सरोकार की मीडिया

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Thursday, March 23, 2017

एक साथ पढ़ने पर भी लगा दो पाबंदी.....

एक साथ पढ़ने पर भी लगा दो पाबंदी.....


अब भाई पार्क, किला, मंदिर, मस्जिद, कॉफी शॉप, होटल आदि जगहों पर जाने का मन हो तो अकेले ही जाओं, हां दोस्‍तों के साथ भी जा सकते हो, वो भी सिर्फ लड़के होना चाहिए, यदि अब लड़कियों के साथ गए तो क्‍या पता कहीं से एंटी रोमियों स्‍कॉड न आ जाए (महिला पुलिस के साथ) और आपको लड़की के साथ देखकर आपकी हजामत न करने लग जाए.... और हां यदि अब कोई विवाहित पुरूष अपनी पत्‍नी के साथ इन जगहों पर जाने की सोच रहे हो तो शादी की एक दो तस्‍वीरें अपने साथ जरूर रखकर चले….. या फिर कोई आई कार्ड बनवा लीजिएगा जिसको अपने गले में जरूर टांग लीजिएगा.....ताकि कोई पुलिसवाला पूछे तो उसको दिखा सको की हम विवाहित है और य‍ह हमारी पत्‍नी है.....खैर जब सरकार यह चाह रही है कि पार्कों, किलों, कॉफी शॉप, मंदिरों में कपल न दिखें तो उनको एक नया नियम और बना देना चाहिए कि आज से स्‍कूल, कॉलेजों, महाविद्यालयों, विश्‍वविद्यालयों आदि जगहों पर लड़के-लड़कियों के साथ पढ़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए....इनकी टाईमिंग में बदलाव कर देना चाहिए कि सुबह की पाली में लड़कियां पढ़ेंगी और शाम की पाली में लड़के.... और सभी स्‍कूल, कॉलेजों, महाविद्यालयों, विश्‍वविद्यालयों के पार्कों, केंटीनों में फोर्स तैनात कर देना चाहिए ..... और तो और पुरूष शिक्षक सिर्फ लड़कों को पढ़ाएंगे और महिला शिक्षिका सिर्फ लड़कियों को.... यह भी नियम बना दीजिए....ताकि जो आपकी मंशा है वो पूरी हो सकें.... वैसे उत्‍तर प्रदेश सरकार के नए मुख्‍यमंत्री ने सभी एसपी को दिशा निर्देश देकर एंटी रोमियों स्‍क्‍वार्ड का गठन हर जिलों में करवा दिया है यह अच्‍छी बात है महिलाओं और लड़कियों को सुरक्षा मिलेगी... पर स्‍कॉड द्वारा इस तरह पार्कों, किलों, मंदिर, मस्जिद, कॉफी शॉप, होटल आदि जगहों पर बैठे लड़के-लड़कियों को प्रताडित करना, लड़कों को थप्‍पड़ मारना, डंडों से पीटना, उठक-बैठक करवाना, उनके उपर केस लगाना क्‍या जायज है... इससे यह प्र‍तीत होता है कि हम स्‍वतंत्र नहीं है.... अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकते. बैठ नहीं सकते, घूम नहीं सकते.... हां महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में यह कदम है तो उन पर कार्यवाही कीजिए जो महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हैं, उन पर फब्‍तियां कसते हैं...... आपसी सहमति से.... दोस्‍तों के साथ बैठना, घूमना,आना, जाना, इस पर प्रतिबंध बिल्‍कुल भी जायज नहीं है.... मैं इस बात का विरोध दर्ज करता हूं.... बाकि हमारे मुख्‍यमंत्री जी बुद्धजीवि है... मेरे द्वारा बताए गए कुछ और नियम अपने इस अभियान में जोड़ ले कि आज से स्‍कूल, कॉलेजों, महाविद्यालयों, विश्‍वविद्यालयों आदि जगहों पर लड़के-लड़कियां एक साथ नहीं पढ़ेगे और एक साथ कहीं ना आएंगे ना जाएंगे... तो शायद आपके द्वारा चलाई गई यह मुहीम पूरी हो सकें....

