सरोकार की मीडिया

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Sunday, October 26, 2014

लव जिहाद’ के झूठ का सच

‘लव जिहाद’ के झूठ का सच
मेरठ का खरखौदा सामूहिक बलात्कार और धर्म परिवर्तन मामला, जिसे ‘लव जिहाद’ का नाम दिया गया, के झूठे होने की बात सामने आ रही है। पीड़िता ने खुद ही पुलिस के पास जाकर यह बयान दिया है कि न तो उसका अपहरण और बलात्कार किया गया था और न ही उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया था। बल्कि, वह अपनी मर्जी से दूसरे समुदाय के अपने प्रेमी के साथ गई थी। उसने अपने परिवार से ही जान का खतरा होने की शिकायत दर्ज कराई है। उसने यह भी बताया कि घरवालों को नेताओं से पैसे मिलते थे जो कि अब बंद हो गए हैं। ऐसे में उससे पूछा जाता था कि आखिर अब पैसा क्यों नहीं आ रहा? इस वजह से घरवाले उसके साथ मारपीट भी करते थे और उसे जान से मारने की साजिश भी रच रहे थे। इसलिए, वो घर से चुपचाप भाग आई है। वहीं एक न्यूज चैनल ने सात अगस्त 2014 को भाजपा के व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष विनीत अग्रवाल द्वारा पीड़ित लड़की की मां को पैसे देने की बात कहते हुए भाजपा को सवालों के घेरे में ला दिया है। अब आरोप और सबूत दोनों भाजपा को आईना दिखा रहे हैं। अब देखना है, सपा सरकार को कि क्या वह ‘लव जिहाद’ के नाम पर पीड़िता के परिजनों को पैसा देकर झूठा मामला बनाने वाले सांप्रदायिक नेता के खिलाफ कोई कार्यवाई करने की वह हिम्मत करती भी है या नहीं? इस झूठे आरोप में फंसाए गए मुस्लिमों, जिनकी देश की जेलों में आबादी से ज्यादा संख्या होने की नियति हो गई है, को अगर ताक पर रख भी दिया जाए तो क्या इस सवाल को आधार बनाकर पूरे मुस्लिम समुदाय और मदरसों पर जो आरोप लगाए गए थे, वह खत्म हो गए? यह एक बड़ा सवाल है?
तो वहीं, खरखौदा प्रकरण को लेकर जिन हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ‘लव जिहाद’ का माहौल बनाकर इसे अन्र्तराष्ट्रीय साजिश करार दिया था, के मकसद की तफ्तीश अनिवार्य हो गई हैं। पूरे प्रकरण को उनके द्वारा ‘दिखाने’ का और उसे ‘हल’ करने का क्या नजरिया था? ऐसा इसलिए कि इस प्रकरण की सच्चाई जो पहले भी सामने थी और आज भी है, से समाज में जो विघटन हुआ, उसे जोड़ना इतना आसान नहीं होगा। क्योंकि निर्मार्ण एक धीमी गति से चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है और विघ्वंस एक तीव्र आक्रोश की प्रतिक्रिया है। यह हमारे समाज के हर उस ढांचे को नेस्तानाबूत कर देना चाहती है, जो हमें जोड़ती है। यहां हिन्दुओं की ‘बड़ी चिंता’ करने वाले विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों से सवाल है कि अगर वे इस षडयंत्र में नहीं शामिल हैं तो हिन्दू धर्म की एक लड़की को मोहरा बनाकर उसे बदनाम करके राजनीति करने वाली भाजपा के खिलाफ क्या वह जाएगी? बहुसंख्यक हिन्दू समाज को बरगलाने वाले इन संगठनों की मांगों पर गौर करें तो इनकी सांप्रदायिक जेहनियत का पता चल जाएगा कि यह ‘हिन्दू लड़की’ को न्याय नहीं बल्की मुस्लिम समाज को उत्पीड़ित करने के लिए ऐसा कर रहे थे।
विश्व हिंदू परिषद ने पीड़िता को ‘हिन्दू अध्यापिका’ कहते हुए महिला उत्पीड़न की घटना को सांप्रदायिक रुप दिया। वहीं मदरसे में मौलवियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए, देशभर के मदरसों पर छापा मारकर खोई लड़कियों को तलाश करने की मांग की। ऐसा माहौल बनाया जैसे पूरे देश में जिन लड़कियों का अपहरण हो रहा है, उसके लिए मुस्लिम समाज और मदरसे ही जिम्मेदार हैं। विश्व हिंदू परिषद के ‘अन्र्तराष्ट्रीय’ अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने और आगे बढ़कर मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर व अन्य ऐसे मदरसों पर ताला लगाने की मांग करते हुए कहा कि मदरसे जिस इस्लामिक मूल संगठन से जुड़े हैं, उनके प्रमुखों और इन मदरसों के सभी मौलवियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। बजरंग दल ने मदरसों को बदनाम करने के लिए अफवाह फैलाई की चार और हिंदू लड़कियों की बरामदगी मदरसे से हुई।
विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने ’लव-जिहाद’ से लड़ने के लिए ’मेरठ बचाओ मंच’ तक का गठन कर दिया। हर बात के लिए इस्लाम को दोष देने वाले इन संगठनों ने इसे अन्र्तराष्ट्रीय साजिश करार देते हुए कहा कि मेरठ की ‘हिन्दू अध्यापिका’ अकेली इस गैंग की शिकार नहीं है। हिन्दू लड़कियों के साथ मदरसों में सामूहिक बलात्कार किया जा रहा है और उन्हें जबरन मुसलमान बनाकर अरबी शेखों के लिए दुबई भेजा रहा है।
सिर्फ यूपी के मदरसों में ही ऐसे ‘जिहादी गुनाह’ होते हैं ऐसा नहीं है, कहते हुए पूरे देश में ‘लव जिहाद’ का माहौल बनाया गया। विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाईन ने दावा किया कि केरल, तमिलनाडु, आंध्र, महाराष्ट्र, बंगाल समेत पूरे देश से उनके पास शिकायतें है। ऐसे में भारत का केंद्रीय गृह विभाग ऐसे मामलों में गंभीरता से संज्ञान लेकर देश के सभी मदरसों की तलाशी ले और ऐसी लड़कियों को मुक्त कराए।
बची-खुची कसर संचार माध्यमों ने घटना का नाट्य रुपांतरण कर पूरी कर दी। और हां कई ने तो नाट्य रुपान्तरण कर ‘लव जिहादियों’ के स्टिंग करने का दावा करते हुए, खूब टीआरपी बटोरी। चेहरे पर हल्की दाढ़ी दिखाते हुए, कैमरा उसके होठों पर जूम हो जाता और वह बताने लगता कि वह एक मुसलमान है। पर वह अपना हिंदू नाम बताता है और हिंदू लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसाने के लिए कलावा बांधे हुए हैं, ऐसा वह एक साजिश के तहत कर रहा है। इस तरह से अफवाह वाले कार्यक्रम और पीड़ित लड़कियों के फर्जी नाट्य रुपान्तरण से समाज में एक दूसरे के प्रति गहरी खाई, टीवी स्क्रीनों ने प्रायोजित की। स्क्रीनों पर चीखती आवाजें जो ‘लव जिहाद’ की आड़ में एक पूरे समुदाय को हैवान के बतौर पेश कर रही थीं, को भूलना शायद मुश्किल होगा। लड़कियों के गायब होने, मानव अंग तस्करी और अमानवीय सेक्स व्यापार की घटनाओं व आकड़ों को एक सांप्रदायिक नजरिया दिया जा रहा था।
जिस मदरसे ने एक हिन्दू लड़की को आर्थिक सहयोग देने के लिए, बिना किसी धार्मिक भेद-भाव के उसे अध्यापिका के रुप में नियुक्त किया, वही उसका सबसे बड़ा गुनाह हो गया। हिन्दुत्वादी समूहों ने मदरसों के प्रति हीन भावना पैदा करते हुए प्रचारित किया कि ग्रेजुएट होकर भी मेरठ की हिन्दू लड़की को मदरसे जैसे स्थान पर नौकरी ढूंढने जाना पड़ता है। ‘लव जिहाद’ के बहाने वो अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की नीति पर निशाना साधते हुए, इसे बहुंसख्यकों के प्रति दोहरा रवैया बताकर, सांप्रदायिक विभाजन की अपनी रणनीति पर काम करते हैं। ‘लव जिहाद’ की ओट लेकर अल्पसंख्यक आयोग की तरह हिन्दू मानवाधिकार आयोग की ‘सख्त जरुरत’ की बात कही जाने लगी। इसके लिए प्रचारित किया गया कि विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाईन का हिन्दू मानवाधिकार आयोग पहले से है। अब केंद्र सरकार इस आयोग को कानूनन मान्यता देकर उसे कार्मिक और कानूनी अधिकार दे देना चाहिए।
हिन्दू अस्मिता के नाम पर ‘मेरठ बचाओं मंच’ जैसे संगठनो का निर्माण कर वे एक क्षेत्रिय आक्रामक अस्मितावादी सांप्रदायिकता को भड़काने की फिराक में हैं। खरखौदा प्रकरण की वास्तविकता के बाद वे थोड़ा ठहर भले सकते हैं। पर वे उस सांप्रदायिक जेहनियत के विस्तार में और तेजी लाएंगे, जिसे हमारे समाज में निहित पितृ सत्ता खाद-पानी देती है। वे इसको प्रचारित करेंगे कि एक हिंदू लड़की जो एक मुसलमान के पास चली गई थी को वापस लाने के लिए उन्होंने यह सब किया। जिसका, उनको समाज का रुढ़िवादी ढांचा मौन स्वीकृति देता है। ऐसे में हमें व्यापकता में प्रेम संबन्धों पर अपनी जेहनियत का विस्तार करना होगा। सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर 1857 की साझी शहादत और साझी विरासत की नगरी मेरठ को ठहर कर सोचना होगा, नहीं तो वो उसके इस ऐतिहासिक ढांचे का ध्वसं कर देंगे।
सभार-
राजीव कुमार यादव
 (Freelance Journalist)
C/o Adv. Md. Shoaib
110/46, Harinath Banerjee Street
Latuch Road, Naya Gaon East
Lucknow , UP
Mob. 09452800752
Email- 
rajeev.pucl@gmail.com


