सरोकार की मीडिया

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Thursday, May 11, 2017

यह तो बस शुरूआत है......

यह तो बस शुरूआत है......


उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार और मुखिया अखिलेश यादव के कार्यकाल में जब कभी दंगें हुए तो भारतीय जनता पार्टी इन दंगों को आड़े हाथों लेती रही और इसे सपा सरकार व अखिलेश यादव की नाकाबलियत मानती रही... कि उनके कार्यकाल में कानून व्यवस्था ठप्प हो जाती है... इस संदर्भ में बीजेपी के सभी नेता अपने-अपने भाषण और वक्तव्य में कहा करते थे कि उनकी सरकार होती तो ऐसा नहीं होता.... दंगें नहीं होते, कानून व्यवस्था सूचारू रूप से चलती... तो आज उनके बता दूं कि प्रदेश में उनकी पूर्ण बहूमत की सरकार है जिसे बने हुए अभी जुमा-जुमा 2 माह ही हुए हैं और प्रदेश में बलात्कापर, मार-पीट, लूटमार तो चल ही रहा था अब दंगों की शुरूआत सहारनपुर दंगों से हो चुकी है.... इसका मतलब यह है कि बीजेपी भी कानून व्यूवस्था सूचारू ढंग से चला पाने में असमर्थ प्रतीत हो रही है... क्योंकि दूसरों की कार्य प्रणाली पर लांछन तो कोई भी लगा सकता है.... जब वो चीजेें खुद करनी पड़े तो कोने तलाशते फिरते हैं.... जुमले मारिए और इस दंगें को किसी और पार्टी पर मड़ दीजिए.....किस इस दंगें को करवाने में किसी और पार्टी का हाथ है जो अपनी बीजेपी (योगी सरकार) को नीचा दिखाने के लिए यह सब कर रही है.... हालांकि बीजेपी या उनकी पार्टी का कोई मंत्री ऐसा कोई भी बयान देता है तो इससे यह भी साफ साबित हो जाएगा कि सपा शासनकाल में हुए दंगों में शायद बीजेपी का हाथ न हो..... वैसे मैं सपा का समर्थक नहीं हूं..... जो सपा के पक्ष में और बीजेपी के विपक्ष में नहीं लिख रहा हूं... सपा के शासनकाल में सभी जानते हैं कि कानून व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था की रीड़ तोड़ दी जाती है... ताकि उनके नेता और समर्थक अपनी मनमानी कर सकें... तो उसी के पदचिन्हों पर योगी सरकार भी चलती हुई प्रतीत हो रही है.... क्योंकि देखा जा रहा है कि भगवा धारण करके योगी व बीजेपी के समर्थक अती पर उतारू नजर आ रहे हैं..... खास तौर से मुसलमानों के विपक्ष और विरोध में खड़े नजर आ रहे है.... इस विरोध से सिर्फ और सिर्फ दंगें होगें और कुछ नहीं हो सकता... खैर अभी तो शुरूआत है 4 साल 10 माह बाकि है.........

Sunday, May 7, 2017

कहां गई वो मोमबत्तियां.....

कहां गई वो मोमबत्तियां.....

आज एक शादीशुदा महिला के साथ उसके पति के सामने 8 लोगों ने गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया... जिसे हमारे कुछ मीडिया चैनलों ने मात्र एक छोटी सी खबर बनाकर पेश किया....वहीं कुछ चैनलों को इस खबर से कोई सरोकार नहीं दिखा.... और न ही कहीं कोई मोमबत्तियां दिखाई दी, न कहीं कोई जलूस दिखाई पड़ा, न कोई हो-हल्‍ला.... न न्‍याय की मांग, न कानून में परिवर्तन, न बलात्‍कारियों को फांसी की सजा मांग, न ही न्‍यूज चैनलों पर बड़े-बड़े बुद्धजीवियों द्वारा कोई डिबेट....न चर्चा, न परिचर्चा.... क्‍या यह बलात्‍कार की श्रेणी में नहीं आता... क्‍या बलात्‍कार सिर्फ निर्भया के साथ हुआ था.... जिसे लेकर हजारों लोग दिल्‍ली में तख्‍तियां लेकर न्‍याय की और बलात्‍कारियों को फांसी देने की मांग कर रहे थे...इस महिला के साथ 8 लोगों ने गैंगरेप किया, शायद यह इनकी दृष्टिकोण से बलात्‍कार की श्रेणी में नहीं आता होगा…. तभी तो चारों तरफ सन्‍नाटा पसरा पड़ा है.... या फिर कुछ और कारण तो नहीं है जो निर्भया के साथ हजारों की भीड़ खड़ी हो गई थी... और इस महिला के साथ कोई भी नहीं….शायद यह एक दलित महिला थी, तभी इसकों न्‍याय दिलाने के लिए कोई सामने आता नहीं दिख रहा है....

