है ताकि पूर्ति होती रहे।  और जब ....खत्म हो जाता है इश्क़ जिस्मों का.... फिर लोग तोहफे को सड़कों पर यूँ ही  छोड़ जाते है। या फिर आप सभी जानते हैं कि क्‍या-क्‍या होता है। कहने की जरूरत नहीं है। इसे सिर्फ समझा जा सकता है।
हालांकि आंकड़ों से प्रेम को नापा जाए तो 97 प्रतिशत मामलों में पूर्ति के उपरांत प्रेम नदारत हो जाता है। और उनके बीच इसके कुछ समय सीमा तक ही प्रेम संबंध बने रहते हैं फिर वह किसी न किसी कारण को बता कर एक-दूसरे से किनार कर लेते हैं। हां मात्र 3 प्रतिशत ही लोगों अपने प्रेम को कोई नाम दे पाते हैं। वहीं इन 3 प्रतिशत लोगों में वो लोग भी शामिल हो जाते हैं जो प्रेम को नाम देने के उपरांत अपने जीवन साथी से तालुकात ही नहीं रखना चाहते... और वह विवाह-विच्‍छेद कर दूसरे के साथ प्रेम में बंध जाते हैं। सोचने वाली बात है कि अब आपका प्रेम कहां नदारत हो गया। देखा तो यहां तक गया है कि एक प्रेमी-प्रेमिकाओं के न जाने कितने लोगों से प्रेम संबंध होते हैं, यह कौन-सा प्रेम होता है समझ से परे हैं.....शायद पश्चिमी सभ्‍यता से और कुछ नहीं बस यही सीखा गया है। हालांकि जितना मुझे समझ आता है यह सब मांग और पूर्ति का खेल है (इक्‍नोमिक्‍स में पढ़ा था)। जहां जितनी मांग होती है पूर्ति होने की संभावनाएं उतनी ही प्रबल होने लगती है। चाहे कैसे भी और किसी से भी। ।
अब बहुत सारे लोग यह कह सकते हैं कि मेरा प्रेम तो सच्‍चा है....आप हमारे प्रेम पर तोहमत लगा रहे हैं, तो सच्‍चे होने की कोई परिभाषा नहीं होती..... अपने गिरवाने में एक बार जरूर झांक कर देखिए कि कभी आपने अपने प्रेमी-प्रेमिका के इतर किस अन्‍य को उस नजर से नहीं देखा, तो वास्‍तविकता से स्‍वयं परिचित हो जाएंगे। क्‍योंकि इंसान दूसरों पर झूठ का पर्दा डाल सकता है परंतु खुद को धोखें में ज्‍यादा देर तक नहीं रख सकता।  
वैसे भी झूठ का पर्दा ज्‍यादा दिनों तक नहीं ठहरता। चाहे आपे कसमें खा लीजिए, वादे कर लीजिए... झूठ एक-न-एक दिन झाड बनकर आपके समक्ष परिलक्षित जरूर हो जाएगा। अगर प्रेम सिर्फ शादी के बंधन में बंधना मात्र है तो शादी से पहले और बाद के अपने-अपने रिश्‍तों को (जिन पर राख चढ़ा रखी है) गौर जरूर फरमाइएगा.... शायद अतीत के रिश्‍तों की आग आज भी धधक रही होगी। जिस चाह कर भी आप आज तक बुझा नहीं पाएं हैं। .. तो साथी को भम्रित कर, झूठ बोल सकते हैं कि नहीं मेरा आपके पहले किसी और से कोई रिश्‍ता नहीं था... विश्‍वास रखने वाला मान लेता है, परंतु सभी को ज्ञात है कि ऐसा कोई पेड़ नहीं जिसको हवा नहीं लगी हो। वैसे इसमें बुराई क्‍या है, लगनी भी चाहिए... जरूरत और मांग जो है... परंतु इसमें छुपाने वाली बात भी नहीं होनी चाहिए.... किया है तो खुलकर स्‍वीकार करें....यदि आपका साथी वास्‍तव में आपसे प्‍यार करता है तो स्‍वीकार करेगा.... नहीं तो अपने अतीत में उड़ाए गुर्लछारे आपके जीवन को छलनी जरूर कर देंगे... फिर आप सोच रहे हैं छुपाना चाहिए.... पर कब तक... राज को राज रहने दो...... परंतु भेद तो आज नहीं कल खुल ही जाएगा....फिर क्‍या मुंह दिखाया जाएगा... इसका परिणाम सिर्फ और सिर्फ विच्‍छेद होता है.... आप अपने रास्‍ते हम अपने रास्‍ते। अब सारी की सारी मोहब्‍बत चुल्‍हें में चली जाती है और रह जाती है प्रेम की राख मात्र।
मैं प्रेम का विरोध नहीं कर रहा हूं... मात्र यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि प्रेम हर बंधनों से परे होता है.... और एक प्रेम दुबारा नहीं होता......जिनको प्रेम दुबारा हो जाता है, उनका प्रेम प्रेम नहीं रहता.. मात्र जरूरत होता है, आज इससे कल उससे.....खैर सभी समझदार हैं जो प्रेम में चाहे, वह कर सकते हैं... बस अपने वर्तमान और भविष्‍य को मददेनजर रखते हुए..... एक बार पुन: सभी को हफ्ते भर का प्रेम दिवस मुबारक....

