सरोकार की मीडिया

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Friday, October 26, 2012

समलैंगिकता का समाजशास्त्र


समलैंगिकता का समाजशास्त्र


ब्रिटिश सरकार द्वारा 1860 में बनाई गई भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को भारत में दंडनीय अपराध बनाया गया। धारा 377 के अंतर्गत यह इंगित किया गया कि कोई पुरुष, स्त्री, या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वैच्छया इन्द्रीय भोग नहीं करेगा, यदि वह इन कृत्यों में पाया जाता है तो आजीवन कारावास (जिसकी अवधि दस वर्ष तक की होगी) दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
भारत में इस धारा के अन्तर्गत न केवल पुरुष समलैंगिकता को अपितु किसी स्त्री या पशु के साथ भी अप्राकृतिक मैथुन को अत्यन्त गंभीर अपराध मानते हुए भारी दंड से दंडित करने का प्रावधान है। जबकि ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और अमरीका में इस तरह के अपराधों मानने वाले कानूनों को समाप्त किया जा चुका है।
समलैंगिकता की दृष्टि से देखा जाए तो इसका उद्भव प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में मृत्यु के भयानक तांडव को देखकर पश्चिम के लोग यह सोचकर भोगवादी हो गए कि जब जीवन का कोई ठिकाना ही नहीं है तब फिर नैतिकता को ताक पर रखकर क्यों नहीं जीवन का आनंद लिया जाए? इस सोच ने बड़ी तेजी से वहां के समाज में यौन-स्वच्छंदता को मान्यता प्रदान करने में मदद की। और इसी सोच से जन्म हुआ सार्वजनिक-समलैंगिकता के इस विषवृक्ष का। बेशक कहा जा सकता है कि समलैंगिक व्यवहार पहले भी समाज में प्रचलित था लेकिन ढके-छिपे रूप में, खुलकर समाज में प्रचलन नहीं था।
इस आलोच्य में कहें तो समलैंगिकता भारतीय समाज से निकल कर नहीं आई है। समलैंगिक की पृष्ठभूमि और तौर-तरीके से ही साफ स्पष्ट होता है कि इसकी प्रेरणा यूरोपीय या पश्चिमी समाज से आई है। उनके व्यवहार से साफ प्रतीत होता है कि यह एक ऐसे समाज की देन है जिसमें विषमता और असमानता के ज्यादा बुनियादी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलू लगभग हल कर लिए गए हैं। यह एक ऐसे समाज की समस्या लगती है जो सहज उपभोग से अघाया हुआ समाज है और स्वाभाविक संवेदनों से इतना ऊब गया है कि उसे नित नए और सनसनीखेज उपायों की जरूरत महसूस होती है। यह सनसनीखेज सोच पश्चिमी समाज समलैंगिकों की समानता की लड़ाई लड़ सकता है। परंतु भारतीय समाज में व्याप्त भुखमरी, बेरोजगारी और सब तरह की मजबूरियों में किसी प्रकार जीते हुए रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई लड़ने वाले अधिसंख्य लोग समलैंगिकों की समानता की लड़ाई नहीं लड़ सकते। लेकिन पश्चिमी में भी ईसाइयत ने अगर लैंगिक और मैथुनिक संबंधों पर इतना कट्टर रवैया नहीं अपनाया होता तो वहां भी समलैंगिकों को ऐसा संघर्ष नहीं करना पड़ता।
इस मामले में मीडया पर हुई बहस का विश्लेषण करें तो  वहां पर सवाल कुछ ऐसे ढंग से उठाए गए कि समलैंगिकों और समलैंगिकता का समर्थन करना प्रगतिशीलता और विकसित होने का सबूत हो और जो लोग सहज प्रकृतिक स्त्री पुरुष लैंगिकता का आग्रह कर रहे हों वे पुराणपंथी और पारंपरिक किस्म के घटिया लोग हों। इससे बड़ी मानसिक विकृति कोई हो नहीं सकती। किसी भी सभ्यता संस्कृति ने समलैंगिकता को प्राकृतिक मान कर उसका उत्सव नहीं मनाया.
लेकिन मीडिया इसे कुछ ऐसे पेश करता है जैसे समलैंगिकता को स्वीकार करना विकसित होना है। पश्चिम में यूरोप के विकसित समाज ने इसे मंजूर किया है तो यह निश्चित ही तरक्की की निशानी है। जो कि यूरोपीय समाज का धर्म है वहां के लोगों के मन में समलैंगिकता पर कैसी वितृष्णा भर रखी है और वहां इस वर्जना से मुक्त पाना कैसी स्वतंत्रता है। अगर कहा जाए तो भारत में पहले तो धर्म ही संगठित नहीं है फिर भी स्थानीयता और व्यक्तिमत्तता को बहुलता और विविधता ने खूब अच्छी तरह समो रखा है। ध्यातव्य है कि महाभारत के महावीर अर्जुन को जब पांडवों के वनवास में छद्म रूप में रहना था तो वे बृहन्नला बन कर रहे।
लेकिन मीडिया भारतीयता को भी पश्चिमी और अंग्रेजी रास्ते से ही स्वीकार करता है। और जब तक यूरोप और अंग्रेजी-समलैंगिकता और नपुंसकता की भारतीय समाज व्यवस्था में जगह को परिभाषित नहीं करती तब तक हम उन्हें ईसाइयत की नजर से ही देखते जाएंगे। हमारा यह दृष्टि दोष ही हमें यूरोप के सेकुलरज्म और भारत के सर्व धर्म समानत्व का अंतर नहीं समझने देता। ऊपर मैंने कहा है कि समलैंगिक समानता की भारतीय लड़ाई की प्रेरणा यूरोप में है तो इसीलिए कि मीडिया में भारतीय समलैंगिकता-नपुंसकलिंगता की समझ नहीं है। इसीलिए ऐसे वाक्य लिखे गए कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से भारत का भूमंडलीकरण हो गया और हम उन विकसित देशों की सूची में आ गए जो समलैंगिकता को अपराध नहीं मानते। यह कहने का मतलब यह भी नहीं कि भारतीय समाज समलैंगिकता को स्वीकार करता तो बल्कि भारतीय समाज में भी इसको सदियों से निषेध माना गया है।
