सरोकार की मीडिया

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Friday, November 25, 2011

महिला राजनीतिक सशक्तिकरण और मीडिया

मीडिया और स्त्री के निहितार्थ विभिन्न घटकों में मीडिया के सापेक्ष स्त्री और स्त्री के सापेक्ष मीडिया का मूल्यांकन शमिल है। आज के मीडिया का अर्थ जहां अब तोते, कबूतर, दूत-दूती, पोस्टमैन, घोड़ा वगैरह नहीं रह गया है, वहीं आज की स्त्री का मतलब भी करूणामूर्ति, हूर, अबला, मां, बहन, पत्नी, कुमारी, सुकुमारी आदि तक सीमित नहीं है। मीडिया हमारे समय का बहुत प्रबल घटक है। और, महिला हमारे समय में अपनी पहचान और छाप और होने की पूरी शिद्दत के साथ अपने बूते पर दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। इस संदर्भ में महिला मीडिया की ओर आषा भरी निगाहों से देख रही है। मीडिया अपनी चमक को और चमकीला बनाने के लिए स्त्री का उपयोग करने के लिए आतुर है, जबकि स्त्री अपनी अस्मिता को साबित करने के लिए मीडिया का उपयोग करने के वास्ते हलकान है। इस जुगलबंदी में मीडिया की मंषा और उसका वर्तमान तो काफी हद तक स्पष्ट  है। लेकिन, स्त्री की मंशा और उसकी ऐतिहासिक स्थिति इससे काफी जटिल है। आंकड़ें बताते हैं कि आधुनिक विश्वक में सामाजिक स्तर पर क्या विकसित, क्या विकासशील और क्या अविकसित देशों में थोड़े-बहुत हेर-फेर के स्त्री को पुरूष के सापेक्ष दोयम दर्जे का ही नागरिक माना जाता है, और इसी आधार पर उनके साथ होने वाला उत्पीड़न प्रायः सार्वभौमिक है। इस दृष्टि से समूची दुनियां की स्त्री के दुख, समस्या और परिस्थिति एक जैसी है। और, स्त्री की सत्ता कई तरह से बीच बहस में है, केंद्र में है।
समकालीन परिवेश में विश्वइ की गिनी-चुनी शक्तियों में मीडिया की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता है। अस्तु, मीडिया सशक्त माध्यम है, जनभावनाओं को व्यक्त करने का। मीडिया अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से रखता है, जिसका सीधा-सीधा प्रभाव देखने वालों पर पड़ता है। साथ ही मीडिया ने वैश्विक दूरियों को कम किया है। राष्ट्री य और वैश्विक स्तर पर घटित घटनाओं को सामने रखा है। मीडिया के दोनों माध्यमों इलेक्ट्रॅनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया का आज भी खास प्रभाव है। इसलिए महिलाओं से जुड़े तमाम देखे-अनदेखे, ज्ञात-अज्ञात मुद्दों को सामने लाने में मीडिया की भूमिका ध्यातव्य है। मीडिया में इस हेतु संवेदनशील गहरी अंतदृष्टि अपेक्षित है। इतना ही नहीं, वैश्विक समस्याओं से लेकर स्थानीय मामलों तक को मीडिया उठाता है हालांकि, जीवन के सथार्थ से जुड़े मुद्दों को लेकर मीडिया के दोनों माध्यमों की सक्रियता कम दिखती है, अभिरूचि कम दिखती है। इस संदर्भ में उदाहरण स्वरूप कहना चाहिए कि वे स्त्रियों से जुड़े मामलों को उतना महत्त्वपूर्ण नहीं मानते है। मीडिया में भी वही पितृसत्तात्मक मानसिकता काम करती है, जो सदियों से स्त्रियों के लिए नियम-कायदे बनाती चली आई है।
इसमें संदेह नहीं कि मीडिया ने स्त्री के लिए संभावनाओं के कई आयाम खोल दिए हैं। ये जितने रूपहले और चमकीले हैं, उतने ही आत्मस्मृति मुलर (अपने को पहचान की सुविधा प्राप्त करने वाले) और आत्मनिखार के अवसर देने वाले भी। हम अगर उसे वैश्विक संदर्भ में सिर्फ़ बाजार मान लें, तभ भी एक यह गुंजाइश तो बची ही रहती है कि हम वहां एक प्रतिस्पर्धी उपस्थिति के लिए स्वाधीनता के साथ संघर्षरत रहें। गायन, नृत्य, अभिनय, कला-कौशल की अन्य भूमिकाओं में मीडिया ने स्त्री के लिए लगभग युगांतर की स्थिति / उपस्थिति पैदा कर दिया है। जानी-मानी गायिकाएं, युवा-नृत्यांगनाएं, अभिनेत्रियां अनेक महत्वपूर्ण चैनलों से जुड़ी सूचना और संवाद दूतियां इस सच्चाई को प्रमाणित करती हैं कि महिलाओं के जीवन के इतिहास में एक नए युग की शुरूआत हो चुकी है। इस संदर्भ में मीडिया हस्तक्षेप व दखल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए अब महिलाओं के समक्ष चुनने की क्षमता अथवा उनके विकल्पों में इज़ाफा हुआ हैं और वह नई दृष्टि से अपने आस-पास को देखने लगी हैं। मेरा मानना है कि स्त्री हमेशा से अधिक नैतिक, मानवीय और उर्जामयी रही है। आगे भी उसकी यही छवि रहेगी। क्योंकि, वह जितनी भावनात्मक है, उतना ही मर्यादामय भी। मीडिया की कार्यशैली व सोच में महिला की दृष्टि बहुत अधिक दिनों तक अछूती नहीं रहेगी। वह आयाम एक नयी दृष्टि लेकर महिला सशक्तिकरण के समस्त प्रयासों को उर्जामय बना देगी, ऐसी संभावना व्यक्त की जा सकती है।

