सरोकार की मीडिया

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Wednesday, October 15, 2014

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा
पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिवंगत भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे को मुख्यमंत्री बनाने का संकेत यह कहते हुए दिया कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम पंकजा के नेतृत्व में सभी पिछड़ी जातियों के लिए न्याय पाने का कार्य जारी रखेंगे। भाजपा पंकजा को मुख्यमंत्री बनाने जा रही है या नहीं इस बात से ज्यादा इस बात की तह में जाने की जरुरत है कि वह पिछड़ी जातियों को जो न्याय दिलाने की बात कह रही है उसकी परिभाषा क्या है? क्योंकि यह हो सकता है कि मुंडे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने के बाद उनकी बेटी चुनाव में आएं और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की बात करें। जिस विरासत में भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा भी निहित है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भाजपा के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद हिंदू राष्ट्र की जो बातें कहीं जा रही हैं, उसमें पिछड़ों को क्या न्याय मिलेगा, इसका विश्लेषण किया जाए। 
अमित शाह ने जिस तरह कहा कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग के एक शख्स को प्रधानमंत्री बनाया इसलिए उनकी सरकार की एक प्रमुख नीति पिछड़े वर्गों के लिए काम करने की है और आने वाले दिनों में वे महाराष्ट्र में भी इस नीति को आगे बढ़ाएंगे। तो ऐसे में पिछड़े वर्ग को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि चार महीने जिस मोदी सरकार को हो चुके हैं उसने उनके लिए क्या किया? रही बात महाराष्ट्र की पहली महिला मुख्यमंत्री या पहली महिला पिछड़े वर्ग की मुख्यमंत्री बनने की तो इस अस्मितावादी खोल से बाहर आकर सोचने की जरुरत है। क्योंकि महाराष्ट्र में मात्र 10 प्रतिशत महिला उम्मीदवरों को टिकट मिले हैं और उसमें भी कांग्रेस ने 27 को तो भाजपा ने सिर्फ 21 महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है।
सवाल यहां विचार नहीं अस्मिता का है, जिसको भाजपा एडेªस करके चुनावी लाभ लेना चाहती है। क्योंकि पिछड़े वर्ग के न्याय का विचार, सामाजिक न्याय का विचार है, भाजपा जिसके खिलाफ है। आज ‘बृहद’ हिन्दुत्व के अंदर सभी प्रकार के वंचित समाज को समाहित करने की प्रक्रिया में वह इसे छुपा रही है। इतिहास से पिछड़े समाज को सबक लेने की जरुरत है कि यह वो नहीं है जिसको यह बता रही है। जिन पिछड़े वर्ग के शख्स को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही जा रही है उनके गुजरात मॉडल के इतिहास को जानने की आवश्यकता है, जहां भाजपा और दीगर भगवा संगठनों ने आरक्षण का विरोध किया है। संघ परिवार और उसके संगठन विद्यार्थी परिषद ने गुजरात के शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाया, यह बात किसी से छुपी नहीं है। अहमदाबाद जैसे शहरी इलाके को भी हिंसक विरोध का ठिकाना बनाया गया। शहरों, कस्बों के अलावां उन्नीस में से अट्ठारह जिलों में आरक्षण विरोधियों ने हिंसा की।
भाजपा को पिछड़ों से कोई परहेज नहीं है, उसे बस अपने सांप्रदायिक-गैर बराबरी वाले एजेण्डे को आगे बढ़ाने वाला चाहिए। चाहे वह दलित हो या फिर पिछड़ा। क्योंकि उसने यह देख लिया है कि जब तक वह एक शहरी और सवर्णवादी पार्टी बनकर रही तब तक उसे चुनावी प्रक्रिया में उतनी सफलता नहीं मिली जितनी उसने दलितों और पिछड़ों को जोड़कर अर्जित किया। पर यहां पिछड़ों को सोचने की जरुरत है कि जो भाजपा उनके प्रति इतनी लचीली हो गई है, समय-समय पर वह और उससे जुड़े संगठन कैसे आरक्षण का विरोध करने लगते हैं?