जिसके के विरोध में नाज फौन्डेशन इंटरनैशनल नामक संस्था और समलिंगी अधिकारों के लिए काम करने वाले कुछ संगठनों ने पिछले कुछ समय से एक आन्दोलन छेड़ रखा है जिसने एक नयी बहस शुरू की है और जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी चल रही है। नाज फाऊंडेशन इंट. ने भारतीय दंड विधान की धारा 377 को अभियोज्य-अपराधमुक्त decriminalize करने की वकालत की है। और उन्होंने दलीले दी कि;-
·        आपसी सहमती से बनाया गया समलिंगी संबंध व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
·        समलिंगी संबंध प्राकृतिक और सामान्य है।
·        समलैंगिक को अधिकार है एक सामान्य नागरिक की तरह जीने और सुरक्षा का।
·        समलैंगिक एक अल्पसंख्यक समूह हैं।
·        विश्व में कई जगहों पर समलैंगिकता को मान्यता प्राप्त है और ऐसा भारत में भी होना चाहिए
इस विरोध के विपक्ष में गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि भारतीय संस्कृति में समलैंगिक सेक्स की इजाजत नहीं दी जा सकती। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने समलैंगिक संबंधों को अत्यंत ‘‘अनैतिक’’ और ‘‘सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ’’ करार देते हुए इन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने का उच्चतम न्यायालय में कड़ा विरोध किया। मंत्रालय की ओर से पैरवी कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने दलील दी कि भारतीय समाज अन्य देशों से भिन्न है और यह विदेशों का अनुकरण नहीं कर सकता। वहीं दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दो मर्द या औरत अगर अपनी सहमति से बंद कमरे के भीतर समलैंगिक यौन संबंध बनाते हैं तो ये अपराध नहीं है। हाई कोर्ट की इस घोषणा से पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत ऐसे संबंध बनाए जाने पर कड़ी सजा का भी प्रावधान था। इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने कहा था कि समलैंगिक रिश्ते बनाना कुदरत के खिलाफ है और इसे आपराधिक जुर्म करार दिया जाना चाहिए।
इसके पक्ष में उच्च न्यायालय ने कहा कि समलैंगिकता को बदलते समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। पीठ ने ‘लिव इन रिलेशनशिप’, ‘सिंगल पेरेंट’ और ‘सरोगेसी’ (किराए की कोख) का हवाला देते हुए कहा था कि पहले देश में बहुत सी चीजें जो पहले अस्वीकार्य थीं, अब समय के साथ स्वीकार्य हो गई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आते ही देश में कोई दर्जन भर समलिंगी विवाह हो चुके हैं, जिससे यहां का सामाजिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक ढांचे के चरमरा जाने का भय उत्पन्न हो गया है और प्रबुद्ध समाज स्वाभाविक रूप से बहुत चिंतित हो गया है।
इस संदर्भ में आरएमएल हॉस्पिटल में सायकायट्री डिपार्टमंट की अध्यक्ष डॉ. स्मिता देशपांडे कहती हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी ऐसा होता था, लेकिन तब कोई खुलकर बात नहीं करता था। लेकिन अब पश्चिमी देशों में इसे मान्यता मिलने के बाद लोग खुलकर सामने आने लगे हैं, और यह सही भी है, क्योंकि अगर कोई बात नहीं करेगा तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता है।
मेरे दृष्टिकोण से कहा जाए तो समलैंगिकता एक नैतिक असंतुलन है, एक अपराध और दुराचार है। इसमें संदेह नहीं कि यह बुराई मानव समाज में सदियों से मौजूद है। इनके उन्मूलन के प्रयास किये जाने चाहिए, न कि इन्हें सामाजिक स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए। कोई भी व्यक्ति जन्म से ही समलैंगिक नहीं होता, बल्कि लोग उचित मार्गदर्शन के अभाव में ये बुराइयां सीखते हैं। किशोरावस्था में अपनी नवीन और तीव्र कामेच्छा पर नियंत्रण न पाने के कारण ही लोग समलिंगी दुराचारों का शिकार हो जाते हैं ।
इस आलोच्य में समलैंगिकता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए खतरनाक है। यह एक घातक रोग (एड्स) का मुख्य कारण है। इसके अलावा यह महिला और पुरुष दोनों के लिए अपमानजनक भी है। भारतीय संस्कृति एक पुरुष को पुरुष और एक महिला को महिला बने रहने की शिक्षा देता है, जबकि समलैंगिकता एक पुरुष से उसका पुरुषत्व और एक महिला से उसका स्त्रीत्व छीन लेता है। यह अत्यंत अस्वाभाविक जीवनशैली है। जिस कारण समलैंगिकता पारिवारिक जीवन को विघटन की ओर ले जा रहा है।