Wednesday, October 15, 2014

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा
पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिवंगत भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे को मुख्यमंत्री बनाने का संकेत यह कहते हुए दिया कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम पंकजा के नेतृत्व में सभी पिछड़ी जातियों के लिए न्याय पाने का कार्य जारी रखेंगे। भाजपा पंकजा को मुख्यमंत्री बनाने जा रही है या नहीं इस बात से ज्यादा इस बात की तह में जाने की जरुरत है कि वह पिछड़ी जातियों को जो न्याय दिलाने की बात कह रही है उसकी परिभाषा क्या है? क्योंकि यह हो सकता है कि मुंडे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने के बाद उनकी बेटी चुनाव में आएं और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की बात करें। जिस विरासत में भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा भी निहित है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भाजपा के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद हिंदू राष्ट्र की जो बातें कहीं जा रही हैं, उसमें पिछड़ों को क्या न्याय मिलेगा, इसका विश्लेषण किया जाए। 
अमित शाह ने जिस तरह कहा कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग के एक शख्स को प्रधानमंत्री बनाया इसलिए उनकी सरकार की एक प्रमुख नीति पिछड़े वर्गों के लिए काम करने की है और आने वाले दिनों में वे महाराष्ट्र में भी इस नीति को आगे बढ़ाएंगे। तो ऐसे में पिछड़े वर्ग को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि चार महीने जिस मोदी सरकार को हो चुके हैं उसने उनके लिए क्या किया? रही बात महाराष्ट्र की पहली महिला मुख्यमंत्री या पहली महिला पिछड़े वर्ग की मुख्यमंत्री बनने की तो इस अस्मितावादी खोल से बाहर आकर सोचने की जरुरत है। क्योंकि महाराष्ट्र में मात्र 10 प्रतिशत महिला उम्मीदवरों को टिकट मिले हैं और उसमें भी कांग्रेस ने 27 को तो भाजपा ने सिर्फ 21 महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है।
सवाल यहां विचार नहीं अस्मिता का है, जिसको भाजपा एडेªस करके चुनावी लाभ लेना चाहती है। क्योंकि पिछड़े वर्ग के न्याय का विचार, सामाजिक न्याय का विचार है, भाजपा जिसके खिलाफ है। आज ‘बृहद’ हिन्दुत्व के अंदर सभी प्रकार के वंचित समाज को समाहित करने की प्रक्रिया में वह इसे छुपा रही है। इतिहास से पिछड़े समाज को सबक लेने की जरुरत है कि यह वो नहीं है जिसको यह बता रही है। जिन पिछड़े वर्ग के शख्स को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही जा रही है उनके गुजरात मॉडल के इतिहास को जानने की आवश्यकता है, जहां भाजपा और दीगर भगवा संगठनों ने आरक्षण का विरोध किया है। संघ परिवार और उसके संगठन विद्यार्थी परिषद ने गुजरात के शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाया, यह बात किसी से छुपी नहीं है। अहमदाबाद जैसे शहरी इलाके को भी हिंसक विरोध का ठिकाना बनाया गया। शहरों, कस्बों के अलावां उन्नीस में से अट्ठारह जिलों में आरक्षण विरोधियों ने हिंसा की।
भाजपा को पिछड़ों से कोई परहेज नहीं है, उसे बस अपने सांप्रदायिक-गैर बराबरी वाले एजेण्डे को आगे बढ़ाने वाला चाहिए। चाहे वह दलित हो या फिर पिछड़ा। क्योंकि उसने यह देख लिया है कि जब तक वह एक शहरी और सवर्णवादी पार्टी बनकर रही तब तक उसे चुनावी प्रक्रिया में उतनी सफलता नहीं मिली जितनी उसने दलितों और पिछड़ों को जोड़कर अर्जित किया। पर यहां पिछड़ों को सोचने की जरुरत है कि जो भाजपा उनके प्रति इतनी लचीली हो गई है, समय-समय पर वह और उससे जुड़े संगठन कैसे आरक्षण का विरोध करने लगते हैं?
