Dr. Gajendra Pratap Singh (Post Doctorate & Assistant Professor) School of Media and Communication Studies Galgotias University, Greater Noida 09839036115 Email: gajendra_125@rediffmail.com
Tuesday, June 30, 2015
Monday, May 18, 2015
अलविदा...................अरूणा रामचंद्र शानबाग
अलविदा...................अरूणा
रामचंद्र शानबाग
अरूणा रामचंद्र शानबाग को लोग शायद समय
के साथ-साथ भूल गये। या फिर बहुतों को आज भी उसके साथ घटित घटना के बारे में याद
होगा। ‘‘अरूणा शानबाग वह महिला थी, जिसने लोगों की देखभाल के लिए 1966 में के.ई.एम. अस्पताल में नर्स के
पेशे को चुना।’’ उसी अस्पताल में सफाई के तौर पर कार्यरत एक सफाई कर्मी सोहन लाल
वाल्मीकि, ने 27 नवम्बर,
1973 को अरूणा पर
हमला किया। और, उसके साथ बलात्कार की घटना को अंज़ाम
दिया।’’ घटना के दौरान बलात्कारी ने अरूणा के गले को कुत्ता बांधने वाली
जंजीर से बांध दिया और, उसे पकड़कर खिचने की वजह से अरूणा के
मस्तिष्क से ऑक्सीजन की आपूर्ति रूक गई तथा कार्टेक्स को क्षति पहुंची।
परिणामस्वरूप, वह कोमा में चली गयी। अरूणा को इलाज के
लिए के.ई.एम. अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन, अच्छे-से-अच्छे डॉक्टर भी उसे कोमा से बाहर न निकाल सके। तब से अरूणा
शानबाग मुसलसल वार्ड नं. 4 में जिंदा लाश की तरह पड़ी थी।
अरूणा की संरक्षिका पिंकी वीरानी के
अनुसार घटना के बाद से विगत 42
वर्षों से वह कोमा में थी। उसका वजन काफी घट गया था। और, उसकी हड्डियां नाजुक हो गई थीं। बिस्तर
पर पड़े रहने से कई अन्य बीमारियों ने भी उसे जकड़ लिया था। उसकी कलाइयां अंदरूनी
हिस्से की ओर ऐंठ गई थीं। उसके दांत झड़ गए थे। उसे सिर्फ़ छोटे-छोटे टुकड़ों में
ही खाना दिया जा सकता था,
जिसके जरिये वह जीवित थी। 37 वर्षों के संघर्ष के बाद संरक्षिका
पिंकी वीरानी की उम्मीदों ने भी हार मान ली, तब
उसने सुप्रीम कोर्ट में अरूणा की मृत्यु के लिए आवेदन किया था। उसने कहा कि लगातार
37 साल से कोमा में पड़ी 59 वर्षीया अरूणा शानबाग बिल्कुल
निष्क्रिय अवस्था में है,
और उसका मस्तिष्क वस्तुतः मृत हो गया
है। वह बाहरी दुनिया से बिल्कुल बेख़बर है। वीरानी ने अरूणा को इच्छा मृत्यु देने के
संबंध में दायर अपनी याचिका में कहा है कि वह न तो देख सकती है और न ही सुन सकती
है। वह न तो कुछ अभिव्यक्त कर सकती हैं और न ही किसी भी तरीके से संप्रेषण कर सकती
है। इस कारण से उसे इच्छा मृत्यु देने की अनुमति दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायमूर्ति
मार्कण्डय काटजू और तत्कालीन न्यायमूर्ति ज्ञान मिश्रा की पीठ ने विभिन्न पक्षों
की विस्तृत दलील सुनने के बाद नर्स अरूणा रामचंद्र शानबाग को इच्छा मृत्यु की
अनुमति देने के सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इच्छा मृत्यु की अनुमति
देने के विवादास्पद मुद्दे पर कई वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। ‘‘दलील के दौरान अटॉर्नी जनरल जी.ई.
वाहनवती ने कहा कि न तो किसी कानून और न ही संविधान में इच्छा मृत्यु की अनुमति
देने का कोई प्रावधान है।’’ सिसोदिया ने याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि अस्पताल कर्मी, और खासतौर पर नर्स तथा चिकित्सक विगत 37 वर्षों से अरूणा की अच्छी तरह से
देखभाल कर रहें हैं, और वे उन्हें इच्छा मृत्यु दिए जाने के
खिलाफ़ हैं। दूसरी ओर चीफ़ जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय
बेंच ने भी कहा कि हम किसी व्यक्ति को मरने की अनुमति नहीं दे सकते।’’
पूरे मामले को ध्यान से देखने पर पता
चलता है कि नर्स अरूणा रामचंद्र शानबाग अपने साथ घटित बलात्कार की घटना के बाद 42 वर्षों से कोमा में थी। ‘‘आरोपी सोहन लाल वाल्मीकि सात साल की
सज़ा काटने के बाद रिहा हो चुका है। और वह आराम की जिंदगी जी रहा है।’’
लेकिन
बलात्कार की शिकार 42 वर्षों से जिंदा लाश बनी हुई थी। इस
मामले ने अब समाज और मीडिया चिंतकों के बीच एक बहस छेड़ दी है, जिसमें तमाम सवाल जन्म ले रहें हैं; यथा-
§ क्या बलात्कारी के लिए 7 साल की सज़ा काफी है? क्या उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए?