Tuesday, November 27, 2018

चांद पर पहुंचने के बाद राजनैतिक लोगों की प्रतिकिया


चांद पर पहुंचने के बाद राजनैतिक लोगों की प्रतिकिया

लो जी हम तो मोटरसाईकिल से चांद पर पहुंच गए...... मेरे चांद पर पहुंचने की जानकारी मिलने पर कुछ राजनैतिक लोगों की प्रतिक्रिया यूं हुई.....

प्रधानमंत्री.... भाईयों और बहनों..... देश का प्रधानमंत्री कौन है....और सबसे पहले चांद पर किसको पहुंचना चाहिए...बोलों किसको पहुंचना चाहिए....बताओं किसको.....

 राहुल गांधी.... भाइयों....यह सब मोदी की चाल है...मोदी नहीं चाहती कि कांग्रेस चांद पर जाए.... यह सरासर नाइंसाफी है।

केजरीवाल.... मैं तो पहले से ही कह रहा था कि चांद पर मोदी सबसे पहले अपने आदमी को पहुंचा देंगे.... इसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए.... नहीं तो हमारी पार्टी धरना करेगी।

अंबानी.... मोदी जी से हमारा साम, दाम का रिश्‍ता है मोदी जी ने कहा था कि सबसे पहले हमें चांद पर पहुंचाएं... बाद में खुद आएंगे... पर यह मोदी जी ने अच्‍छा नहीं किया।

अमित शाह..... हमारी पार्टी स्‍वयं चांद पर न जाकर उसने एक आम आदमी को चांद पर पहुंचाने का बहुत बड़ा काम किया है। 

उमा भारती.... आप लोगों को चांद की पड़ी है, आप लोगों को मेरे बारे में जरा सी भी फ्रिक नहीं है कि 2018 खत्‍म होने वाला है और मैं गंगा को पूरी तरह साफ नहीं करा पाई हूं.... अब मुझे जल समाधि लेनी पड़ेगी।

अखिलेश यादव......मैं तो पहले सी जानता था कि मोदी ऐसा ही करेगा..... इसका परिणाम आने वाले लोकसभा में उन्‍हें भुगतना पड़ सकता है।

मायवाती.... यह दलितों के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी है, सबसे पहले चांद पर एक दलित को भेजना चाहिए। मैं इस बात की घोर निंदा करती हूं।

आडवानी.... काश मोदी जी चांद पर हमको ही पहुंचा देते... तो क्‍या बिगड जाता.. मैंने पार्टी के लिए कितना कुछ नहीं किया, परंतु अब मेरी दश देखों मोदी ने क्‍या कर दी है।

