सरोकार की मीडिया

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Wednesday, November 8, 2017

मीडिया का भक्ति काल

मीडिया का भक्ति काल



संपूर्ण मीडिया को 400 करोड़ की चढ़ौत्री-चढ़ावे के कारण इस समय मीडिया में भक्ति काल चल रहा है.... मोदीमय भक्ति काल... परंतु मोदी यह नहीं जानते कि जब तक चढ़ोत्री चढ़ती रहेगी तभी तक उनका समय बना हुआ है जिस दिन चढ़ावा बंद हुआ उसी दिन से उनका व उसकी पार्टी का काल शुरू हो जाएगा...क्‍योंकि मीडिया अब पहले जैसा नहीं रहा जो वास्‍तविक हकीकत से सभी को रूबरू करवाता था (बिना किसी लालच के)।  वर्तमान समय में मीडिया गिरगिट बन चुका है.. समय-समय पर अपना रंग बदलता रहता है... या फिर यूं कहे कि वर्तमान समय में मीडिया सरकार द्वारा डाली जाने वाली हड्डियों पर अपनी दुम हिला रहा है क्‍योंकि कुत्‍ता वफादर होता है अपने मालिक की नहीं भंजाएगा फिर किसकी भंजाएगा... परंतु वह यह भूल जाते है कि इससे पहले यह किसी और का था और अब उसकी को काट रहा है.... समय के बदलते ही यह वर्तमान सरकार को नहीं काटेगा इसकी क्‍या गारंटी है.... भई काटेगा... तुमको भी काटेगा... बस समय आने दीजिए.... अभी जो आपका मीडिया में भक्तिमय काल चल रहा यह सब चढ़ौत्री के कारण है.... जिस आपकी तरफ से कृपा आनी बंद हो जाएगी यह पक्‍का काटेगा... क्‍योंकि यह मीडिया है यह किसी का भी सगा नहीं हो सकता... बस इसके लिए माया ही सब कुछ है... और हो भी क्‍यों नहीं… क्‍योंकि बिना अर्थ के कुछ नहीं हो सकता।  खैर समय रहते चेत जाए तो ठीक नहीं तो इंजेक्‍शन के लिए तैयार रहे...