Monday, October 22, 2012

क्यों पुरूष हैवान बन जाता है........?????


क्यों पुरूष हैवान बन जाता है........?????

समाज के साथ-साथ समूची स्त्री जाति कारण जानना चाहती है कि आखिर पुरूष हैवान कैसे बन जाता है। इस विवादस्पद प्रश्न का जबाव कोई और नहीं स्वयं स्त्री जाति बता सकती है, कि वो कौन-से मूल करण हैं जिसकी वजह से एक पुरूष हैवान बन जाता है। मेरा इस तरह से समूची स्त्री जाति पर प्रश्न उठाना, शायद किसी को भी अच्छा न लगें। लग भी कैसे सकता है, क्योंकि स्वयं हमने मानव को दो भागों में विभाजित कर दिया है-एक पुरूष, दूसरा स्त्री। इस तरह का विभाजन आज या आज से 100 वर्ष पुराना नहीं है यह विभाजन तो पूर्व से ही चला आ रहा है। जिस प्रकार से जाति व्यवस्था सदियों से चली आ रही है ठीक उसी प्रकार। हां यह बात सही है कि वक्त की हवाओं ने कुछ परिवर्तन जरूर किए हैं परंतु उतने नहीं जितने होने चाहिए थे।
अगर समूची स्त्री जाति पर हो रहे अत्याचारों को जाति व्यवस्था से जोड़कर देखा जाए तो आज भी कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य किसी दलित जाति के व्यक्ति को ऊपर उठते नहीं देखना चाहता, वह तो यही चाहता है कि जिस तरह से सदियों से हम उन पर अत्याचार करते आए हैं और यह लोग बिना किसी विरोध के हमारा हुक्त मानते आए हैं यही परंपरा चलती रहनी चाहिए। ठीक इसी प्रकार समूचा पुरूषवादी समाज भी यही चाहता है कि एक स्त्री जिस प्रकार सदियों से उसकी उंगलियों पर कठपुतली की भांति नाचती आई है उसी तरह नाचती रहे। और पुरूष उसका जब चाहे शोषण कर सकें बिन किसी रोक-टोक के। क्योंकि पुरूष प्रधान समाज में ऐसा हमेशा से होता आया है।
मैं पुनः यह कहना चाहता हूं कि वक्त की हवाओं ने कुछ परिवर्तन जरूर किए हैं जिसे हम पश्चिमी सभ्यता की देन मानते हैं और यह परिवर्तन चाहे स्त्री जाति हो या पुरूष जाति, दोनों में देखा जा रहा है। एक कहावत यहां यथार्थ होती है कि लोग अच्छी चीजों की अपेक्षा बुरी चीजों को जल्द ही ग्रहण कर लेते हैं। हुआ भी वही, पश्चिमी सभ्यता से हमने अपने अधिकारों के प्रति सचेत और ज्ञान को कम स्वीकार किया है। इसके बाबत हमने वहां पनप रही नग्नता को पूरी तरह अपनी हवाओं में मिला लिया है। आज समाज के चारों तरह नग्नता का नाच मचा हुआ है। फिल्मों के रंगीन पदों से लेकर शादी से पहले प्रेम प्रसंग में प्रेमी की बांहों तक नग्नता आसानी से देखी जा सकती है। बाग-बगीचे, होटल, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में भी, वो भी बिना किसी रोक-टोक के।
मेरी बात परे बहुत से लोग असहमत होगें, परंतु यदि वो मेरे विरोध में खड़ा होना चाहते हैं तो पहले एक सर्व करके आए कि देश कि राजधानी दिल्ली में कितने प्रेमी युगल हैं, कितनों का पहला प्यार है और कितनों का..........??????? और तो और इस प्रेम प्रसंग की पृष्ठभूमि की धरातल कितनी गहरी है यह भी पता लगा कर आए। हकीकत से स्वतः रूबरू हो जाएंगे। यह मैं केवल राजधानी के परिप्रेक्ष्य में नहीं कह रहा हूं अपितु संपूर्ण भारत के परिदृश्य के बारे में कह रहा हूं कि प्यार के नाम पर क्या-क्या हो रहा है।
यहां एक वाक्या आपको बताना चाहूंगा कि एक विश्वविद्यालय में बाहर से आईं स्त्री चिंतक और विश्लेषक महोदया जिसका मैं नाम भूल रहा हूं उनसे मैंने एक प्रश्न किया था जिसका उत्तर उन्होंने घुमा-फिरा कर अपूर्ण ही दिया। शायद वो मेरे प्रश्न से सरोकार नहीं रखना  चाहती थीं या स्त्री होकर स्त्री जाति पर ही सार्वजनिक जगह पर सवालिया निशान लगाने में खुद को असहज महसूस कर रही होगीं। सवाल आप सभी के समक्ष रख रहा हूं कि जब लड़का-लड़की समाज से परे होकर प्रेम-प्रसंग में कसमें-वादें खाते हैं जब तक यह प्यार ही होता है। ज्यों ही यह समाज की नजरों में आता है यह प्यार बलात्कार में तब्दील हो जाता है। एक ही पल में इतना बड़ा बदलाव, आखिर कैसे? और कैसे एक लड़की अपने प्रेमी पर ही बलात्कार का संगीन आरोप लगा सकती है समझ से परे है।
मैं मानता हूं कि स्त्रियों का शोषण होता है। उनके पैदा होने से लेकर बड़े होने तक उन पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते हैं। परंतु यह सिक्के का एक मात्र पहलू ही है। क्योंकि हमस ब आंकड़ों के खेल में फंस जाते हैं और उसी दृष्टिकोण में देखने व सोचने लगते हैं। जैसा यह आंकड़ें हमें दिखाना चाहते हैं। वैसे सर्वे और आंकड़ों की हकीकत से सभी बुद्धजीवी भलीभांति परिचित होगें कि कैसे आंकड़ें एकत्रित किए जाते हैं। सर्वे कराने वाली संस्था और करने वाली संस्था दोनों अपने ही मुताबिक आंकड़ों को एकत्रित करती है बाकि उनका किसी से भी कोई सरोकार नहीं होता।
पुरूष के स्त्री के प्रति हैवान बनने की तो मैं पूर्णतः पश्चिमी सभ्यता को दोषी नहीं मानता, पश्चिमी सभ्यता के साथ-साथ आज की शिक्षा व्यवस्था व मां-बाप को भी बराबर का दोषी मानता हूं। क्योंकि जिस तरह मां-बाप और गुरूजनों का ध्यान बच्चों से विमुक्त हो चुका है। यह सभी जान रहे हैं। बच्चें क्या कर रहे हैं, कहां जा रहे हैं, किसके संपर्क में हैं खुद मां-बाप को ही मालूम नहीं होता। ठीक है आजादी है सभी को स्वतंत्र रहने की आजादी है। परंतु यह अश्लीलता की आजादी, कैसी आजादी है? जनसंचार माध्यमों द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता और आस-पास के वातावरण के कारण तन पर कपड़ें दिनों-दिन छोटे-से-छोटे होते जा रहे हैं। लड़कियों का भी कहना है कि जो दिखता है सो बिकता है। यदि दिखाएंगे नहीं तो लड़के उनके प्रति आकर्षित कैसे होगें?
अब रही बात पुरूष के हैवान बनने की तो शारीरिक बदलाव के दृष्टिकोण से देखे तो पुरूष किसी भी आकर्षित वस्तु के प्रति जल्द ही उतेजित होने लगता है। ज यह उतेजना धीरे-धीरे अपनी चरम सीमा पार करने लगती है तब पुरूष का दिमाग स्वयं के वश में नहीं होता और वह हैवान बन जाता है। इस हैवानियत में वह यह तक भूल जाता है कि वह क्या करने जा रहा है। जिसका बाद में उसे पछतावा भी होता है। इसके साथ-साथ एक कारण और जो मेरी समझ में आ रहा है कि जब तक प्यार के नाम पर एक पुरूष की शारीरिक पूर्ति होती रहती है तब तक कुछ नहीं होता। ज्यों ही उसकी प्रेमिका या जिस के साथ संबंध है वह उससे अलग होती है और पुरूष की शारीरिक पूर्ण होनी बंद हो जाती है तब वह हैवान बनने लगता है। क्योंकि यह भी एक तरह का नशा है जो आज की युवा पीढ़ी की रगों में कम उम्र में ही घुल जाता है। पर कैसे, यह मुझें अभी तक पता नहीं चला।
इतना सब लिखने के बाद मैं स्त्रीवादी चिंतकों से एक सवाल करना चाहता हूं कि पुरूष के हैवान बनने के पीछे सबसे पहले किसे वह कठघरे में खड़ा करेंगी। प्यार को, समाज को, पश्चिमी सभ्यता को, शिक्षा व्यवस्था को, संचार माध्यमों को, कानून व्‍यवस्‍था को, पुरूषवादी सोच को, मां-बाप को या फिर स्वयं स्त्री अपने आप को।