योगी जी..... चांद पर अपनी पार्टी लाएंगे और मंदिर वहीं बनाएंगे।

ओबेसी.....यह सब मुस्लिम विरोधी साजिश है, सबसे पहले एक हिंदू को चांद पर पहुंचाया गया है, हम चुप नहीं बैठेंगे।  

ममता....हमार के तुमार.... बंगाल के लोगों के साथ अच्‍छा नहीं किया.... उत्‍तर प्रदेश के आदमी को चांद पर पहुंचाकर।

लालू..... ई ससूरा बुडबक.... चांद पर पहुंच गया.... और हम हैं कि अभी तलक यही अटके पड़े हैं। सबरी चाल ई मोदीया की है।

इसी तरह की प्रतिक्रिया देखी गई... अब आप ही बताएं कोई चांद पर भी नहीं जा सकता.. इस पर भी राजनीति कर रहे हैं।

Sunday, November 18, 2018

डर-सहमे शिवराज

डर-सहमे शिवराज


कल सुबह भोपाल से घर लौटते समय सामने यात्रा करने वाले सहयात्री द्वारा एक समाचार पत्र खरीदा गया (समाचारपत्र का नाम गुप्‍त रखा गया है)। जिसको सहयात्री द्वारा पढ़ने के उपरांत अपनी सीट पर फेंक दिया गया। सोचा समय है हम भी इसका वाचन कर लेते हैं। तो सहयात्री से अनुरोध करते हुए अखबार मांग लिया, जिसे सहयात्री ने बिना किसी संकोच के दे दिया। अखबार हाथ में आते ही सबसे पहले मेरी दृष्टि समाचार पत्र में प्रकाशित एक विज्ञापन पर पड़ी। यह विज्ञापन बीजेपी, मध्‍यप्रदेश द्वारा वर्तमान मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में निकाला गया था। जिसमें कांग्रेस के पापों को गिनाते हुए कहा गया कि कांग्रेस गरीबों के दर्द पर गरीबी हटाओं का नमक छिड़कते रहे और बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान मजदूर को मजबूर ना होने का संबल देते रहे। वहीं जब अखबार का पन्‍ना पटला ही था तो दूसरा विज्ञापन चासनी से परिपूर्ण प्रकाशित था। जिसमें कहा गया कि गरीबों की हर समस्‍या का समाधान खोजने वाली देश की पहली सरकार, भाजपा सरकार है। साथ ही 2003 में मध्‍यप्रदेश जहां बीमारू की क्‍या स्थिति था, वहीं 2018 तक वह समृद्ध हो गया है।  यह तो अच्‍छी बात है कि मध्‍यप्रदेश शिवराज सिंह चौहान के पिछले 15 सालों में बीमारू से समृद्ध हो गया है परंतु इस बात की पुष्टि कौन और कैसे की जा सकती है कि मध्‍यप्रदेश वर्तमान में समृद्धि की ओर अग्रसर है। बस योजना बना देने से क्‍या वास्‍तविक जरूरतमंदों को योजना का लाभ मिल सका है या वह भी ऑफिस-ऑफिस के खेल में फंसा रहा। क्‍या आंकड़े वास्‍तविक हकीकत को बयां करते हैं।

 वैसे मध्‍यप्रदेश में पिछले 15 सालों से बीजेपी (शिवराज) की सत्‍ता कायम है। तो जब आपके द्वारा इतनी सारी योजनाओं से सभी को लाभ हुआ है तब आप इतने डरे-सहमे हुए खुद को महसूस क्‍यों कर रहे हैं। आपने काम किया है तो आपको उसका फल जरूर मिलेगा, और यदि सिर्फ कागजी खानापूर्ति हुई है और जरूरतमंदों सिर्फ ठगा गया है तो उसका नतीजा भी आपके सामने आ ही जाएगा। अपने मियां मिठ्ठू क्‍यों बन रहे हैं कि हमने यह किया, हमने वह किया। कोई गरीबों की मदद करे फिर यह जताए कि हमने यह किया हमने उसके लिए वह किया। क्‍या शोभा देता है।

