सरोकार की मीडिया

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Monday, June 25, 2018

एक विवाह ऐसा भी….


एक विवाह ऐसा भी….

हमारे समाज में सदियों से विवाह के कुल आठ प्रकारों को दर्शाया गया है जिनमें से आज सिर्फ एक-दो प्रकार की प्रचलन में बचे हुए है बाकि सब वक्‍त के साथ विलुप्‍त हो गए.... यदि आठ प्रकार के विवाहों पर गौर किया जाए तो
1. ब्रह्म विवाह :- दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
2. दैव विवाह :-किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप में अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
3. आर्श विवाह :- कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह :- कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह :- परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है।
6. असुर विवाह :- कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
7. राक्षस विवाह :- कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।
8. पैशाच विवाह :- कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक संबंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है। इसमें कन्या के परिजनों की हत्या तक कर दी जाती है।
वैसे इन विवाह के उपरांत भी समाज में अन्‍य तरह के विवाह भी देखे जा सकते हैं जिसमें वर का या कन्‍या का मंगली दोष होने के कारण उसका विवाह किसी जानवर से या फिर किसी वृक्ष से कर देना भी समाने आता रहा है ताकि उक्‍त वर या कन्‍या का दोष मिट जाए.....हालांकि कुछ हर राज्‍य में विवाह करने की अलग-अलग परंपरा विकसित है वह अपने कुनबे और अपने धर्म के हिसाब से विवाह करते हैं वहीं बिहार राज्‍य में एक अलग तरह के विवाह को भी देखा जा सकता है जिसको पकडुआ विवाह भी कहते हैं। पकडुआ विवाह वह होता है जिसमें कन्‍या पक्ष किसी वर को पकड़ कर बिना वर की सहमति से अपनी कन्‍या का जबरन विवाह करवा देना पकडुआ विवाह कहलाता है। हालांकि प्रशासन की सख्‍ती के बाद काफी हद तक इस तरह के विवाह पर रोक लग चुकी है परंतु कभी-कभी एक-दो मामले समाने आते रहते हैं।  ठीक उसी तर्ज पर आज मध्‍य प्रदेश में एक बीजेपी नेता ने एक बेचारे मेंढ़क को जबरन पकड़कर उसका विवाह अपनी पुत्री मेंढ़की से करवा दिया..... जिस पर पूरा प्रशासन अभी भी मौन बना हुआ है। हालांकि बीजेपी नेता इस विवाह को ब्रह्म विवाह बता रहे हैं। अब देखना यह है कि क्‍या इस तरह के विवाह पर कोई कानूनन कार्यवाही की जाती है या इस पकडुआ विवाह को बढ़ावा मिलता है। आज मेंढ़क की बात थी तो सब चुप्‍पी साधे बैठे हैं कल आपके कुत्‍ते की बात भी हो सकती है। क्‍या पता कल कोई बीजेपी नेता आपके कुत्‍ते को अपने चमचों से पकड़वा कर उसका विवाह अपनी पुत्री से न करवा दे। तो सकर्त रहे..... सबक एक को और सीख हम सबको....

Sunday, June 17, 2018

स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्‍या


स्त्रियों की  सबसे  बड़ी  समस्‍या
जब बहू  बनती  हैं  तब  सास  अच्‍छी नहीं  मिलती,
जब सास  बनती हैं तब बहू अच्‍छी नहीं मिलती,
जब देवरानी बनती हैं तब जेठानी अच्‍छी नहीं मिलती,
और जब जेठानी बनती है तब देवरानी अच्‍छी नहीं मिलती,
जब भाभी बनती है तब ननद अच्‍छी नहीं मिलती,
और जब ननद बनती हैं तो भाभी अच्‍छी नहीं मिलती,
अंत में यदि सभी अच्‍छी मिल भी जाएं तो कामवाली बाई अच्‍छी नहीं मिलती,
अब बचा आखिरी में बेचारा पति....
तो कसम से आज तक वो किसी को भी अच्‍छा नहीं मिला.........

Thursday, April 12, 2018

उक्‍त बलात्‍कारी के साथ भगवान को भी सजा हो......


उक्‍त बलात्‍कारी के साथ भगवान को भी सजा हो......