Saturday, October 13, 2012

मीडिया दलालीकरण और भावी सरकार


मीडिया दलालीकरण और भावी सरकार
मीडिया का काम आमतौर पर समाज में स्थापित कुरूतियों, विसमताओं और समाज में के हर तबके तक सूचना पहुंचना, उन्हें शिक्षित व मनोरंजन करना भी है। यह एक सरल परिभाषा के दायरे में आती है फिर भी देखा जा सकता है कि मीडिया को दी गई यह सरल परिभाषा में भी परिवर्तन हो चुका है। मीडिया जनमत तैयार करने, निर्णय सुनाने, प्रोपेगेंडा फैलाने, अश्लीलता को बढ़वा देने, राजनेताओं का बखान करने, साथ-ही-साथ कुरूतियों का इस तरह महिमामंडन करके दिखाया जाना इनके लिए आम बात हो चुकी है। जिस पर समय-समय पर उंगलियां उठती रही हैं। परंतु कभी हमने इसके पीछे चल रहे या चलाए जा रहे संस्थाओं के दलालीकरण की पृष्ठभूमि पर विचार विमर्श नहीं किया, कि समय के परिवर्तन के साथ इन संस्थाओं में भी बदलाव आ सकता है। नहीं आना चाहिए फिर भी यह परिवर्तन अपने तीव्रवेग से चल रहा है।
वैसे मीडिया पर समय-समय पर बहुत से कानून लागू किए गए, जिनका पालन करना इस संस्थानों ने कभी मुनासिब नहीं समझा। इसके लिए भारतीय पे्रस परिषद के अध्यक्ष और सदस्य ने भी ज्यादा जोर नहीं दिया कि वह इन कानून का पालन क्यों नहीं कर रहे हंै! शायद जरूरत ही महसूस नहीं होती। दूसरी तरफ अपने आप को लोकतंत्र का चैथा खंभा कहलाने वाला मीडिया छुट्टा सांड की भांति दौड़ा जा रहा है बिना किसी लगाम के। वहीं सरकार ने भी इस सांड पर काबू करने का अपना फैसला त्याग दिया है। इसमें भी सरकार का अपना हित छिपा हुआ है। क्योंकि सरकार की गर्दन (नेता, राजनेता और भ्रष्टाचारियों) खुद फंसी हुई है जिसकी लगाम इन मीडिया संस्थानों के हाथों में दिखाई दे रही है। जिस दिशा में यह मोड़ना चाहते हैं उस दिशा में मोड़ दिया जाता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में उल्टी गंगा बह रही है। जिस पर जिसका नियंत्रण होना चाहिए वह छुट्टा और जिस पर नहीं वह मीडिया के इसारे पर मुजरा कर रहा है। अगर आज के परिप्रेक्ष्य में सरकार को रखैल की संज्ञा से सुशोभित किया जाए तो मेरे मित्रों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि मैं जनता हूं कि मेरे बहुत सारे मित्रगण किसी-न-किसी पार्टी से सरोकार रखते हैं और बहुत से मित्रों के सिर पर किसी-न-किसी राजनेताओं का हाथ बना हुआ है। अगर मेरे मित्रगण यह आरोप लगाए कि मैं सरकार के खिलाफ इस तरह के आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कैसे कर सकता हूं तो यहां यह भी बता दूं कि मैं, मीडिया से सरोकार रखता हूं। बावजूद इसके मैं, मीडिया के क्रिया-कलापों पर समय-समय पर प्रश्न चिह्न लगाता रहता हूं तो सरकार इससे कैसे अछूती रह सकती है।
अभी दो-तीन दिन पहले प्राइम टाइम पर प्रसारित हो रही एक खबर का मैंने विश्लेषण किया जिसको लगभग सभी समाचार प्रेमी और राजनैतिक घरानों व पार्टियों से सरोकार रखने वाले लोगों ने देखा होगा। खबर हमारे लल्ला की दिखाई जा रही थी जो पंजाब विश्वविद्यालय के मंच से अपने मुखारबिंदु से अच्छे-अच्छे प्रवचन दे रहे थे कि विपक्षी पार्टियां उनकी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को लागू नहीं होने देती या उन्हें विकास के लिए काम नहीं करने देती। बड़ी आश्चर्यचकित बात है जिनकी अम्मा के हाथों में देश की कमान हो वही यह राग अलापेंगे तो कैसे काम चलेगा। अगर यह विकास की बात करें तो 8 साल में देश के विकास का पहिया वहीं के वहीं स्थिर है। जिसका ढीकरा यह व उनकी पार्टी विपक्षी दलों पर फोड़ रहे हैं। परंतु वह यह भूल रहे हैं कि चाचा मनमोहन की सरकार के कार्यकाल में (शुरू से लेकर अब तक) कितने घोटाले हुए, और कितनी बार जनता का उनकी पार्टी ने खून चूसा। इस बात पर सभी का मुंह सील जाता है। यह सरकार नहीं मच्छर है जो गरीब जनता का खून चूस रही है। क्योंकि इस कमरतोड़ मंहगाई के कारण यह दो वक्त की रोटी का गुजारा भी नहीं कर सकते। तब तक मच्छर मारने की दवा का कैसे प्रयोग कर सकते हैं। हां हो यह सकता है कि इस मंहगाई की मार से बचने के लिए वह मच्छर मार दवा का ही सेवन कर ले ताकि यह मच्छर दुबारा कभी खून न पी सकें।
इस परिप्रेक्ष्य में कहें तो हमारे देश के लल्ला अपने प्रवचनों के समय यह भी भूल गए कि उनके जीजाजी श्री पर भी अब आरोप लग चुके हैं। फि भी इस मुद्दे पर बोलने की वजह वह अपने मियां मिट्ठू बनते रहे। सही बात है रात में गुनाह करने वाला दिन के उजाले में अपने आप को हमेशा साहूकार ही बताता है।
इस तरह की खबरों को मीडिया ही महिमामंडन करके दिखाता है क्योंकि यह उनके लिए बड़ी खबर का काम करती है। टीआरपी बढ़ाने का काम करती है। वह यह भूल जाते है कि वह ही हैं जो किसी को रातोंरात शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा भी सकता है और उसका नामोनिशान की मिटा सकता है। फिर भी मीडिया संस्थाओं के लोग इनकी डाली गई हड्डियों पर जीभ ललचाकर आश्रित हो जाते हैं और जैसा यह चाहते हैं वह करने लगते हैं। वह यह भी भूल जाते है कि उनका समाज के प्रति भी कोई सरोकार है जिसके लिए उसे चैथे स्तंभ से नबाजा गया है ताकि गरीब जनता के लिए जब तीनों स्तंभ नकारा साबित होने लगे तो वह उन्हें शोषण से मुक्ति व अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने में और उनका हक दिलाने में कारगर सिद्ध हो सके। कालचक्र का पहिया अपनी घुरी पर लगातार घूमता रहता है फिर भी वक्त रहते इन संस्थाओं के लोगों के चेतने और दलालीकरण का त्याग करके जनता के हितों में पुनः पहले जैसी सोच कायम करने की है। नहीं तो तीनों स्तंभ की भांति इस स्तंभ से भी आम जनता का बना हुआ भरोसा भी खत्म हो जाएगा।