Tuesday, March 7, 2017

पुरूषों की सोच से परे सोचें......महिलाएं

पुरूषों की सोच से परे सोचें......महिलाएं

एक दिन...... हां जी सिर्फ एक दिन.... महिलाओं के नाम...चलो अच्‍छा है थोड़ा सा चिल्‍लाने का मौका उनको भी मिल जाता है....कि हम महिलाएं हैं..... हमारे साथ ऐसा होता है, वैसा होता…… यह पुरूष समाज हमारे साथ ऐसा करते आ रहे हैं, वैसा करते आ रहे हैं.... इनसे मुक्ति मिलनी चाहिए.....हां भाई जरूर मिलनी चाहिए....आप भी आधी आबादी का हिस्‍सा है हमारी..... पर साल में एक दिन अपने अधिकारों को चिल्‍ला-चिल्‍लाकर याद करना कहां की तुक है....साल के बाकि दिन भी आपके हैं उसमें भी अपने अधिकारों के लिए लड़ा जा सकता है.....पर नहीं....चुप्‍पी साध के बैठे रहते हैं आप लोग.... इस एक दिन के लिए.... कि मार्च की 8 तारीख आएगी और हमें कहना का मौका मिलेगा......हमको पता है बहुत कुछ सहा है आप सभी ने...सह भी रहे हैं... पर क्‍यों..... वैसे कभी आप लोगों ने अपने-अपने घरों में भी झांककर देखा होता तो आपको पता चल जाता कि आपके शोषण की शुरूआत वहीं से हुई है...... जरा गौर कीजिए जब आपको कहीं जाना होता था और आप अपनी माता से कहती थी, तो जबाव साफ मिलता है कहीं नहीं जाना.... जाना है तो भाई के साथ चली जाना..... कभी आपकी माता ने आपके भाई से क्‍यों नहीं कहा कि जाना है तो अपनी बहन के साथ ही जाना, नहीं तो कहीं जाना ही नहीं है......वहीं आपके भाई को खुली छूट है कि वो रात्रि के 9-10 बजे तक आ सकता है और आपको.... घर में 6 बजे ही बंद कर दिया जाता रहा है..... और तो और सुबह का नास्‍ता, खाना, घर का पूरा काम आप लोगों को ही करना पड़ता है.... कभी आपके परिवार वालों ने कहा कि नास्‍ता या खाना या घर का यह-यह काम तुम्‍हारा भाई ही करेगा....कभी ऐसा हुआ....कभी नहीं.......क्‍योंकि वो पुरूष है आप महिला... वहीं यदि आपका भाई किसी से प्रेम करता है तो उसको आजादी है मेरा लाल, मेरा बेटा... और आपने कर लिया तो पाबंदियां ही पाबंदियां.... कलमुंही, कुल्‍टा, और न जाने क्‍या–क्‍या आपकी माता के मुखरबिंदु से अच्‍छे-अच्‍छे अल्‍फाज निकलने लगते हैं।
कभी अपने ही घर में अपने शोषण के प्रति आवाज उठाई है.....और उठाई है तो वो आवाज आपके परिवार वालों ने ही दबा दी है..... और सबसे अधिक उसको दबाने वाली कोई और नहीं आपकी माता जी ही होती है..... इस संदर्भ में और कहें तो विवाहित महिलाओं को देखिए कि उनकी पूरी सोच पुरूषों के अनुरूप ही घूमती रहती है....सोचने का नजरिया, देखने का नजरिया सब कुछ पुरूषों के अनुसार..... क्‍योंकि महिलाएं अपने आपको आज भी उन पर निर्भर समझती है.... कमजोर समझती है बिना पुरूषों के......(एक आध अपवाद स्‍वरूप महिलाओं को छोड़कर)..... शादी, बच्‍चे पैदा करने का निर्णय, घर में आज क्‍या बनेगा, क्‍या बनना चाहिए सब कुछ पुरूषों के अनुसार ही किया जाता है..... वहीं दहेज की मांग करने वाली अधिकांशत: औरतें ही होती हैं.... दहेज की आग में जलाने वाली अधिकांश सास होती है.... और तो और अपनी बहुओं से लड़का ही पैदा हो इस तरह की ख्‍वाहिशें भी सास ही करती देखी जाती है... बहू पर अत्‍याचार करने वाली सास, या सास पर अत्‍याचार करने वाली बहू...जरा सोचिए महिला होने के बाद भी वो महिलाओं के साथ क्‍या-क्‍या करती हैं....क्‍योंकि उनकी सोच आज भी पुरूष समाज के समकक्ष चलती है। मेरे कहने का तात्‍पर्य सिर्फ इतना है कि जब आप अपने ही घर में अपनी आवाज नहीं उठा सकते तो फिर इस तरह बाजार में चिल्‍लाने से फायदा ही क्‍या है...... पहले अपने ही घर में हो रहे शोषण को देखिए जिसे आप अनदेखा कर देती है....उसके खिलाफ आवाज उठाए....जब आप अपने घर में अपने अधिकारों के प्रति सजग हो जाएंगे तो समाज अपने आप ही आपको वो अधिकार देने पर स्‍वत: मजबूर हो जाएगा जिसे वो आज तक आप सभी से छिनता आया है.....आप सब का दोहन करता आया है..... वो अधिकार पुरूष समाज ही क्‍या कोई भी नहीं छिन सकता जिसके प्रति आप लोग सजग है... नहीं तो इस देश में उल्‍लू बनने वालों की कमी थोड़ी के है.....
यदि किसी को मेरा विचार किसी को अच्‍छे नहीं लगे हों तो मैं माफी मांगता हूं.... बाकि महिला दिवस की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं...