Tuesday, November 7, 2017

कैशलेस का दर्द

कैशलेस का दर्द
आज रात्रि के 9 बजे के अपने कार्यक्रम जनमन में ए बी पी द्वारा यह दिखाने की भरकस कोशिश की जा रही थी कि मोदी द्वारा कैशलेस की योजना कितनी साकार साबित हुई.... अपने कार्यक्रम में ए बी पी द्वारा अपने कुछ महिला एंकरों को लिया... जो यह दिखाने का प्रयास करती हुई नजर आई कि मोदी की कैशलेस योजना वास्‍तव में कारगर साबित हुई... महिला एंकरों में से एक महिला एंकर द्वारा अपने न्‍यूज कार्यालय नई दिल्‍ली से देहरादून तक का सफर किया। जिसमें सबसे पहले उक्‍त एंकर ने ऑन लाइन आई आर सी टी सी से अपना टिकट बुक किया....जिसका भुगतान उसने अपने एकाउंट से किया, इसके पश्‍चात उसने ओला कैब बुक करकेअपने न्‍यूज कार्यालय से नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन पहुंची और ओला कैब का भुगतान पेटीएम के माध्‍यम से किया.... इसके बाद वह नई दिल्‍ली से शताब्‍दी ट्रेन पकड़कर 5 घंटें के सफर के उपरांत देहरादून पहुंची और फिर वहां से फिर उसके ओला कैब की और देहरादून के प्रमुख बाजार पहुंची, ओला कैब का भुगतान पेटीएम के द्वारा ही किया गया... बाजार में उक्‍त एंकर द्वारा कुछ चुंनिदा दुकानों पर खरीददारी की और उसका भुगतान भी पेटीएम द्वारा करते दिखाया गया.... फिर एक जगह एक स्‍वेटर खरीदा उसका भुगतान कैश में किया गया... इसके बाद उसने खाना खाया और खाने का भुगतान भी पेटीएम द्वारा किया गया बाद में देहरादून से शताब्‍दी ट्रेन पकड़कर नई दिल्‍ली पहुंचते हुए दिखाया जाता है... और फिर यह भी बताया जाता है कि 87 प्रतिशत मेरी यात्रा कैशलेस रही.... इस पूरी स्‍टोरी को देखने के उपरांत एक तो बहुत गुस्‍सा आया फिर हंसी आने लगी... कि किस प्रकार मोदीमय मीडिया कुछ भी दिखाने लगी है.... वैसे इस कार्यक्रम का यदि वास्‍तव में विश्‍लेषण किया जाए तो उक्‍त महिला एंकर हकीकत से कोसों दूर नजर आएगी... क्‍योंकि उक्‍त एंकर को जो दिखाना था उसके द्वारा दिखाया गया पर वास्‍तविक हकीकत से जरा से रूबरू हो जाती तो अच्‍छा था.... आपने अपने  ऑफिस में बैठकर अपना टिकट ऑन लाइन बुक कर लिया...वो भी शताब्‍दी एक्‍सप्रेस में....जरा महोदया जी यह भी देख लेती कि देश की कितने प्रतिशत जनता वास्‍तव में ऑन लाइन टिकट कर पाने  में सक्षम हैं और कितने प्रतिशत जनता जनरल बोगियों में सफर करती है... उन लोगों से पूछ लेते कैशलेस का वास्‍तविक दंश.... जितने प्रतिशत पूरी ट्रेन में सवारियों की संख्‍या होती है उसके कहीं अधिक उन जनरल बोगियों में होते हैं जिनको अपने एक सिरे से नजर अंदाज कर दिया.....खैर आगे चलते हैं अपने ओला कैब बुक कर लिया और पहुंच गए रेलवे स्‍टेशन और भुगतान किया पेटीएम से.... अब यह भी बता देती तो बेहतर ही होता कि कितने प्रतिशत लोग ओला कैब का प्रयोग करते हैं.. और  यह वर्ग कौन सा है।  क्‍या (किसान वर्ग, मजदूर वर्ग,  दिहाड़ी वर्ग और आम आदमी यह ओला कैब का प्रयोग करते हैं  जबाव मिलेगा नहीं यह वह लोग है जो बसों में सफर करते हैं ट्रेक्‍सी में सफर करते हैं पर ओला का प्रयोग नहीं कर पाते) ओला कैब का प्रयोग सिर्फ धनाढ्य वर्ग के लोग ही अधिक करते हैं  जैसा उक्‍त महिला एंकर द्वारा किया गया...  इसके बाद प्रश्‍न यह उठता है कि कितने प्रतिशत लोग अच्‍छे होटलों पर खाना खाते हैं.... अरे भई आम जनता उन ढावों पर, उन ठेलों पर खाना खा कर अपना गुजारा कर लेते हैं जहां पर 25 से 30 रूपए में भोजन मिल जाता है वह इन होटलों की तरफ रूख नहीं कर सकते जहां 200 से 250 रूपए में खाना मिलता है क्‍योंकि इनके आमदनी ही दिन की 200 रूपए होती है.. अब बात यह है क्‍या यह ढावें और ठेलों पर खाना बेचने वाले पेटीएम से भुगतान ले सकते है या यह मजदूर वर्ग पेटीएम से भुगतान करने की वास्‍तविक स्थिति में दिखाई देते हैं। जबाव मिलेगा नहीं।

खैर एबीपी के एंकरों द्वारा जो दिखाया गया वह मोदीमय कारनामों को सही ठहराने मात्र था कि  मोदी द्वारा कैशलेस कितना कारगर साबित हुआ.. सो उनके द्वारा दिखा दिया गया... अगर वास्‍तविक हकीकत जाननी हो तो जनरल बोगी में यात्रा करते हुए किसी गांव में चले जाए औकात पता चल जाएगी.... कि क्‍या सही है और क्‍या गलत.... एसी बोगियों में और एसी गाडियों में सफर करने वाले क्‍या कभी जनरल बोगियों में यात्रा करने वाले लोगों का दर्द समझ पाए हैं जो अब समझेंगे.....बाकि मीडिया है और मोदी सरकार ने मीडिया के लिए 400 करोड़ की रकम पहले से ही रख रखी है तभी तो सभी चैनल मोदीमय गुणगान गाते हुए दिखते हैं.....