आस्‍था रखने वालों, पोंगा पंडितों, साधु-संतों अब बताओं कहां गया तुम्‍हारा भगवान...कोई दलील कोई बचाव है तुम्‍हारे पास...अपने भगवान के लिए.... हो तो अपना-अपना मुंह खोलो...और बको.... और बताओं ऐसा आखिर क्‍यों हुआ.... जिसकी आंखों के सामने एक मासूम बच्‍ची के साथ बलात्‍कार कर उसे जान से मार दिया गया और वह तमाशबीन बन कर तमाशा देखता रहा.... क्‍या उसकी भी यही मंशा थी उक्‍त बच्‍ची के साथ बलात्‍कार करने देने की.... यदि ऐसा ना होता तो वह प्रकट होता और उस दुष्‍ट बलात्‍कारी को बलात्‍कार से रोकता... और उसे उसका दंड भी देता... परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ...न तो मुर्ति के अंदर से कोई हलचल हुई न ही वह मुर्ति के अंदर से बाहर निकल कर आया... बस वह बुत बना तमाशा देखता रहा... कि होने दो कौन सा मेरे धर्म, मुझ में आस्‍था रखने वालों की बच्‍ची थी.. वह तो दूसरे समुदाय, दूसरे धर्म की बच्‍ची थी.. तब मुझे क्‍या फर्क पड़ना चाहिए... शायद भगवान भी उस समय ऐसा ही सोच रहा होगा... नहीं तो वह मासूम बच्‍ची के साथ ऐसा कभी नहीं होने देता.... खैर यह कोई पहला मामला तो है नहीं, मंदिरों में बलात्‍कार का.... पहले भी बाबाओं को चोला औंढे ढोंगी बाबा मामूस बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते रहे हैं और बनाते रहेंगे... क्‍योंकि उनको चूतिया जनता भगवान का ही दर्जा देकर पूजती आ रही है.... जिससे इन बाबाओं का मनोबल और बढ़ जाता है इस तरह के कुकृत्‍य करने के लिए..... रही बात मंदिर में बलात्‍कार की, तो इससे अच्‍छा ठिकाना और क्‍या हो सकता है..... क्‍योंकि उक्‍त दोषी अच्‍छी तरह जानते हैं कि वहां पर विराजमान भगवान तो कुछ बोलेगा नहीं... कुछ भी करते रहो उनके सामने.... क्‍योंकि वह तब भी कुछ नहीं कर पाते जब चोर उनके जेवर ही चुरा लेते है, जेवर क्‍या, चोर उनको ही चुराकर बाजारों में बेच देते है वह तब भी कुछ कर पाने में असमर्थ दिखाई देते है... क्‍योंकि जो भगवान स्‍वयं की रक्षा नहीं कर सकता... वह आम जनता की रक्षा कैसे कर सकता है... इसके बाद भी भीड़ की जमात में शामिल होकर लगे रहते हैं जयकारा करने.......जय हो... जय हो.... अब करो जय हो... उक्‍त भगवान की जय हो... जिसकी आंखों के सामने बलात्‍कार हुआ... उसकी जय करो.....मेरे हिसाब से बलात्‍कार करने वाला कम दोषी है उसे बलात्‍कार करने देने वाला ज्‍यादा दोषी है... इसलिए यदि उक्‍त बलात्‍कारी को सजा मिलती है तो भगवान को भी बराबर सजा मिलनी ही चाहिए........ .

