सरोकार की मीडिया

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Thursday, January 26, 2017

अम्बेडकर को कभी खारिज़ नहीं किया जा सकता

अम्बेडकर को कभी खारिज़ नहीं किया जा सकता


संवेदना और स्वयंवेदना में अंतर होता है। आप ठीक वो नहीं महसूस कर सकते हैं जो कोई और महसूस कर रहा है। स्वयंवेदना को संवेदना के बरक्स रखने का दावा दरअसल बिलकुल खोखला है। आप सिर्फ सुनकर, समझकर और गुनकर अंदाज़ा लगाते हुए कहतें हैं कि मैं समझ सकता/सकती हूँ। मसलन एक गर्भवती महिला कैसे महसूस करती है, क्या सहन करती है वो एक महिला ही समझ सकती है वो भी वैसी महिला जो खुद उस स्थति से गुज़र रही है या गुज़र चुकी है। जैसे एक अल्पसंख्यक की मुश्किलें बहुसंख्यक बिल्कुल वैसे ही नहीं समझ सकता जो कोई अल्पसंख्यक फ़ेस करता है। जैसे एक दलित महिला/पुरुष की तकलीफें, रोज़ाना होने वाला भेदभाव, उनके प्रति सामजिक व्यवहार और नज़रिया प्रेक्टिसेस को एक्जैक्ट एक सवर्ण नहीं समझ सकता। संवेदनशीलता होना मनुष्य होने की अनिवार्य शर्त समझती हूँ मैं। संवेदनशील होकर आप स्वयंवेदना को नकार नहीं सकते। यदि आप ऐसे कर रहें हैं तो झाँकिये खुद में ही कि कहीं खुद के छिप जाने या इम्पोर्टेंस कम होने की कुंठा तो नहीं है ना। अपने आप को अलग़-अलग़ तरीक़े से बनाये रखने, अपनी इम्पोर्टेंस बनाये रखने के लिए दूसरे प्रश्नों को गौण नहीं बना सकते आप। ये साफ़तौर पर उन प्रश्नों को नकारने का प्रपंच दिखता है, जो भारतीय समाज में प्राथमिक हैं।
इनदिनों कुछ मार्क्सवादियों ने खुले रूप में बाबासाहेब आंबेडकर और अम्बेडकरवादियों को गरियाने का ठेका ले रखा है। इन्हें बाबासाहेब अम्बेडकर से दिक़्क़त है, अम्बेडकरवादियों से दिक़्क़त है, संविधान से दिक़्क़त है, लोकतंत्र से दिक़्क़त, गणतंत्र से दिक़्क़त है। इन्हें लगता है कि सूट-बूट पहने अम्बेडकर दलितों के प्रतिनिधि नहीं हो सकते। तो भाई नुमाइंदगी कौन करेगा?...... तो नुमाइंदगी मार्क्सवादी करेंगे। वही लोग जो प्राचीन काल में शास्त्र पढ़ाते थे और अब कार्लमार्क्स पढ़ाते हैं। जो बहुत होशियारी से वर्ग की बात करके वर्ण की बात छुपा जाते हैं। जाति का मुद्दा इनके लिए नहीं है ना। अब सोचिये कोई पांडे, त्यागी, उपाध्याय, सिंह,राय, चटर्जी, मुख़र्जी को क्या जातिवाद का सामना करना पड़ता है? क्यों आपके लिए जाति मुद्दा होगा? सिर्फ़ आपके सरनेम के कारण समाज आपके साथ कैसे व्यवहार करता है और हमारे साथ कैसे व्यवहार करता है जानते हैं आप भी। ये कह रहें हैं कि आंबेडकर और अम्बेडकरवादियों ने ही इनकी क्रांति का मार्ग अवरुद्ध कर रखा है। वाह जनाब! बहुत बढ़िया, आप ख़ारिज करने की कोशिश करोगे अम्बेडकर को क्योंकि अम्बेडकर सिर्फ़ दक्षिणपंथियों के लिए गले की हड्डी नहीं है , मार्क्सवादियों के लिए भी है। लगते होंगे आपको अम्बेडकरवादी पूंजीवाद के प्रतिनिधि इसके लिए आपकी समझ और व्यवहार पर मुझे सहानुभूति है। अगर मुठ्ठी भर दलितों की हालत सुधरने से आपको लगता है कि दलित पूंजीवादी हैं तो यह उनके समझ के मसले से ज़्यादा यह तकलीफ़ का मसला दिखता है। सशक्त हो गये और हो रहे दलितों को भी जातिवाद का सामना करना पड़ता है, यह आप समझ भी नहीं पाओगे क्योंकि चोटीधारी होने की प्रिविलेज़ आपको मिल सकती है पर एक दलित व्यक्ति को नहीं है। ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद करते हुए आप जाति के प्रश्न को वर्ग का मुद्दा बनाकर छुपातें हैं, आप भुगतते नहीं हैं ना इसलिए जाति का प्रश्न आपके लिए नहीं होगा हमारे लिए है। कास्टलेस, जेंडरलेस, रिलीजनलेस ऐसे ही नहीं हो जायेगा, देखिये अपनी ही प्रेक्टिसेस को। जेएनयू में इंटरव्यू के मुद्दे पर धारण किया मौन और उसके पीछे की पॉलिटिक्स, पश्चिम बंगाल का क़त्लेआम भूला नहीं जायेगा, किसी लेफ़्टपार्टी में कितने दलित-आदिवासी-पिछडों को पद दिए गए हैं, आदिवासी नहीं पिस रहें हैं क्या नक्सलवाद की आड़ में, मार्क्स को जप-जप कर भी अपनी ही जाति में शादी करते वक़्त सारी क्रांति हवा हो जाती है। दलित मुद्दों पर अपर कास्ट सवर्ण बात करेंगे वाह! दलित डिस्कोर्स से एक व्यक्ति नहीं मिलता ऑक्सफ़र्ड के सेमिनार में बात रखने के लिए। क्यों भाई सारी योग्यता अपर कास्ट सवर्णों में ही है क्या ? जाति का मुंह देखकर व्यवहार करने वाले समाज में देखिये मीडिया कवर कन्हैया को मिलता है, कवर न दिलीप को मिला न राहुल सोनपिम्पले को। जेएनयू में इंटरव्यू को सिलेक्शन का मापदंड बनाने के ख़िलाफ़ चल रहे अनशन को रवीश कुमार पांडे जातिगत भेदभाव की बजाय भाषा का मुद्दा बता देतें हैं, क्या ये वाक़ई भाषा का मुद्दा है? अपर कास्ट के राइटरों और लेफ्टिस्टों को जिस तरह हाथोंहाथ लिया जाता है, वैसे बहुजनों को नहीं। इसलिए आप नहीं बोलोगे ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़, आप नहीं कहोगे कि जाति मुद्दा है, आप नहीं कहोगे की आप खुद भी जातिवादी हो .......तो चिल्लाते रहो। खोखली क्रांति आपको मुबारक़। अब मार्क्स का भक़्त ब्राह्मण तो कम से कम यह नहीं बताएगा कि हमारा प्रतिनिधि कौन होगा। अम्बेडकर को कभी खारिज़ नहीं किया जा सकता। अंबेडकर व्यक्ति नहीं है विचारधारा है। इंसानों के रूप में कंसीडर किये जातें हैं अब हम।

Tuesday, January 24, 2017

एक दिन मयखाना फ्री हो जाए....??????