Monday, November 6, 2017

टंटा ही खत्‍म

टंटा ही खत्‍म
एक हाथ पर - आधार कार्ड नंबर गुदवा ले
दूसरे हाथ पर- पेन कार्ड नंबर गुदवा ले
माथे पर - जी एस टी नंबर गुदवा ले
एक गाल पर - मतदाता पहचान पत्र गुदवा ले
दूसरे गाल पर - बैंक एकाउंट नंबर गुदवा ले
छाती पर - समग्र परिवार आई डी गुदवा ले
एक बाजू पर- खुद की परिवार आई डी गुदवा ले
दूसरी बाजू पर - एस सी \एस टी/सवर्ण गुदवा ले
पेट पर - ड्राइविंग लाइसेंस नम्वर गुदवा ले
पीठ पर - बैंक में जमा रकम लिख कर रखें
गंजे सिर पर- भारतीय गुदवा ले व जिनके बाल है वह कटिंग ऐसी करा ले जिसमे भारत का नक्शा बनवा हो
और कोई - बकाया नंबर हो तो टांगे ।
दरअसल

यह अनुभव हुआ है, कि जिंदा रहने पर यह चीजे पग पग पर लगने लगी है । दूसरी ओर यह बात भी सुनी है कि, शवदाह गृह और सरकारी व संस्थाओं द्वारा संचालित मुक्तिधाम में उन्हीं को जलाया जायेगा जिनके पास उक्त पहचान पत्र होगें । तब मरने वाले को मरने के पहले घरवालों को बताकर रखना होगा कि उक्त डाक्यूमेंट कहाँ  रखे हैं । इसीलिऐ गुदवा कर टंटा ही समाप्त करना हितकर है । अन्यथा बिना  बतालाए मरने पर परिजन शोक मनाने बैठेंगे या घर में डाक्यूमेंट के लिए छापामारी करने लग जायेंगे । शवयात्रा में आए लोग भी पूंछेगे कि डाक्यूमेंट पूरे हैं  तो चलते है अन्यथा वापिस जाते है।

Friday, November 3, 2017

जनता तो उल्‍लू है....

जनता तो उल्‍लू है....

ललितपुर नगर पालिका परिषद के अध्‍यक्ष पद के उम्‍मीदवार अभी से नदारत नजर आ रही हैं। चुनाव प्रचार उनके पति/पुत्रों एवं समर्थकों द्वारा संपन्‍न किया जा रहा है। जब आलम अभी से यह है तो चुनाव के समापन्‍न के उपरांत क्‍या होगा.... यह सोचने वाली बात है...वैसे होने वाला तो यह है कि जो भी महिला प्रत्‍या‍शी चुनाव जीतेगी सिर्फ नाम उसका चलेगा और सत्‍ता उनके पतियों/पुत्रों द्वारा संचालित की जाएगी...क्‍योंकि जिस तरह से देखने को मिल रहा है उससे अंदाजा साफ लगाया जा सकता है कि इन महिलाओं की कोई खास छवि नहीं है, बस इनके पति/पुत्र अपनी छवियों को भुनाने की कावायदें कर रहे हैं ताकि सत्‍ता पर काबिज हो सके.... और सत्‍ता मिलने के बाद जो होना है वो तो जग जाहिर है.... चुनावी वादे हैं जो शायद ही कभी पूरे होते हो... क्‍योंकि सत्‍ता की चमक चुनावी वादों पर ग्रहण लगा देती है। यह ग्रहण कुछ समय का नहीं बल्कि पूरे के पूरे पांच साल चलता है और इनके द्वारा किए गए वादे सत्‍ता की चकाचौंध में कहीं चौंधियां से जाते हैं....वैसे मैं किसी भी प्रत्‍याशी एवं उनके पतियों/पु‍त्रों की योग्‍यता पर प्रश्‍नचिह्न नहीं लगा रहा... वनस्‍पत जो होता आ रहा है उसी का स्‍वरूप दिखाने की कोशिश कर रहा हूं कि जो अभी तक होता आया है उसमें कुछ नया क्‍या जुड़ने वाला है.... बाकि जनता तो उल्‍लू है आज इस डाल पर कल उस डाल पर....  