2006 के दौरान जब उच्च शिक्षा में आरक्षण का सवाल उभरा था तो यूथ फॉर इक्यूलिटी नाम के एक संगठन का प्रार्दुभाव हुआ। ‘समानता’ की बात करने वाला यह ‘युवा’ तब जागा जब सरकार ने 27 प्रतिशत पिछड़ों को उच्च शिक्षा में आरक्षण देने की बात कही। जिसमें 20 केन्द्रिय विश्वविद्यालय और एम्स व जिपमर जैसे 9 प्रिमियर मेडिकल कॉलेज शामिल थे। यह संगठन भारत में सभी तरह के जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण का विरोधी था। इस संगठन के प्रणेता शिव खेड़ा ने 2008 में इन्हीं विचारों के आधार पर भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के गठन का ऐलान किया था। जाति और धर्म आधारित आरक्षण खत्म करने तथा ‘तुष्टीकरण’ को समाप्त करने की मुहिम छेडने के साथ, वह देश की अखंडता के साथ खिलवाड करने वाली ऐसी ताकतों का किसी भी कीमत पर विरोध करेंगे ऐसा उन्होंने आहवान किया। श्री श्री रविशंकर ने भी खेड़ा को बधाई दी। अगर हम गौर करें तो ठीक ऐसी ही मिलते-जुलते प्रयोग स्वामी रामदेव ने भी किए जिसके मूल में आरक्षण विरोध निहित था।
हिन्दुत्वादी संगठनों ने वक्ती जरुरतों के अनुसार अपने को बदला है। वह दलित-पिछड़ों की अस्मिता जो छुआछूत या बराबरी के विचार तक सीमित है को कृत्रिम तरीके से हल कर अपने एजेण्डे में उनको सहयात्री बनाने की फिराक में रहती है। इसीलिए समय-समय पर धर्म या जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने की जो वह बात करती है, खुद को पर्दे के पीछे रखकर, खेड़ा-रामदेव जैसों का सहरा लेकर करती है। 2014 लोकसभा चुनावों में रामदेव को तो हर किसी ने इनके साथ देखा ही है, शिव खेड़ा ने भी भाजपा का प्रचार किया था। यह बहुत अन्र्तविरोधी बात है, एक तरफ मोदी ने अपने को पिछड़ा और राजनीतिक अछूत के रूप में पेश करते हुए यह ऐलान भी किया कि ‘आगामी दशक पिछड़े समुदायों के सदस्यों का दशक होगा, वहीं दूसरी तरफ पिछड़ों के आरक्षण विरोधी उसके प्रचारक भी थे।’ यह अन्र्तविरोध साफ करता है कि भाजपा प्रोपोगंडा के बतौर पिछड़ों का इस्तेमाल कर रही है।
2013 में यूपी में त्रिस्तरीय आरक्षण को लेकर चले आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने आरक्षण विरोधियों का नेतृत्व किया, जिसमें भाजपा के विधायकों समेत अनेकों पदाधिकारी मौजूद रहते थे। वहीं आरक्षण समर्थकों के साथ अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। अब अगर उस पूरे आंदोलन की समीक्षा करें तो भाजपा ने अनुप्रिया के साथ गठबंधन करके न सिर्फ अपनी सीटें बढ़ायीं, बल्कि उन आरक्षण समर्थकों को भी साथ ले लिया। इसके लिए सिर्फ भाजपा को दोष देने से ज्यादा पिछड़े वर्ग को खुद में झांकना होगा कि उसके हक-हुकूक की लड़ाई में उसके अस्मितावादी लालच ने, उसके विचार को कैसे खत्म कर दिया है। सामाजिक न्याय सिर्फ किसी जाति तक आधारित नहीं है। वह एक व्यापक नजरिए की मांग करता है। जिसमें महिला, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी प्रकार का वंचित तबका शामिल हैं। सिर्फ अपना-अपना मानकर चलने पर वह उसी जातिवादी अस्मिता में घिर जाएगा, जो उसे धर्म की सकरी गली में लेकर चला जाएगा। जातियां, धर्म से निकली हैं और ऐसी जातियों को समाहित करने का बहुत परिपक्व अनुभव हिन्दुत्वादी राजनीति के पास है।
आभार-
राजीव यादव
द्वारा- मोहम्मद शुऐब (एडवोकेट)
110/46 हरिनाथ बनर्जी स्ट्रीट, नया गांव पूर्व
लाटूश रोड, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मो0- 09452800752