2006 के दौरान जब उच्च शिक्षा में आरक्षण का सवाल उभरा था तो यूथ फॉर इक्यूलिटी नाम के एक संगठन का प्रार्दुभाव हुआ। ‘समानता’ की बात करने वाला यह ‘युवा’ तब जागा जब सरकार ने 27 प्रतिशत पिछड़ों को उच्च शिक्षा में आरक्षण देने की बात कही। जिसमें 20 केन्द्रिय विश्वविद्यालय और एम्स व जिपमर जैसे 9 प्रिमियर मेडिकल कॉलेज शामिल थे। यह संगठन भारत में सभी तरह के जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण का विरोधी था। इस संगठन के प्रणेता शिव खेड़ा ने 2008 में इन्हीं विचारों के आधार पर भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के गठन का ऐलान किया था। जाति और धर्म आधारित आरक्षण खत्म करने तथा ‘तुष्टीकरण’ को समाप्त करने की मुहिम छेडने के साथ, वह देश की अखंडता के साथ खिलवाड करने वाली ऐसी ताकतों का किसी भी कीमत पर विरोध करेंगे ऐसा उन्होंने आहवान किया। श्री श्री रविशंकर ने भी खेड़ा को बधाई दी। अगर हम गौर करें तो ठीक ऐसी ही मिलते-जुलते प्रयोग स्वामी रामदेव ने भी किए जिसके मूल में आरक्षण विरोध निहित था।
हिन्दुत्वादी संगठनों ने वक्ती जरुरतों के अनुसार अपने को बदला है। वह दलित-पिछड़ों की अस्मिता जो छुआछूत या बराबरी के विचार तक सीमित है को कृत्रिम तरीके से हल कर अपने एजेण्डे में उनको सहयात्री बनाने की फिराक में रहती है। इसीलिए समय-समय पर धर्म या जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने की जो वह बात करती है, खुद को पर्दे के पीछे रखकर, खेड़ा-रामदेव जैसों का सहरा लेकर करती है। 2014 लोकसभा चुनावों में रामदेव को तो हर किसी ने इनके साथ देखा ही है, शिव खेड़ा ने भी भाजपा का प्रचार किया था। यह बहुत अन्र्तविरोधी बात है, एक तरफ मोदी ने अपने को पिछड़ा और राजनीतिक अछूत के रूप में पेश करते हुए यह ऐलान भी किया कि ‘आगामी दशक पिछड़े समुदायों के सदस्यों का दशक होगा, वहीं दूसरी तरफ पिछड़ों के आरक्षण विरोधी उसके प्रचारक भी थे।’ यह अन्र्तविरोध साफ करता है कि भाजपा प्रोपोगंडा के बतौर पिछड़ों का इस्तेमाल कर रही है।
2013 में यूपी में त्रिस्तरीय आरक्षण को लेकर चले आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने आरक्षण विरोधियों का नेतृत्व किया, जिसमें भाजपा के विधायकों समेत अनेकों पदाधिकारी मौजूद रहते थे। वहीं आरक्षण समर्थकों के साथ अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। अब अगर उस पूरे आंदोलन की समीक्षा करें तो भाजपा ने अनुप्रिया के साथ गठबंधन करके न सिर्फ अपनी सीटें बढ़ायीं, बल्कि उन आरक्षण समर्थकों को भी साथ ले लिया। इसके लिए सिर्फ भाजपा को दोष देने से ज्यादा पिछड़े वर्ग को खुद में झांकना होगा कि उसके हक-हुकूक की लड़ाई में उसके अस्मितावादी लालच ने, उसके विचार को कैसे खत्म कर दिया है। सामाजिक न्याय सिर्फ किसी जाति तक आधारित नहीं है। वह एक व्यापक नजरिए की मांग करता है। जिसमें महिला, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी प्रकार का वंचित तबका शामिल हैं। सिर्फ अपना-अपना मानकर चलने पर वह उसी जातिवादी अस्मिता में घिर जाएगा, जो उसे धर्म की सकरी गली में लेकर चला जाएगा। जातियां, धर्म से निकली हैं और ऐसी जातियों को समाहित करने का बहुत परिपक्व अनुभव हिन्दुत्वादी राजनीति के पास है।
आभार-
राजीव यादव
द्वारा- मोहम्मद शुऐब (एडवोकेट)
110/46 हरिनाथ बनर्जी स्ट्रीट, नया गांव पूर्व
लाटूश रोड, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मो0- 09452800752