अभी 5 मई को ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया कांड के सभी दोषियों को फांसी की सजा बरकरार रखी है और इसके बाद यह कांड..... क्‍योंकि उनको भी पता है कि हमारे देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था कितनी लचीली है..... कुछ नहीं बस केस चलता रहेगा.... और हम खुले आम घूमते रहेंगे हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.... और यदि 5-10 साल बाद सजा हो भी गई तो सजा कितनी 2-5 साल की होगी.... जिस हम हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चेंलेज कर देंगे फिर वहां भी 2-5 साल केस चलेगा..... हमारा कुछ नहीं होगा.....यही वास्‍तविक हकीकत है..... जो निर्भया के पहले और निर्भया के बाद न जाने कितनी निर्भया इस दंश को झेलने पर मजबूर होंगी.... क्‍योंकि सिर्फ निर्भया ही थी जिसके पीछे एक हजूम दिखा बाकि तो सब ऐसे ही थी... क्‍योंकि किसी नेता ने कहा था बलात्‍कार होना आम बात है और किसी अन्‍य नेता ने कहा था कि बच्‍चों से गलतियां हो जाती है.... और सबको पता है बच्‍चे गलतियां करते रहते हैं..... पर एक दलित महिला के साथ हुए गैंगरेप के बाद लगता है कि हमारे समाज का कुछ नहीं हो सकता.... क्‍योंकि पीडिताओं को कभी न्‍याय नहीं मिल सकता और दोषियों को न ही सजा...

Monday, May 1, 2017

वाह रे आदमी

वाह रे आदमी

आदमी अच्‍छे रास्‍ते पर नहीं जाता
पर बुरे रास्‍ते पर सभी जाते हैं
इसलिए दारू बचने वाला कहीं नहीं जाता
पर दूध बेचने वाले को घर-घर, गली-गली, कोने-कोने में जाना पड़ता है
और दूध बेचने वाले से बार-बार पूछा जाता है पानी तो नहीं डाला, पानी तो नहीं डाला
पर दारू में खुद पानी मिला-मिलाकर पीते हैं... वाह रे दुनिया...वाह रे दुनिया
वाहे रे दुनिया तेरी रीत...
जो भाग्‍य में है वो भाग कर आएगा
जो नहीं है वो आकर भी भाग जाएगा
जिंदगी...यह जिंदगी को इतना सीरियस लेने की जरूरत नहीं है यारों
यहां से जिंदा बचकर न कोई गया है, न कोई जाएगा
इक सच बात यह भी है कि
अगर जिंदगी इतनी अच्‍छी होती, तो हम ये दुनिया में रोते रोते न आते
मगर मीठा सच यह भी है कि अगर जिंदगी बुरी होती, तो जाते-जाते रूलाकर ना जाते
वारे आदमी... तेरे करेक्‍टर
लाश को हाथ लगाता है तो नहाता है
पर बेजुबान जीव को मार कर खाता है
यह मंदिर-मस्जिद भी क्‍या गजब की जगह है दोस्‍तों
यहां गरीब बाहर और अमीर अंदर भीख मांगता है
विचित्र दुनिया का कठोर सत्‍य
बारात में दुल्‍हे सबसे पीछे और दुनिया आगे चलती है
मइ्यत में जनाजा आगे और दुनिया पीछे चलती है
यानी दुनिया खुशी में आगे... और दुख में पीछे जाती है
अजब तेरी दुनिया... गजब तेरा खेल
मोमबती जलाकर मुर्दों को याद करना
और मोमबती बुझाकर जन्‍मदिन मनाना
नई सदी मिल रही है दर्द भरी सौगात
बेटा कहता है बाप से तेरी क्‍या औकात
पानी आंखों का मरा, मरी शर्म और लाज
कहें बहू अब सास से, घर में मेरा राज
भाई भी करता नहीं, भाई का विस्‍वास
बहन पराई हो गई, साली खासमखास
मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश
बापू को बोझ समझे, पत्‍थर लगे गणेश
बचे कहां अब शेष है, दया, धर्म और ईमान
पत्‍थर के भगवान है, पत्‍थर दिल के इंसान
पत्‍थर को लगते हैं छप्‍पन भोग
मर जाते हैं फुटपाथ पर भूखे प्‍यासे लोग
पहन मुखौटा धर्म का, करते दिन भर पाप
भंडारे करते फिरे, घर में भूखा बाप
वाह रे आदमी, वाह रे इंसान

गजब तेरी दुनिया, गजब तेरे ख्‍बाव......