Sunday, February 19, 2017

हमाम में सब नंगे हैं

हमाम में सब नंगे हैं

राजनीति शुरू से ही गंदी रही है तभी तो नेता इस गंदगी को छुपाने के लिए सफेद कपड़े पहनते है ताकि गंदगी छुप सके। बाहरी गंदगी को सफेद वस्‍त्रों से तो छुपा सकते हैं जो आपके अंदर गंदगी है उसके कैसे साफ करेंगे.....राजनीति है....इसमें साम, दाम, दंड, भेद सभी का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है जो इसका प्रयोग बखूबी करना नहीं जानता वो राजनीति के अखाडे में ज्‍यादा देर तक टिका नहीं रह सकता। वैसे जिसको इस अखाडे में अपनी सत्‍ता काबिज करनी है उसे हर पहलुओं से गुजरना पड़ता है, वो ना तो अपनी पत्‍नी का होता है, ना मां का होता है, ना बाप का और ना ही भाई का.....उसके लिए सत्‍ता के सिंहसन पर बैठने के लिए चाहे जिसकी भी बलि देनी पड़े वो पीछे नहीं हटते......हम सबने पढ़ा है कैसे सिंहसन को पाने के लिए राजाओं के पुत्रों, मंत्रियों और लोगों के क्‍या-क्‍या नहीं किया.....अपने बाप को, अपनी मां को, अपने भाई की भी हत्‍या कर सत्‍ता हथिया ली.....वो ही छवि आज-कल के नेताओं में देखी जा सकती है। वैसे उत्‍तर प्रदेश में चुनावी शंखनाथ के बाद सभी पार्टियों के नेताओं, और उनके मुखियाओं ने एक-दूसरे पर कटाक्ष करना शुरूकर दिया है....वो ऐसा, वो वैसा, उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया....हमारी पार्टी आएगी तो ऐसा करेंगे, हमारी पार्टी आएगी तो वैसा करेंगे..... करेंगे.....आप आम जनता को क्‍या दिखाना चाहते है कि हम बहुत अच्‍छे है....हमारा दामन पाक साफ है.....आप कैसे भूल जाते हैं कि हमाम में सब नंगे हैं......चाहे किसी की पार्टी हो......एक भी ऐसा नेता बता दीजिए जिसका दामन साफ हो.....लट्टू लेकर खोजेंगे तब भी किसी पार्टी में ऐसा एक भी नहीं मिलेगा। 