Saturday, October 4, 2014

कचरे में पलती जिंदगियां......... और गांधी का स्वच्छ भारत

कचरे में पलती जिंदगियां......... और गांधी का स्वच्छ भारत






स्वच्छ भारत की संकल्पना हमारे प्रधानमंत्री जी ने की, पर गंदगी तो कहीं से न तो साफ हुई न तो साफ होती दिखी। गंदगी जस की तस बनी ही रही। हां यह और बात है कि छायाचित्रों में आने के लिए इन कर्मचारियों, नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। वैसे सफाइ्र करते हुए इनकी तस्वीरे बड़ी उम्दा किस्म की आई जैसे मानों सच में सफाई कर रहे हो। क्यों उम्दा नहीं आती, बकायदा कैमरा मैन बुलाए गए थे तस्वीरों को लेने के लिए............ ताकि उनका मीडिया में महीमा मंडन करवाया जा सके। और उनकी यह साजिश मीडिया ने कामयाब भी की..............छाप दी, चला दी.....मीडिया में....... झांडू के साथ उनकी तस्वीरें ताकि लगे की वो वास्तव में इस देश से गंदगी दूर करना चाहते हो। गंदगी साफ करनी है तो अपने घर के बाहर साफ कीजिए जहां हर रोज आप अपने घर को साफ करके कचड़ा फेंक देते हैं। गंदगी साफ करनी है तो अपने दिल को साफ करें जिसमें न जाने किस-किस प्रकार के कचड़े कई वर्षों से पड़े-पड़े सड़ रहे हैं। जिनमें पता नहीं कब से बू आ रही है। गंदगी साफ करनी है तो देश से अमीरी गरीबी का भेद मिटा कर करें जो सबसे बड़ी गंदगी को जन्म देती है। गंदगी साफ करनी है तो भूख को मिटा कर करें जो हर एक जुर्म का जन्म देती है।