Tuesday, April 18, 2017

मैं अक्‍सर सोचता हूं......

मैं अक्‍सर सोचता हूं......


सोचता हूँ ,
मैं अक्सर सोचता हूँ
की मरना क्या है ,
शरीर से ? आत्मा से ?
मेरे अंदर एक कब्रिस्तान
बसता है ,
जहाँ हर रोज मेरी इच्छाएं ,
पटरी पर लेटी ,
ट्रैन का इंतज़ार करती है,
मेरी सोच गहरी खाई ,
मैं कूद कर खो जाता है,
मेरे विचार तकिये की ,
कोर को भिंगाती हुई ,
दम घोंट कर मार दी जाती है,
मेरे सपने ,मेरी महत्वाकांक्षायें ,
बिस्तर पर चढ़ कर ,
पंखे से झूल जाते है ,
लेकिन कोई सुसाइड नोट ,
नहीं पड़ा होता कहीं,
जिस पर काँपते हाथों से,
मैंने अपने दर्द को बयाँ किया हो ,
खुद ही घोल देता हूँ अपनी ,
हसरतों को जहर की शीशी में,
और एक साँस में खत्म,
कर देता हूँ ,
उन अधबुने सपनों को,
इन लाशों का कोई,
पोस्टमार्टम नहीं होता,
न कोई हो हंगामा,
न कोई केस दर्ज,
न कोई फैसला,
न कोई सुनवाई,
बस ये दफ़न होती रहती है ,
मेरे अंदर के कब्रिस्तान में,
दुनिया के शोरगुल में,
ऐसी अनगिनत आत्महत्यायें ,
रोज होती है,
सब मशगूल है ,अपने कामों में,
झुठे हँसने मुस्कुराने में,
सब कुछ यूँ ही चलता रहता है,
न कोई आँसू बहाता है ,
न कोई सन्नाटा छाता है ,
और न किसी को कानो कान
ख़बर होती है।