Saturday, October 4, 2014

कचरे में पलती जिंदगियां......... और गांधी का स्वच्छ भारत

कचरे में पलती जिंदगियां......... और गांधी का स्वच्छ भारत






स्वच्छ भारत की संकल्पना हमारे प्रधानमंत्री जी ने की, पर गंदगी तो कहीं से न तो साफ हुई न तो साफ होती दिखी। गंदगी जस की तस बनी ही रही। हां यह और बात है कि छायाचित्रों में आने के लिए इन कर्मचारियों, नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। वैसे सफाइ्र करते हुए इनकी तस्वीरे बड़ी उम्दा किस्म की आई जैसे मानों सच में सफाई कर रहे हो। क्यों उम्दा नहीं आती, बकायदा कैमरा मैन बुलाए गए थे तस्वीरों को लेने के लिए............ ताकि उनका मीडिया में महीमा मंडन करवाया जा सके। और उनकी यह साजिश मीडिया ने कामयाब भी की..............छाप दी, चला दी.....मीडिया में....... झांडू के साथ उनकी तस्वीरें ताकि लगे की वो वास्तव में इस देश से गंदगी दूर करना चाहते हो। गंदगी साफ करनी है तो अपने घर के बाहर साफ कीजिए जहां हर रोज आप अपने घर को साफ करके कचड़ा फेंक देते हैं। गंदगी साफ करनी है तो अपने दिल को साफ करें जिसमें न जाने किस-किस प्रकार के कचड़े कई वर्षों से पड़े-पड़े सड़ रहे हैं। जिनमें पता नहीं कब से बू आ रही है। गंदगी साफ करनी है तो देश से अमीरी गरीबी का भेद मिटा कर करें जो सबसे बड़ी गंदगी को जन्म देती है। गंदगी साफ करनी है तो भूख को मिटा कर करें जो हर एक जुर्म का जन्म देती है।

अगर वास्तव में गांधी के सपना को मोदी पूरा करने चाहते थे तो उन मासूम बच्चों के बारे में भी जरा सी फिकर कर लेते जो कचरे में अपनी जिंदगी गुजार देते हैं, एक निवाले के खातिर। जरा सा आप लोग भी सोचिए.......अगर खुद से समय मिल जाए तो.......सिर्फ जरा सा..........  चंद तस्वीरे आप साझा कर रहा हूं। यह तस्‍वीरे 2 अक्टूबर के दिन सेवाग्राम रेलवे स्‍टेशन पर रेलवे कर्मचारियों एवं स्‍थाई नेता द्वारा सफाई का दिखावा करते तथा उसी दिन ट्रेन में बच्‍चों द्वारा मांगी जा रही भींख की कुछ तस्‍वीरें खींची थी। जिससे अंदाजा लगा सकते हैं कि सफाई कहां होनी चाहिए थी......?????????

Thursday, May 1, 2014

नीले गगन के तले, झांडियों में प्‍यार पले..........

नीले गगन के तले, झांडियों में प्‍यार पले..........

प्‍यार....प्‍यार....प्‍यार कौन सा प्‍यार और कैसा प्‍यार................. तितली वाला या फूल वाला, नदी वाला या समुंदर वाला, चांद वाला या चांदनी वाला, धूप वाला या छांव वाला, दोस्‍त वाला या दुश्‍मन वाला, भूख वाला या दौलत वाला, रूह वाला या जिस्‍मानी......प्‍यार को अपने-अपने अनुसार परिभाषित किया जा सकता है। अलग-अलग जगहों पर परिस्थिति के अनुकूल। अलग-अलग परिस्थितियों के अनुरूप यह अपनी मूल विधा से उन्‍मुक्‍त होकर हर बंधन से परे चला जाता है। जहां इसका अस्तित्‍व वक्‍त और स्थिति के साथ स्‍वत: बदल जाता है। आज के दौर में बदलना ही इसकी नियति है। इस नियति में बदलाव के पीछे नैतिकता के पतन और जल्‍द जवां होती चाहत को मान सकते हैं क्‍योंकि नैतिकता के पतन और जल्‍द जवां होने की चाहत ने प्‍यार के वास्‍तविक मायने ही बदल दिए। आज प्‍यार आंखों से तो शुरू होता है पर दिल की गहराईयों में न उतरते हुए, झांडियों के झुरमुट में अपना दम तोड़ देता है। इस प्‍यार को रूहानी प्‍यार की संज्ञा तो कभी नहीं दी जा सकती,  हां इसके क्रियाकलापों को देखते हुए इसे जिस्‍मानी प्‍यार का दर्जा अवश्‍य दिया जा सकता है। जो पल-पल बदलते समय के साथ अपनी स्थिति बदलता रहता है। कभी इसकी बांहों में तो कभी उसकी बांहों में....... पनपता रहता है। एहसास नहीं होता इनको, क्‍योंकि यह लोग भावनात्‍मक बंधनों से पहले ही मुक्‍त हो चुके होते हैं। इनके बीच एक प्रकार का अदृश्‍य अनुबंध, जिसमें जब तक मन हो प्‍यार की पेंगे भरी जा सकती हैं और यदि किसी एक का मन उचटा नहीं, कि अनुबंध स्‍वत: ही खत्‍म। खत्‍म हुए इस अनुबंध पर चाहे तो आपसी संबंधों की सहमति के आधार पर कुछ समय के उपरांत पुन: अपनी स्‍वीकृति प्रदान कर सकते हैं, नहीं तो किसी अन्‍य के साथ अनुबंध करने की आजादी उनके पास हमेशा ही रहती है। यह युवा पीढ़ी का धधकता हुआ युवा जोश है, जो विकास के नए नमूने को यदाकदा इजाद करता रहता है। वैसे हमारे वैज्ञानिकों ने प्‍यार के मिलाप से उत्‍पन्‍न होने वाली झंझट से इस जवां पीढ़ी को बेफ्रिक कर दिया है। शायद वो युवा जोश को पहले ही भांप गए थे कि आने वाली पीढ़ी किस तरह अपना रंग बदलेगी। तभी तो गली-गली हर कूचे में बेफिक्री की दवा आसानी से उपलब्‍ध हो जाती है। यह प्‍यार को बरकरार रखने के तरीके और किसी अन्‍य प्रकार की झंझट से मुक्ति का आश्‍वासन अवश्‍य ही जवां चाहतों को दिला पाने में सक्षम है। क्‍योंकि प्‍यार के मायने बदल गए हैं......
आज प्‍यार का ढांचा खोखली नींव पर खड़ा किया जाता है या होने लगा है। उसमें भी मिलावट देखने को मिलने लगी है। क्‍योंकि यह झांडियों वाला प्‍यार है, अब यह पतंगों वाला प्‍यार नहीं रहा। अब तो यह दुपट्टें में छुपी अंतरंग अवस्‍था का वो कपड़े उतारू प्‍यार, सामाजिक मान-मर्यादा से परे, बंदर-बंदरियों सी हरकते करते हुए समाज को अपनी मोहब्‍बत का तमाशा दिखाते रहते हैं कि आओं देखों हमारी नग्‍नतापूर्ण मोहब्‍बत को, जिसे हम खुले आम बाजार में नीलाम कर रहे हैं। यह प्‍यार तो नहीं है पर प्‍यार जैसा प्रतीत कराने की वो नाकाम कोशिशें जिन्‍हें यह जवां जोड़े समाज पर थोपने का काम बखूबी कर रहे हैं। हां यह कुछ समय बाद हमारी रंगों में खून बनकर जरूर दौड़ने लगेगा। और हमारी आने वाली नई जवां पीढ़ी भी इस नैतिकता को और अधिक ताख पर रखकर खुलआम सड़कों पर अपनी जिस्‍मानी जरूरतों की पूर्ति करते हुए देखे जा सकेंगे।
अगर यह कहा जाए तो गलत नहीं होना चाहिए कि भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में प्‍यार ने नैतिकता का हनन पश्चिमी सभ्‍यता से भलीभूत होकर ही किया है। क्‍योंकि तमाशबीन प्‍यार भारतीय सभ्‍यता में कभी नहीं रहा। हां यह प्‍यार लुकछिप के भारतीय संस्‍कृति में हमेशा से फल फूलता रहा है, पर नग्‍नता से विमुक्‍त होकर। परंतु जिस तरह पश्चिमी संस्‍कृति में नंगापन अपने पुरजोर पर हावी है उसी नंगेपन के जहर ने भारतीय युवा वर्ग को भी अपनी चपेट में भी लिया है। नंगेपन के जहर की चपेट में आए युवा वर्ग से यह बात तो अवश्‍य ही साबित होती है कि भारतीय युवा वर्ग सकारात्‍मक की अपेक्षा नकारात्‍मक प्रवत्ति को शीघ्र ही आत्‍मसात कर लेते हैं बिना उसके प्रभावों को समझते हुए। और वो पश्चिमी संस्‍कृति के समान आजाद होने की ललक के चलते वहां के नंगे प्‍यार का धीरे-धीरे अपनाते जा रहे हैं, तभी तो चार दिवारी से निकलकर यह प्‍यार सड़कों के किनारे बने पार्कों की झाडियों, सुनसान पड़े खंडहरों, खुलेआम पत्‍थरों की जरा सी आड़ में पनपने लगा है।


Thursday, March 20, 2014

दंगें की आग.........

दंगें की आग.........

रात के सुनसान सन्नाटे में अपने तेज कदमों के साथ बढ़ा जा रहा था। मंजिल पर पहुंचने की जल्दी भी थी और विरान पड़ी सड़क पर उपजने वाली डरावनी आवाज से पनपने वाला भय भी था। तेज कदमों के साथ दिल की धड़कनें भी तेज हो रहीं थीं। जिस पर इमरान का बस नहीं चल रहा था, चाह कर भी इमरान भय के कारण बढ़ने वाली धड़कनों पर काबू पाने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहा था। फिर भी कदमों को तेज और तेज बढ़ता ही जा रहा था। वैसे इमरान जिस इलाके से गुजर रहा था वो पिछले दस दिनों से कफ्र्यू की चपेट में था। पूरा इलाका किसी शमशान से कम नहीं लग रहा था, जगह-जगह आग की लपटों में कुछ न कुछ जल रहा था। कहीं लाठी, कभी चक्कू, कहीं तलवार, कहीं कट्टा तो कहीं जिंदा बम पड़े हुए थे जो फटने के लिए अपनी सांसे धीरे-धीरे तेज कर रहे थे। जगह-जगह क्या बूढ़ा, क्या जवान, क्या महिलाए और क्या बच्चे। न जाति, न धर्म बस संप्रदायिकता की मार से मुर्दा पड़ी उनकी अस्त-व्यस्त लाशें, आस लगाए कि कहीं कोई अपना बचा हो, जो हमें ठिकाने लगा दे। पर ऐसा नहीं था, दूर-दूर तक लाशों का जमावड़ा ही था। कौन किससे आस करे? पूरे के पूरे परिवार खत्म हो चुके थे।
वैसे कोई भी नहीं जान पा रहा था कि इस दंगें की चिंगारी को हवा कहां से और किसने दी? जिसकी आग में पूरा शहर जल उठा। जिसने सबको अपनी चपेट में ले लिया था। सरकार ने दंगें पर काबू पाने के उद्देश्य से कफ्र्यू का सहारा लिया और पूरे 12 दिनों तक कफ्र्यू लगा रहा। चारों तरफ सिर्फ पुलिस ही पुलिस, दंगों को रोकने के लिए तैनात थी। बावजूद इसके दंगा रह-रहकर भड़क उठता, जो 20-25 लोगों को निगलकर शांत हो जाता। उसी इलाके से रात को इमरान गुजर रहा था। इसी बावत एक भय दिल में बना हुआ था। जिससे न चाहते हुए भी खुद को निकाल नहीं पा रहा था। चला जा रहा था, टुकड़ों में विभाजित हो चुकी लाशें, जो कुछ दिन पहले जीती जागती हुआ करती थीं। उनको लांघते हुए एक शायर की चंद पक्तियां उसके जहन में आने लगीं। ‘‘एक दिन हुआ सबेरा, दिल में कुछ अरमान थे..... एक तरफ थीं झोपड़ियां, एक तरफ शमशान थे..... चलते-चलते एक हड्डी पैरों के नीचे आई, उसके यही बयान थे...... ऐ भाई जरा संभलकर चलना, हम भी कभी इंसान थे....’’ हां यह भी कभी जिंदा इंसान थे। उन्हीं से बचते-बचाते इमरान तेज रफ्तार से चला जा रहा था कि अचानक एक तरफ से किसी के बिलखने की आवाज ने दिल की धड़कनों को और बढ़ा दिया। उस ओर से आ रही मार्मिक रोने के आवाज ने जैसे पैरों को एकाएक रोक दिया। न चाहते हुए भी पैर खुद-ब-खुद रोने की दिशा की तरफ चल पड़े। थोड़ा चलने के बाद इमरान के पैर फिर थम गए, क्योंकि आवाज एक झोंपड़ी के अंदर से आ रही थी। झोंपड़ी के अंदर जाने की हिम्मत वो बहुत देर तक बटोरता रहा। जब हिम्मत ने साथ दिया तो अंदर घुस गया। अंदर का नजारा सभ्य पुरुष समाज की दरिंदगी की पूरी कहानी को खुद-ब-खुद बयां कर रहा था। एक 14-15 साल की बच्ची, जमीन पर पड़ी बिलख रही थी। उसके तन पर जालिमों ने एक भी कपड़ा नहीं छोड़ा था। पास जाकर देखा तो उसकी रूह ही कांप गई। उस बच्ची पूरे शरीर पर जगह-जगह पड़े घावों से खून रिस-रिस कर बह रहा था।