अगर वास्तव में गांधी के सपना को मोदी पूरा करने चाहते थे तो उन मासूम बच्चों के बारे में भी जरा सी फिकर कर लेते जो कचरे में अपनी जिंदगी गुजार देते हैं, एक निवाले के खातिर। जरा सा आप लोग भी सोचिए.......अगर खुद से समय मिल जाए तो.......सिर्फ जरा सा..........  चंद तस्वीरे आप साझा कर रहा हूं। यह तस्‍वीरे 2 अक्टूबर के दिन सेवाग्राम रेलवे स्‍टेशन पर रेलवे कर्मचारियों एवं स्‍थाई नेता द्वारा सफाई का दिखावा करते तथा उसी दिन ट्रेन में बच्‍चों द्वारा मांगी जा रही भींख की कुछ तस्‍वीरें खींची थी। जिससे अंदाजा लगा सकते हैं कि सफाई कहां होनी चाहिए थी......?????????

Thursday, May 1, 2014

नीले गगन के तले, झांडियों में प्‍यार पले..........

नीले गगन के तले, झांडियों में प्‍यार पले..........

प्‍यार....प्‍यार....प्‍यार कौन सा प्‍यार और कैसा प्‍यार................. तितली वाला या फूल वाला, नदी वाला या समुंदर वाला, चांद वाला या चांदनी वाला, धूप वाला या छांव वाला, दोस्‍त वाला या दुश्‍मन वाला, भूख वाला या दौलत वाला, रूह वाला या जिस्‍मानी......प्‍यार को अपने-अपने अनुसार परिभाषित किया जा सकता है। अलग-अलग जगहों पर परिस्थिति के अनुकूल। अलग-अलग परिस्थितियों के अनुरूप यह अपनी मूल विधा से उन्‍मुक्‍त होकर हर बंधन से परे चला जाता है। जहां इसका अस्तित्‍व वक्‍त और स्थिति के साथ स्‍वत: बदल जाता है। आज के दौर में बदलना ही इसकी नियति है। इस नियति में बदलाव के पीछे नैतिकता के पतन और जल्‍द जवां होती चाहत को मान सकते हैं क्‍योंकि नैतिकता के पतन और जल्‍द जवां होने की चाहत ने प्‍यार के वास्‍तविक मायने ही बदल दिए। आज प्‍यार आंखों से तो शुरू होता है पर दिल की गहराईयों में न उतरते हुए, झांडियों के झुरमुट में अपना दम तोड़ देता है। इस प्‍यार को रूहानी प्‍यार की संज्ञा तो कभी नहीं दी जा सकती,  हां इसके क्रियाकलापों को देखते हुए इसे जिस्‍मानी प्‍यार का दर्जा अवश्‍य दिया जा सकता है। जो पल-पल बदलते समय के साथ अपनी स्थिति बदलता रहता है। कभी इसकी बांहों में तो कभी उसकी बांहों में....... पनपता रहता है। एहसास नहीं होता इनको, क्‍योंकि यह लोग भावनात्‍मक बंधनों से पहले ही मुक्‍त हो चुके होते हैं। इनके बीच एक प्रकार का अदृश्‍य अनुबंध, जिसमें जब तक मन हो प्‍यार की पेंगे भरी जा सकती हैं और यदि किसी एक का मन उचटा नहीं, कि अनुबंध स्‍वत: ही खत्‍म। खत्‍म हुए इस अनुबंध पर चाहे तो आपसी संबंधों की सहमति के आधार पर कुछ समय के उपरांत पुन: अपनी स्‍वीकृति प्रदान कर सकते हैं, नहीं तो किसी अन्‍य के साथ अनुबंध करने की आजादी उनके पास हमेशा ही रहती है। यह युवा पीढ़ी का धधकता हुआ युवा जोश है, जो विकास के नए नमूने को यदाकदा इजाद करता रहता है। वैसे हमारे वैज्ञानिकों ने प्‍यार के मिलाप से उत्‍पन्‍न होने वाली झंझट से इस जवां पीढ़ी को बेफ्रिक कर दिया है। शायद वो युवा जोश को पहले ही भांप गए थे कि आने वाली पीढ़ी किस तरह अपना रंग बदलेगी। तभी तो गली-गली हर कूचे में बेफिक्री की दवा आसानी से उपलब्‍ध हो जाती है। यह प्‍यार को बरकरार रखने के तरीके और किसी अन्‍य प्रकार की झंझट से मुक्ति का आश्‍वासन अवश्‍य ही जवां चाहतों को दिला पाने में सक्षम है। क्‍योंकि प्‍यार के मायने बदल गए हैं......
आज प्‍यार का ढांचा खोखली नींव पर खड़ा किया जाता है या होने लगा है। उसमें भी मिलावट देखने को मिलने लगी है। क्‍योंकि यह झांडियों वाला प्‍यार है, अब यह पतंगों वाला प्‍यार नहीं रहा। अब तो यह दुपट्टें में छुपी अंतरंग अवस्‍था का वो कपड़े उतारू प्‍यार, सामाजिक मान-मर्यादा से परे, बंदर-बंदरियों सी हरकते करते हुए समाज को अपनी मोहब्‍बत का तमाशा दिखाते रहते हैं कि आओं देखों हमारी नग्‍नतापूर्ण मोहब्‍बत को, जिसे हम खुले आम बाजार में नीलाम कर रहे हैं। यह प्‍यार तो नहीं है पर प्‍यार जैसा प्रतीत कराने की वो नाकाम कोशिशें जिन्‍हें यह जवां जोड़े समाज पर थोपने का काम बखूबी कर रहे हैं। हां यह कुछ समय बाद हमारी रंगों में खून बनकर जरूर दौड़ने लगेगा। और हमारी आने वाली नई जवां पीढ़ी भी इस नैतिकता को और अधिक ताख पर रखकर खुलआम सड़कों पर अपनी जिस्‍मानी जरूरतों की पूर्ति करते हुए देखे जा सकेंगे।
अगर यह कहा जाए तो गलत नहीं होना चाहिए कि भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में प्‍यार ने नैतिकता का हनन पश्चिमी सभ्‍यता से भलीभूत होकर ही किया है। क्‍योंकि तमाशबीन प्‍यार भारतीय सभ्‍यता में कभी नहीं रहा। हां यह प्‍यार लुकछिप के भारतीय संस्‍कृति में हमेशा से फल फूलता रहा है, पर नग्‍नता से विमुक्‍त होकर। परंतु जिस तरह पश्चिमी संस्‍कृति में नंगापन अपने पुरजोर पर हावी है उसी नंगेपन के जहर ने भारतीय युवा वर्ग को भी अपनी चपेट में भी लिया है। नंगेपन के जहर की चपेट में आए युवा वर्ग से यह बात तो अवश्‍य ही साबित होती है कि भारतीय युवा वर्ग सकारात्‍मक की अपेक्षा नकारात्‍मक प्रवत्ति को शीघ्र ही आत्‍मसात कर लेते हैं बिना उसके प्रभावों को समझते हुए। और वो पश्चिमी संस्‍कृति के समान आजाद होने की ललक के चलते वहां के नंगे प्‍यार का धीरे-धीरे अपनाते जा रहे हैं, तभी तो चार दिवारी से निकलकर यह प्‍यार सड़कों के किनारे बने पार्कों की झाडियों, सुनसान पड़े खंडहरों, खुलेआम पत्‍थरों की जरा सी आड़ में पनपने लगा है।