Saturday, March 25, 2017

कचड़ा खाती हमारी माताएं

कचड़ा खाती हमारी माताएं

गाय को माता का दर्जा दिया गया है। सिर्फ दर्जा ही दिया गया है (मानने वाले सिर्फ माता मानते हैं) और अधिकांश लोग इसको सिर्फ एक जानवर के रूप में देखते हैं। हां यह बात और है कि सुबह सुबह बहुतरे लोग पुण्‍य कमाने की दृष्टि से गाय को रोटी खिलाते हैं ताकि उनके द्वारा किए गए पाप कुछ कम हो सकें। वैसे गाय को घरों के साथ-साथ चौराहों पर, सड़कों के बीच में बैठे हुए, यहां-वहां कचड़ा में से अपना भोजन तलाशते हुए आसानी से देखा जा सकता है... चाहे गांव हो या शहर.... गांव में गायों की स्थिति बहुत हद तक ठीक है वहीं शहरों में तो आलम यह है कि जब तक गाय दुध देने का काम करती है तब तक उसको घर में बांध कर रखा जाता है जैसे ही उसने दुध देना बंध किया वैसे ही उसको छोड़ दिया जाता है यहां-वहां भटकने के लिए... कूड़ा, कचड़ा, पन्‍नी और भी बिषैली चीजों को खाने के लिए....गाय भी क्‍या कर सकती है जब उसका घनी ही उसको छोड़ देता है तो अपना पेट भरने के लिए कुछ ना कुछ तो खाना ही पड़ेगा, फिर चाहे वो कचड़ा ही क्‍यों ना हो... यह इंसान है, मतलबी इंसान, जो अपने बुढ़े मां-बाप को भी घर से निकाल देता है वो गाय को क्‍या घर में रखेंगा....जिस तरह से समाज ने बच्‍चों द्वारा निकाले गए बूढ़े मां-बाप को पनाह देने के लिए वृद्धाआश्रम बनावा दिया है उसी प्रकार समाज ने इन गायों के लिए गाउशाला का निर्माण करवा दिया है.... यह बात तो ठीक है... क्‍या समाज के बुद्धजीवि व्‍यक्तियों, कानून ने, इस संदर्भ में कभी नहीं सोचा कि उन बच्‍चों पर भी कार्यवाही होनी चाहिए जो अपने मां-बाप को इस तरह दर-दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं... इस पर सबकी बोलती बंद हो जाती है, बहुत से लोग यह तर्क देकर अपना पल्‍ल झाड़ लेते है कि यह उनका आपसी मामला है इसमें हम क्‍या कर सकते हैं.... फिर इस तरह गायों पर वबाल क्‍यों मचाने लगते हो... जरा जाकर उस गाय के धनी की खबर भी तो लेकर देखों जो जरूरत निकल जाने पर छोड़ देते हैं... या फिर बेच देते हैं। हालांकि जब आप गाय के प्रति हम और आप इतने संवेदनशील हैं तो फिर जहां पर इन गायों को भटकते हुए देखते है उसको अपने साथ घर क्‍यों नहीं ले आते... उसकी देखभाल क्‍यों नहीं करते.... बस एक दिखावा करते हैं कि हमें अपनी गाउ माता की रक्षा करनी है... जरा कभी अपने- अपने घरों में झांककर भी देख लिया करों जो अपने माता-पिता का इस तरह अनादर करते रहते हैं वो क्‍या खाक गाय की सेवा करेंगे....वैसे सेवा की बात करें तो सिर्फ गायों के लिए ही इतना उतावलापन आखिर क्‍यों.... और भी तो बहुत से जानवर है उनकी भी तो रक्षा की जा सकती है...क्‍योंकि सभी धमों में लिखा गया है कि प्राणियों की रक्षा करनी चाहिए, जिससे आपके पापों को दोहन होगा... नहीं बस गाय को पकड़कर बैठ जाते हैं....

यह एक पक्ष है गाय के संदर्भ में दूसरे पक्ष पर बात करें तो गाय का नाम लेते ही इसका नाम स्‍वत: धर्मवाद से जुड़ जाता है। जो कभी कभी दंगों का रूप भी इख्तियार कर लेता है। जिसमें इंसान, इंसान के खून का इस कदर प्‍यासा हो जाता है कि उसे कुछ नहीं दिखता, बस दिखता है तो किसी को आहत कैसे किया जाए.... रही बात गाय को काटने की तो पशुओं पर अत्‍याचार करना पाप है.... परंतु जब उसका मालिक ही उसको चंद पैसों की लालच में बूचड़खानों को बेच देता है उस पर कोई कार्यवाही क्‍यों नहीं की जाती..... जब गाय का मालिक ही उसको किसी भी कारणों से नहीं बेचेगा (चाहे वो दूध दे या ना दे) तो यह बूचड़खाने तो स्‍वत: बंद हो जाएंगे.... पर इस ओर किसी की दृष्टि शायद ही जाती हो....खैर मेरे कहने का तात्‍पर्य सिर्फ इतना है कि यदि हम गाय को माता मानते हैं तो इस तरह मतलब निकल जाने पर कुड़ा-कचरा खाने के लिए न छोड़े....

Thursday, March 23, 2017

एक साथ पढ़ने पर भी लगा दो पाबंदी.....

एक साथ पढ़ने पर भी लगा दो पाबंदी.....