Friday, February 3, 2017

बीजेपी के कार्यकाल में महिलाएं कितनी सुरक्षित

बीजेपी के कार्यकाल में महिलाएं कितनी सुरक्षित


बहुत खूब.....दागदार चरित्र वाले दूसरों पर कीचड़ उछालना खूब जानते हैं। आप सभी देख रहे है उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जगह-जगह पोस्‍टर और बैनर (चुनाव आयोग से अनुमति लेकर) लगे नजर आ रहे हैं...जिसमें भारी भरकम स्‍लोगन लिखे हैं कि....जाति धर्म है जिनका आधार, नहीं चाहिए ऐसी सरकार, गुंडागर्दी, हत्‍या और लूटमार, नहीं चाहिए ऐसी सरकार... अब और नहीं बलात्‍कार, नहीं चाहिए ऐसी सरकार......परिवर्तन लाएंगे, कमल खिलाएंगे....ऐसे अनगिनत स्‍लोगन आपको जगह-जगह देखने को आज भी मिल जाएंगे.....साथ ही ऐसे स्‍लोगन सोशल मीडिया पर भी खूब छाए हुए हैं....जिनका कोई अता-पता नहीं कि इसका खर्चा कहां के उम्‍मीदवार के चुनाव खर्चें में जोड़ा जाएगा.... वैसे बीजेपी वाले अपने दामन को पाक साफ बता रहे हैं...आज ही ऑनलाइन एक बेवसाइट से खबर आई....कि दिल्‍ली में बीजेपी पार्टी की महिला नेता जबरन महिलाओं से देह व्‍यापार करवाती पकड़ी गई.....खबर के साथ ही उसके उपर बीजेपी का प्रचार स्‍लोगन सहित चल रहा था जिसे देखकर बीजेपी की वास्‍तविक स्थिति का आंकलन आसानी से किया जा सकता है..... कि इनका दामन कितना पाक साफ है.और जो महिलाओं की सुरक्षा की बात करते हैं उनके कार्यकाल में महिलाएं अपने आपको कितनी सुरक्षित महसूस कर रही हैं...आगे आप सभी समझदार हैं...... 