Sunday, October 7, 2012

भारत में भाषा समस्या


भारत में भाषा समस्या
किसी राष्ट्र के अनिवार्य घटकों में से एक एकसमान भाषा विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम एवं एकता के बल के रूप में उपयोगी एवं सुविधाजनक होती है। एक समान बोली में आत्मीयता एवं गहरे बंधन का भाव जगता है। ऐसा प्रायः देखा गया है कि भारत बिना किसी राष्ट्रीय भाषा का एक कोलाहल है। यह तथ्य यथार्थ से कोसों दूर है। भारत एक विशाल देश-लगभग एक महादेश के समान है जिसमें कई जातियों एवं समुदायों के लोग रहते हैं जिनकी अपनी मातृबोली होती है। इसने अतीत में कुछ एकसमान भाषाओं के माध्यम से विभिन्न वर्गों के लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया है। प्राचीन काल में संस्कृत ने यह भूमिका निभाई तथा इसके बाद प्राकृत भाषा ने कुछ हद तक यह कार्य किया। मुस्लिम काल के दौरान, विशेषकर मुगल काल में, फारसी पूरे देश की आधिकारिक भाषा बन गई, जबकि फारसी और हिंदी भाषा से उत्पन्न उर्दू आम लोगों की भाषा हो गई। समयांतराल में उर्दू ने आधिकारिक भाषा का स्थान ले लिया।
भारतीय परिदृश्य पर अंग्रेजों की उपस्थिति के बाद सारी बातें बदल गई। अपने शासन को सुगठित करने के लिए उन्होंने अंग्रजी भाषा शुरू की तथा वर्ष-दर-वर्ष अंग्रेजी काफी लोगप्रिय हो गई। इस भाषा ने उर्दू एवं अन्य मातृभाषाओं को उत्तरोत्तर प्रतिस्थापित कर अधिकारिक भाषा का स्थान ले लिया। प्रशासन एवं अन्य आधिकारिक कार्यों के उद्देश्य से अंग्रेजी पूरे देश में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाषा बन गई।
भारत की आंतरिक शक्ति एवं गहरी एकता के मुख्य माध्यमों के रूप में पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय भाषा का शीघ्र विकास करना होगा। हिंदी को हमारी आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है किंतु दुर्भाग्यवश इसे हमारे देशवासियों, विशेषकर दक्षिण भारत के हृदय में स्थान नहीं मिला है। वास्तव में अधिकारिक एवं शैक्षणिक माहौल में अंग्रेजी का हिंदी द्वारा प्रतिस्थापन से एक कटु एवं दूखद विवाद उत्पन्न हो गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पांच दशक से अधिक समय के बीत जाने के बाद भी हमें अभी ऐसी भाषा का विकास करना है जो समाज के सभी वर्गों द्वारा एक राष्ट्रीय भाषा के रूप में गर्मजोशी से स्वीकार्य हो। इसलिए भाषा समस्या का मूल प्रश्न वैसी भाषा का पता लगाना है जो समग्र राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए।
हिंदी की वकालत करने वालों का तर्क है कि यह भाषा देश के बहुत बड़े क्षेत्र में बोली एवं समझी जाती है जबकि अंग्रेजी अंग्रेज उपनिवेशक शासनों द्वारा थोपी गई भाषा है। उनकी दलील है कि हमारी अपनी समृद्ध एवं सुविकसित अखिल भारतीय भाषा, अर्थात् हिंदी की तुलना में अंग्रेजी का प्रयोग हमारे देश के आत्म-सम्मान की दृष्टि से असंगत है। दूसरी तरफ डाॅक्टर एवं इंजीनियर जैसे उच्च शिक्षित एवं कुशल व्यावसायिक लोगों का तर्क है कि विदेशी शासन की बुराइयों के बावजूद अंग्रेजी भाषा ने भारतीय राष्ट्रवाद के विचार की उत्पत्ति की तथा राष्ट्रीय भावनाओं के विकास एवं स्वतंत्रता प्राप्ति में सहायता की। उनकी दलील है कि अंग्रेजी उच्च शिक्ष, प्रौद्योगिकी तथा वैज्ञानिक अनुसंधान का साधन है तथा इसमें किसी प्रकार के व्यवधान की कोशिश हमारी शिक्षा को नुकशान पहुंचाना होगा तथा आधुनिक युग के सभी क्षेत्रों में देश को पीछे धकेलता है। तीसरे समूह का मानना है कि समान रूप से विकसित तथा संबंधित क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखने वाली विविध भाषाओं को संबंधित क्षेत्रों की राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता देनी चाहिए और हिंदी या अंग्रेजी की आवश्यकता नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को समान आदर मिलना चाहिए।
अंग्रेजी की भूमिका की प्रशंसा के लिए संपूर्ण कार्यबोध होना आवश्यक है। दो सौ वर्षों से अधिक समय से अंग्रेजी देश में प्रांत एवं केंद्र स्तर पर आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित है। यह उच्च शिक्षा, प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा उद्योग एवं वाणिज्य का माध्यम रही है। इस काल के दौरान मानव के विचारों, आविष्कारों एवं संगठनों में बड़े एवं क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। वहीं ब्रिटेन एवं अमेरिका इन परिवर्तनों के मुख्य केंद्र है और उनकी भाषा अंग्रेजी सभी आधुनिक विकास के लिए सर्वाधिक समृद्ध एवं सक्षम माध्यम है। अंग्रेजी शासन के दौरान संपूर्ण भारत को प्रशासन एवं व्यावसायिक उद्देश्य के लिए 1833 में अंग्रेजी भाषा को स्वीकार करके एकभाषी राष्ट्र में परिवर्तन कर दिया गया था। इसने अंग्रेजी को एक विशिष्ट शक्ति एंव महत्त्व प्रदान किया।
भारत में भाषाई समस्या काफी गंभीर हो गई है। संपूर्ण देश के लिए एकसमान भाषा की भावना को त्यागना ही शायद सर्वोत्तम उपाय है तथा अधिक गंभीर समस्याओं पर एकाग्रचित होकर ध्यान देना चाहिएं क्षेत्रीय भाषाएं स्वाधिकार से प्रगति करेंगी। भारतीय सिनेमा के सौजन्य से हिंदी संपूर्ण देश की बोलने की भाषा होगी तथा अंग्रेजी देश की आधिकारिक भाषा के रूप में फलती-फूलती रहेगी चाहे इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए या न किया जाए। इसलिए, हमें साहसपूर्वक एवं ईमानदारीपूर्वक इस कटु सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि अंग्रेजी अपने स्थान पर अटल है तथा इसे भावनात्मक आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता है।