§ क्या कोमा में पड़ी अरूणा को मरने का
अधिकार मिलना चाहिए था?
ऐसे बहुत सारे प्रश्न इस मामले पर उठते
नज़र आते हैं। उल्लेखनीय है कि इच्छा मृत्यु को साफ तौर पर मना कर दिया गया था, क्योंकि संविधान में जीने का अधिकार
है। मरने का कोई अधिकार नहीं है। इस पर मीडिया और मानवाधिकार आयोग अपनी-अपनी
भूमिका निभा रहे थें। मीडिया तरह-तरह से इस मामले को समाज के सामने रखने के लिये
संघर्ष कर रहा था। मानवाधिकार आयोग इस मामले में इच्छा मृत्यु देने का विरोध कर
रहा था। कहना गलत न होगा कि मानवाधिकार आयोग 66
वर्ष की अरूणा, जो विगत 42 वर्षों से कोमा में थीं, को न्याय दिलाने में असफल साबित हुआ
है। 7 मार्च, 2011 को न्यायालय ने अपने फैसले में अरूणा को इच्छा मृत्यु देने से इंकार
कर दिया।’’ इस आलोक में 8 मार्च, 2011 को महिला दिवस के अवसर पर इस ख़बर को लगभग सभी समाचारपत्रों ने
प्रमुखता से प्रकाशित किया। हालांकि, इस
पूरे प्रकरण में मीडिया की अपेक्षित भूमिका संतोषजनक नहीं रही है। वहीं कोमे में 42
वर्षों पड़ी अरूणा ने आखिरकार जीवन से लड़ते हुए आज अपने प्राण त्याग दिए। यह वास्तव
में एक दुखद खबर है कि 42 वर्षों से उसे जिस न्याय की तलाश थी वो उसे मरने के बाद
भी नहीं मिल सका। और न ही 42 सालों से बलात्कार के संदर्भ में आती-जाती सरकारों ने
कोई भी ठोस कानून नहीं बना पाने में सक्षम साबित हो सकी। वाह रे हमारा कानून वाह री
सरकारें................
Friday, May 8, 2015
उसके लिए ..................
उसके लिए
उसके लिए
आधी से ज्यादा जिंदगी
एक दुस्वप्न सी बीती
उसने
ना जाने कितना ही समय
एक ही साड़ी में
निपटा दिया
मांगे हुए या दिये गए
कपड़ों में
ताउम्र गुज़ार दी
घर की बड़ी बहू होते हुए भी
वो कभी ना सजी,
ना संवरी
हाथ में चार पितल की चुड़िययाँ डाले
हमेशा करछी हिलाते हुए ही मिली
ना जाने कितने ही सपने
उसके भीतर
अपनी मौत मर गए
पलंग का एक कोना पकड़े हुए
कभी खुद पर हँसती
कभी खुद पर रोती
बहुत बार खुद पर नाराज़ होती
नज़र आ जाती थी
अच्छे दिनों की आस में
उसका
पल पल बीत गया
दहेज का भी समान
धीरे धीरे हाथ से
फिसल गया
ना कोई अच्छा दिन आया
ना इज्ज़त ना सम्मान मिला
पर उम्मीद और इंतज़ार का
एक बड़ा सा पहाड़
काटने को मिल गया
कुछ खास सी
';दिव्य'; थी वो मेरे लिए
उसके टूटे-फूटे ब्यान
आज भी दर्ज है
मेरी यादों में
उसका चलना, बैठना,उठना
बात बात पर बिदकना
और फिर मान जाना
ऐसी ही बहुत सी संभव बाते
जो वो किया करती थी
आज भी अंकित है
स्मृतियों में मेरी
मेरे रीति -रिवाजों की तरह ||
गुल्लक
गुल्लक
गुल्लक कुछ यादों की
कुछ बातों की
गुल्लक याद दिलाती है
बचपन की
गुल्लक
जो अहसास है
उस वक़्त का जब
अपने बुजुर्ग,
जेब की रेजगारी
उस में डाल दिया करते थे
आज ना वो बुजुर्ग है और ना ही
वो रेजगारी
गुल्लक
जो अहसास है
मेरी उन यादों का
जिस में कभी खुशी के पल
तो कभी उदासी डालती थी
कभी पैसे की कमी
तो कभी आभाव की बातें
डाला करती थी
कभी बसंत के रंग
तो कभी होली की हुड़दंग
कभी कंजकों की जोड़-तोड़
कभी राखी के धागो का बंधन
तो कभी दीवाली की खुशी
सभी हिस्सा है मेरी
गुल्लक का
पहली गुल्लक
मिट्टी की
जो, मन की हर छोटी छोटी इच्छा पर
टूट जाती थी
दूसरी गुल्लक
वो चाबी वाली
जिसकी चाबी
कभी माँ तो कभी भाई के
हाथो में रहती थी
और वक़्त पड़ने पर
जुगाड़ पॉलिसी ही काम आती थी
और ये तीसरी गुल्लक
एक सफ़ेद चादर सी
मेरी यादों की
जहां सिर्फ
मेरा ही आवागमन है
यहाँ जीवन है
बारिश की बूंदों सा
जीवन के रंगो की
खूबसूरती का
उसकी लय-ताल का
मेरी हर खुशी का
और मेरी हर मुस्कान का
जो कैद है
मेरी इस गुल्लक में |
सभार-- अंजु चौधरी अनु
गांधारी तुम आज भी जीवित हो
गांधारी तुम आज भी जीवित हो
जब भी आज किसी बेटे से कोई
अपराध हो जाता है
हर किसी की सोच में
गांधारी....