Thursday, March 20, 2014

दंगें की आग.........

दंगें की आग.........

रात के सुनसान सन्नाटे में अपने तेज कदमों के साथ बढ़ा जा रहा था। मंजिल पर पहुंचने की जल्दी भी थी और विरान पड़ी सड़क पर उपजने वाली डरावनी आवाज से पनपने वाला भय भी था। तेज कदमों के साथ दिल की धड़कनें भी तेज हो रहीं थीं। जिस पर इमरान का बस नहीं चल रहा था, चाह कर भी इमरान भय के कारण बढ़ने वाली धड़कनों पर काबू पाने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहा था। फिर भी कदमों को तेज और तेज बढ़ता ही जा रहा था। वैसे इमरान जिस इलाके से गुजर रहा था वो पिछले दस दिनों से कफ्र्यू की चपेट में था। पूरा इलाका किसी शमशान से कम नहीं लग रहा था, जगह-जगह आग की लपटों में कुछ न कुछ जल रहा था। कहीं लाठी, कभी चक्कू, कहीं तलवार, कहीं कट्टा तो कहीं जिंदा बम पड़े हुए थे जो फटने के लिए अपनी सांसे धीरे-धीरे तेज कर रहे थे। जगह-जगह क्या बूढ़ा, क्या जवान, क्या महिलाए और क्या बच्चे। न जाति, न धर्म बस संप्रदायिकता की मार से मुर्दा पड़ी उनकी अस्त-व्यस्त लाशें, आस लगाए कि कहीं कोई अपना बचा हो, जो हमें ठिकाने लगा दे। पर ऐसा नहीं था, दूर-दूर तक लाशों का जमावड़ा ही था। कौन किससे आस करे? पूरे के पूरे परिवार खत्म हो चुके थे।
वैसे कोई भी नहीं जान पा रहा था कि इस दंगें की चिंगारी को हवा कहां से और किसने दी? जिसकी आग में पूरा शहर जल उठा। जिसने सबको अपनी चपेट में ले लिया था। सरकार ने दंगें पर काबू पाने के उद्देश्य से कफ्र्यू का सहारा लिया और पूरे 12 दिनों तक कफ्र्यू लगा रहा। चारों तरफ सिर्फ पुलिस ही पुलिस, दंगों को रोकने के लिए तैनात थी। बावजूद इसके दंगा रह-रहकर भड़क उठता, जो 20-25 लोगों को निगलकर शांत हो जाता। उसी इलाके से रात को इमरान गुजर रहा था। इसी बावत एक भय दिल में बना हुआ था। जिससे न चाहते हुए भी खुद को निकाल नहीं पा रहा था। चला जा रहा था, टुकड़ों में विभाजित हो चुकी लाशें, जो कुछ दिन पहले जीती जागती हुआ करती थीं। उनको लांघते हुए एक शायर की चंद पक्तियां उसके जहन में आने लगीं। ‘‘एक दिन हुआ सबेरा, दिल में कुछ अरमान थे..... एक तरफ थीं झोपड़ियां, एक तरफ शमशान थे..... चलते-चलते एक हड्डी पैरों के नीचे आई, उसके यही बयान थे...... ऐ भाई जरा संभलकर चलना, हम भी कभी इंसान थे....’’ हां यह भी कभी जिंदा इंसान थे। उन्हीं से बचते-बचाते इमरान तेज रफ्तार से चला जा रहा था कि अचानक एक तरफ से किसी के बिलखने की आवाज ने दिल की धड़कनों को और बढ़ा दिया। उस ओर से आ रही मार्मिक रोने के आवाज ने जैसे पैरों को एकाएक रोक दिया। न चाहते हुए भी पैर खुद-ब-खुद रोने की दिशा की तरफ चल पड़े। थोड़ा चलने के बाद इमरान के पैर फिर थम गए, क्योंकि आवाज एक झोंपड़ी के अंदर से आ रही थी। झोंपड़ी के अंदर जाने की हिम्मत वो बहुत देर तक बटोरता रहा। जब हिम्मत ने साथ दिया तो अंदर घुस गया। अंदर का नजारा सभ्य पुरुष समाज की दरिंदगी की पूरी कहानी को खुद-ब-खुद बयां कर रहा था। एक 14-15 साल की बच्ची, जमीन पर पड़ी बिलख रही थी। उसके तन पर जालिमों ने एक भी कपड़ा नहीं छोड़ा था। पास जाकर देखा तो उसकी रूह ही कांप गई। उस बच्ची पूरे शरीर पर जगह-जगह पड़े घावों से खून रिस-रिस कर बह रहा था।

भेडिया और गिद्धों के समूह ने उस मेमने समान बच्ची को अपनी-अपनी हैवानियत पूरी करके जिंदा लाश बनाकर छोड़ दिया था। उसको देखकर इमरान के पैरों में मानों जान ही न बची हो। पैर खुद ही लड़खड़ाने लगे। और इमरान उसके पास ही बैठ गया। बच्ची ने इमरान को देखकर अपने नग्न शरीर को अपने हाथों से छुपाने की नकाम कोशिश करने लगी। इमरान ने उसके सिर पर हाथ रखा तो वह बुरी तरह कांपने लगी। डरो नहीं, मैं तुम्हारी मदद करने आया हूं। डरो नहीं। इमरान वहां से उठा और झोंपड़ी के कोने-कोने में देखने लगा। कहीं कोई कपड़ा मिल जाए, जिससे इसके नग्न बदन को ढांक सकूं? पर पूरी झोंपड़ी में कहीं कुछ भी नहीं मिला। इमरान झोंपड़ी के बाहर आ गया। कुछ देर तलाशते रहने के बाद भी उसे कहीं कुछ इस तरह को नहीं दिखा जिससे उस बच्ची के तन को ढांका जा सके। एकाएक उसकी दृष्टि पास ही पड़ी एक महिला की लाश पर गई। जिसके तन पर साड़ी थी। इमरान उस महिला की लाश से साड़ी उतारने लगा। दिमाग में ख्याल आया कि मैं भी किसी महिला को नंगा कर रहा हूं। फिर ख्याल आया कि किसी मृत पड़ी लाश की अपेक्षा उस बच्ची को इसकी जरूरत ज्यादा है। इमरान ने उस महिला की लाश से साड़ी उतारी और वापस उस झोंपड़ी में आ गया। वहां पहुंचा, तो देखा वो अब रो नहीं रही थी। इमरान उसके पास बैठ गया और उससे कहा.... लो इसको पहन लो... उसने कोई रिस्पोंस नहीं दिया। उसने पुनः उससे कहा कि बेटा इसको पहन लो... पर कोई जवाब नहीं। उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसका शरीर ठंडा पड़ चुका था। समझते देर नहीं लगी कि अभी तक जिंदा बच्ची लाश में तबदील हो चुकी है। आंखों से आंसू बह निकले। मृत हो चुकी उस बच्ची के नग्न शरीर पर उस मृत महिला की साड़ी से ढंक दिया। एक मृत की साड़ी उतारकर दूसरे मृत के नग्न शरीर को इमरान ढंक रहा था। उसके शरीर को साड़ी से ढंकने के बाद उसने उस बच्ची की लाश को अपने हाथों में उठा लिया और झोंपड़ी से बाहर निकलकर चल पड़ा। कुछ दूर पर चलने के बाद इमरान ने उस बच्ची की लाश को जमीन पर रख दिया और यहां वहां से लकड़ियां जुटाकर, दंगें की ही आग में उसको स्वाहा कर दिया।