Friday, September 28, 2012

मुनि श्री बताएः उनके किस धर्म लिखा है, दूसरे धर्म के पूज्यनीय देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टीका-टिप्पणी करना

 मुनि श्री बताएः उनके किस धर्म लिखा है, दूसरे धर्म के पूज्यनीय देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टीका-टिप्पणी करना




           
सामाजिक सद्भाव की नगरी ललितपुर में यूं तो सभी धर्मों के लोग आपसी भाई-चारा और प्रेम सौहार्द के अटूट बंधन में कुछ इस तरह बंधे हैं कि एक-दूसरे की छोटी-बड़ी शिकायतें आपस में कह सुनकर ही नज़रअंदाज कर देते हैं। किसी भी धर्म के अनुयायी को दूसरे धर्म की आलोचना करने में झिझक ही नहीं गिलानी भी महसूस होती है क्योंकि उसे श्रृद्धा से मानने वाले हमारे ही बीच रहते हैं और हम सब भाई बंधु के रिश्ते में बंधे हैं। परंतु हमारे बीच जब कभी कोई बड़ी वजह धर्म को लेकर प्रहार करने लगे तो निश्चय ही हम धर्म गुरूओं की शरण लेते आए हैं। यही तरीका भी है लेकिन जब कोई धर्म गुरू महात्मा ही आघात का कारण बन जाए तो कहां जाएं, किससे कहें, या घुटते रहे और बस घुटते रहें।
जी हां मैं तुच्छ प्राणी उन महान् मुनियों को आरोपित करने पर मजबूर हुआ हूं जो मेरी भी अटूट श्रृद्धा के पात्र हैं मगर एक मात्र वजह उनका नगर में वेपर्दा भम्रण व इस तरह उनके अनुयायियों द्वारा हिुदू धर्म के देवी-देवताओं पर टीका-टिप्पणी करना मुझे सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं लगता, किससे कहूं? कौन है? जो समझायेगा इसे उचित समझने की तरकीब! क्योंकि इस तरह का वाक्या घटित होने के उपरांत मैं भी उन पर और उन जैसे मुनि श्री के कृत्यों पर हस्तक्षेप करने जा रहा हूं। क्योंकि मेरा ध्यान जाता है केवल मुनि श्री के चरणों में केवल वहीं मेरा मार्ग दर्शन कर सकते हैं मगर मेरा संपूर्ण मनोविज्ञान मेरे प्रश्न को इतना गलत ठहराता है कि सीधा कहने की हिम्मत जुटा पाना शायद मेरे वश में नहीं। यही कारण है जो इसे इस तरह समाज के समक्ष व्यक्त कर रहा हूं। ऐसा नहीं है कि यह जिज्ञासा केवल मेरी ही है जनपद का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने इस विषय पर आज तक तर्क-वितर्क न किए हो। प्रतिदिन भ्रमण काल में स्वयं मुनि श्री ने भी इस जिज्ञासा को घूरती, शर्माती, या झुकती निगाहों में पढ़ा होगा। ऐसा मेरा अनुमान है अपनी जिज्ञासा को व्यक्त करने में कुतर्क करने की भूल कर सकता हूं। जिसे क्षमा करने की कृपा करें। मेरी जिज्ञासा सभी धर्म के अनुयायियों के समक्ष प्रस्तुत है।      
मुनि स्वरूप यदि जैसा है आवश्यक है तो क्या उनका नगर भ्रमण न होकर मंदिर परिधि में सीमित नहीं रह सकता। क्योंकि नगर में सभी धर्मों के मानने वाले रहते हैं जबकि मंदिर में तो केवल एक धर्म के ही अनुयायी उस समय होगें अथवा वह लोग होगें जो दर्शन लाभ लेना चाहेंगे। ऐसा सुना है कि उक्त स्वरूप के पूर्व मुनि श्री एक वस्त्र धारण की अवस्था में रहते थे। क्या सर्व समाज के हित में कुछ समय के लिए (केवल भ्रमण काल के वक़्त) पूर्व अवस्था में आना त्याग की परिभाषा में स्वीकार हो सकता है।      
उक्त निवेदनों के सापेक्ष मेरे तर्क जो शायद कुतर्क हो। यह है कि आज त्याग की पराकष्ठा पार कर चुके मुनि श्री या वर्ग विशेष के मेरे बंधु-बंधवों का ध्यान क्या इस ओर गया है कि जब सब कुछ त्याग दिया फिर उदर पूर्ति में नगर की भीतरी सीमा ही आवश्यक क्यों? या कीमती भवनों में प्रवेश वर्जित क्यों नहीं ? यदि इस का जबाव यह है कि उपरोक्त सब कुछ श्रृद्धालुओं की अनुनय विनय के कारण होता है न कि मुनि श्री की इच्छानुसार, तो क्या यह विनय श्रृद्धालुओं की सीमित स्वार्थी सोच का दर्शन नहीं कराती। और क्या अनुनय विनय में एक विनय और शामिल नहीं हो सकता,  यदि ऐसा है तो न्याय धर्म गुरू ही कर सकते है। दूसरी बात में तर्क यह है कि यदि त्याग की पराकाष्ठा की ओर अग्रसित मुनि श्री नगर सीमा में समाज कल्याण या प्राणी मात्र के कल्याण की भावना से ही आते हैं तो क्या एक वस्त्र धारण उनकी भावना को आहत कर सकता है।     
मोह माया के संसार में श्वास तो सभी ले रहे हैं फिर चाहें वह साधारण मनुष्य हो, अथवा विलक्षण प्रतिभा के धनी और लोक-परलोक की जानकारी प्राप्त मुनि श्री जब मायावी संसार में विरक्त भी रह सकते हैं और संसारिकता उनकी विरक्ति को क्षति ग्रस्त नहीं कर पाती तब तन पर वस्त्र हैं अथवा नहीं क्या फर्क पड़ता है। कहीं यह मात्र आकर्षण में सहायक तो नहीं, ऐसा सुना है कि संसार में विपरीत का आकर्षण है जैसे चुम्बक के विपरीत दो सिरे ही परस्पर आकर्षित होते हैं सामान सिरों को यदि पास में लाया जाता है तो प्रति कर्षित ही होते हैं। इसी प्रकार संसार में विपरीत लिंग का आकर्षण है। इसी क्रम में कहीं कपड़े के व्यापारी और वस्त्र विहीन मुनि श्री का आकर्षण तो नहीं। वाणी की अति किसी तपस्वी को रूष्ट न कर दें इसलिए क्षमा चाहता हूं। मेरे तर्कों पर मनन और चिंतन से अन्ततः लाभ की ही संभावना है यदि मेरी बातें सत्यता के ओत-प्रोत हैं तो सर्व समाज की कुंठा शांत होगी। और यदि ऐसा नहीं तो सर्व समाज कि कुंठा का मुनि श्री अपनी ज्ञान ऊर्जा से समाधान करें ऐसी मेरी प्रार्थना है। 