एक दिन मयखाना फ्री हो जाए....??????
काश केंद्र में बैठी सरकार यह ऐलान कर दे कि जिस दिन उत्‍तर प्रदेश के जिस जिले में विधानसभा हेतू वोटिंग डाली जाएगी उस दिन वहां के ठेकों पर केंद्र सरकार द्वारा शराब का मुफ्त वितरण किया जाएगा...दिल खोलकर शराब पिओ और अपने पसंदीदा उम्‍मीदवार को जिताओं... इसमें बुराई भी क्‍या है...यदि शराब इतनी ही बुरी चीज है तो सरकार इस पर पूर्ण रूप से पाबंदी क्‍यों नहीं लगाती...बेचारे हमारे प्रदेश के पुलिस वालों को खासी मसक्‍कत करनी पड़ती है शराब को बनाने वालों को पकड़ने में....अरे भाई बड़ी-बड़ी कंपनियों को पकड़ों वो भी तो शराब बना रही है। वहीं हमारे मीडिया साथियों को भी खबर बनानी पड़ती है...कि फलां-फलां पुलिस ने इतने लीटर शराब समेत 3 को पकड़ा...सही है पकड़ लिया...अब यह भी तो दिखाओं की जमानत पर कानून ने उनको रिहा कर दिया.....हां यह और बात है कि कुछ लोगों को जेल की हवा भी खानी पड़ती है और सजा भी भुगतनी पड़ती है क्‍योंकि उनका वकील सलमान खान के वकील जैसा नहीं होता...जो सारे सबूतों को ही पलटकर रख दें..और हमारे माननीय जज साहब को फैसला सुनना पड़े कि खुद हिरन चलकर आया था.. इसमें सलमान खान निर्दोष हैं और हिरन दोषी....यदि हमारे कानून में मुर्दो को सजा देने का प्रावधान होता तो हिरन को कब की सजा मिल चुकी होती....यदि हिरन को नहीं तो हिरन के बच्‍चों को मिल चुकी होती...क्‍योंकि सलमान खान ने तो शराब के नशे में फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी भी नहीं चढ़ाई थी....खुद फुटपाथ पर सो रहे लोगों ने जब देखा कि सलमान खान की गाड़ी आ रही है तो वो खुद सोते सोते ही उसकी गाड़ी के नीचे आ गए होंगे... अरे भाई शायद में मुद्दे से भटक गया...में तो विधानसभा चुनाव में शराब को सरकार द्वारा मुफ्त पिलाने की बात कर रहा था...क्‍योंकि होना तो ऐसा ही है कि तमाम पाटियों के लोग वोट के खातिर अपने पाले हुए भाईनुमां गुंडों को पैसा देकर शराब का वितरण तो करवाएंगे ही...तो फिर जो लुकाछिपी में होगा वह सरकार को चाहिए कि इस संबंध में खुली छूट देकर मुक्ति पा ले....ताकि पुलिसवालों को परेशानियों का सामना न करना पड़े...अब वो चुनाव देखें या फिर शराब को बनाने वालों को पकड़े या फिर शराब को पिलाने वालों को....तभी तो कह रहा हूं कि चुनाव को मद्देनजर रखते हुए शराब को उस दिन के लिए मुफ्त कर दिया जाए जिस दिन वोटिंग होने वाली हो....वैसे यह बात भी है कि इससे आदमी सही उम्‍मीदवार का चयन करेंगा...क्‍योंकि शराब पीने के बाद आदमी का दिमाग ज्‍यादा ही सक्रिय हो जाता है उसे अच्‍छे और बुरे दोनों का ज्ञात होने लगता है.. अभी तो ऐसा होगा कि भाई- भतीजावाद या फिर धर्म - जातिवाद, जात- जातवाद के नाम पर वोट दिए जाएंगे बिना यह देखे कि उस पार्टी ने पिछले पांच सालों से वहां की जनता और जिले, नगर के विकास के लिए क्‍या क्‍या किया। जब वो दो पैग पी लेगा तो उसे उस उम्‍मीदवार के कर्मों का लेखाजोखा और पिछले पांच साल में किए गए विकास का लेखा जोखा समझ में आने लगेगा...तभी तो सरकार से अग्रह है कि सिर्फ एक दिन शराब का वितरण मुफ्त कर दिया जाए....वैसे भी नोटबंदी के बाद से बहुत सारे करोड़ों रूपए आपने पकड़े हैं थोड़ी ही धनराशि से शराब का सेवन ही करवा दीजिए जनता आपको दुआएं देंगी...और हो सकता है कि वोट भी दे दे....तो फिर ज्‍यादा सोचा विचारी मत कीजिए और मुझे एक वोट समझकर मेरी बात पर गौर फरमाएं.....क्‍योंकि हमको पता है कि जो भी उम्‍मीदवार जीतकर आएंगा वो पिछले वाला जैसा ही होगा....कोई खास बदलाव नहीं आएंगा... बस नाम बदल जाएंगा...पार्टी बदल जाएंगी...बस काम का नाम मत लेगा क्‍योंकि विकास नहीं होगा.....बाकि सब होगा...माया, मुलायम, अखिलेश, राहुल, प्रियंका, सोनिया, मोदी, राजनाथ, कल्‍यान अन्‍य कोई भी, बसपा, सपा, कांग्रेस, बीजेपी, अन्‍य कोई भी पर विकास नहीं आएंगा....यह बस एक जुमला रह जाएगा कि विकास होगा....विकास को तो यह नेता गर्भ में ही मार देते है और जनता इसी आस में रह जाती है कि चलों अगले पांच साल बाद विकास होगा.....
नोट:- इस लेख का किसी पार्टी विशेष से कोई लेना देना नहीं है...यदि सहयोग से किसी का नाम आता है तो इसें मात्र एक संजोग समझा जाए...यह लेखक के अपने मत है....

Monday, January 2, 2017

एक संस्म रण......