Tuesday, October 31, 2017

समान अधिकारों की बात आखिर कैसे.......

समान अधिकारों की बात आखिर कैसे.......
आज महिलाएं अपने अधिकारों की बात करती नजर आती हैं क्‍योंकि सदियों से पुरूष समाज महिलाओं का शोषण करता आ रहा है। जिसके परिप्रेक्ष्‍य में कहा जाए तो पश्चिमी महिलाएं कुछ हद तक अपने अधिकारों के प्रति सजग व जगरूक हुई हैं और वह लगातार अपने अधिकारों की मांग पर पुरजोर वकालत करती रहती हैं। यह महिलाएं पुरूषवादी चंगुल से अपने आपको काफी हद तक आजाद करा पाने में सक्षम हुई हैं पर भारतीय महिलाएं सिर्फ वकालत करती दिखाई प्रतीत होती हैं। वह आज भी पुरूषवादी, पितृसत्‍तात्‍मक के मकड़जाल में इस तक फंसी पड़ी हैं जिससे निकालना तो चाहती है पर निकल नहीं पा रही है क्‍योंकि वह आज भी अपने आप को पुरूषों पर निर्भर मानती है कि बिना पुरूष के उसका अस्तित्‍व कुछ भी नहीं है। वह पूर्णत: पुरूषों पर आश्रित हो चुकी हैं। इसी कारण पुरूष भी उसे कमतर समझ उसका शोषण करता रहता है। क्‍योंकि आज भी भारतीय महिलाओं की जो छवि बनी हुई है वह कोमल और कमजोर की बनी हुई है। वैसे इसमें कोई दोराह की बात नहीं है कि भारतीय महिलाओं ने बहुत हद तक अपनी इस छवि को साफ कर एक आत्‍मनिर्भर, परिपक्‍य, शासक्‍त छवि के रूप में समाज के सामने खुद को पेश किया है। परंतु पूर्णत: नहीं कर पाई हैं। इसके पीछे महिलाओं का पुरूष सोच से चलना प्रमुख कारण है।
वैसे इस संदर्भ में आगे बात कि जाए तो आज देखने को मिल जाता है कि महिलाओं को काफी अधिकारी प्राप्‍त हैं जिनका वह बखूब उपयोग कर रही है ताकि उनका शोषण न किया जा सके। परंतु महिलाएं आज जिस समानता की वकालत करती हैं क्‍या वह स्‍वयं सामान अधिकार चाहती हैं या फिर यह सब एक नाटक की कडि़यां मात्र है जिसमें वह पुरूष के समकक्ष अधिकार तो चाहती है पर सामान रूप से नहीं, क्‍योंकि आज जो देखने को मिलता है कि महिलाओं को हर जगह पुरूषों के वनस्‍पत अधिक दर्जा दिया जाता है, उदाहरणस्‍वरूप ले तो बस में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें, ट्रेनों में आरक्षित सीटें, टिकट बिना लाइन में लगे मिल जाना, इस तरह के और भी उदाहरण है जिनमें महिलाओं को अधिक दर्जा दिया जाता है क्‍योंकि सरकार भी व महिलाएं स्‍वयं भी मानती हैं कि वह आज भी कमजोर है। वहीं पश्चिमी महिलाएं इस तरह की मांग नहीं करती है वह पुरूषों के समान लाइन में लगती हैं और अपना सामान स्‍वयं उठाती हैं। परंतु भारतीय महिलाएं नहीं।
जब समान अधिकारों की बात हो रही है तो फिर आरक्षित चीजें आखिरकार क्‍यों.....खत्‍म कर देनी चाहिए....फिर समान अधिकारों की बात करें तो जायज लगे कि आपका पुरूषवर्ग शोषण करता है और हमें अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं। पहले स्‍वयं ही इस मकड़जाल से आजाद होने की कोशिश तो करें.... तभी आप आजाद हो पाएंगें नहीं तो दिल बहलाने के लिए गालिबन ख्‍याल अच्‍छा है।