वैसे विज्ञापन को देखकर इसका अंदाजा कोई भी व्‍यक्ति साफ लगा सकता है कि यह विज्ञापन की शक्‍ल में पेड न्‍यूज है। जो बीजेपी सरकार (शिवराज) की महिमा मंडन कर रहा है। और कांग्रेस या अन्‍य पार्टियों को नीचा दिखाने का काम करता हुआ प्रतीत होता है। और तो और विज्ञापन के माध्‍यम से इतना भी कह दिया गया कि गरीबों की हर समस्‍या का समाधान खोजने वाली कोई पहली सरकार है तो भाजपा की सरकार है। यह सुनने में कितना अच्‍छा लग रहा है। क्‍योंकि अच्‍छा सुनने में अच्‍छा ही लगता है। कानों को सकून देते है कोई भी हो......परंतु लिखने और करने में बहुत फर्क होता है। अपने 15 सालों में अपने द्वारा किए गए कामों और योजनाओं को तो विज्ञापन के द्वारा गिनवा दिया, पर कभी चुनाव से पहले जनता से किए गए वादों को याद तो कर लेते..... अपना मेनफेस्‍टों को देख लेते, जो किसी पांच सितारा होटल के मेन्‍यू कार्ड से कम नहीं था। क्‍या वह मेनफेस्‍टों आपकी सरकार ने पूरा किया है। यदि पूरा किया है तो फिर इस तरह के विज्ञापन निकलवाने का क्‍या औचित्‍य है समझ से परे लगता है। वैसे अपने प्रदेश की हकीकत जाननी हो तो शहरों की चकाचौंध को छोड़कर उन गलियों का भम्रण भी कर आए जहां गरीब अपनी समस्‍या से खुद दो-चार हो रहे हैं और आपकी योजनाएं उन तक नहीं पहुंच पा रही है। खैर जनता जगरूक है इसका जवाब वह खुद देगी। समय आने पर............

Monday, November 12, 2018

‘’रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई’’


‘’रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई’’


केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने लखनऊ में कहा था कि यदि वह 2018 तक गंगा को पूर्णत: साफ करा पाने असमर्थ रही, तो वह दिसंबर, 2018 तक जल समाधि ले लेगी। ज्ञात हो कि केंद्र सरकार द्वारा नमामि गंगे योजना के तहत 20 हजार करोड़ रूपए पारित हुए थे जिसकी राशि बहुत पहले ही दी जा चुकी है। आर.टी.आई के खुलासे से ज्ञात हुआ कि मोदी सरकार के शासनकाल में नमामि गंगे योजना फेल हो चुकी है और साफ होने के वनस्‍पत गंगा में प्रदूषण और बढ़ा है। यानि गंगा अभी तक साफ नहीं हो सकी है। वहीं केंद्रीय मंत्री के वादे पूरे करने के बयान पर सोशल मीडिया पर लोग उनका जमकर मज़ाक बना रहे हैं। लोग उनके गंगा सफाई के उस वादे को याद कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर वह गंगा को साफ़ करने में नाकाम रहीं तो जलसमाधि ले लेंगी। तो अब इंतजार की घंडियां खत्‍म होने वाली है दिसंबर नजदीक है शायद उमा भारती जगह तलाश कर रही होंगी कि वह किस जगह का चयन करें जहां वह समाधि लेंगी। अभी तक उन्‍होंने जगह का चयन भी कर लिया होगा, क्‍योंकि 2018 के समाप्‍त होने में ज्‍यादा दिन नहीं बचे हैं। अब देखना यह है कि वह अपने वादे पर कायम रहती हैं या यह सिर्फ एक जुमला मात्र था। और इनकी पार्टी के सारे नेता इसी तरह जनता से वादे करके मुकर जाते हैं। ठीक राम मंदिर की तरह। सत्‍ता में आने से पहले मोदी ने कहा था यदि हमारी सरकार केंद्र में आई तो राम मंदिर का निर्माण होगा, परंतु जिस पंडाल में रामलला विराजमान थे अभी भी उसी दशा में विराजमान है। केंद्र और उत्‍तर प्रदेश दोनों में बीजेपी की सरकार है। इसके बावजूद मंदिर का निर्माण अभी करा पाने में वह असमर्थ साबित हुए हैं। अब तो फिर से लोकसभा के चुनाव नजदीक आने वाले हैं फिर राम मंदिर का मुद्दा गरमाने लगा है। वैसे देखा जाए तो मुद्दा गरमाने नहीं लगा, वह ठंडा पड़ता जा रहा है क्‍योंकि सर्दी ने दस्‍तक दे दी है और जनवरी तक कंपकपाती हुई ठंडक पड़ने वाली है तो फिर राम मंदिर का मुद्दा भी ठंडे बस्‍ते में जाता दिखाई दे रहा है।
खैर राम मंदिर के मुद्दे को छोड़ देते हैं जब बनना होगा तब बन जाएगा, और नहीं बनना होगा तो नहीं बनेगा। बनने और न बनने से जनता को नुकसान या मुनाफा नहीं होने वाला। हां मंदिरों में विराजमान मठाधीशों की चांदी जरूर हो जाएगी।  इसलिए छोड़ देते हैं इस मुद्दे को.... हम अपने असल मुद्दे पर आते हैं, जी हां नमामि गंगे योजना पर.... जिसमें पारित 20 हजार करोड़ रूपए  लगता नहीं गंगा सफाई में खर्च किए जा चुके हैं, गंगा की वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि चासनी का स्‍वाद सभी चींटियों से ले लिया है। और अब सिर्फ बचा है तो सिर्फ पानी.... हां सिर्फ पानी वो भी प्रदूषण युक्‍त। वैसे जो नेता यह कहे कि गंगा पहले से साफ हुई है तो हमारे पास ले आए हम उनके गंगा के ऐसे स्‍थान पर ले जाएंगे और वहां से बोतल में पानी भरकर कहेंगे कि इसको पूरा पीकर दिखाएं.... प्रत्‍यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं पड़ती साहब..... आपकी पार्टी के वादे सिर्फ खोंखले वादे ही होते हैं हकीकत इससे कोसों दूर है जिसे आपका चश्‍मा तो दूर की बात है गांधी का चश्‍मा भी नहीं देख पाएंगा।
अब देख पाए या न देख पाए, देखना तो सिर्फ इतना है कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती दिसंबर, 2018 तक जल समाधि कहां पर ले रही हैं... क्‍योंकि अभी तक इनकी पार्टी द्वारा इस बात की पुख्‍ता शासकीय तौर घोषणा नहीं की गई है... कि उनकी मंत्री महोदया जी कब और कहां, कितने समय पर जलसमाधि लेंगी। कोई आयोजन, व्‍यवस्‍था दिखाई नहीं पड़ रही है..... कुछ तो बीजेपी पार्टी को करना ही चाहिए, ज्‍यादा बड़ा न सही छोटा-सा ही कर दीजिएगा.... ताकि उमा भारती की आत्‍मा को शांति मिले.....वैसे हम सब भी इनकी जल समाधि के उपरांत दो वक्‍त का मौन व्रत भी रख लेंगे.... क्‍योंकि यह अपने वादे पर कायम जो होने जा रही हैं... और यदि वह ऐसा नहीं करती हैं तो जूते की माला भी तैयार करके रखी है। क्‍योंकि यह अपने आप को बड़े राम भक्‍त बताते हैं तो राम ने कहा था... ‘’रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई’’..... यह भी मंत्री महोदय जी वचन वाली बात है। बाकि हमारे प्रधानमंत्री ने कुछ समय पहले स्‍वयं ही कहा था कि कुछ नेता झूठ बोलने वाली मशीन होते हैं एके47 की तरह झूठ बोलते रहते हैं अब यह देखना है कि मोदी जी अपनी पार्टी के नेताओं की बात कर रहे थे या फिर दूसरी पार्टी पर तंज कस रहे थे। चलो फिर कुछ समय और इंतजार कर लेते हैं सब कुछ साफ हो ही जाएंगा.....चलता हूं... अपना ख्‍याल रखना।