एक संस्‍मरण......
एक संस्‍मरण.... मैं कल बैठा था तो यकायक वो दिन याद आने लगे जब मेरा प्रवेश महात्‍मा गांधी अंतराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में पीएचडी में हुआ था। और मुझे विश्‍वविद्यालय के तरह से रहने के लिए शांति कुटी छात्रावास मिला हुआ था। छात्रावास बहुत अच्‍छा था एकांत और सेवाग्राम रेलवे स्‍टेशन के समीप। पर छात्रावास में कुछ सुविधाओं का अभाव जरूर था....नहाने की पूर्ण व्‍यवस्‍था नहीं थी, खाने की व्‍यवस्‍था का भी अभाव था। तो सभी वहां पर रहने वाले छात्र खुले में स्‍नान करते थे। एक दिन मैं स्‍नान कर रहा था तभी वहां पर एक छात्रा का आगमन हुआ.....उसको देखकर मैंने असहजभाव महसूस किया पर कर भी किया सकता था जल्‍दी-जल्‍दी स्‍नान किया। और वह छात्रा किसी छात्र के रूम में दाखिल हो गई। बाद में पता चला कि इस विश्‍वविद्यालय द्वारा मिले सभी पुरूष छात्रावास में छात्राओं के आने व रूकने की अनुमति है। चूकि मेरे लिए यह किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था। खैर ऐसा कुछ दिनों तक लगातार चलता रहा। फिर मैंने वहां मौजूद कुछ अपने मित्रों से इस संदर्भ में बात की, कि विश्‍वविद्यालय प्रशासन से कहा जाए या तो हम लोगों के लिए स्‍नान की उचित व्‍यवस्‍था करवाई जाए या फिर लड़कियों का पुरूष छात्रावास में आने से वर्जित किया जाए.....जिसके संदर्भ में हम लोगों ने तत्‍कालीन कुलपति महोदय को एक पत्र लिख, जिस पर कार्यवाही करते हुए कुलपति ने पुरूष छात्रावास में लड़कियों के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके कारण बहुत लोगों की गालियां भी सुननी पड़ी। खैर प्रतिबंध लगने के कुछ दिनों बाद विश्‍वविद्यालय में अध्‍ययनरत महिला अध्‍ययन विभाग की छात्राओं एवं कुछ छात्रों द्वारों इस प्रतिबंध को उनके अधिकारों का हनन मानते हुए कुलपति से मुलाकात की, कि इस प्रतिबंध को हटा लिया जाए। सहयोग से इस बात की जानकारी मुझे भी लग गई....तो मैंने कुलपति महोदय से कहा कि मेरे द्वारा दिए गए पत्र को नाकार दीजिए और छात्राओं को पुरूष छात्रावास में जाने की अनुमति पुन:प्रदान कर दे....और साथ में महिला छात्रावास में पुरूषों को भी जाने की अनुमति दे दे.....जिस पर सभी छात्राओं ने इसका विरोध किया कि पुरूष महिला छात्रावास में कैसे आ सकते हैं.....हम किस अवस्‍था में रहते हैं.....तो उन छात्राओं की बात काटते हुए कहा कि जब आप लोग असहज महसूस कर सकते है तो पुरूष भी असहज महसूस करते हैं। बात वहीं खत्‍म हुई।
कुछ दिनों के बाद फिर सभी छात्राओं ने इस बावत प्रतिकुलपति से मुलाकात की.......तत्‍कालीन प्रतिकुलपति ने जो कहा उस बात से सभी की बोलती बंद कर दिया.....उन्‍होंने साफ-साफ कहा कि जिन छात्राओं को पुरूष छात्रावास में जाना है, रूकना है वह पहले अपने माता-पिता से लिखित लिखवा के लाए कि हमारी बेटी को पुरूष छात्रावास में जाने की अनुमति दी जाए, तो हम उस छात्रा को अनुमति दे देंगे....नहीं तो नहीं।
प्रतिकुलपति महोदय की वो बात आज भी याद है मुझे..... वैसे आज देखा जाता है कि फलां-फलां को प्‍यार हो गया, प्‍यार के नाम से सब कुछ हो गया....जो नहीं होना चाहिए वो भी हो जाता है। फिर बात आती है शादी की....तो अधिकांश लड़के यह कहकर उस लड़की से संबंध तोड़ देते हैं कि मेरे घरवाले इस रिश्‍ते को स्‍वीकार नहीं करेंगे....आपकी जाति कुछ और है, मेरी कुछ और.....अरे भाई प्‍यार करने में सबसे आगे रहते हैं और शादी के नाम पर नानी मरने लगती है। क्‍यों भाई प्‍यार करने से पहले अपने माता-पिता से पूछा था कि मैं फलां-फलां लड़की से प्‍यार करने जा रहा हूं, वह इस जाति से है...क्‍या आपकी अनुमति है कि मैं उससे प्‍यार कर लूं। प्‍यार करते वक्‍त क्‍यों नहीं पूछा....अब कहते हो कि हमारे घरवाले हमारे रिश्‍ते को स्‍वीकार नहीं करेंगे.......वैसे आज के दौर में सभी लड़कियों को चाहिए कि वो उस लड़के से पूछे कि क्‍या तुमने अपने माता-पिता से पूछा है कि मैं फलां-फलां से प्‍यार करने जा रहा हूं....क्‍या अनुमति है। यदि वो अनुमति देते है तो ही प्‍यार करें.....क्‍योंकि कल यदि वो लड़का यह कहें कि मेरे घरवाले इस रिश्‍ते के खिलाफ हैं तो वो लिखित पत्र उसको दिखा सको कि देखों प्‍यार करने से पहले तुम्‍हारे घरवालों ने अनुमति दी थी....इससे जो लड़के लड़कियों को प्‍यार के नाम पर धोखा देते हैं वो खत्‍म हो जाएगा...और फिर यूं प्‍यार के नाम पर लड़कियां का शोषण बंद हो सकेंगा।

Saturday, December 24, 2016

राहुल गांधी ने की केंद्र सरकार से मुआवजे की मांग..... चाय पीते वक्त आधा बिस्कुट चाय में गिरा

राहुल गांधी ने की केंद्र सरकार से मुआवजे की मांग
चाय पीते वक्‍त आधा बिस्‍कुट चाय में गिरा


दिल्‍ली। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा दिनांक 8 नवंबर को 500 और 1000 के नोट बंद करने के बाद जो स्थिति उत्‍पन्‍न हुई है उससे आमजन तो प्रभावित हुए ही है साथ में कांग्रेस के उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी सबसे ज्‍यादा प्रभावित नजर आ रहे हैं। जिसको लेकर राहुल जगह-जगह सभा रैली कर रहे हैं। एक सभा रैली को संबोधित करने के बाद जैसे ही उन्‍हें चाय की तलब हुई उन्‍होंने अपने कार्यकर्ताओं से चाय और बिस्‍कुट मंगवाया। रैली को संबोधित करते समय उनका गुस्‍सा मोदी पर फूटा ही था और वो गुस्‍सा अब भी बरकरार था। जैसे ही उनके समक्ष चाय और बिस्‍कुट हाजिर हुए उन्‍होंने चाय की चुस्‍की लेते हुए पहला ही बिस्‍कुट चाय में डुबोया ही था कि आधा बिस्‍कुट चाय में जा गिरा। फिर राहुल ने उस बचे हुए आधे बिस्‍कुट से चाय में गिरा बिस्‍कुट का आधा टुकड़ा उठाने की कोशिश की और बचे हुए आधे बिस्‍कुट से भी हाथ धो बैठे। जिससे उनका गुस्‍सा और भड़क गया। इसके बाद उन्‍होंने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकतकी और केंद्र सरकार से मुआवजा दिलाने की मांग की। मोदी ने उन्‍हें आश्‍वासन दिया है कि जल्‍द ही इस संबंध में एक जांच कमेटी का गठन किया जाएगा। जांच के उपरांत यदि संबंधित मामला सही पाया गया तो आपको मुआवजा मिल जाएगा। 
मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कड़े तेवर में मीडिया से कहा कि यदि  केंद्र सरकार इस मामले में जल्‍द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाएगी और उन्‍हें 30 दिन तक मुआवजा नहीं मिला तो वह केंद्र सरकार को हिला कर रख देगें। वहीं दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चाय में गिरे बिस्‍कुट के आधे हिस्‍से के गिरने में मोदी का हाथ बताया है। केजरीवाल ने कहा कि चुंकि मोदी पहले चाय बेचते थे तो चाय और मोदी की साठगांठ बहुत पहले सही है...जरूर मोदी ने ही चाय को कहा होगा कि जब राहुल गांधी चाय में बिस्‍कुट डाले तो आधा बिस्‍कुट चाय में गिर जाना चाहिए। और चाय ने वैसा ही किया। केजरीवाल ने राहुल गांधी का समर्थन करते हुए यह भी कहा कि यदि केंद्र सरकार राहुल को मुआवजा देने में आनाकानी करती हुई नजर आएगी तो वही रामलीला मैदान पर अमरण अनशन करेंगे। मीडिया में आई इस खबर के बाद भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संपूर्ण मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं और संपूर्ण जनता से शांति बनाए रखने की अपील की है।  

Friday, November 11, 2016

प्रधानमंत्री जी जरा इन पर भी गौर कीजिए.....

प्रधानमंत्री जी जरा इन पर भी गौर कीजिए.....
क्‍या हुआ नरेंद्र मोदी जी..........भारत में बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिन पर तत्‍काल प्रभाव से प्रतिबंध लगना बाकि है.......जरा इस ओर भी ध्‍यान दे......
1. सभी देवी/देवताओं पर प्रतिबंध
2. सभी बाबाओं पर प्रतिबंध
3. मंदिर में चढ़ने वाला दान सार्वजनिक हो
4. भगवान/अल्‍लाह ने सभी एसी की मांग नहीं की.... फिर मंदिर/मस्जिद में एसी पर प्रतिबंध
5.भाई भतीजावाद पर प्रतिबंध
6.सभी अधिकारियों और नेताओं के बच्‍चों को सरकारी स्‍कूल में पढ़ाया अनिवार्य...ऐसा न करने पर डिमोशन
7.हर घर से....(चाहे वह नेता का घर हो या आम नागरिक का) एक व्‍यक्ति को फौज में जाना अनिवार्य
8.एक घर से सिर्फ दोव्‍यक्ति ही राजनीति में आ सकते हैं
9. सभी नेताओं का रूपया सर्वजनिक होना अनिवार्य
10. कोतवाली में सीसीटीवी कैमरे लगना अनिवार्य और इनका डिस्‍पेल सार्वजनिक स्‍थल पर हो..
11. घूस लेते पकड़े गए कोई भी व्‍यक्ति (कर्मचारी, अधिकारी, नेता, पुलिस) को 10 साल की सश्रम कारावास वो भी बिना जमानत के....
12. योग्‍यता के आधार पर कार्य का विभाजन
13. पूरे भारत में खाली पड़े (हर विभाग में) पदों को सार्वजनिक किया जाए...और एक टेस्‍ट लिया जाए...फिर मेरिट के आधार पर चयन हो...
14.जो भी नेता चुनाव के दौरान जनता से वादा करता है उसकी एक सूची चुनाव आयोग सार्वजनिक करे.... और यदि वो 3 वर्ष के अपने कार्यकाल में उसको पूरा नहीं करता है तो उसको तत्‍काल प्रभाव से हटा दिया जाए...
15..शादी के दौरान उक्‍त राज्‍य की सरकार कन्‍या पक्ष के घर में सादा वर्दी में पहुंचाने का आदेश....ताकि वो यह देख सकें कि वर पक्ष दहेज की मांग तो नहीं कर रहा......यदि ऐसा करता है तो उसको 10 वर्ष की सश्रम कारावास
16. बलात्‍कार के दोषी व्‍यक्ति को तत्‍काल प्रभाव से फांसी की सजा
17.घरेलू हिंसा, महिलाओं के साथ हो रहे भेदभावपूर्व रवैए के दोषी को 10 साल की सजा का प्रावधान
18. बाल मजदूरी पर पूर्णत: रोक.......
19. रेल्‍वे परिसर या फिर चौराहे पर भीख मांगते लोग पाए जाने पर उस क्षेत्र के संबंधित कर्मचारियों पर कानूनी कार्यवाही
20....महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटना होती है तो उक्‍त व्‍यक्ति के खिलाफ तत्‍काल कानूनी कार्यवाही (चाहे वह व्‍‍यक्त्‍िा कोई भीहो) साथ ही संबंधित क्षेत्र के पुलिस वालों पर कानूनी कार्यवाही
21.दबंग, दाउ-दादा...और बदमाश प्रवृति के लोगों पर तत्‍काल कार्यवाही.... साथ ही संबंधित क्षेत्र के पुलिस वालों पर कानूनी कार्यवाही
22. शराब, सिगरेट, गुटखा आदि नशीली वस्‍तुओं पर पूर्णत: रोक....सेवन करते या बेचते पाए जाने पर 2 साल की सजा का प्रावधान
23.सड़क (खड्डों से भरी) पानी (गंदा पानी) बिजली (बिजली की अधिकता से ज्‍यादा कटौती) होने पर संबंधित उच्‍च अधिकारियों पर कानूनी कार्यवाही
24. उक्‍त क्षेत्र के अधिकारियों व संबंधित क्षेत्र के सांसद/विधायक का हर 10 दिन में क्षेत्र का निरीक्षण करना अनिवार्य....ऐसा न करने पर सांसद/विधायक के वेतन में कटौती का प्रावधान
25. शिक्षकों से सिर्फ शिक्षण कार्य करवाया जाए.....सर्वे... वोटर लिस्‍ट....अ‍ादि अन्‍य का नहीं सौंपे जाएंग.....यदि ऐसा कोई अधिकारी करता है तो उस अधिकारी पर कानूनी कार्यवाही
26. संबंधित शिक्षा विभाग के अधिकारी हर सरकारी स्‍कूलों में हर सप्‍ताह जाकर शिक्षक कार्य का निरीक्षण करेंगे....व उसकी रिपोर्ट संबंधित मंत्रालय को देंगे......यदि उक्‍त अधिकारी ऐसा नहीं करते हैं तो उन पर कानूनी कार्यवाही साथ ही उनके वेतन में से कटौती का प्रावधान
27. गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले सभी लोगों को आवास व खाने पीने की हर माह वस्‍तुएं मुहैया करवाई जाए...
28..प्रतिमाह प्रत्‍येक छात्र चाहे व किसी भी श्रेणी का छात्र हो...वह प्रत्‍येक शिक्षक को एक अंक प्रदान करेगा....जो उस शिक्षक के पढ़ाने पर निर्भर करेंगा....यदि 6 माह में उक्‍त शिक्षक का कम अंक मिलते हैं तो उस पर जांच बैठाई जाए....
इसके आलावा और भी है.....जरा इन पर भी गौर करें तो देश का नकशा ही बदल जाएंगा.....

Saturday, July 23, 2016

गालियों का समाज शास्त्र

गालियों का समाज शास्त्र
गाली एक ऐसा तरीका है जिससे आप अपना गुस्सा व्यक्त्त करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसका प्रयोग आप बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के आसानी से कर सकते हैं। वैसे इसके उच्चारण मात्र से यानि अपने मुखारबिंदू से इसका उच्चारण करने से सामने वाला आवश्यक तौर पर प्रभावित जरूर होता है। अगर इसको समान शब्दों में परिभाषित किया जाए तो गाली का प्रयोग इंसान अत्याधिक क्रोध आने पर शारीरिक रूप से हिंसा न करते हुए, मौखिक रूप से की गई हिंसात्मक कार्यवाही के लिए चयनित शब्दों का वह समूह जिसके उच्चारण के पश्चात् मन को गहन शांति का अनुभव प्राप्त होता है, उसे हम गाली के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।
वैसे गाली आनंद के लिए भी दी जा सकती है और अपनी शक्ति को सिद्ध करने के लिए एक माध्यम के तौर पर भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। आनंद के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो गाली अपनी स्वंत्रता को साबित करने के उद्देश्य से तथा शक्ति के परिप्रेक्ष्य पर बात करें तो दूसरे को अपने से कमतर आंकने के परिदृश्य से इसका प्रयोग किया जाता है। हालांकि इसका मूल जब तक तय नहीं होता जब तक गाली सुनने वाला इस पर किसी प्रकार की कोई क्रिया न करे। यानि उसे वह बुरी न लगे। इस प्रकार गालियों से हमें यह ज्ञात होता है कि हमारे समाज में इसका प्रयोग एक संचारित भाषा के रूप में किया जाता है।
गालियों का प्रचलन समाज में कब से प्रारंभ हुआ और सबसे प्रथम किस व्यक्ति द्वारा किसको गाली दी, तथा गाली सुनने वाले ने उस गाली पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया की होगी? यह एक मजेदार शोध का विषय हो सकता है। हालांकि अनेक पूर्ववर्ती विद्वानों ने गालियों के उद्भव और विकास पर युगों-युगों से माथा-पच्ची की है, किंतु इस अथाह रहस्य को आज तक शायद कोई नहीं जान पाया। मेरे मतानुसार गालियों का प्रादुर्भाव भाषा के विकास के साथ-साथ ही हुआ होगा? क्योंकि तीक्ष्ण, अप्रिय और अपमानित करने वाले शब्दों को ‘गाली’ माना गया है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि शब्दों के निर्मम प्रहार जब विद्रूप हो उठें और जिन्हें सुनकर मनुष्य क्रोधित और अनियंत्रित हो उठे, वह गाली माना जाता है। शब्द-प्रहार, शस्त्र-प्रहार से कहीं अधिक घातक और मर्मभेदी हो सकता है, और प्रायः होता भी है। स्मरण कीजिए, महाभारत का वह प्रसंग जब द्रोपदी ने दुर्योधन का उपहास ‘अंधे का अंधा’ कहकर किया था। इस उपहास का ही परिणाम राष्ट्र के सामने ‘महाभारत’ के रूप में उपस्थित हुआ, जिसमें भारी नरसंहार और रक्तपात हुआ।
गालियों का प्रचलन सदियों से समाज में रहा है। गालियां निर्बल का शस्त्र मानी गई हैं। बलवान व्यक्ति अपनी शारीरिक और शस्त्रगत ताकत से जब निर्बलों पर आक्रमण करते हैं, तो अशक्त और निर्बलजन गालियों के प्रहार से ही उनका प्रतिकार कर पाते हैं। वीर और साहसी व्यक्तियों को गाली देने की आवश्यकता ही क्या है? वे तो अपनी शक्ति के बल पर ही प्रतिद्वंद्वी का मानमर्दन कर सकते हैं। गाली देना उनके गौरव के अनुप्रयुक्त माना जायेगा। श्रीरामचरित मानस में लक्ष्मण जी ने परशुरामजी को नसीहत देते हुए कहा है-
वीर व्रती तुम धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
किंतु अंगद-रावण संवाद में गालियों का उन्मुक्त आदान-प्रदान हुआ है। रावण व अंगद दोनों ही लगभग समान रूप से बली थे। दूसरे, अंगद शांति-दूत बनकर गए थे। उन्हें शस्त्र-प्रहार की अनुमति नहीं थी, अतः उन्होंने शब्द-प्रहार का सहारा लिया। इसी प्रकार रावण भी राजनीति के नियमों के अनुसार शांति-दूत पर शस्त्र-प्रहार नहीं कर सकता था, अतः उसने भी शब्द-प्रहार यानी कि गालियों का ही अवलंबन लिया। गालियां मानव-मन के भले-बुरे उद्वेगों को व्यक्त करती हैं। गालियां देने और गालिया सुनने वाले-दोनों ही पक्ष भावनात्मक रूप से उत्तेजित हो जाते हैं। इससे दोनों की असली औकात खुलकर सामने आ जाती है। किसी ने कहा भी है कि यदि किसी की औकात आंकनी हो तो उसे क्रोध दिला दो।
गालियों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वे मानव-जाति के परस्पर संबंधों को अनायास उद्घाटित करती हैं। यूं तो गालियां विश्व की लगभग सभी भाषाओं और बोलियों में कही व सुनी जाती हैं, किंतु भारत में गालियों का अपना अलग ही अंदाज है। भारत में कई हुई गालियों का बुरा नहीं माना जाता। कदाचित् इसीलिए हमारे यहां विवाह-शादियों में तथा होली जैसे त्यौहारों पर गालियों को गाने की पुरातन प्रथा चली आ रही है। विवाह में महिलाओं के द्वारा और होली पर पुरुषों के द्वारा गाई जाने वाली और उमंगमय गालियों का कोई बुरा नहीं मानता-
जेंवत देहिं मधुर धुनि गारी।
ले ले नाम पुरुष अरु नारी।।
समय सुहावनि गारि विराजा।
हंसत राउ सुनि सहित समाजा।।
श्रीराम के विवाह-समय पर जनकपुर की महिलाओं के द्वारा गाई हुई गालियां आज भी विवाह-बारातों में हम अपने-अपने संदर्भ में अपनी पारिवारिक महिला-सखियों-सहेलियों से सुनते हैं और प्रसन्न होते हैं। जबकि अन्य किसी अवसर पर दी हुई किसी की भी गाली हमें गोली की तरह बींध कर रख देती है और क्षणभर में खून-खराबे की नौबत आ जाती है।
गालियों के अनेक प्रकार हैं। कुछ गालियां जाति-बोधक होती हैं, तो कुछ संबंध बोधक। कुछ गालियां मानव की विकलांगता से जुड़ी होती हैं, तो कुछ उसके स्वभाव से। कई गालियां मानव का जानवरों से तादात्म्य स्थापित करती हैं, तो कई गालियों में उसके बौद्धिक स्तर की धज्जियां उधेड़ दी जाती हैं।
क्रोध में दी गई गालियों में प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने का भाव निहित होता है, जबकि उमंग और अनुराग में दी गई गालियां घनिष्टतम प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं। कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि गालियों का उच्चारण मानव की दमित कामेच्छाओं को शमित करता है। गालियों से परहेज करने वाले कितने ही तथाकथित शिष्ट लोग एकांत में अशिष्ट और अश्लील हरकतों में लिप्त देखे जा सकते हैं। ऐसा माना जा सकता है कि गालियों का प्रचलन मानव के आदिम विकास-काल से आज तक यथावत् बना हुआ है। गालियों से मनुष्य के काम और क्रोध-इन दो विकारों का निस्तारण काफी हद तक हो जाता है। होली का त्यौहार गालियों के आदान-प्रदान का उन्मुक्त त्यौहार है। इसे शास्त्रकारों ने मदनोत्सव की संज्ञा दी है। मदन का अर्थ काम से है। भारतीय जन अपने काम-गत विकारों का निस्सरण करने के लिए होली पर गोली छान कर गाली बकते हुए देखे जाते हैं। यह परिपाटी सदियों से चली आई है। शास्त्रकारों-विद्वानों ने इसका अनुमोदन भी किया है और इसे हमारी धार्मिक आस्थाओं से जोड़े रखने की चेष्टा भी की है। उन्होंने हिरण्यकश्यप की बहन ढुंढा (होली) को जलाते समय गालियां बकने का शास्त्रीय विधान निर्धारित किया है, जिससे कि वह राक्षसी तृप्त और प्रसन्न होकर अपनी दाह-शक्ति को प्रचंड बनाए रखे-
तमग्नित्र्रिपरिक्रम्य शब्दै लिंग-भगांकितै,
तेन शब्देन सा पापा राक्षसी तृप्तिमाप्नुयात्।
जो भी हो, गालियों का अपना एक अलग समाज-शास्त्र है जिसे मानव की भावनात्मक-वैचारिक और संवेदनात्मक ऊर्जा के संचयन तथा उसमें उत्पन्न हुए अनावश्यक विकारों के निस्तारण के लिए हमारे पूर्वजों ने निर्धारित किया है। इसमें तथाकथित सभ्यतावादियों के अरण्य-रोदन से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है। यह सृष्टि गाली से ही शुरू हुई थी और गाली पर ही समाप्त होगी, यह एक शाश्वत सत्य है।
संचार के दृष्टिकोण से
संचार के दृष्टिकोण में गाली का विश्लेषण किया जाए तो संचार के सभी माध्यमों में इसकी प्रतिपुष्टि देखी जा सकती है।
1.         अंतरावैयक्तिगत संचार:- इस संचार में कोई भी व्यक्ति अपने अंतर मन में किसी अन्य व्यक्ति को मन ही मन में गाली देकर कोसने का काम करता है। इस संचार का प्रयोग गाली देने वाला व्यक्ति तब ही करता है जब वो दूसरे व्यक्ति से शारीरिक तौर पर कमजोर हो। यानि जिसको वह गाली दे रहा है वह व्यक्ति बाहूबली हो, उसी स्थिति में अंतरावैयक्तिगत संचार का प्रयोग किया जाता है। हालांकि इस प्रकार के संचार में गाली देने के उपरांत कोई भी प्रतिक्रिया दर्ज नहीं होती है।
2.         अंतरवैयक्तिगत संचार:- इस संचार में जब एक व्यक्ति सामने वाले दूसरे व्यक्ति को गाली देता है तो बिना की रूकावट के गाली देने वाले को एक के बदले में दो-चार गालियों के रूप में प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है, यानि शीघ्र ही फीडबैक मिल जाता है। वैसे इस संचार में गाली देने वाला तथा सुनने वाला दोनों ही शारीरिक रूप में उन्नीस और बीस होते हैं।
3.         व्यक्तिगत संचार:- इस प्रकार के संचार का प्रयोग तब ही होता है जब गाली देने वाला तथा सुनने वाला दोनों एक दूसरे के घनिष्ठ मित्र हो। इस संचार में भी गाली देने के उपरांत तुरंत या फिर कुछ क्षण के बाद प्रतिक्रिया मिलना स्वाभिक है।
4.         जनसंचार:- इस प्रकार के संचार में किसी माध्यम को केंद्र में रखते हुए एक विशाल जन समूह तक गाली का प्रचार-प्रसार करना शामिल है, हां यह बात और है कि इसमें प्रतिक्रिया शीघ्र नहीं मिल पाती, तथा इस प्रकार के संचार में उपयोग होने वाले उपकरण में बाधा आने की संभावना बनी रहती हैं। हम इस संचार का प्रयोग एक जनसमूह तक गाली को संप्रेषित करने के लिए करते हैं और इसमें फिल्मों को माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाता है।
फिल्मों में गाली के स्वरूप को देखा जाए तो देखने को मिलता है कि किस प्रकार फिल्में एक विशाल जन समूह तक गाली को संप्रेषित करने का काम बिना किसी रूकवट के आसानी से करती हैं। जिससे जनता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। इससे पहले फिल्मों में गालियों का प्रयोग किसी जानवर से संबंधित या फिर पत्नी के भाई से संबंधित होती थी। हालांकि बॉलीवुड में खुले तौर पर गाली के नए चलन का प्रयोग ‘नो वन किल्ड जेसिका’ से अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने शुरू किया। इस फिल्म में रानी एक तेज तर्रार टीवी पत्रकार की भूमिका में थी जो जमकर सिगरेट पीती है और धड़ल्ले से गालियां देती है। इस फिल्म के साथ रानी ने अपनी मासूम सी छवि के साथ प्रयोग करते हुए अपनी छवि बदली। फिल्म में उनका सबसे प्रचलित संवाद था आई एम ए बिच। यानि मैं एक कुतिया हूं। वहीं पर ‘देल्ही बेली’ ने तो फूहडता पूर्ण गाली का प्रयोग किया जिसे सेंसर बोड ने बिना किसी रूकावट के पास कर दिया जिसे दर्शकों ने भी अच्छा खासा पसंद किया।
इस आलोच्य में आगे बात की जाए तो फिल्मकारों ने वास्तविक जीवन कथाओं पर बोल्ड फिल्में बनाकर नए प्रयोग किए। ‘डर्टी पिक्चर’ जैसी फिल्म में किरदारों और फिल्मी जीवन को वास्तविक रूप देने के नाम पर मुखर संवाद और गालियों का जमकर प्रयोग किया गया। फिल्म के निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने इस तरह की भाषा और बोल्डनेस को फिल्म की कहानी और किरदारों को वास्तिविक रूप देने के नाम पर जायज ठहराया। वहीं फिल्म ‘देल्ही बेली’ बोल्डनेस और गालियों के प्रयोग के मामले में एक कदम और आगे रही। इस फिल्म में जमकर गालियों का और द्विअर्थी गानों का प्रयोग किया गया। फिल्म का गाना ‘भाग डीके बोस’ अपने बोलों की वजह से खासा लोकप्रिय हुआ। अगर इसके मूल अर्थ को समझे तो इस गाने का मूल भाव में ‘भोसडी के’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिसे आम बोलचाल वाली गाली के बतौर प्रयोग किया जाता है।
इस एडल्ट कॉमेडी फिल्म के निर्माता अभिनेता आमिर खान ने इसे मजेदार कॉमेडी फिल्म बताते हुए कहा कि इसमें अंगप्रदर्शन जैसी चीज नहीं है केवल अश्लील भाषा का प्रयोग किया गया है। आमिर ने कहा था कि यह फिल्म बोल्ड फिल्मों की परिभाषा बदल देगी और एक नए चलन की शुरूआत करेगी। इस क्रम में कुछ और फिल्में भी शामिल है जिनमें देसी अपशब्दों और संवादों का भी जमकर प्रयोग कर हास्यात्मक रूप में पेश किया गया। इस तरह की भाषा से सजी ‘रा वन’ ‘रेडी’, ‘बॉडीगार्ड’ और ‘सिंघम’ जैसी फिल्में सुपरहिट रहीं। इसी तरह की बोल्ड भाषा और संवादों से सजी कई और फिल्में जिनमें गाली का प्रयोग किया गया। कंगना राणावत ने फिल्म ‘तनु वेडस मनु’ में, गुल पनाग ने ‘टर्निंग थर्टी’ में और सौरभ शुक्ला ने फिल्म ‘ये साली जिंदगी’ में दैनिक जीवन में दी जाने वाली गालियों और अपशब्दों का जमकर प्रयोग किया। निर्देशक लव रंजन ने भी अपनी एडल्ट कॉमेडी फिल्म ‘प्यार का पंचनामा’ में अपशब्दों से भरी भाषा का प्रयोग किया।
इससे पहले भी कई अपशब्दों और गाली गलौज से भरी भाषा का फिल्मों में प्रयोग होता रहा है लेकिन वो काफी हद तक कहानी की मांग थी। फिल्म ‘ओंकारा’ में सैफ अली खान और अजय देवगन इसी तरह की भाषा में बात करते दिखे, वहीं विद्या बालन और अरशद वारसी ने भी फिल्म ‘इश्किया’ में अपशब्दों से भरे संवाद कहे। इसी तरह की अशिष्ट भाषा का प्रयोग करीना ने फिल्म ‘जब वी मेट’ और ‘गोलमाल थ्री’ में किया गया। इसी वजह से ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल भी रहीं। यानि सफलता की मुख्य श्रेणी को आप कामुकता, फूहडता और गाली-गलौज को श्रेय दे सकते हैं।
वैसे पहले धमेंद्र व मिथुक की फिल्मों में साले, कुत्ते आदि गाली का प्रयोग किया जाता था अब फिल्मों में अब देसी गाली के साथ-साथ एक अंग्रेजी गाली का प्रयोग एक-दो सालों में कुछ ज्यादा होने लगा है जिसे फक कहते हैं। इसी के नाम पर ‘फुकरें’ फिल्म का निमार्ण किया गया था। जिसमें दिल्ली की एक गैरकानूनी काम करने वाली महिला के जीवन को आधार बनाकर फिल्म को बनाया गया था जिसमें वह मां-बहनों की गाली साथ-साथ, पिछवाड़े में उंगली तथा फक शब्द का बखूबी प्रयोग करते हुए जनता को दिखाया गया है।
हालांकि अब तो गालियों का प्रयोग बड़े पर्दे के साथ-साथ छोटे पर्दे पर भी होने लगा है। कॉमेडी के नाम पर गालियों को संचारित करने का काम आसानी से किया जा रहा है। चाहे वह लाफ्टर चैलेंज हो या फिर कॉमेडी सर्कस या फिर कपिल का कॉमेडी सर्कस हो। जिसमें कलाकार फूहडता, कामुकता तथा द्विअर्थी संवाद का प्रयोग जनता को हंसाने के लिए करते हैं। इसमें मुख्यतः मां-बहनों की गाली तथा फक शब्द, बाबा जी का घंटा आदि गाली का बिना किसी रोकटोक के प्रयोग किया जाता है। जिससे एक विशाल जन समूह इन गालियों से आसानी से रूबरू होकर संचारित होता है।
सामाजिक दृष्टिकोण के रूप में गाली
सामाजिक दृष्टिकोण के रूप में संचारित या प्रेषित होने वाली गालियां का स्वरूप व्यक्ति विशेष से संबंधित होकर तथा समाज में मान-सम्मान के हनन के बतौर भी प्रयोग किया जाता है। जैसे किसी लड़के के पिता के वैध होने या न होने के दृष्टिकोण में ‘हरामी’ जैसी गाली बनती है। वैसे अधिकतर गालियां यौन अंगों और यौन संबंधों से जुड़ी हुई होती हैं जो जबरदस्ती यौन संपर्क की बात करती हैं। जिसको हम अपनी ताकत दिखाने का एक तरीका भी कह सकते है। इस बात पर गौर करें तो इसके पूरे आधार स्तंभ में गालियां अधिकतर स्त्रियों से संबंधित होती हैं एक-दो गालियों को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो सभी गालियां महिलाओं को केंद्र में रखकर दी जाती हैं।
आम समझ में गाली का अर्थ यौनांगों और यौन संबंधों से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी उस अभिव्यक्ति से लिया जाता है जो लक्षित व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आत्मविश्वास या आत्मबल पर सीधा असभ्य-सा प्रहार करती है। यह प्रहार लैंगिक, सामाजिक आदि पक्षों के अतिसंवेदनशील मार्मिक बिंदुओं पर होता है, परिणामतः शारीरिक प्रहार से भी भयानक हो जाता है।
इस आलोच्य में आगे बात की जाए तो प्रहार शारीरिक और मानसिक दोनों होते हैं। वैसे मनुष्य का जिसके प्रति जितना अधिक सम्मान और अपनत्त्व का भाव होता है, वह प्रहार के लिए उतनी ही उपयुक्त होती है। किसी को कष्ट पहुंचाना हो तो उसके लिए जो परम आदरणीय है, उसका परम अनादर कर दो, यही गालियों के पीछे मानसिकता काम करती है। यह आश्चर्य की बात नहीं कि, मां की गाली सबसे तीखी और खराब मानी जाती है। अंतरंग मित्र जो बिना गालियों के एक दूजे से एक वाक्य भी नहीं बोल पाते, वे भी इससे परहेज करते हैं। बहुतेरे ऐसे हैं जो कोई भी गाली सह लेते हैं लेकिन मां की गाली मिलते ही क्रोधोंमत्त हो जाते हैं। न्यूनाधिक रूप में ऐसा पिता केंद्रित गाली के साथ भी होता है। क्योंकि मनुष्य इनसे भावनात्मक तौर पर जुड़ा हुआ होता है।