तुम आज भी जीवित हो जाती हो
घटना दुखद तो
उस के प्रतिफल मे
तुम आज भी
खून के आँसू बहाती हो |
आलोचना,प्रतिवाद
रिश्तों के नागफणी के
जंगल में
रिश्तों का तार-तार
होना
उसके दर्द में,
गांधारी
तुम आज भी दर्द से तड़पती हो |
एक पात्र जो रच दिया
इतिहास ने
वो अपने आप में
बार बार दोहराया जाता है
कपटी-कुटिल समाज में
इतनी कठिन परीक्षाओं के
बाद भी
ज़रा सी गलती के उपरांत
बेटे को दुर्योधन
और माँ को गांधारी बना दिया जाता है
हाँ....सच है ...मैं डरती हूँ
गांधारी बनने से
क्यों कि
आज के वक्त में
मैं भी बेटों की माँ
हूँ
इस लिए किसी भी हाल में
समाज के चलन और बुराइयों को
नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकती
तभी तो मुझे भी
किसी के बेटे की गलती पर
गांधारी सा देखा जाता है ||
एक लीला ऐसी भी
एक लीला ऐसी भी
(राधा और कृष्ण का प्रेम ...जहाँ एक ओर राधा अपने
प्रेम भावनाओं में बह रही हैं ...अपने मन के भाव को कृष्ण के साथ बाँट रही
है...वहीँ दूसरी ओर वो अपने मन और कृष्ण को ये समझाने में असमर्थ है कि वोउ नके
जाने पर कितनी दुखी है ...प्रेम और जुदाई के भाव को लेकर लिखी गई रचना )
(प्रेम के भाव )
मंद मंद समीर की
सूर्योदय बेला में
शीतल स्पर्श से तुम्हारे
पुलकित है मन मेरा |
मधुर भरी रजनी की
अलसायी आँखों में
सुरभित झोंकों से
गुंजित है बांसुरी-वंदन
तुम्हार |
वायु के मृदु अंक में
खिली हर कली कली
मधुर संगीत की धुन पर
भ्रमर, ये अंग अंग मेरा |
खुले आकाश तले
तुम्हारी ,हथेलियों पर रख कर
सर अपना
झूमती हूँ मैं पल पल ||
(और जुदाई के वक्त )
कैसे कहूँ अब तुम से
विचलित हूँ जाने से
तुम्हारे ,
झुलस जाऊँगी विरह
कुछ किरण,कुछ धूप
कुछ पकड़ में आने लायक
तुम्हारा ये छलिया रूप
कुछ मंद ,कुछ तेज
यह संगम कैसे समझाऊं
मैं |
तुम्हारे प्रेम की अग्नि में
तप गई मैं प्रेम दीवानी
किसको अब दिखलाऊं मैं |
भस्म हुई फिरती हूँ,
कैसे तुम्हें समझाऊं मैं |
हे प्रभु ! क्यों इतना
स्नेह बरसाते हो
कि मन भ्रमित हो जाता
है और
फिर,रिमझिम नैना बरसते हैं |
माना,मैंने
एक दृष्टि तुम्हारी
हर लेती है हर पीड़ा
मेरी
क्यों अब इन नैनो को
उम्र भर ...राह ताकने
की
सजा दिए जाते हो |
जितनी भीगी प्रेम में तुम्हारी
उतना ही अब शुष्क किए
जाते हो
होठों पर कैसे लाऊं
करुण पुकार मैं अपनी
उम्र भर का इंतज़ार, अब तुम्हारा
क्यों मुझे दिए जाते हो ?
कैसे बतलाऊं तुम्हें ,
न दिन,न रात
साँझ की बेला में घटी
ये बात
तुम्हारी ये निशब्द सी
लीला
और उम्र भर का वियोग
तुम्हारा
मुझे असहनीय पीड़ा दिए
जाता है
कैसे कहूँ अब तुम से कि
विचलित हूँ तुम्हारे
जाने से
कैसे कहूँ अब तुम से कि
विचलित हूँ तुम्हारे
जाने से ||
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