Sunday, November 17, 2013

मीडिया में महिला खबरें गौण

मीडिया में महिला खबरें गौण

मीडिया अपनी मिशन की यात्रा करते हुए आज कालपनिक दुनिया का सफर तय करने लगा है। जिसमें हर चीज कल्पना के इर्द-गिर्द घुमती हुई दिखाई देती है। कालपनिक दुनिया ने जैसे हमारे सीमित उपयोगितावादी चेतना तंत्र को मानो डंस लिया है। जिसका जहर हम सब की रगों में खून बनकर दौड़ता मालूम पड़ता है। वैसे मीडिया इस कालपनिक दुनिया का सहारा लेकर हमारे समाज में वेश्या जैसी भूमिका निभाता हुआ प्रतीत होता है। जिसको न तो अपयाना जा सकता है और न ही तिरस्कार। हालांकि व्यापक समाज किसी भी तंत्र के प्रति निर्विकार रह सकता है, परंतु यदि उसमें सभ्य आचरण की अंतरंगता को विज्ञापनी व्यावसायिकता में तब्दील करके सभ्य संभोग का प्रस्तुतिकरण करके दिखाए जाने के उपरांत यदि वह उत्तेजित हो उठता है, तो इसमें स्वार्थ या पाखंड का मूल तत्त्व विराजमान है। इस तत्त्व का बचाव यह कह कर नहीं किया जा सकता कि यह बुराई तो एक आदिम बुराई है और मीडिया एक आधुनिक घटना, जिससे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह इस अश्लीलता को प्रोत्साहित या सहन करेगा। तनिक-सा गौर करते ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि जहां तक स्त्री का ताल्लुक है, तथाकथित आदिम और तथाकथित आधुनिक दृष्टियों में कोई बुनियादी फर्क नजर नहीं आता है। साथ ही यह भी कि संगठित इस तंत्र के जन्म के पीछे जो व्यावसायिक दबाव थे, वही दबाव आज मीडिया में देखने को मिल रहे हैं। क्योंकि अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि यही व्यावसायिकता कहीं-न-कहीं मीडिया उद्योग की भी प्राणवायु बन चुकी है।
वैसे मीडिया में सभी तरह की खबरों का समावेश देखने को मिलता है, परंतु मीडिया में प्रकाशित/प्रसारित खबरों में स्त्री हमेशा गुम रही है। क्योंकि उसे सार्वजनिक जीवन से बाहर रखा गया है। फिर भी स्त्रियों के साथ चूंकि बहुत कुछ ऐसा घटित होता रहता है जिससे हमारी यथास्थितिवादी चेतना को भी धक्का पहुंचता है। अतः स्त्रियों को मीडिया में लाना जरूर हो जाता है। लेकिन अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि वे स्त्रियों  से संबंधित खबरें नहीं हैं। वे भी पुरुषों की ही खबरें हैं-उन पुरुषों की खबरें, जिन्होंने स्त्रियों के साथ कुछ अमान्य आचरण किया है। मसलन दहेज के लिए प्रताडित, हत्या, छेड़छाड़, बलात्कार, नारी देह का प्रदर्शन आदि, जो पुरुष ने किया है और वह स्त्री के साथ हुआ है। वैसे उसके लिए कोई नाम तक नहीं है हमारे पास। इससे पता चलता है कि घटनाओं के बयान करने वाली हमारी शब्दावली तक कितनी नकाफी है।
अब प्रश्न यह उठता है, कि स्त्रियों से संबंधित खबरें क्या हो सकती है? ये खबरें वही हो सकती हैं जिसके केंद्र में स्त्री यानी उसकी स्थिति, उसकी समस्याएं और उसकी सक्रियता हो। हालांकि स्त्री की ऐसी सक्रियता बहुत कम ही है जो खबरों का रूप ले सके। यह एक ऐसा पहलू है, जिस पर स्त्रियों को गइराई से विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि पुरुष सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे हैं अथवा उसका दुरूपयोग कर रहे हैं, इसलिए वे हमेशा खबरों के केंद्र में आ जाते हैं। इस संघर्ष रणनीति में स्त्री नहीं के बराबर मौजूद हैं और जितनी है भी, वह चर्चा का विषय बनती ही है। इसलिए सीमित होने के कारण स्त्री के अपने संघर्ष मीडिया में प्रतिबिंबित नहीं होते। इसका कारण यह यथास्थितिवादी सोच ही है कि स्त्रियां मौजूद सत्ता संतुलन को छेड़ कर जैसे कुछ अनैतिक काम कर रही हैं। इस मामले में उनकी हैसियत आदिवासियों या हरिजनों से भी गई-गुजरी है।
वस्तुतः यह है कि स्त्री को लगातार हजारों कामुक निगाहों का सामना करना पड़ता है। घर, बाहर लगातार उसे स्त्री होने का दंड भोगना पड़ता है, तो क्या यह बात मीडिया में प्रकाशित/प्रसारित करने लायक है-उस मीडिया में, जो स्वयं इस प्रक्रिया से पूरी तरह बरी नहीं हो पाया है? कौन-सा अपराध संवाददाता इन छोटी-छोटी, किंतु गंभीर घटनाओं की दैनिक सूची बनाता है? वैसे स्त्री के सभी मौलिक अधिकार, जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या जहां इच्छा हो वहां जाने का अधिकार तो हमेशा निलंबित रहते हैं, तो मीडिया में किस-किसका उल्लेख किया जाए? निश्चय ही बहुत सारी खबरें इसलिए खबरें नहीं बन पाती हैं क्योंकि वे हमारी दिनचर्या का अंग बन चुकी होती हैं। तो क्या स्त्री की नियति बदलने में मीडिया के सभी जनसंचार माध्यमों की ओर से हमें बिल्कुल निराशा ही हाथ लगने वाली है? क्या यह मान लेना चाहिए कि मीडिया स्त्री की उपेक्षा या स्त्री विरोध के लिए अभिशप्त हैं, अतः वह इस वर्ग के लिए कुछ कर नहीं सकता?
इस लेख के कुछ अंश राजकिशोर द्वारा लिखित पुस्तक ‘पत्रकारिता के नए परिप्रेक्ष्य से लिए गए हैं। राजकिशोर जी सभार.......