Thursday, January 26, 2017

अम्बेडकर को कभी खारिज़ नहीं किया जा सकता

अम्बेडकर को कभी खारिज़ नहीं किया जा सकता


संवेदना और स्वयंवेदना में अंतर होता है। आप ठीक वो नहीं महसूस कर सकते हैं जो कोई और महसूस कर रहा है। स्वयंवेदना को संवेदना के बरक्स रखने का दावा दरअसल बिलकुल खोखला है। आप सिर्फ सुनकर, समझकर और गुनकर अंदाज़ा लगाते हुए कहतें हैं कि मैं समझ सकता/सकती हूँ। मसलन एक गर्भवती महिला कैसे महसूस करती है, क्या सहन करती है वो एक महिला ही समझ सकती है वो भी वैसी महिला जो खुद उस स्थति से गुज़र रही है या गुज़र चुकी है। जैसे एक अल्पसंख्यक की मुश्किलें बहुसंख्यक बिल्कुल वैसे ही नहीं समझ सकता जो कोई अल्पसंख्यक फ़ेस करता है। जैसे एक दलित महिला/पुरुष की तकलीफें, रोज़ाना होने वाला भेदभाव, उनके प्रति सामजिक व्यवहार और नज़रिया प्रेक्टिसेस को एक्जैक्ट एक सवर्ण नहीं समझ सकता। संवेदनशीलता होना मनुष्य होने की अनिवार्य शर्त समझती हूँ मैं। संवेदनशील होकर आप स्वयंवेदना को नकार नहीं सकते। यदि आप ऐसे कर रहें हैं तो झाँकिये खुद में ही कि कहीं खुद के छिप जाने या इम्पोर्टेंस कम होने की कुंठा तो नहीं है ना। अपने आप को अलग़-अलग़ तरीक़े से बनाये रखने, अपनी इम्पोर्टेंस बनाये रखने के लिए दूसरे प्रश्नों को गौण नहीं बना सकते आप। ये साफ़तौर पर उन प्रश्नों को नकारने का प्रपंच दिखता है, जो भारतीय समाज में प्राथमिक हैं।
इनदिनों कुछ मार्क्सवादियों ने खुले रूप में बाबासाहेब आंबेडकर और अम्बेडकरवादियों को गरियाने का ठेका ले रखा है। इन्हें बाबासाहेब अम्बेडकर से दिक़्क़त है, अम्बेडकरवादियों से दिक़्क़त है, संविधान से दिक़्क़त है, लोकतंत्र से दिक़्क़त, गणतंत्र से दिक़्क़त है। इन्हें लगता है कि सूट-बूट पहने अम्बेडकर दलितों के प्रतिनिधि नहीं हो सकते। तो भाई नुमाइंदगी कौन करेगा?...... तो नुमाइंदगी मार्क्सवादी करेंगे। वही लोग जो प्राचीन काल में शास्त्र पढ़ाते थे और अब कार्लमार्क्स पढ़ाते हैं। जो बहुत होशियारी से वर्ग की बात करके वर्ण की बात छुपा जाते हैं। जाति का मुद्दा इनके लिए नहीं है ना। अब सोचिये कोई पांडे, त्यागी, उपाध्याय, सिंह,राय, चटर्जी, मुख़र्जी को क्या जातिवाद का सामना करना पड़ता है? क्यों आपके लिए जाति मुद्दा होगा? सिर्फ़ आपके सरनेम के कारण समाज आपके साथ कैसे व्यवहार करता है और हमारे साथ कैसे व्यवहार करता है जानते हैं आप भी। ये कह रहें हैं कि आंबेडकर और अम्बेडकरवादियों ने ही इनकी क्रांति का मार्ग अवरुद्ध कर रखा है। वाह जनाब! बहुत बढ़िया, आप