यह तो सभी ने जाना और समझा है कि मुनि श्री किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं हैं अभी हाल में उन्होंने सभी समाज से कुछ अपीले कि थी जिसका सर्व समाज ने पूरे मन से आदर किया था कि गरीक कन्याओं की उच्च शिक्षा हेतु महाविद्यालय खोला जाएगा जहां पर गरीब तबके के लोग अपनी बालकाओं को कम फीस पर शिक्षा प्रदान करा सकेंगे साथ-ही-साथ बहुतों ने उन कल्याणकारी प्रस्तावों को आत्मसात भी किया, जिसमें एक समाज विशेष के लोग मांसाहार जो उनके लिए खाद्य श्रृंखला है का त्याग कर सकते है और इसे सिद्ध किया जा सकता है कि कई लोगों ने मात्र मुनि श्री से प्रभावित होकर उक्त मलक्ष्य का भक्षण तथा व्यापार दोनों बंद कर दियें। तो क्या सर्व समाज की एक प्रार्थना मुनि श्री स्वीकार नहीं करेगें। मेरा तर्क यह भी है कि पुरातन समय में जब तप के लिए आवादी से दूर घने जंगलों और पहाड़ों की शरण लेना पड़ती थी। तब वस्त्रों कि अनुपलब्धता वस्त्रों का त्याग करने पर तपस्वी का ध्यान केन्द्रित करती रही होगी। ऐसी हर वस्तु जिसे त्यागा जा सकता है का ही त्याग तपस्वियों ने किया है वर्तमान परिस्थितियों में नकल के आधार पर यदि उक्त को निभाया जा रहा है तो क्यों न इसे बदलने पर विचार किया जाएं। 
अग्रिम क्षमा मांगते हुए मेरा यह कुतर्क भी प्रस्तुत है कि यदि वस्त्र तपस्या में इतने ही बाधक है तो इसे मेल तपस्वियों ने ही क्यों त्यागा। इस पर भी गहन विचार मंथन की आवश्यकता है क्या तपस्वी महिलाएं वस्त्रों की सहायता के बिना साधना में नहीं रह सकती? अथवा लोकलाज की भावना वस्त्र पहनने पर मजबूर करती है या साधना में वस्त्रों का होना या न होना मायने नहीं रखता। हां यदि किसी आदि ग्रंथ में उक्त सब ऐसा ही लिखा हो जिसके बदलने में कठिनाई महसूस होती हो, तो उससे समाज को न सिर्फ परिचित कराना चाहिए बल्कि शेष समाज की दृष्टि को, मनोदशा को वर्ग विशेष की मनः स्थिति, दृष्टि के समतुल्य बनाने की आवश्यकता है। ताकि श्रृद्धा में आ रहा व्यवधान समाप्त हो सकें।      
जैसा मैंने शुरूआत में कहा भी है कि मुनि श्री मेरी अटूट श्रृद्धा के पात्र हैं उनके खिलाफ बोलना, लिखना मेरा स्वभाव नहीं मात्र जिज्ञासा है कुछ अनछुएं अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजना और सामाजिक आलोचनाओं पर विराम लगाना ही उद्देश्य है। इस एक विडंबना को छोड़कर शेष सारे नियम सिद्धांत परम आदणीय अनुकरणीय है, लाभप्रद है, वर्ग विशेष की निरंतर प्रगति इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी है। अभी तक हमने वस्त्र विहीनता को आलोचित तो किया है मगर उसकी उस विवेचना से परिचित नहीं कराया जोकि जहां-तहां नुक्कड चैराहों पर देखी सुनी जाती है। मर्यादा में रहते हुए मैं थोड़ा-सा दर्शन कराना चाहूंगा ताकि मर्म को ठीक से पहचाना जा सकें। एक दृश्य प्रस्तुत करता हूं- कि विगत कुछ महीनों से ललितपुर जिले में स्थित क्षेत्रपाल जैन मंदिर में पधारे मुनि श्री सुधासागर जी अपने प्रवचनों व ज्ञान से सभी को कृतज्ञ कर रहें हैं। इसके साथ-साथ जिले में गरीब जनता हेतू स्कूल व महाविद्यालय खोले जाने का भी वचन दिया है। जो वक्त रहते बन ही जाएगा। यह सब बातें अपनी यथा स्थान पर पूर्णतः सही है। इसके बावजूद यह वाक्या कि हिंदू धर्म के देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक लेख प्रकाशित करवाकर बांटवाना क्या न्याय उचित है। शायद इस का जबाव पधारे मुनि श्री ही दे सकते हैं कि उनके किस धर्म की पुस्तक में लिखा है कि दूसरे धर्म में पूज्यनीय देवी-देवताओं पर इस तरह टीका-टिप्पणी करें। यह वास्तव में निंदनीय है। जिस कारण से सामाजिक सद्भाव की नगरी ललितपुर में आज-कल हिंसा का माहौल देखा जा रहा है। 
मैं पहले ही कह चुका हूं कि कहीं कोई शब्द किसी के हृदय को चोट पहुंचाए तो क्षमा प्रार्थी हूं। इसके बाद मैं जैन धर्म के मुनि श्री पर इसलिए प्रश्न चिह्न लगाना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने अभी तक जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा हिंदू धर्म के देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक लेख की भर्षाणा नहीं की है। जिस कारण से हालात बद-से-बदत्तर होते जा रहे हैं।
इसी आपत्तिजनक लेख के चलते ललितपुर जिले में हिंदू संगठनों द्वारा बाहर से नागा बाबाओं का एक जत्था बुलाआ गया है। हिंदू धर्म को मानने वाले लोग अब पूर्णतः क्रोध की अग्नि में जलते दिखाई दे रहे हैं। अब सामाजिक सद्भाव की नगरी कहे जाने वाले ललितपुर और मुनि श्री के आगमन पर हुए पूरे वाक्या का कहीं-न-कहीं इन मुनि श्री पर ही प्रश्न चिहृ लगाता है। देखना होगा कि वक्त किस तरह मरहम का काम कर सकता है कहीं ऐसा न हो कि यह जातिगत-धर्मवाद, सांप्रदायिक हैजे का रूप एख्तियार न कर ले जिसकी चपेट में आकर आपसी भाई-बंधु एक-दूसरे के बैर न करने लगें और यह बैर सभी को नष्ट न कर दे।

Thursday, September 27, 2012

खैरात नहीं, रोजगार दो!


खैरात नहीं, रोजगार दो!

बेरोजगारी एक ऐसा अभिशाप है जिसका दंश एक उम्र के पड़ाव के बाद, आज के दौर में हर किसी को झेलना ही पड़ता है। किसी को कम, किसी को अधिक समय के लिए इस शाप से शापित रहना ही पड़ता है। वहीं व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक अपने-अपने बच्चों को अच्छी-से-अच्छी शिक्षा प्रदान कराने की पूर्ण कोशिश करने हैं, चाहे इसके लिए कर्जा ही क्यों न लेना पड़े। क्योंकि वह चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी तालीम ले और योग्यतानुसार रोजगार पाकर उनके व अपने सपनों को साकार कर सकें। परंतु होता ठीक इसके विपरीत है। मां-बाप अपना पेट काट-काटकर जैस-तैसे शिक्षा तो प्रदान करा देते हैं, इसके वाबजूद रोजगार के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। उदाहरणस्वरूप मुझे ही लिया जा सकता है कि उच्च शिक्षा (पीएच-डी.) ग्रहण करने के उपरांत भी रोजगार की दूर-दूर तक कोई आस नजर नहीं आ रही है। साक्षात्कार तो बहुत जगहों पर दिए, परंतु सिफारिश और पैसे न होने के कारण हर जगह से निराशा ही हाथ लगी। फिर भी कोशिश जारी है, जारी ही रहेगी। कब तक यह मुझसे दूर भागेगी, कभी-न-कभी इसको मेरे पहलू में आना ही पड़ेगा।
वैसे इस बेरोजगारों की दौड़ में मैं ही अकेला नहीं दौड़ राहा हूं, मेरे जैसे न जाने कितने, कोई आगे कोई पीछे दौड़ ही रहे हैं। और यह दौड़ अब कतार का रूप लेती जा रही है। इसका कारण बस यही है कि पहले से दौड़ रहे बेरोजगार अब भी बेरोजगार हैं और शिक्षा पाकर नए प्रतिभागी भी इस बेरोजगारी की दौड़ में शामिल हो जाते हैं।
शायद शिक्षा प्रणाली ही पूर्ण रूप से दोषी है कि वह सभी को शिक्षा मुहैया करवा देती है और रोजगार के नाम पर ठेगा दिखा देती है। हालांकि रिक्त पदों की बात की जाए तो संपूर्ण भारत में लाखों सरकारी विभागों में करोड़ों पद सालों से खाली पड़े हुए हैं। इनको न भरे जाने का मूल कारण जो मेरी समझ में आता है वह मात्र यह है कि या तो किसी के सगे-संबंधी का इंतजार हो रहा है या फिर जितना रूपया उच्च अधिकारी मांग रहे हैं उतना नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा और कोई कारण मेरी समझ से परे है। अगर प्रतिभागी की योग्यता की बात करें तो लाखों ऐसे बेरोजगार हैं जो योग्य होने के बावजूद बेरोजगार है। इनके बेरोजगार होने पर संपूर्ण शिक्षा प्रणाली को कठघरे में खड़ा करने मन करता है कि क्यों ऐसी शिक्षा प्रदान की जा रही है जो रोजगार न दिला सके।
उसी पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और अब मुख्यमंत्री अखलेश यादव द्वारा बेरोजगारों को बेराजेगारी भत्ता के रूप में 1000 रूपये प्रतिमाह दिए जा रहे हैं ताकि यह बेरोजगार, रोजगार के लिए सरकार के खिलाफ आवाज न उठा सके। इनका मुंह बंद कराने के तौर पर इनको रोजगार नहीं खैरात बांटी जा रही है। जिसका विरोध होना चाहिए, नहीं हुआ। कारण जो भी रहे हो।
अगर प्रतिमाह 1000 रूपये का विश्लेषण किया जाए और इस 1000 में 30 से भाग दिया जाए तो 33.33 प्रतिदिन आएगा। यानि एक बेरोजगार अपना व अपने परिवार का खर्च इस कमर तोड़ मंहगाई में 33रूपये 33पैसे में कैसे चला सकता है? यह तो सरकार ही बता सकती है। मेरे नजरिए से यह तो भीख के समान ही है। साथ-ही-साथ यह 1000 रूपये की खैरात इन बेरोजगारों की योग्यता और काबलियत पर बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न लगाती नजर आती है। और तो और जिस मेहनत व लगन से यह पहले रोजगार के पीछे हाथ धोकर लगते थे वह कुंठाग्रस्त हो चुके हैं कि चलो बिना किसी काम के घर बैठे ही 1000 रूपये तो मिल जा रहे हैं। परंतु ऐसा कब तक चलेगा।
सभी को एक जुट होकर इसका विरोध करना पड़ेगा और मुख्यमंत्री से कहना पड़ेगा कि खैरात नहीं, रोजगार चाहिए।