Saturday, April 7, 2018

आमजन की बेल पर भी हो तत्‍काल सुनवाई


आमजन की बेल पर भी हो तत्‍काल सुनवाई
सोचने वाली बात है.... वाह रे न्‍याय प्रणाली…..एक तरफ लालू प्रसाद यादव को 3.5 साल की सजा हुई है और पटना हाईकोर्ट ने अभी तक उनकी बेल पर सुनवाई तक नहीं की। वहीं दूसरी तरफ सलमान खान को 5 साल की सजा हुई और दो दिन बाद सुनवाई करके बेल भी दे दी गई। अगर गौर किया जाए तो इलाहाबाद हाईकोर्ट, पटना हाईकोर्ट और भी हाईकोर्टों में ऐसे बहुत सारे मामले लंबित चल रहे हैं जिनकी बेल पर सुनवाई साल-साल भर होने के उपरांत अभी तक नहीं की गई है... और न्‍याय कुर्सी पर विराजमान जज यह कहकर उक्‍त व्‍यक्ति के परिजनों पर तारीख चिपका देते हैं कि हम इस तरह का केस सुनना ही नहीं चाहते.... वैसे एक बात समझ से परे मालूम होती है कि जब हाईकोर्टों डेली केस लिस्‍ट बनाते हैं तो फिर उन केसों की सुनवाई क्‍यों नहीं करते.... क्‍यों तारीख पे तारीख चिपकाते रहते हैं। कभी सोचा है उक्‍त व्‍यक्ति और उसके परिजनों के बारे में कि वह कैसे करके तारीखों पर पहुंचता है और जब फाइल ही नहीं सुनी जाती, तो एक निराशा का भाव लेकर फिर अगली तारीख पर बेल होने की लाइन में खड़ा हो जाता है। यह आम जनता है जिसकी पीड़ा से किसी को कोई सरोकार नहीं.... चाहे वह उच्‍च धरातल पर न्‍याय करने वाला न्‍यायाधीश ही क्‍यों न हो... वहीं सलमान जैसों को तत्‍काल प्रभाव से बेल मिल जाती है... यह कैसा दोगलापन है न्‍याय का... सही है गरीबों की कहां सुनी जाती है.... मैं लालू को गरीब नहीं मानता.... बस उनका उपयोग उदाहरणस्‍वरूप किया है... लालू तो राजनीति का शिकार हैं तभी उनकी बेल नहीं हो रही है.. यदि वह बीजेपी में होते तो अभी तक उन पर लगे सारे आरोप खुद-व-खुद खारिज हो जाते..और वह सभी केसों से बाइज्‍जत बरी भी हो चुके होते.... मैं तो बस न्‍याय प्रणाली पर प्रश्‍नचिह्न लगा रहा हूं कि आमजन की बेल पर तत्‍काल प्रभाव से सुनवाई क्‍यों नहीं की जाती.. क्‍या वह इंसान नहीं होते.....

Wednesday, April 4, 2018

भारत में दलितों पर होने वाले अत्‍याचारों की हकीकत


भारत में दलितों पर होने वाले अत्‍याचारों की हकीकत
  


 
इतनी तेजी से तो देश भी तरक्की नहीं कर रहा जितनी तेजी से दलितों पर अत्याचार के आंकड़े बढ़े हैं। अत्याचार की कहानी यूं तो सदियों से चली आ रही है लेकिन आंकड़ों की स्क्रिप्ट कुछ और ही बयां करती है। दलितों के साथ होने वाले अत्याचार के मामले में साल 2009 में 33,594, 2010 में 32,712, 2011 में  33,719, 2012 में 33,655, 2013 में 39,408 तथा 2014 में 47,064 आंकड़े दर्ज किए गए। राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक 2016 में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराधिक मामलों में 2015 के मुकाबले 5.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2016 में कुल 40,801 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि 2015 में ये आंकड़ा 38,670 तक ही था। उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के 10,426 आंकड़ें दर्ज हुए हैं, जो कि पूरे मामलों के 25.6 फीसदी हैं। इसके बाद बिहार का नंबर आता है, जहां लगभग 14 फीसदी अपराध हुए हैं। 2016 में मध्यप्रदेश में दलितों के खिलाफ 43.4 फीसदी संज्ञेय अपराध हुए हैं, जबकि राजस्थान में ये आंकड़ा 42 फीसदी है। गोवा में 36.7 फीसदी, 34.4 फीसदी बिहार में और 32.5 फीसदी गुजरात में। पूरे देश में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराध का आंकड़ा 20.6 फीसदी था।
वहीं इससे इतर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो दलितों पर अत्याचार के मामले में मध्य प्रदेश पहले स्थान पर है। यहां 4,922 अपराध दर्ज किए गए। अपराध की दर 43.4 फीसदी रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दोगुनी हैं। इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर हैं, जहां 5,134 अपराध हुए हैं। उसकी दर 42.0 प्रतिशत रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दोगुनी है। गोवा तीसरे स्थान पर है जहां अपराध दर 36.7 रही। गुजरात का स्थान 5वां है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है।
यह केवल वह आंकड़े हैं जो थानों में दर्ज कराए गए। इनके अलावा कितने दलितों को अत्याचार का चाबुक सहना पड़ता है इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। एनसीआरबी द्वारा जारी किए गए 2014 के आंकड़ों के अनुसार देश भर में दलितों पर अत्याचार के 47,064 मामले सामने आए। जो वर्ष 2009 से 13,652 अधिक हैं। आंकड़े साफ-साफ बयां करते हैं कि दलितों पर अत्याचार साल दर साल लगातार बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। 
वहीं दलित महिलाओं की बात की जाए तो दलित महिलाओं की स्थिति भी ठीक नहीं रहीं है। साल 2015 के मुकाबले 2016 में दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2015 में जहां रेप के 444 मामले प्रदेश में दर्ज किए गए थे। वहीं 2016 में दर्ज मामलों की संख्या 557 पहुंच गई। इसके अलावा रेप के प्रयास के 77 मामले दर्ज किए गए जबकि साल 2015 में यह आंकड़ा महज 22 था। यौन उत्पीड़न के मामलों में भी इजाफा दर्ज किया गया है। 2016 में 874 मामले दर्ज किए गए हैं जबकि साल 2015 में 704 मामले दर्ज किए गए थे। इस तरह के मामलों में हो रहे इजाफे पर केंद्र सरकार ने हाल में दिल्ली में एक बैठक की। इसमें प्रदेश सरकार की तरफ से समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री ने दलितों पर बढ़ते अत्याचार की रिपोर्ट और सरकार का पक्ष रखा। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में दलितों पर अत्याचार के कुल 8,460 मामले दर्ज किए गए थे जबकि साल 2016 में आपराधिक मामलों का आंकड़ा बढ़कर 10,492 हो गया था।
इन अपराधों पर अंकुश लगाने वाले कानूनों की कोई कमी नहीं है, पर संभवत उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं होने के कारण दलितों पर अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं। वैसे इन आंकड़ों को देखकर नहीं लगता कि दलित स्‍वतंत्र भारत में रह रहे हैं और उनकी स्थिति में सुधार आया हो....बाकि कोई भी किसी की भी सरकार सत्‍ता में काबिज हो जाए.... दलितों पर अत्‍याचार रोकेंगे के लिए कोई भी प्रभाव कदम उठाती दिखाई नहीं प्रतीत होती है। ऐसा लगता है कि इनकी स्थिति जानवरों के भी बद्तर समझी जा रही है क्‍योंकि प्रबुद्ध वर्ग के लोग आज भी नहीं चाहते की यह उनके समान, समकक्ष खड़े हो सके। तभी तो आंकड़े पूरी दास्‍तान बयां करते दिखाई देते हैं।


Saturday, March 31, 2018

दलितों, पिछड़ा और मुसलमानों का विरोधी था- गांधी


दलितों, पिछड़ा और मुसलमानों का विरोधी था- गांधी

सन् 1930-31 में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर द्वारा अंग्रेज़ सरकार से भारतीयों के लिए  स्वराज देने तथा दलितों के लिए विधानमंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्र देने की मांग रखी थी। प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस और गांधी ने भाग नहीं लिया लेकिन दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने भाग लिया और अपनी गलत और अमानवीय सोच का परिचय देते हुए दलितों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र और राजनीतिक अधिकार देने का डटकर विरोध किया । गांधी का कहना था कि ‘’दलित वर्ग हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है, इसलिए दलित वर्ग को हिंदू वर्ग से अलग नहीं किया जा सकता।‘’ गांधी का कहना था कि ‘’मैं प्राणों की बाजी लगाकर इस तरह के राजनीतिक बंटवारे का मैं विरोध करूंगा।‘’
दलितों को मिले अधिकार के विरोध में गांधी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया था। अब रही बात कि गांधी नहीं चाहता था कि दलितों को निर्वाचन क्षेत्र में अधिकार मिले,  क्‍योंकि उसने स्‍वयं कहा था कि ‘’मैं प्राणों की बाजी लगाकर इस तरह के राजनीतिक बंटवारे का मैं विरोध करूंगा।‘’ तो क्‍या गांधी भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा चाहता था....जिस प्रकार उसने दलितों को मिलने वाले अधिकार के विरोध में आमरण अनशन शुरू कर दिया था उसी प्रकार भारत और पाकिस्‍तान के विभाजन पर भी कर सकता था। परंतु नहीं किया... क्‍योंकि वह चाहता था कि भारत और पाकिस्‍तान का विभाजन हो और पूर्ण सत्‍ता कांग्रेस के पक्ष में आ जाए और वह इस सत्‍ता को ग्रहण न करते हुए भी सत्‍ता को अपनी मर्जी के हिसाब से चलाता रहे.... और हुआ भी ठीक वैसा ही... विभाजन के उपरांत सत्‍ता कांग्रेस के पक्ष में चली गई और उसकी बागडोर गांधी के हाथों में। गांधी जिस तरह चलाना चाहते, सत्‍ता उसकी तरफ करवट बदलती। इसे कहते हैं ऊपर राम और बगल में छुरी का काम करना... गांधी के मुंह पर राम-नाम का जाप रहता था परंतु, गांधी के मन में इतना मैल भरा हुआ था कि वह दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को मिलने वाले अधिकारों का विरोध करता रहता था ताकि सत्‍ता निम्‍न वर्गों के हाथों में न चली जाए...और जो वर्ग अभी तक हम लोगों की गुलामी करते आ रहे हैं वह हमारे समक्ष कंधे से कंधा मिलाकर,आंखों में आंखें डालकर खड़े न हो सके।

