सरोकार की मीडिया

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Wednesday, July 11, 2018

वाह रे रूपया! तेरे कितने नाम


वाह रे रूपया! तेरे कितने नाम

मंदिर में दिया जाए तो - चढ़ावा
स्कुल में - फ़ीस
शादी में दो तो - दहेज
बारात में लुटाया जाए – निछवर
तलाक देने पर - गुजारा भत्ता
आप किसी को देते हो तो - कर्ज
अदालत में - जुर्माना
सरकार लेती है तो - कर
सेवानिवृत्त होने पे - पेंशन
अपहर्ताओ के लिएं - फिरौती
होटल में सेवा के लिए - टिप
बैंक से उधार लो तो - ऋण
श्रमिकों के लिए - वेतन
मातहत कर्मियों के लिए - मजदूरी
अवैध रूप से प्राप्त सेवा - रिश्वत
और मुझे दोगे तो - गिफ्ट
मैं रूपया हूं........
मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते; मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूं...
मैं रूपया हूं.......
मुझे पसंद करो सिर्फ इस हद तक कि लोग आपको नापसंद न करने लगें।
मैं रूपया हूं...... 
मैं भगवान् नहीं मगर लोग मुझे भगवान् से कम नहीं मानते।
मैं रूपया हूं......
मैं नमक की तरह हूं; जो जरुरी तो है मगर जरुरत से ज्यादा हो तो जिंदगी का स्वाद बिगाड़ देता है।
मैं रूपया हूं......
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके पास मैं बेशुमार था; मगर फिर भी वो मरे और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था।
मैं रूपया हूं....
मैं कुछ भी नहीं हूं; मगर मैं निर्धारित करता हूँ; कि लोग आपको कितनी इज्जत देते है।
मैं रूपया हूं....
मैं आपके पास हूं तो आपका हूं:! आपके पास नहीं हूं तो; आपका नहीं हूं...मगर मैं आपके पास हूं तो सब आपके हैं।
मैं रूपया हूं.....
मैं नई-नई रिश्तेदारियां बनाता हूं; मगर असली औऱ पुरानी बिगाड़ देता हूं।
मैं रूपया हूं.....
मैं सारे फसाद की जड़ हूं; मगर फिर भी न जाने क्यों सब मेरे पीछे इतना पागल हैं...?
हां मैं रूपया हूं................