Friday, October 27, 2017

कहां गए रामदेव के गुरू...शंकर देव

कहां गए रामदेव के गुरू...शंकर देव


आज बाबा रामदेव और उनके प्रमुख चेला जिस असीम संपत्ति पर मालिका हक जमा कर बैठे हैं वो वास्‍तव में बाबा रामदेव के गुरू शंकर देव की संपत्ति है जिसको शंकर देव ने सन् 1992 में दिव्‍य योग ट्रस्‍ट के नाम से स्‍थापित किया था जिसे बाद में 1995 को दिव्‍य योग ट्रस्‍ट को दिव्‍य योग मंदिर में तब्‍दील कर दिया गया। इस मंदिर के प्रमुख स्‍वामी शंकर देव ही थे और उनके सहायोगियों के रूप में रामदेव, कर्मवीर, बालकृष्‍ण, वियज चैतन्‍य और साध्‍वी कमला थेा जिससे पतंजलि का शिलायांस हुआ था।  14 जुलाई 2007 को शंकर देव सुबह की सैर पर निकले थे, जिसके बाद से वह कभी लौटकर नहीं आएं।  गुरू शंकरदेव की जांच सीबीआई को सौंपी गई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया। और कुछ समय बाद फाइल को बंद कर दिया गया।  इस घटना के बाद बाबा रामदेव के ऊपर तरह तरह के आरोप लगाए गए। यहां तक की कई राजनेताओं ने यह भी कहा कि रामदेव इस मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और आशंका जताई जाती है कि शंकर देव को उन्हीं के शिष्य रामदेव ने अगवा करवाया है। तमाम आरोपों के बाद भी रामदेव इस बात को लगातार नकारते रहे और कहते रहे कि वह अपने गुरु का बेहद सम्मान करते हैं और ऐसा पाप वह करने की सोच भी नहीं सकते। दरअसल, राम देव का कहना है कि जब शंकर देव जब लापता हुए थे, तो वह विदेश में थे। वैसे इस बात में सच्‍चाई है कि बाबा रामदेव विदेश में थे पर क्‍या यह एक सोची समझी साजिश का रूप नहीं लगता कि रामदेव विदेश में हैं और शंकर देव गायाब हो जाते हैं।

वैसे यह हैरानी की बात है कि पिछले10 साल में रामदेव और उनकी मंडली ने शंकर देव को खोजने की कोई कोशिश नहीं की। जिस शख्‍स ने रामदेव को इतना बड़ा आदमी बनाया कि सरकार तक हिल जाए उसकी खोज खबर लेने के लिए रामदेव ने कभी उत्‍तराखंड पुलिस पर दबाव नहीं बनाया, जबकि दुनिया जानती है कि मुख्‍यमंत्री और अब प्रधानमंत्री रामदेव के कितने करीबी हैं। तब तो सक की सुई सीधा और सीधा रामदेव पर आकर ही घुमती हुई प्रतीत होती है, क्‍योंकि आज भी गुरू शंकर देव का अभी तक कुछ भी अता-पता नहीं है कि उनके साथ आखिर में  हुआ  क्‍या था.....जिसने गायब होते ही राम ने उनकी संपत्ति को हथिया लिया, और जिनका उस संपत्ति पर अब कहीं नाम भी नहीं है....वैसे सरकार किसी की भी हो.... जांच का मुद्दा आज भी बनता है कि आखिर गुरू शंकर देव गए तो गए कहां.... 