Wednesday, November 13, 2013

गंदगी से बू आने लगी.........

गंदगी से बू आने लगी.........

भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की सभी सभ्यताओं ने अपने-अपने क्रमिक विकास में नारी को नीचे और नीचे धकेलते हुए पुरुष की शारीरिक सामथ्र्य और बौद्धिक श्रेष्ठता को तो स्थापित किया ही है साथ ही नारी के साथ सबसे क्रूर उपहास यह किया कि उसे एक देह मात्र में समेट कर रख दिया। पुरुष द्वारा स्थापित इस भार के नीचे स्त्री की समस्त प्रतिभा, अद्भूत शैक्षणिक योग्यता, प्रत्युत्पन्नमतित्व और सारी योग्यताएं गौण बन कर रह गई, यानि न के बराबर हो गई। अगर कुछ बचा तो वह है नारी देह का सौष्ठव और सौंदर्य। यह मानसिकता वर्षों से चली आ रही है। सदियों से चली आ रही इस मानसिकता का प्रभाव यह हुआ कि नारी का सुंदर शारीरिक रूप ही पुरुष और समाज द्वारा स्वीकार किया जाने लगा। क्योंकि पुरुष तो पुरुष, स्त्री समाज में भी नारी की प्रतिभा, और योग्यता की अपेक्षा सुंदर शरीर को ही वरीयता प्रदान की जाने लगी है।
यह सर्वविदित तथ्य है कि ‘‘पुरुष की अपेक्षा स्त्री में सौंदर्य-बोध अधिक होता है। जिसको हम बचपन में बच्चों के व्यवहार के स्वरूप में साफ तौर पर देख सकते हैं कि लड़कियां जहां घर-घर खेलती हैं और अपनी मां के सौंदर्य सामग्रियों का उपयोग करती रहती है, वहीं लड़के दिन भर चोर-सिपाही तथा और भी बहुत सारे खेल खेलते देखे जा सकते हैं। जो लड़के-लड़कियों को उनके व्यवहार से कहीं न कहीं अलग करता है। वैसे हम आदिकाल से ही देखते आए हैं कि स्त्री अपने शरीर को विभिन्न अलंकारों से सुसज्जित सुशोभित करती आई है। पुरुष की दृष्टि में, पुरुष के वर्चस्ववाद समाज में, सुंदर देह ही स्त्री की पहचान बनी थी। वैसे बीसवीं शताब्दी में शिक्षा के प्रसार और स्त्री मुक्ति के संदर्भ में आंदोलनों ने नारी विमर्श के अनेक प्रश्नों को जन्म देकर स्त्री को अपने अस्तित्व और अस्मिमा के प्रति जागरूक तो बना दिया। परंतु औद्योगिक क्रांति और उपभोक्तावादी संस्कृति ने वस्तुओं के प्रचार के लिए विज्ञापनों का सहारा लिया। और विज्ञापन को लुभावना बनाने के दृष्टिकोण से सुंदर देह से बढ़कर और क्या हो सकता था तो स्वाभाविक परिणति के रूप में सदियों की दासता निद्रा से जागती स्त्री को पुरुष ने फिर सुंदर शरीर के रूप में विज्ञापन की वस्तु बना दिया। उसने स्त्री शरीर के अद्भुत रोमांच और आनंद को भली प्रकार पहचान लिया। अतः उसने स्त्री शरीर से व्यावसायिक लाभ कमाने और नारी देह तथा नारी सौंदर्य को अपना व्यवसाय-व्यापार बढ़ाने का साधन बना लिया। विडंबना तो यह रही कि पुरुष की मनोवृत्ति को पहचान कर भी स्त्री नहीं संभली। वह अपने ही देह प्रदर्शन, सौंदर्य प्रदर्शन, में जाने-अनजाने रस लेने लगी है। यही कारण है कि ‘‘ब्यूटी पार्लरों, मॉडलिंग कंपनियों, नाइट क्लबों, रेस्तराओं, होटलों, कॉल सेंटरों, शॅपिग मॉल्स और भी असंख्य स्थानों पर काम करने वाले कर्मचारियों में युवतियों की संख्या बड़ी तेजी से दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है।’’  जो आज आने-अनजाने में कहीं न कहीं अश्लील है और यह समाज में अश्लीलता को बढ़ावा देता है।