अब भाई पार्क, किला, मंदिर, मस्जिद, कॉफी शॉप, होटल आदि जगहों पर जाने का मन हो तो अकेले ही जाओं, हां दोस्‍तों के साथ भी जा सकते हो, वो भी सिर्फ लड़के होना चाहिए, यदि अब लड़कियों के साथ गए तो क्‍या पता कहीं से एंटी रोमियों स्‍कॉड न आ जाए (महिला पुलिस के साथ) और आपको लड़की के साथ देखकर आपकी हजामत न करने लग जाए.... और हां यदि अब कोई विवाहित पुरूष अपनी पत्‍नी के साथ इन जगहों पर जाने की सोच रहे हो तो शादी की एक दो तस्‍वीरें अपने साथ जरूर रखकर चले….. या फिर कोई आई कार्ड बनवा लीजिएगा जिसको अपने गले में जरूर टांग लीजिएगा.....ताकि कोई पुलिसवाला पूछे तो उसको दिखा सको की हम विवाहित है और य‍ह हमारी पत्‍नी है.....खैर जब सरकार यह चाह रही है कि पार्कों, किलों, कॉफी शॉप, मंदिरों में कपल न दिखें तो उनको एक नया नियम और बना देना चाहिए कि आज से स्‍कूल, कॉलेजों, महाविद्यालयों, विश्‍वविद्यालयों आदि जगहों पर लड़के-लड़कियों के साथ पढ़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए....इनकी टाईमिंग में बदलाव कर देना चाहिए कि सुबह की पाली में लड़कियां पढ़ेंगी और शाम की पाली में लड़के.... और सभी स्‍कूल, कॉलेजों, महाविद्यालयों, विश्‍वविद्यालयों के पार्कों, केंटीनों में फोर्स तैनात कर देना चाहिए ..... और तो और पुरूष शिक्षक सिर्फ लड़कों को पढ़ाएंगे और महिला शिक्षिका सिर्फ लड़कियों को.... यह भी नियम बना दीजिए....ताकि जो आपकी मंशा है वो पूरी हो सकें.... वैसे उत्‍तर प्रदेश सरकार के नए मुख्‍यमंत्री ने सभी एसपी को दिशा निर्देश देकर एंटी रोमियों स्‍क्‍वार्ड का गठन हर जिलों में करवा दिया है यह अच्‍छी बात है महिलाओं और लड़कियों को सुरक्षा मिलेगी... पर स्‍कॉड द्वारा इस तरह पार्कों, किलों, मंदिर, मस्जिद, कॉफी शॉप, होटल आदि जगहों पर बैठे लड़के-लड़कियों को प्रताडित करना, लड़कों को थप्‍पड़ मारना, डंडों से पीटना, उठक-बैठक करवाना, उनके उपर केस लगाना क्‍या जायज है... इससे यह प्र‍तीत होता है कि हम स्‍वतंत्र नहीं है.... अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकते. बैठ नहीं सकते, घूम नहीं सकते.... हां महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में यह कदम है तो उन पर कार्यवाही कीजिए जो महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हैं, उन पर फब्‍तियां कसते हैं...... आपसी सहमति से.... दोस्‍तों के साथ बैठना, घूमना,आना, जाना, इस पर प्रतिबंध बिल्‍कुल भी जायज नहीं है.... मैं इस बात का विरोध दर्ज करता हूं.... बाकि हमारे मुख्‍यमंत्री जी बुद्धजीवि है... मेरे द्वारा बताए गए कुछ और नियम अपने इस अभियान में जोड़ ले कि आज से स्‍कूल, कॉलेजों, महाविद्यालयों, विश्‍वविद्यालयों आदि जगहों पर लड़के-लड़कियां एक साथ नहीं पढ़ेगे और एक साथ कहीं ना आएंगे ना जाएंगे... तो शायद आपके द्वारा चलाई गई यह मुहीम पूरी हो सकें....