Monday, July 9, 2018

मीडिया से गंदगी साफ करने की आवश्‍यकता


मीडिया से गंदगी साफ करने की आवश्‍यकता
आओ देखे समस्या कहां है, कुछ समझने की कोशिश करें कि बलात्कार अचानक इस देश में क्यों बढ़ गए हैं??? इसे कुछ उद्धरण से समझते हैं जैसे.....
1. लोग कहते हैं कि रेप क्यों होता है ?
एक 8 साल का लड़का सिनेमाघर में राजा हरिशचंद्र फिल्म देखने गया और फिल्म से प्रेरित होकर उसने सत्य का मार्ग चुना और वो बड़ा होकर महान व्यक्तित्व से जाना गया। परंतु आज 8 साल का लड़का टीवी पर क्या देखता है ? सिर्फ नंगापन और अश्‍लील वीडियो और फोटो, मैग्जीन में अर्धनग्न फोटो, पड़ोस में रहने वाली भाभी के छोटे कपड़े !!
इस पर लोग कहते हैं कि रेप का कारण बच्चों की मानसिकता है। पर वो मानसिकता आई कहां से ? उसके जिम्मेदार कहीं- न-कहीं हम खुद जिम्मेदार है। क्योंकि हम संयुक्‍त परिवार में अब नहीं रहते। हम अकेले रहना पसंद करते हैं। और अपना परिवार चलाने के लिये माता-पिता को बच्चों को अकेला छोड़कर काम पर पड़ता है। वहीं बच्चे अपना अकेलापन दूर करने के लिए टीवी और इंटरनेट का सहारा लेते हैं। और उनको देखने के लिए क्या मिलता है सिर्फ वही अश्‍लील वीडियो और फोटो, तो वो क्या सीखेंगे यही सब कुछ ना ? अगर वही बच्चा अकेला न रहकर अपने दादा-दादी के साथ रहे तो कुछ अच्छे संस्कार सीखेगा। कुछ हद तक ये भी जिम्मेदार है।
2. पूरा देश रेप पर उबल रहा है, छोटी-छोटी बच्चियों से जो दरिंदगी हो रही उस पर सबके मन मे गुस्सा है। कोई सरकार को कोस रहा, कोई समाज को तो कई महिलावादी स्त्रियां सारे लड़को को बलात्कारी घोषित कर चुकी है !
लेकिन आप सुबह से रात तक कई बार सनी लियोन के कंडोम के विज्ञापन देखते हैं ..!!  फिर दूसरे विज्ञापन  में रणवीर सिंह शैम्पू के ऐड में लड़की पटाने के तरीके बताता है...!!  ऐसे ही क्‍लोज अप,
लिम्का, थम्‍सअप, और बहुत सारे डियो के विज्ञापनों में भी दिखाता है। लेकिन तब आपको गुस्सा नहीं आता है... है ना ???
आप अपने छोटे बच्चों के साथ संगीत  चैनल पर सुनते ही हैं......
दारू बदनाम कर दी,  कुंडी मत खड़काओ राजा, मुन्नी बदनाम, चिकनी चमेली, झंडू बाम, तेरे साथ करूंगा गंदी बात, और न जाने ऐसी कितनी मूवीज के गाने देखते और सुनते हैं। तब आपको गुस्सा नहीं आता ??
मम्मी बच्चों के साथ स्‍टार प्‍लास, जीटीवी, सोनी टीवी देखती है जिसमें एक्टर और एक्ट्रेस सुहाग रात मनाते हैं, किस करते हैं, आंखो में आंखे डालते हैं, और तो और भाभीजी घर पर है, जीजाजी छत पर है,
टप्पू के पापा और बबिता जिसमें एक व्यक्ति दूसरे की पत्नी के पीछे घूमता लार टपकता नज़र आएगा पूरे परिवार के साथ देखते हैं। इन सब सीरियल को देखकर आपको गुस्सा नहीं आता ?? हंसी आती है, मजा आता है आप लोगों को। फिल्म्स आती है जिसमे किस (चुम्बन, आलिंगन), रोमांस से लेकर गंदी कॉमेडी आदि सब कुछ दिखाया जाता है। पर आप बड़े मजे लेकर देखते है, इन सब को देखकर आपको गुस्सा नहीं आता ?? 
खुलेआम टीवी- फिल्म वाले आपके बच्चों को बलात्कारी बनाते हैं। उनके मन मे जहर घोलते हैं। तब आपको गुस्सा नहीं आता ? क्योंकि आपको लगता है कि रेप रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। पुलिस, प्रशासन, न्यायव्यवस्था की जिम्मेदारी है..... लेकिन क्या समाज और मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुछ भी परोस दोगे क्या ?
आप तो अखबार पढ़कर, न्‍यूज देखकर बस गुस्सा निकालेंगे। कोसेंगे सिस्टम को, सरकार को, पुलिस को, प्रशासन को, डीपी बदल लेंगे, सोशल मीडिया पे खूब हल्ला मचाएंगे, बहुत ज्यादा हुआ तो कैंडल मार्च या धरना कर लेंगे लेकिन....टीवी चैनल्स, बॉलीवुड, मीडिया को कुछ नहीं कहेंगे। क्योंकि वो आपके मनोरंजन के लिए है।
सच पुछिऐ तो टीवी चैनल्‍स अश्‍लीलता परोस रहे है ... पाखंड परोस रहे है, झूंठे विज्ञापन परोस रहे है, झूंठे और सत्य से परे ज्योतिषी पाखंड से भरी कहानियां एवं मंत्र, ताबीज आदि परोस रहे हैं। उनकी भी गलती नहीं है। क्योंकि आप खरीददार हो .....?? बाबा बंगाली, तांत्रिक बाबा, स्त्री वशीकरण के जाल में खुद फंसते हो ।
3. अभी टीवी का खबरिया चैनल मंदसौर के गैंगरेप की घटना पर समाचार चला रहा है।
जैसे ही ब्रेक आए:- पहला विज्ञापन बोडी स्प्रे का जिसमे लड़की आसमान से गिरती है, दूसरा कंडोम का, तीसरा नेहा स्वाहा-स्नेहा स्वाहा वाला, और चौथा प्रेगनेंसी चेक करने वाले मशीन का...... जब हर विज्ञापन, हर फिल्म में नारी को केवल भोग की वस्तु समझा जाएगा तो बलात्कार के ऐसे मामलों को बढ़ावा मिलना निश्चित है। क्योंकि "हादसा एक दम नहीं होता, वक़्त करता है परवरिश बरसों....!" ऐसी निंदनीय घटनाओं के पीछे निश्चित तौर पर भी बाजारवाद ही ज़िम्मेदार है ..
4. आज सोशल मीडिया, इंटरनेट और फिल्मों में @ पोर्न परोसा जा रहा है। तो बच्चे तो बलात्कारी ही बनेंगे ना।  ध्यान रहे समाज और मीडिया को बदले बिना ये आपके कठोर सख्त कानून कितने ही बना लीजिए, ये घटनाएं नहीं रुकने वाली है।
इंतजार कीजिए बहुत जल्‍द आपको फिर केंडल मार्च निकालने का अवसर हमारा स्‍वछंद समाज, बाजारू मीडिया और गंदगी से भरा सोशल मीडिया देने वाला है। अगर ब भी आप बदलने की शुरूआत नहीं करते हैं तो समझिए कि ...... फिर कोई भारत की बेटी निर्भया एवं अन्‍य बेटियों की तरह बर्बाद होने वाली है। आपको आपकी बेटियां बचना है तो सरकार, कानून, पुलिस के भरोसे से बाहर निकलकर समाज, मीडिया और सोशल मीडिया की गंदगी साफ करने की आवश्‍यकता है.....