ख़ारिज करने की कोशिश करोगे अम्बेडकर को क्योंकि अम्बेडकर सिर्फ़ दक्षिणपंथियों के लिए गले की हड्डी नहीं है , मार्क्सवादियों के लिए भी है। लगते होंगे आपको अम्बेडकरवादी पूंजीवाद के प्रतिनिधि इसके लिए आपकी समझ और व्यवहार पर मुझे सहानुभूति है। अगर मुठ्ठी भर दलितों की हालत सुधरने से आपको लगता है कि दलित पूंजीवादी हैं तो यह उनके समझ के मसले से ज़्यादा यह तकलीफ़ का मसला दिखता है। सशक्त हो गये और हो रहे दलितों को भी जातिवाद का सामना करना पड़ता है, यह आप समझ भी नहीं पाओगे क्योंकि चोटीधारी होने की प्रिविलेज़ आपको मिल सकती है पर एक दलित व्यक्ति को नहीं है। ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद करते हुए आप जाति के प्रश्न को वर्ग का मुद्दा बनाकर छुपातें हैं, आप भुगतते नहीं हैं ना इसलिए जाति का प्रश्न आपके लिए नहीं होगा हमारे लिए है। कास्टलेस, जेंडरलेस, रिलीजनलेस ऐसे ही नहीं हो जायेगा, देखिये अपनी ही प्रेक्टिसेस को। जेएनयू में इंटरव्यू के मुद्दे पर धारण किया मौन और उसके पीछे की पॉलिटिक्स, पश्चिम बंगाल का क़त्लेआम भूला नहीं जायेगा, किसी लेफ़्टपार्टी में कितने दलित-आदिवासी-पिछडों को पद दिए गए हैं, आदिवासी नहीं पिस रहें हैं क्या नक्सलवाद की आड़ में, मार्क्स को जप-जप कर भी अपनी ही जाति में शादी करते वक़्त सारी क्रांति हवा हो जाती है। दलित मुद्दों पर अपर कास्ट सवर्ण बात करेंगे वाह! दलित डिस्कोर्स से एक व्यक्ति नहीं मिलता ऑक्सफ़र्ड के सेमिनार में बात रखने के लिए। क्यों भाई सारी योग्यता अपर कास्ट सवर्णों में ही है क्या ? जाति का मुंह देखकर व्यवहार करने वाले समाज में देखिये मीडिया कवर कन्हैया को मिलता है, कवर न दिलीप को मिला न राहुल सोनपिम्पले को। जेएनयू में इंटरव्यू को सिलेक्शन का मापदंड बनाने के ख़िलाफ़ चल रहे अनशन को रवीश कुमार पांडे जातिगत भेदभाव की बजाय भाषा का मुद्दा बता देतें हैं, क्या ये वाक़ई भाषा का मुद्दा है? अपर कास्ट के राइटरों और लेफ्टिस्टों को जिस तरह हाथोंहाथ लिया जाता है, वैसे बहुजनों को नहीं। इसलिए आप नहीं बोलोगे ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़, आप नहीं कहोगे कि जाति मुद्दा है, आप नहीं कहोगे की आप खुद भी जातिवादी हो .......तो चिल्लाते रहो। खोखली क्रांति आपको मुबारक़। अब मार्क्स का भक़्त ब्राह्मण तो कम से कम यह नहीं बताएगा कि हमारा प्रतिनिधि कौन होगा। अम्बेडकर को कभी खारिज़ नहीं किया जा सकता। अंबेडकर व्यक्ति नहीं है विचारधारा है। इंसानों के रूप में कंसीडर किये जातें हैं अब हम।

Tuesday, January 24, 2017

एक दिन मयखाना फ्री हो जाए....??????

एक दिन मयखाना फ्री हो जाए....??????
काश केंद्र में बैठी सरकार यह ऐलान कर दे कि जिस दिन उत्‍तर प्रदेश के जिस जिले में विधानसभा हेतू वोटिंग डाली जाएगी उस दिन वहां के ठेकों पर केंद्र सरकार द्वारा शराब का मुफ्त वितरण किया जाएगा...दिल खोलकर शराब पिओ और अपने पसंदीदा उम्‍मीदवार को जिताओं... इसमें बुराई भी क्‍या है...यदि शराब इतनी ही बुरी चीज है तो सरकार इस पर पूर्ण रूप से पाबंदी क्‍यों नहीं लगाती...बेचारे हमारे प्रदेश के पुलिस वालों को खासी मसक्‍कत करनी पड़ती है शराब को बनाने वालों को पकड़ने में....अरे भाई बड़ी-बड़ी कंपनियों को पकड़ों वो भी तो शराब बना रही है। वहीं हमारे मीडिया साथियों को भी खबर बनानी पड़ती है...कि फलां-फलां पुलिस ने इतने लीटर शराब समेत 3 को पकड़ा...सही है पकड़ लिया...अब यह भी तो दिखाओं की जमानत पर कानून ने उनको रिहा कर दिया.....हां यह और बात है कि कुछ लोगों को जेल की हवा भी खानी पड़ती है और सजा भी भुगतनी पड़ती है क्‍योंकि उनका वकील सलमान खान के वकील जैसा नहीं होता...जो सारे सबूतों को ही पलटकर रख दें..और हमारे माननीय जज साहब को फैसला सुनना पड़े कि खुद हिरन चलकर आया था.. इसमें सलमान खान निर्दोष हैं और हिरन दोषी....यदि हमारे कानून में मुर्दो को सजा देने का प्रावधान होता तो हिरन को कब की सजा मिल चुकी होती....यदि हिरन को नहीं तो हिरन के बच्‍चों को मिल चुकी होती...क्‍योंकि सलमान खान ने तो शराब के नशे में फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी भी नहीं चढ़ाई थी....खुद फुटपाथ पर सो रहे लोगों ने जब देखा कि सलमान खान की गाड़ी आ रही है तो वो खुद सोते सोते ही उसकी गाड़ी के नीचे आ गए होंगे... अरे भाई शायद में मुद्दे से भटक गया...में तो विधानसभा चुनाव में शराब को सरकार द्वारा मुफ्त पिलाने की बात कर रहा था...क्‍योंकि होना तो ऐसा ही है कि तमाम पाटियों के लोग वोट के खातिर अपने पाले हुए भाईनुमां गुंडों को पैसा देकर शराब का वितरण तो करवाएंगे ही...तो फिर जो लुकाछिपी में होगा वह सरकार को चाहिए कि इस संबंध में खुली छूट देकर मुक्ति पा ले....ताकि पुलिसवालों को परेशानियों का सामना न करना पड़े...अब वो चुनाव देखें या फिर शराब को बनाने वालों को पकड़े या फिर शराब को पिलाने वालों को....तभी तो कह रहा हूं कि चुनाव को मद्देनजर रखते हुए शराब को उस दिन के लिए मुफ्त कर दिया जाए जिस दिन वोटिंग होने वाली हो....वैसे यह बात भी है कि इससे आदमी सही उम्‍मीदवार का चयन करेंगा...क्‍योंकि शराब पीने के बाद आदमी का दिमाग ज्‍यादा ही सक्रिय हो जाता है उसे अच्‍छे और बुरे दोनों का ज्ञात होने लगता है.. अभी तो ऐसा होगा कि भाई- भतीजावाद या फिर धर्म - जातिवाद, जात- जातवाद के नाम पर वोट दिए जाएंगे बिना यह देखे कि उस पार्टी ने पिछले पांच सालों से वहां की जनता और जिले, नगर के विकास के लिए क्‍या क्‍या किया। जब वो दो पैग पी लेगा तो उसे उस उम्‍मीदवार के कर्मों का लेखाजोखा और पिछले पांच साल में किए गए विकास का लेखा जोखा समझ में आने लगेगा...तभी तो सरकार से अग्रह है कि सिर्फ एक दिन शराब का वितरण मुफ्त कर दिया जाए....वैसे भी नोटबंदी के बाद से बहुत सारे करोड़ों रूपए आपने पकड़े हैं थोड़ी ही धनराशि से शराब का सेवन ही करवा दीजिए जनता आपको दुआएं देंगी...और हो सकता है कि वोट भी दे दे....तो फिर ज्‍यादा सोचा विचारी मत कीजिए और मुझे एक वोट समझकर मेरी बात पर गौर फरमाएं.....क्‍योंकि हमको पता है कि जो भी उम्‍मीदवार जीतकर आएंगा वो पिछले वाला जैसा ही होगा....कोई खास बदलाव नहीं आएंगा... बस नाम बदल जाएंगा...पार्टी बदल जाएंगी...बस काम का नाम मत लेगा क्‍योंकि विकास नहीं होगा.....बाकि सब होगा...माया, मुलायम, अखिलेश, राहुल, प्रियंका, सोनिया, मोदी, राजनाथ, कल्‍यान अन्‍य कोई भी, बसपा, सपा, कांग्रेस, बीजेपी, अन्‍य कोई भी पर विकास नहीं आएंगा....यह बस एक जुमला रह जाएगा कि विकास होगा....विकास को तो यह नेता गर्भ में ही मार देते है और जनता इसी आस में रह जाती है कि चलों अगले पांच साल बाद विकास होगा.....
नोट:- इस लेख का किसी पार्टी विशेष से कोई लेना देना नहीं है...यदि सहयोग से किसी का नाम आता है तो इसें मात्र एक संजोग समझा जाए...यह लेखक के अपने मत है....