Tuesday, March 7, 2017

पुरूषों की सोच से परे सोचें......महिलाएं

पुरूषों की सोच से परे सोचें......महिलाएं

एक दिन...... हां जी सिर्फ एक दिन.... महिलाओं के नाम...चलो अच्‍छा है थोड़ा सा चिल्‍लाने का मौका उनको भी मिल जाता है....कि हम महिलाएं हैं..... हमारे साथ ऐसा होता है, वैसा होता…… यह पुरूष समाज हमारे साथ ऐसा करते आ रहे हैं, वैसा करते आ रहे हैं.... इनसे मुक्ति मिलनी चाहिए.....हां भाई जरूर मिलनी चाहिए....आप भी आधी आबादी का हिस्‍सा है हमारी..... पर साल में एक दिन अपने अधिकारों को चिल्‍ला-चिल्‍लाकर याद करना कहां की तुक है....साल के बाकि दिन भी आपके हैं उसमें भी अपने अधिकारों के लिए लड़ा जा सकता है.....पर नहीं....चुप्‍पी साध के बैठे रहते हैं आप लोग.... इस एक दिन के लिए.... कि मार्च की 8 तारीख आएगी और हमें कहना का मौका मिलेगा......हमको पता है बहुत कुछ सहा है आप सभी ने...सह भी रहे हैं... पर क्‍यों..... वैसे कभी आप लोगों ने अपने-अपने घरों में भी झांककर देखा होता तो आपको पता चल जाता कि आपके शोषण की शुरूआत वहीं से हुई है...... जरा गौर कीजिए जब आपको कहीं जाना होता था और आप अपनी माता से कहती थी, तो जबाव साफ मिलता है कहीं नहीं जाना.... जाना है तो भाई के साथ चली जाना..... कभी आपकी माता ने आपके भाई से क्‍यों नहीं कहा कि जाना है तो अपनी बहन के साथ ही जाना, नहीं तो कहीं जाना ही नहीं है......वहीं आपके भाई को खुली छूट है कि वो रात्रि के 9-10 बजे तक आ सकता है और आपको.... घर में 6 बजे ही बंद कर दिया जाता रहा है..... और तो और सुबह का नास्‍ता, खाना, घर का पूरा काम आप लोगों को ही करना पड़ता है.... कभी आपके परिवार वालों ने कहा कि नास्‍ता या खाना या घर का यह-यह काम तुम्‍हारा भाई ही करेगा....कभी ऐसा हुआ....कभी नहीं.......क्‍योंकि वो पुरूष है आप महिला... वहीं यदि आपका भाई किसी से प्रेम करता है तो उसको आजादी है मेरा लाल, मेरा बेटा... और आपने कर लिया तो पाबंदियां ही पाबंदियां.... कलमुंही, कुल्‍टा, और न जाने क्‍या–क्‍या आपकी माता के मुखरबिंदु से अच्‍छे-अच्‍छे अल्‍फाज निकलने लगते हैं।
कभी अपने ही घर में अपने शोषण के प्रति आवाज उठाई है.....और उठाई है तो वो आवाज आपके परिवार वालों ने ही दबा दी है..... और सबसे अधिक उसको दबाने वाली कोई और नहीं आपकी माता जी ही होती है..... इस संदर्भ में और कहें तो विवाहित महिलाओं को देखिए कि उनकी पूरी सोच पुरूषों के अनुरूप ही घूमती रहती है....सोचने का नजरिया, देखने का नजरिया सब कुछ पुरूषों के अनुसार..... क्‍योंकि महिलाएं अपने आपको आज भी उन पर निर्भर समझती है.... कमजोर समझती है बिना पुरूषों के......(एक आध अपवाद स्‍वरूप महिलाओं को छोड़कर)..... शादी, बच्‍चे पैदा करने का निर्णय, घर में आज क्‍या बनेगा, क्‍या बनना चाहिए सब कुछ पुरूषों के अनुसार ही किया जाता है..... वहीं दहेज की मांग करने वाली अधिकांशत: औरतें ही होती हैं.... दहेज की आग में जलाने वाली अधिकांश सास होती है.... और तो और अपनी बहुओं से लड़का ही पैदा हो इस तरह की ख्‍वाहिशें भी सास ही करती देखी जाती है... बहू पर अत्‍याचार करने वाली सास, या सास पर अत्‍याचार करने वाली बहू...जरा सोचिए महिला होने के बाद भी वो महिलाओं के साथ क्‍या-क्‍या करती हैं....क्‍योंकि उनकी सोच आज भी पुरूष समाज के समकक्ष चलती है। मेरे कहने का तात्‍पर्य सिर्फ इतना है कि जब आप अपने ही घर में अपनी आवाज नहीं उठा सकते तो फिर इस तरह बाजार में चिल्‍लाने से फायदा ही क्‍या है...... पहले अपने ही घर में हो रहे शोषण को देखिए जिसे आप अनदेखा कर देती है....उसके खिलाफ आवाज उठाए....जब आप अपने घर में अपने अधिकारों के प्रति सजग हो जाएंगे तो समाज अपने आप ही आपको वो अधिकार देने पर स्‍वत: मजबूर हो जाएगा जिसे वो आज तक आप सभी से छिनता आया है.....आप सब का दोहन करता आया है..... वो अधिकार पुरूष समाज ही क्‍या कोई भी नहीं छिन सकता जिसके प्रति आप लोग सजग है... नहीं तो इस देश में उल्‍लू बनने वालों की कमी थोड़ी के है.....
यदि किसी को मेरा विचार किसी को अच्‍छे नहीं लगे हों तो मैं माफी मांगता हूं.... बाकि महिला दिवस की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं...