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Monday, May 18, 2015

अलविदा...................अरूणा रामचंद्र शानबाग

अलविदा...................अरूणा रामचंद्र शानबाग

अरूणा रामचंद्र शानबाग को लोग शायद समय के साथ-साथ भूल गये। या फिर बहुतों को आज भी उसके साथ घटित घटना के बारे में याद होगा। ‘‘अरूणा शानबाग वह महिला थी, जिसने लोगों की देखभाल के लिए 1966 में के.ई.एम. अस्पताल में नर्स के पेशे को चुना।’’  उसी अस्पताल में सफाई के तौर पर कार्यरत एक सफाई कर्मी सोहन लाल वाल्मीकि, ने 27 नवम्बर, 1973 को अरूणा पर हमला किया। और, उसके साथ बलात्कार की घटना को अंज़ाम दिया।’’  घटना के दौरान बलात्कारी ने अरूणा के गले को कुत्ता बांधने वाली जंजीर से बांध दिया और, उसे पकड़कर खिचने की वजह से अरूणा के मस्तिष्क से ऑक्सीजन की आपूर्ति रूक गई तथा कार्टेक्स को क्षति पहुंची। परिणामस्वरूप, वह कोमा में चली गयी। अरूणा को इलाज के लिए के.ई.एम. अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन, अच्छे-से-अच्छे डॉक्टर भी उसे कोमा से बाहर न निकाल सके। तब से अरूणा शानबाग मुसलसल वार्ड नं. 4 में जिंदा लाश की तरह पड़ी थी।
अरूणा की संरक्षिका पिंकी वीरानी के अनुसार घटना के बाद से विगत 42 वर्षों से वह कोमा में थी। उसका वजन काफी घट गया था। और, उसकी हड्डियां नाजुक हो गई थीं। बिस्तर पर पड़े रहने से कई अन्य बीमारियों ने भी उसे जकड़ लिया था। उसकी कलाइयां अंदरूनी हिस्से की ओर ऐंठ गई थीं। उसके दांत झड़ गए थे। उसे सिर्फ़ छोटे-छोटे टुकड़ों में ही खाना दिया जा सकता था, जिसके जरिये वह जीवित थी। 37 वर्षों के संघर्ष के बाद संरक्षिका पिंकी वीरानी की उम्मीदों ने भी हार मान ली, तब उसने सुप्रीम कोर्ट में अरूणा की मृत्यु के लिए आवेदन किया था। उसने कहा कि लगातार 37 साल से कोमा में पड़ी 59 वर्षीया अरूणा शानबाग बिल्कुल निष्क्रिय अवस्था में है, और उसका मस्तिष्क वस्तुतः मृत हो गया है। वह बाहरी दुनिया से बिल्कुल बेख़बर है। वीरानी ने अरूणा को इच्छा मृत्यु देने के संबंध में दायर अपनी याचिका में कहा है कि वह न तो देख सकती है और न ही सुन सकती है। वह न तो कुछ अभिव्यक्त कर सकती हैं और न ही किसी भी तरीके से संप्रेषण कर सकती है। इस कारण से उसे इच्छा मृत्यु देने की अनुमति दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट के तत्‍कालीन न्यायमूर्ति मार्कण्डय काटजू और तत्‍कालीन न्यायमूर्ति ज्ञान मिश्रा की पीठ ने विभिन्न पक्षों की विस्तृत दलील सुनने के बाद नर्स अरूणा रामचंद्र शानबाग को इच्छा मृत्यु की अनुमति देने के सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इच्छा मृत्यु की अनुमति देने के विवादास्पद मुद्दे पर कई वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। ‘‘दलील के दौरान अटॉर्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने कहा कि न तो किसी कानून और न ही संविधान में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने का कोई प्रावधान है।’’  सिसोदिया ने याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि अस्पताल कर्मी, और खासतौर पर नर्स तथा चिकित्सक विगत 37 वर्षों से अरूणा की अच्छी तरह से देखभाल कर रहें हैं, और वे उन्हें इच्छा मृत्यु दिए जाने के खिलाफ़ हैं। दूसरी ओर चीफ़ जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच ने भी कहा कि हम किसी व्यक्ति को मरने की अनुमति नहीं दे सकते।’’ 
पूरे मामले को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि नर्स अरूणा रामचंद्र शानबाग अपने साथ घटित बलात्कार की घटना के बाद 42 वर्षों से कोमा में थी। ‘‘आरोपी सोहन लाल वाल्मीकि सात साल की सज़ा काटने के बाद रिहा हो चुका है। और वह आराम की जिंदगी जी रहा है।’’  लेकिन बलात्कार की शिकार 42 वर्षों से जिंदा लाश बनी हुई थी। इस मामले ने अब समाज और मीडिया चिंतकों के बीच एक बहस छेड़ दी है, जिसमें तमाम सवाल जन्म ले रहें हैं; यथा-
§  क्या बलात्कारी के लिए 7 साल की सज़ा काफी है? क्या उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए?
§  क्या कोमा में पड़ी अरूणा को मरने का अधिकार मिलना चाहिए था?
ऐसे बहुत सारे प्रश्न इस मामले पर उठते नज़र आते हैं। उल्लेखनीय है कि इच्छा मृत्यु को साफ तौर पर मना कर दिया गया था, क्योंकि संविधान में जीने का अधिकार है। मरने का कोई अधिकार नहीं है। इस पर मीडिया और मानवाधिकार आयोग अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे थें। मीडिया तरह-तरह से इस मामले को समाज के सामने रखने के लिये संघर्ष कर रहा था। मानवाधिकार आयोग इस मामले में इच्छा मृत्यु देने का विरोध कर रहा था। कहना गलत न होगा कि मानवाधिकार आयोग 66 वर्ष की अरूणा, जो विगत 42 वर्षों से कोमा में थीं, को न्याय दिलाने में असफल साबित हुआ है। 7 मार्च, 2011 को न्यायालय ने अपने फैसले में अरूणा को इच्छा मृत्यु देने से इंकार कर दिया।’’  इस आलोक में 8 मार्च, 2011 को महिला दिवस के अवसर पर इस ख़बर को लगभग सभी समाचारपत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। हालांकि, इस पूरे प्रकरण में मीडिया की अपेक्षित भूमिका संतोषजनक नहीं रही है। वहीं कोमे में 42 वर्षों पड़ी अरूणा ने आखिरकार जीवन से लड़ते हुए आज अपने प्राण त्‍याग दिए। यह वास्‍तव में एक दुखद खबर है कि 42 वर्षों से उसे जिस न्‍याय की तलाश थी वो उसे मरने के बाद भी नहीं मिल सका। और न ही 42 सालों से बलात्‍कार के संदर्भ में आती-जाती सरकारों ने कोई भी ठोस कानून नहीं बना पाने में सक्षम साबित हो सकी। वाह रे हमारा कानून वाह री सरकारें................


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