Monday, June 25, 2018

एक विवाह ऐसा भी….


एक विवाह ऐसा भी….

हमारे समाज में सदियों से विवाह के कुल आठ प्रकारों को दर्शाया गया है जिनमें से आज सिर्फ एक-दो प्रकार की प्रचलन में बचे हुए है बाकि सब वक्‍त के साथ विलुप्‍त हो गए.... यदि आठ प्रकार के विवाहों पर गौर किया जाए तो
1. ब्रह्म विवाह :- दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
2. दैव विवाह :-किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप में अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
3. आर्श विवाह :- कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह :- कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह :- परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है।
6. असुर विवाह :- कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
7. राक्षस विवाह :- कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।
8. पैशाच विवाह :- कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक संबंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है। इसमें कन्या के परिजनों की हत्या तक कर दी जाती है।
वैसे इन विवाह के उपरांत भी समाज में अन्‍य तरह के विवाह भी देखे जा सकते हैं जिसमें वर का या कन्‍या का मंगली दोष होने के कारण उसका विवाह किसी जानवर से या फिर किसी वृक्ष से कर देना भी समाने आता रहा है ताकि उक्‍त वर या कन्‍या का दोष मिट जाए.....हालांकि कुछ हर राज्‍य में विवाह करने की अलग-अलग परंपरा विकसित है वह अपने कुनबे और अपने धर्म के हिसाब से विवाह करते हैं वहीं बिहार राज्‍य में एक अलग तरह के विवाह को भी देखा जा सकता है जिसको पकडुआ विवाह भी कहते हैं। पकडुआ विवाह वह होता है जिसमें कन्‍या पक्ष किसी वर को पकड़ कर बिना वर की सहमति से अपनी कन्‍या का जबरन विवाह करवा देना पकडुआ विवाह कहलाता है। हालांकि प्रशासन की सख्‍ती के बाद काफी हद तक इस तरह के विवाह पर रोक लग चुकी है परंतु कभी-कभी एक-दो मामले समाने आते रहते हैं।  ठीक उसी तर्ज पर आज मध्‍य प्रदेश में एक बीजेपी नेता ने एक बेचारे मेंढ़क को जबरन पकड़कर उसका विवाह अपनी पुत्री मेंढ़की से करवा दिया..... जिस पर पूरा प्रशासन अभी भी मौन बना हुआ है। हालांकि बीजेपी नेता इस विवाह को ब्रह्म विवाह बता रहे हैं। अब देखना यह है कि क्‍या इस तरह के विवाह पर कोई कानूनन कार्यवाही की जाती है या इस पकडुआ विवाह को बढ़ावा मिलता है। आज मेंढ़क की बात थी तो सब चुप्‍पी साधे बैठे हैं कल आपके कुत्‍ते की बात भी हो सकती है। क्‍या पता कल कोई बीजेपी नेता आपके कुत्‍ते को अपने चमचों से पकड़वा कर उसका विवाह अपनी पुत्री से न करवा दे। तो सकर्त रहे..... सबक एक को और सीख हम सबको....

Sunday, June 17, 2018

स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्‍या


स्त्रियों की  सबसे  बड़ी  समस्‍या
जब बहू  बनती  हैं  तब  सास  अच्‍छी नहीं  मिलती,
जब सास  बनती हैं तब बहू अच्‍छी नहीं मिलती,
जब देवरानी बनती हैं तब जेठानी अच्‍छी नहीं मिलती,
और जब जेठानी बनती है तब देवरानी अच्‍छी नहीं मिलती,
जब भाभी बनती है तब ननद अच्‍छी नहीं मिलती,
और जब ननद बनती हैं तो भाभी अच्‍छी नहीं मिलती,
अंत में यदि सभी अच्‍छी मिल भी जाएं तो कामवाली बाई अच्‍छी नहीं मिलती,
अब बचा आखिरी में बेचारा पति....
तो कसम से आज तक वो किसी को भी अच्‍छा नहीं मिला.........

Thursday, April 12, 2018

उक्‍त बलात्‍कारी के साथ भगवान को भी सजा हो......


उक्‍त बलात्‍कारी के साथ भगवान को भी सजा हो......

आस्‍था रखने वालों, पोंगा पंडितों, साधु-संतों अब बताओं कहां गया तुम्‍हारा भगवान...कोई दलील कोई बचाव है तुम्‍हारे पास...अपने भगवान के लिए.... हो तो अपना-अपना मुंह खोलो...और बको.... और बताओं ऐसा आखिर क्‍यों हुआ.... जिसकी आंखों के सामने एक मासूम बच्‍ची के साथ बलात्‍कार कर उसे जान से मार दिया गया और वह तमाशबीन बन कर तमाशा देखता रहा.... क्‍या उसकी भी यही मंशा थी उक्‍त बच्‍ची के साथ बलात्‍कार करने देने की.... यदि ऐसा ना होता तो वह प्रकट होता और उस दुष्‍ट बलात्‍कारी को बलात्‍कार से रोकता... और उसे उसका दंड भी देता... परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ...न तो मुर्ति के अंदर से कोई हलचल हुई न ही वह मुर्ति के अंदर से बाहर निकल कर आया... बस वह बुत बना तमाशा देखता रहा... कि होने दो कौन सा मेरे धर्म, मुझ में आस्‍था रखने वालों की बच्‍ची थी.. वह तो दूसरे समुदाय, दूसरे धर्म की बच्‍ची थी.. तब मुझे क्‍या फर्क पड़ना चाहिए... शायद भगवान भी उस समय ऐसा ही सोच रहा होगा... नहीं तो वह मासूम बच्‍ची के साथ ऐसा कभी नहीं होने देता.... खैर यह कोई पहला मामला तो है नहीं, मंदिरों में बलात्‍कार का.... पहले भी बाबाओं को चोला औंढे ढोंगी बाबा मामूस बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते रहे हैं और बनाते रहेंगे... क्‍योंकि उनको चूतिया जनता भगवान का ही दर्जा देकर पूजती आ रही है.... जिससे इन बाबाओं का मनोबल और बढ़ जाता है इस तरह के कुकृत्‍य करने के लिए..... रही बात मंदिर में बलात्‍कार की, तो इससे अच्‍छा ठिकाना और क्‍या हो सकता है..... क्‍योंकि उक्‍त दोषी अच्‍छी तरह जानते हैं कि वहां पर विराजमान भगवान तो कुछ बोलेगा नहीं... कुछ भी करते रहो उनके सामने.... क्‍योंकि वह तब भी कुछ नहीं कर पाते जब चोर उनके जेवर ही चुरा लेते है, जेवर क्‍या, चोर उनको ही चुराकर बाजारों में बेच देते है वह तब भी कुछ कर पाने में असमर्थ दिखाई देते है... क्‍योंकि जो भगवान स्‍वयं की रक्षा नहीं कर सकता... वह आम जनता की रक्षा कैसे कर सकता है... इसके बाद भी भीड़ की जमात में शामिल होकर लगे रहते हैं जयकारा करने.......जय हो... जय हो.... अब करो जय हो... उक्‍त भगवान की जय हो... जिसकी आंखों के सामने बलात्‍कार हुआ... उसकी जय करो.....मेरे हिसाब से बलात्‍कार करने वाला कम दोषी है उसे बलात्‍कार करने देने वाला ज्‍यादा दोषी है... इसलिए यदि उक्‍त बलात्‍कारी को सजा मिलती है तो भगवान को भी बराबर सजा मिलनी ही चाहिए........ .

Saturday, April 7, 2018

आमजन की बेल पर भी हो तत्‍काल सुनवाई


आमजन की बेल पर भी हो तत्‍काल सुनवाई
सोचने वाली बात है.... वाह रे न्‍याय प्रणाली…..एक तरफ लालू प्रसाद यादव को 3.5 साल की सजा हुई है और पटना हाईकोर्ट ने अभी तक उनकी बेल पर सुनवाई तक नहीं की। वहीं दूसरी तरफ सलमान खान को 5 साल की सजा हुई और दो दिन बाद सुनवाई करके बेल भी दे दी गई। अगर गौर किया जाए तो इलाहाबाद हाईकोर्ट, पटना हाईकोर्ट और भी हाईकोर्टों में ऐसे बहुत सारे मामले लंबित चल रहे हैं जिनकी बेल पर सुनवाई साल-साल भर होने के उपरांत अभी तक नहीं की गई है... और न्‍याय कुर्सी पर विराजमान जज यह कहकर उक्‍त व्‍यक्ति के परिजनों पर तारीख चिपका देते हैं कि हम इस तरह का केस सुनना ही नहीं चाहते.... वैसे एक बात समझ से परे मालूम होती है कि जब हाईकोर्टों डेली केस लिस्‍ट बनाते हैं तो फिर उन केसों की सुनवाई क्‍यों नहीं करते.... क्‍यों तारीख पे तारीख चिपकाते रहते हैं। कभी सोचा है उक्‍त व्‍यक्ति और उसके परिजनों के बारे में कि वह कैसे करके तारीखों पर पहुंचता है और जब फाइल ही नहीं सुनी जाती, तो एक निराशा का भाव लेकर फिर अगली तारीख पर बेल होने की लाइन में खड़ा हो जाता है। यह आम जनता है जिसकी पीड़ा से किसी को कोई सरोकार नहीं.... चाहे वह उच्‍च धरातल पर न्‍याय करने वाला न्‍यायाधीश ही क्‍यों न हो... वहीं सलमान जैसों को तत्‍काल प्रभाव से बेल मिल जाती है... यह कैसा दोगलापन है न्‍याय का... सही है गरीबों की कहां सुनी जाती है.... मैं लालू को गरीब नहीं मानता.... बस उनका उपयोग उदाहरणस्‍वरूप किया है... लालू तो राजनीति का शिकार हैं तभी उनकी बेल नहीं हो रही है.. यदि वह बीजेपी में होते तो अभी तक उन पर लगे सारे आरोप खुद-व-खुद खारिज हो जाते..और वह सभी केसों से बाइज्‍जत बरी भी हो चुके होते.... मैं तो बस न्‍याय प्रणाली पर प्रश्‍नचिह्न लगा रहा हूं कि आमजन की बेल पर तत्‍काल प्रभाव से सुनवाई क्‍यों नहीं की जाती.. क्‍या वह इंसान नहीं होते.....