वैसे मनुष्य का जुड़ाव और भावनाएं अपनी जगह हैं लेकिन उसके पीछे वर्चस्व और प्रतिष्ठा की मानसिकता काम करती है। मां की गाली देने वाला यह जताता है कि देखो इस नपुंसक को! इसके सबसे प्रिय व्यक्ति को मैंने गाली दे दी। उसे गाली दी जो इसे इस संसार में ले आई। यह पुरुष प्रधान समाज में संपत्ति और भावना के जटिल मिश्रण वाले सबसे प्रिय स्त्री संबंध पर प्रहार कर सामने वाले को मानसिक रूप से पीड़ित करने का उद्योग होता है। गाली देने वाला अपनी जान सामने वाले की प्रतिष्ठा को क्षतिग्रस्त कर रहा होता है। लेकिन इस संदर्भ को कितने लोग समझते पाते हैं? आक्रामकता को दर्शाते और सराहते हुए प्रतिष्ठा का मूल स्थान ही खिसक जाता है। गाली देते हुए वह अपनी जननी को भी कहीं आक्षेपित कर रहा होता है, यह उसकी समझ में नहीं आता।
लेकिन उन गालियों का क्या जो लोकभाषाओं का अंग हो गई हैं? वास्तव में बहुधा इन गालियों में उन सभी पुरानी लुप्तप्राय भाषाओं के अंश सुरक्षित रह जाते हैं जिनसे लोकभाषा विकसित हुई।
वर्तमान समय तेज परिवर्तन का समय है। गालियां के कई प्रकार हो गए हैं। गालियों के अलावा गाली देने वाले-वालियों पर भी ध्यान देना होगा। कई बाते हैं; गाली बकने वाले क्या इतना सोचते हैं? इसकी आवश्यकता भी है? गालियां की स्वीकार्यता और उनसे घृणा, जुगुप्सा किस स्तर की है? क्या गाली देने वाले के मन में वाकई स्त्री या स्त्रीजाति के प्रति अनादर का भाव ही होता है? क्या स्त्री वाकई अनादर का अनुभव कर याद रखती है या लैंगिक संकेतों पर मुंह बिचका कर उपेक्षित करते हुए भूल जाती है? स्त्री का गाली पर इतना संवेदनशील होना उचित है क्या, तब जब कि वह स्वयं बकती है? यह ‘संवेदनशीलता’ पुरुष प्रधान समाज में अपने पैर जमाती स्त्री के बराबरी के दावे से कितनी और कैसे जुड़ती है? गालियों के प्रयोग का विरोध करने वाले पुरुष स्त्रैण हैं? क्या गालियां इतनी आवश्यक हैं कि उनके बिना काम ही नहीं चल सकता? क्या यह समाज गालीबाज समाज है? ऐसा क्यों है कि परिवार बंधन में बंधने के बाद बहुसंख्य जन गाली बकना सीखकर उसे अंतरंग मित्रों की बैठकी के लिए सुरक्षित कर देते हैं? गालियां रागात्मकता और मित्रवत प्रेम से क्यों जुड़ती हैं? कुछ निकट संबंधों में गालियां स्वीकार्य क्यों हैं? वैवाहिक अनुष्ठानों में कुछ अवसर गालियों के कर्मकांड के लिये सुरक्षित क्यों हैं? धीरे-धीरे वे लुप्त क्यों हो रहे हैं? गालियां सार्वकालिक और सार्वदेशिक क्यों हैं? सिनेमा, टीवी, इंटरनेट के जमाने में साहित्य में गालियों का प्रयोग समाज को कितना दूषित कर सकता है? गालियों को सहेजने की साहित्य की प्रवृत्ति समाज की स्थिति और सोच को कितना दर्शा रही है और उन्हें कितना बदल सकती है? इस युग में साहित्य समाज को दिशा देने और सामाजिक परिवर्तन करने में क्या वाकई सक्षम है? 
हालांकि यह आवश्यक नहीं कि दैनंदिन गाली बकने वाला स्त्री जाति के प्रति अनादर का भाव रखता हो। जैसा कि पहले कहा, यह क्रिया उसके संस्कारों और परिवेश से अनुकूलित मस्तिष्क में स्वचालित सी आती है और अप्रत्यक्ष रूप से अवसाद या क्रोध का निवारण कर उसे आगे के संघर्ष के लिये तैयार कर देती है। अपने परिवार के और दीगर स्त्रियों के प्रति वह आदर, अनादर या तटस्थता का वही भाव रखता है जो पुरुषों के लिये रखता है।
अब सवाल यह कि स्त्रियां गाली क्यों बकती हैं? पुरुष केंद्रित समाज में अगर पुरुष को झटका देना है या उसके ऊपर ‘विजय’ प्राप्त करनी है तो उन्हीं अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं जिनका प्रयोग वह स्त्री को पीड़ित करने के लिए करता है? बहुधा स्त्री के मुंह से लैंगिक गालियां निरर्थक लगती हैं लेकिन पुरुष के लिए स्त्री की यह ‘निर्लज्जता’ एक जोरदार झटका होती है, साथ ही समागम क्रिया में पुरुष वर्चस्व को चुनौती भी- फक यू! ............... तुम ही नहीं मैं भी सकती हूं, तुम्हें आनंद आता है तो मुझे भी आता है। ऐसी स्त्री प्रतिद्वंद्वी को मानसिक रूप से हीन भाव ग्रसित कर देती है। हालांकि गालियां सीख कर उनका धड़ल्ले से प्रयोग कर लेने वाले भी समझते हैं कि गालियां संवाद की मुख्य धारा नहीं है। अधिकांश बाल बच्चेदार हो जाने के बाद गाली बकना अंतरंग मित्रों की बैठक के लिए सुरक्षित कर देते हैं। यह दर्शाता है कि परिवार के बाहर भी एक अलग सा रागात्मक परिवेश है जो एक दूसरे से इतना खुला है कि निषिद्ध संवाद भी बेहिचक कर लेता है। गालियां वहां सहज ही आती हैं चली जाती हैं। यह ‘निजी’ परिवेश परिवार इतना महत्त्वपूर्ण भले न हो, कम महत्त्व नहीं रखता। इस परिवेश में निराशाएं, दुख, क्षोभ साझा किए जाते हैं और आगे के लिये महत्त्वपूर्ण बातें तय की जाती हैं। इस परिवेश से गालियां निकाल कर देखिए औपचारिकता हाबी होने लगेगी।

लेकिन अपने समाज का दर्पण तो बन ही सकता है। जिस समाज में सड़क किनारे या हर उस जगह पर जो साफ, समतल और चिकनी हो, हगने का रिवाज हो, गालियों का चलन सीधे मनोवृत्ति से जुड़ता है।  वैसे लैंगिक गालियां कुछ अधिक ही स्वाभाविक हैं, जो समाज का सच हैं। अगर देखा जाए तो यह युग उदारीकरण के साथ साथ धु्रर्वीकरण का भी युग है। जाति, लिंग, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र आदि को लेकर नित नई गोलबंदियां हो रही हैं। वैसे श्रम और ईमानदारी अपेक्षित है न कि एक दूजे की पीठ खुजाने की गोलबंदी और सतही जुमलेबाजी। गालियां इंसान में समाज से नहीं जातीं, बल्कि समाज से इंसान में आती हैं। समाज इतना संस्कारित हो जाए कि गाली बकना ही छोड़ दे, एक बहुत व्यापक फलक वाला विषय है और उसमें इंसान का योगदान तो है लेकिन इतना भी नहीं कि उसे शुचितावादी होकर कृत्रिमता का चोला पहनने की आवश्यकता पड़े।