Monday, January 2, 2017

एक संस्म रण......

एक संस्‍मरण......
एक संस्‍मरण.... मैं कल बैठा था तो यकायक वो दिन याद आने लगे जब मेरा प्रवेश महात्‍मा गांधी अंतराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में पीएचडी में हुआ था। और मुझे विश्‍वविद्यालय के तरह से रहने के लिए शांति कुटी छात्रावास मिला हुआ था। छात्रावास बहुत अच्‍छा था एकांत और सेवाग्राम रेलवे स्‍टेशन के समीप। पर छात्रावास में कुछ सुविधाओं का अभाव जरूर था....नहाने की पूर्ण व्‍यवस्‍था नहीं थी, खाने की व्‍यवस्‍था का भी अभाव था। तो सभी वहां पर रहने वाले छात्र खुले में स्‍नान करते थे। एक दिन मैं स्‍नान कर रहा था तभी वहां पर एक छात्रा का आगमन हुआ.....उसको देखकर मैंने असहजभाव महसूस किया पर कर भी किया सकता था जल्‍दी-जल्‍दी स्‍नान किया। और वह छात्रा किसी छात्र के रूम में दाखिल हो गई। बाद में पता चला कि इस विश्‍वविद्यालय द्वारा मिले सभी पुरूष छात्रावास में छात्राओं के आने व रूकने की अनुमति है। चूकि मेरे लिए यह किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था। खैर ऐसा कुछ दिनों तक लगातार चलता रहा। फिर मैंने वहां मौजूद कुछ अपने मित्रों से इस संदर्भ में बात की, कि विश्‍वविद्यालय प्रशासन से कहा जाए या तो हम लोगों के लिए स्‍नान की उचित व्‍यवस्‍था करवाई जाए या फिर लड़कियों का पुरूष छात्रावास में आने से वर्जित किया जाए.....जिसके संदर्भ में हम लोगों ने तत्‍कालीन कुलपति महोदय को एक पत्र लिख, जिस पर कार्यवाही करते हुए कुलपति ने पुरूष छात्रावास में लड़कियों के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके कारण बहुत लोगों की गालियां भी सुननी पड़ी। खैर प्रतिबंध लगने के कुछ दिनों बाद विश्‍वविद्यालय में अध्‍ययनरत महिला अध्‍ययन विभाग की छात्राओं एवं कुछ छात्रों द्वारों इस प्रतिबंध को उनके अधिकारों का हनन मानते हुए कुलपति से मुलाकात की, कि इस प्रतिबंध को हटा लिया जाए। सहयोग से इस बात की जानकारी मुझे भी लग गई....तो मैंने कुलपति महोदय से कहा कि मेरे द्वारा दिए गए पत्र को नाकार दीजिए और छात्राओं को पुरूष छात्रावास में जाने की अनुमति पुन:प्रदान कर दे....और साथ में महिला छात्रावास में पुरूषों को भी जाने की अनुमति दे दे.....जिस पर सभी छात्राओं ने इसका विरोध किया कि पुरूष महिला छात्रावास में कैसे आ सकते हैं.....हम किस अवस्‍था में रहते हैं.....तो उन छात्राओं की बात काटते हुए कहा कि जब आप लोग असहज महसूस कर सकते है तो पुरूष भी असहज महसूस करते हैं। बात वहीं खत्‍म हुई।
कुछ दिनों के बाद फिर सभी छात्राओं ने इस बावत प्रतिकुलपति से मुलाकात की.......तत्‍कालीन प्रतिकुलपति ने जो कहा उस बात से सभी की बोलती बंद कर दिया.....उन्‍होंने साफ-साफ कहा कि जिन छात्राओं को पुरूष छात्रावास में जाना है, रूकना है वह पहले अपने माता-पिता से लिखित लिखवा के लाए कि हमारी बेटी को पुरूष छात्रावास में जाने की अनुमति दी जाए, तो हम उस छात्रा को अनुमति दे देंगे....नहीं तो नहीं।
प्रतिकुलपति महोदय की वो बात आज भी याद है मुझे..... वैसे आज देखा जाता है कि फलां-फलां को प्‍यार हो गया, प्‍यार के नाम से सब कुछ हो गया....जो नहीं होना चाहिए वो भी हो जाता है। फिर बात आती है शादी की....तो अधिकांश लड़के यह कहकर उस लड़की से संबंध तोड़ देते हैं कि मेरे घरवाले इस रिश्‍ते को स्‍वीकार नहीं करेंगे....आपकी जाति कुछ और है, मेरी कुछ और.....अरे भाई प्‍यार करने में सबसे आगे रहते हैं और शादी के नाम पर नानी मरने लगती है। क्‍यों भाई प्‍यार करने से पहले अपने माता-पिता से पूछा था कि मैं फलां-फलां लड़की से प्‍यार करने जा रहा हूं, वह इस जाति से है...क्‍या आपकी अनुमति है कि मैं उससे प्‍यार कर लूं। प्‍यार करते वक्‍त क्‍यों नहीं पूछा....अब कहते हो कि हमारे घरवाले हमारे रिश्‍ते को स्‍वीकार नहीं करेंगे.......वैसे आज के दौर में सभी लड़कियों को चाहिए कि वो उस लड़के से पूछे कि क्‍या तुमने अपने माता-पिता से पूछा है कि मैं फलां-फलां से प्‍यार करने जा रहा हूं....क्‍या अनुमति है। यदि वो अनुमति देते है तो ही प्‍यार करें.....क्‍योंकि कल यदि वो लड़का यह कहें कि मेरे घरवाले इस रिश्‍ते के खिलाफ हैं तो वो लिखित पत्र उसको दिखा सको कि देखों प्‍यार करने से पहले तुम्‍हारे घरवालों ने अनुमति दी थी....इससे जो लड़के लड़कियों को प्‍यार के नाम पर धोखा देते हैं वो खत्‍म हो जाएगा...और फिर यूं प्‍यार के नाम पर लड़कियां का शोषण बंद हो सकेंगा।