Wednesday, April 4, 2018

भारत में दलितों पर होने वाले अत्‍याचारों की हकीकत


भारत में दलितों पर होने वाले अत्‍याचारों की हकीकत
  


 
इतनी तेजी से तो देश भी तरक्की नहीं कर रहा जितनी तेजी से दलितों पर अत्याचार के आंकड़े बढ़े हैं। अत्याचार की कहानी यूं तो सदियों से चली आ रही है लेकिन आंकड़ों की स्क्रिप्ट कुछ और ही बयां करती है। दलितों के साथ होने वाले अत्याचार के मामले में साल 2009 में 33,594, 2010 में 32,712, 2011 में  33,719, 2012 में 33,655, 2013 में 39,408 तथा 2014 में 47,064 आंकड़े दर्ज किए गए। राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक 2016 में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराधिक मामलों में 2015 के मुकाबले 5.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2016 में कुल 40,801 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि 2015 में ये आंकड़ा 38,670 तक ही था। उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के 10,426 आंकड़ें दर्ज हुए हैं, जो कि पूरे मामलों के 25.6 फीसदी हैं। इसके बाद बिहार का नंबर आता है, जहां लगभग 14 फीसदी अपराध हुए हैं। 2016 में मध्यप्रदेश में दलितों के खिलाफ 43.4 फीसदी संज्ञेय अपराध हुए हैं, जबकि राजस्थान में ये आंकड़ा 42 फीसदी है। गोवा में 36.7 फीसदी, 34.4 फीसदी बिहार में और 32.5 फीसदी गुजरात में। पूरे देश में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराध का आंकड़ा 20.6 फीसदी था।
वहीं इससे इतर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो दलितों पर अत्याचार के मामले में मध्य प्रदेश पहले स्थान पर है। यहां 4,922 अपराध दर्ज किए गए। अपराध की दर 43.4 फीसदी रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दोगुनी हैं। इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर हैं, जहां 5,134 अपराध हुए हैं। उसकी दर 42.0 प्रतिशत रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दोगुनी है। गोवा तीसरे स्थान पर है जहां अपराध दर 36.7 रही। गुजरात का स्थान 5वां है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है।
यह केवल वह आंकड़े हैं जो थानों में दर्ज कराए गए। इनके अलावा कितने दलितों को अत्याचार का चाबुक सहना पड़ता है इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। एनसीआरबी द्वारा जारी किए गए 2014 के आंकड़ों के अनुसार देश भर में दलितों पर अत्याचार के 47,064 मामले सामने आए। जो वर्ष 2009 से 13,652 अधिक हैं। आंकड़े साफ-साफ बयां करते हैं कि दलितों पर अत्याचार साल दर साल लगातार बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। 
वहीं दलित महिलाओं की बात की जाए तो दलित महिलाओं की स्थिति भी ठीक नहीं रहीं है। साल 2015 के मुकाबले 2016 में दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2015 में जहां रेप के 444 मामले प्रदेश में दर्ज किए गए थे। वहीं 2016 में दर्ज मामलों की संख्या 557 पहुंच गई। इसके अलावा रेप के प्रयास के 77 मामले दर्ज किए गए जबकि साल 2015 में यह आंकड़ा महज 22 था। यौन उत्पीड़न के मामलों में भी इजाफा दर्ज किया गया है। 2016 में 874 मामले दर्ज किए गए हैं जबकि साल 2015 में 704 मामले दर्ज किए गए थे। इस तरह के मामलों में हो रहे इजाफे पर केंद्र सरकार ने हाल में दिल्ली में एक बैठक की। इसमें प्रदेश सरकार की तरफ से समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री ने दलितों पर बढ़ते अत्याचार की रिपोर्ट और सरकार का पक्ष रखा। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में दलितों पर अत्याचार के कुल 8,460 मामले दर्ज किए गए थे जबकि साल 2016 में आपराधिक मामलों का आंकड़ा बढ़कर 10,492 हो गया था
इन अपराधों पर अंकुश लगाने वाले कानूनों की कोई कमी नहीं है, पर संभवत उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं होने के कारण दलितों पर अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं। वैसे इन आंकड़ों को देखकर नहीं लगता कि दलित स्‍वतंत्र भारत में रह रहे हैं और उनकी स्थिति में सुधार आया हो....बाकि कोई भी किसी की भी सरकार सत्‍ता में काबिज हो जाए.... दलितों पर अत्‍याचार रोकेंगे के लिए कोई भी प्रभाव कदम उठाती दिखाई नहीं प्रतीत होती है। ऐसा लगता है कि इनकी स्थिति जानवरों के भी बद्तर समझी जा रही है क्‍योंकि प्रबुद्ध वर्ग के लोग आज भी नहीं चाहते की यह उनके समान, समकक्ष खड़े हो सके। तभी तो आंकड़े पूरी दास्‍तान बयां करते दिखाई देते हैं।