भेडिया और गिद्धों के समूह ने उस मेमने समान बच्ची को अपनी-अपनी हैवानियत पूरी करके जिंदा लाश बनाकर छोड़ दिया था। उसको देखकर इमरान के पैरों में मानों जान ही न बची हो। पैर खुद ही लड़खड़ाने लगे। और इमरान उसके पास ही बैठ गया। बच्ची ने इमरान को देखकर अपने नग्न शरीर को अपने हाथों से छुपाने की नकाम कोशिश करने लगी। इमरान ने उसके सिर पर हाथ रखा तो वह बुरी तरह कांपने लगी। डरो नहीं, मैं तुम्हारी मदद करने आया हूं। डरो नहीं। इमरान वहां से उठा और झोंपड़ी के कोने-कोने में देखने लगा। कहीं कोई कपड़ा मिल जाए, जिससे इसके नग्न बदन को ढांक सकूं? पर पूरी झोंपड़ी में कहीं कुछ भी नहीं मिला। इमरान झोंपड़ी के बाहर आ गया। कुछ देर तलाशते रहने के बाद भी उसे कहीं कुछ इस तरह को नहीं दिखा जिससे उस बच्ची के तन को ढांका जा सके। एकाएक उसकी दृष्टि पास ही पड़ी एक महिला की लाश पर गई। जिसके तन पर साड़ी थी। इमरान उस महिला की लाश से साड़ी उतारने लगा। दिमाग में ख्याल आया कि मैं भी किसी महिला को नंगा कर रहा हूं। फिर ख्याल आया कि किसी मृत पड़ी लाश की अपेक्षा उस बच्ची को इसकी जरूरत ज्यादा है। इमरान ने उस महिला की लाश से साड़ी उतारी और वापस उस झोंपड़ी में आ गया। वहां पहुंचा, तो देखा वो अब रो नहीं रही थी। इमरान उसके पास बैठ गया और उससे कहा.... लो इसको पहन लो... उसने कोई रिस्पोंस नहीं दिया। उसने पुनः उससे कहा कि बेटा इसको पहन लो... पर कोई जवाब नहीं। उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसका शरीर ठंडा पड़ चुका था। समझते देर नहीं लगी कि अभी तक जिंदा बच्ची लाश में तबदील हो चुकी है। आंखों से आंसू बह निकले। मृत हो चुकी उस बच्ची के नग्न शरीर पर उस मृत महिला की साड़ी से ढंक दिया। एक मृत की साड़ी उतारकर दूसरे मृत के नग्न शरीर को इमरान ढंक रहा था। उसके शरीर को साड़ी से ढंकने के बाद उसने उस बच्ची की लाश को अपने हाथों में उठा लिया और झोंपड़ी से बाहर निकलकर चल पड़ा। कुछ दूर पर चलने के बाद इमरान ने उस बच्ची की लाश को जमीन पर रख दिया और यहां वहां से लकड़ियां जुटाकर, दंगें की ही आग में उसको स्वाहा कर दिया।