हालांकि इसके मूल में कई कारण हैं जो स्त्रियां खुद ही अपनी देह का प्रदर्शन करने लगी हैं। वैसे इसके विश्लेषण से जो तथ्य ज्ञात होते हैं उससे साफ स्पष्ट है कि पुरुष और पश्चिमी संस्कृति ही इसके मूल में विराजमान है। क्योंकि एक तरफ पुरुष जहां नारी को तरह-तरह से उत्पीड़त करके उसको अपने काबू में रखना चाहता है। दूसरी तरफ पुरुष नारी को उपभोग की वस्तु (भोग्या) के रूप में भी प्रदर्शित करना चाहता है ताकि अपनी कामुक इच्छाओं की पूर्ति कर सके। वहीं पश्चिमी संस्कृति से ओत-प्रोत होकर नारियां ने इसे ही अपना हथियार बना लिया है जिसको हम भारतीय संस्कृति में विराजमान देवी-देवताओं की कहानियों में भी पढ़ सकते हैं कि किस प्रकार विश्वामित्र और भसमाशुर और न जाने कितने ऐसे पुरुष जिनको नारियों ने अपनी देह के द्वारा या तो उनकी तपस्या भंग की या फिर उसे मारवाने में सहयोग किया। ठीक वो ही प्रवृत्ति को अपनाते हुए और पुरुष की विकृत सोच जो नारी देह पर हमेशा से केंद्रित रही है उसे समझ लिया है। तभी तो आज के परिपे्रक्ष्य में नारी अपनी देह को ही अपना ब्राहमास्त्र के रूप में इस्तेमाल करने लगी हैं। यदि यहां इस बात का भी विश्लेषण कर लिया जाए कि नारी के सुंदर देह पर कौन-कौन मोहित हुआ है तो अपवाद स्वरूप शायद यदाकदा ऐसा कोई मिल जाए जो इससे प्रभावित नहीं हुआ हो, नहीं तो ऐसा कोई पेड़ उपजा नहीं, जिसे हवा न लगी हो।

आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो सभी पुरुष इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं। और अब तो स्त्रियां भी ऐसा ही करने लगी हैं। ताकि वो अपनी देह से मुनाफा कमा सके। मुनाफा कमाने की इस नीति के चलते वो इस अश्लीलता के दलदल में गले तक धंस चुकी हैं। इन्हीं की देखा-देखी आने वाली नई पीढ़ी भी इन्हीं के पदचिह्न पर चल पड़ी है। वैसे देखा जाए तो समाज में यह गंदगी पहले से ही मौजूद रही है। इस गंदगी की शुरूआत पुरुष समाज द्वारा ही हुई है जो धीरे-धीरे पुरुष प्रधान समाज द्वारा बढ़ती गई। अब आलम यह हो चुका है कि इसमें महिलाओं की सहभागिता के कारण इस गंदगी में बदबू आने लगी है। जो कहीं न कहीं समाज को पूर्णतः गदला रही है। हालांकि स्वयं द्वारा उत्पन्न इस गंदगी से अब समाज भी सकते में आ गया है कि इसका आने वाला भविष्य क्या होगा? यह तो एक ही कहावत चरितार्थ होती है कि बोए पेड़ बबूल का, तो अमीया कहां से पाए........ क्योंकि गंदगी का सफाया पहले ही नहीं किया गया तभी तो इसमें अब बू आने लगी है तो अब पछताने से क्या फायदा।