Tuesday, March 27, 2018

2019 में फिर पूर्ण बहुमत से बनेगी बीजेपी की सरकार


2019 में फिर पूर्ण बहुमत से बनेगी बीजेपी की सरकार
अभी कुछ दिनों पहले उत्‍तर प्रदेश में (गोरखपुर व फूलपुर) दो सीटों पर हुए चुनाव और उसके परिणाम का यदि विश्‍लेषण किया जाए तो यह बीएसपी और सपा गठबंधन की जीत नहीं है बल्कि बीजेपी ने अपनी औकात पता करने हेतु मशीनों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की। क्‍योंकि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए बीजेपी अपनी यथास्थिति से खुद को अवगत करवाना चाह रही थी... कि यदि हम लोग मशीनों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करवाते तो स्थिति क्‍या बन सकती है। और इसका नतीजा उनके सामने (दोनों सीटों को गवाने के उपरांत) आ ही गया। वहीं दोनों सीटें सपा को मिल जाने से बीएसपी और सपा के समर्थकों में बड़ा उत्‍साह देखने को मिला.... अखिलेश मायावती से मिलने और उनको बधाई देने तक पहुंच गए..... सही बात है गठबंधन जो हुआ था... कुछ तो दिखावा करना ही पड़ेगा। वैसे विश्‍लेषकों ने इस ओर जरूर ध्‍यान दिया होगा कि गोरखपुर की जो सीट 1989 से 2017 तक लगातार पहले महान्‍त फिर योगी यानि पिछले 28 वर्षों से जो सीट बीजेपी के पक्ष में ही जाती रही हो... चाहे सत्‍ता हाथ में रही हो या न रही हो... फिर वो गोरखपुर की सीट कैसे हार सकते हैं.... वहीं 2014 में मोदी की लहर में फूलपुर से जीते मौर्या महोदय की सीट जाती रही... हालांकि इस सीट का बारीकी से आंकलन किया जाए तो 2014 के पहले तक यह सीट कभी बीजेपी की रही ही नहीं..... वो तो मोदी लहर में फूलपुर की सीट मौर्या के पक्ष में चली गई...और अब वो पुन: विपक्ष में जा पहुंची...
इस बार तो (गोरखपुर से 5 बार सांसद) योगी उत्‍तर प्रदेश में उच्‍चतम पद पर आसीन थे...और मौर्या उपमुख्‍यमंत्री फिर कैसे हार गए.... इसके पीछे का सारा गुणा-गणित आने वाले 2019 के लोकसभा के शतरंज की बिसात पर खड़ा किया गया था.... कि  मशीन में छेड़छाड़ के बिना अब तक की स्थिति और जनता का मिजाज आखिर क्‍या कहता है.... तो हकीकत उनके सामने आ ही गई... कि 2019 के चुनाव में वही करना है जो अब तक अन्‍य राज्‍यों में करवाती आ रही है....इससे एक बात से साबित होती है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पुन: बीजेपी की जीत निश्‍चित ही है....वहीं 2 सीटें मिलने से बबुआ और बुआ दोनों गदगद महसूस कर रहे हैं... जैसा बीजेपी चाह रही थी लगता है वैसा ही हुआ.... क्‍योंकि गुणा-गणित कहता है कि यदि 2 सीटों पर और उप चुनाव होते और वह हार ही क्‍यों न जाती तब भी मोदी की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं था...क्‍योंकि बीजेपी ने 2 सीटें गवाकर और सपा-बसपा को झुनझुना पकड़ाकर पूरा मैदान मार लिया है.......खैर अब आगामी लोकसभा में चाहे अखलेश,मायावती, राहुल, ममता, अरविंद इसी क्रम में और भी.... सभी पीठ पीछे हाथों में खंजर लेकर मुंह पर अपनी झूठी मुस्‍कान लिए गठबंधन करके ऐडी चोटी का जोर क्‍यों न लगा ले... फिर भी बीजेपी की जीत पक्‍की है।