Saturday, October 21, 2017

पालिका चुनाव में पत्नियों के दम पर किस्मत आजमाने को तैयार नेता

पालिका चुनाव में पत्नियों के दम पर किस्मत आजमाने को तैयार नेता
नगर पालिका परिषद के चुनाव की आहट होते ही जिस तरह से उन महिलाओं को अपनी निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जो अभी तक पर्दे में थी उनको पर्दे से बाहर कर होल्डिंग्स, बैनर के जरिए जनता के बीच लांच कर अपने को प्रदर्शित करते हुए नेता जनता की सेवा करने का दम भर रहे हैं।
सरकार ने जिस मकसद से महिलाओं के लिए ललितपुर नगर की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की है मुझे नहीं लगता कि वर्तमान की परिस्थितियों को देखते हुए महिलाओं को ताकत मिलेगी। क्‍योंकि चुनाव की आहट मिलते ही शहर में लगे होडिंग्‍स और बैनर साफ दर्शा रहे हैं कि महिलाओं के साथ उनके पतियों/बेटों की भी तस्‍वीर लगी हुई है यानि उन महिलाओं का अस्तित्‍व अभी तक सिर्फ और सिर्फ घर की चार दीवारी तक ही सीमित था। जो महिला सीट होते ही इन नेताओं ने इन्‍हें भुनाने की कवायदें तेज कर दी। वैसे यह सोचने वाली बात है कि यदि ललितपुर की नगर पालिका परिषद की सीट महिला के लिए आरक्षित नहीं होती तो क्‍या यह महिलाएं होडिंग्‍स और बैनर में अपने पति के साथ दिखाई देती। तो जबाव स्‍वत: ही मिल जाता कि फिर क्‍या जरूरत थी इनकी।
खैर आज ऐसे-ऐसे लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए अपने घर की महिलाओं को चुनाव के लिए प्रदर्शित कराते हुए दिख रहे हैं जिनका समाज में कभी कोई योगदान ही नहीं रहा और ना ही उनका जनता के बीच कभी आगमन ही रहा। वैसे जनता को चाहिए कि ऐसे लोग जब भी उनके पास वोट मांगने के लिए आएं तो उनसे पूछे कि अभी तक उनके द्वारा समाज में कितना योगदान दिया गया या जिन्हें वह चुनाव में ला रहे हैं उनका कितना योगदान अब तक समाज के लिए रहा या फिर नगर पालिका में आने वाले फंड के बन्दरबांट की क्‍या तैयारी पूरी हो चुकी है।
मेरा प्रश्न यह भी है कि जो नेता अपनी-अपनी पत्नियों/माताओं को चुनाव में उतार रहे हैं तो क्‍या नगर पालिका महिलाएं चलाएंगी या फिर उनके पति देव चलाएंगे। वैसे यह बात तो जग जाहिर है कि जब-जब महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हुई है उनकी सत्‍ता इनके पुत्रों या पतियों के द्वारा ही संचालित की जाती रही है। जैसे प्रधान पति, पर्षाद पति इत्‍यादि। इनमें महिलाओं की भूमिका मात्र एक प्‍यादे के समान होती है जिस खाने में उनके पति चलाएंगे वह वही चलेगी।
आज चुनाव में अपराधी, भूमाफिया, साइकिल चोर, सट्टा बाजारी किंग जैसे लोग भी अपनी किस्मत आजमाने निकले हैं जिन्हें कभी समाज से वास्ता नहीं रहा वह बैनरो में ईमानदार और कर्मठ दिखते हुए पैसे और शराब के दम पर चुनाव जीतना चाह रहे हैं । जनता को ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है और बहुत सोच समझ कर वोट करें क्योंकि यह चुनाव आपकी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने से संबंध रखता है।