अपराध और मीडिया

                                               अपराध और मीडिया

अपराध का इतिहास तो बहुत ही पुराना है। देखा जाय तो हर समाजशास्त्री ने अपराध को अपने-अपने नजरियें से परिभाषित किया है और अपराध को एक सामाजिक संबंध में बांध दिया है। जिसमें उसके नियम और कानून का पालन करना पड़ता है। भारतीय समाज में अपराध कई रुपों में व्याप्त है। यह बात सही है कि अपराध के लिए भारतीय समाज की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितयाँ उत्तरदायी हैं, जैसे-गरीबी, आर्थिक-पिछड़ापन, विषमता, सामाजिक व्यवस्था, निरक्षरता, अज्ञानता आदि, जिनसे विवश होकर लोग आपराधिक प्रवृत्ति का रास्ता चुन हैं। एक ओर अपराध जगत आकर्षित करता है और दुसरा अपराध जो घृणा, द्वेष, राजद्रोह, अलगाववाद, मजहवी उन्माद आदि से प्रेरित होता है। जिसके कारण आतंकवादी एवं हिंसक गतिविधियाँ बढ़ती हैं।
निजी चैनल के आगमन की बात कहें तो सबसे पहले निजी चैनलों में जी.टी.वी. का आगमन 1993 में हुआ, उसके बाद स्टार न्यूज आया।  निजी चैनलों ने अपने प्रसार कार्यक्रमों के निमार्ण में, सबसे पहले सामाजिक परिवेश को समझा और धीरे-धीरे अपने अनुरुप कार्यक्रमों का निमार्ण किया। दर्शकों को अपनी ओर खीचा, दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए नये-नये कार्यक्रमों का प्रसारण शुरु कर दिया, जिसे मानवीय रिश्तों के कार्यक्रम कहा जाता है। लेकिन अवमानवीय संबंधों को अनसुना कर दिया गया। नये कार्यक्रमों के साथ-साथ अपराध कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया जाने लगा। जिसे अमानवीय कहा जा सकता है। लेकिन आज हर न्यूज चैनल अपराध की खबरों को महामंडित करके खुलेआम परोस रहे हैं। जो अपराधी नहीं हैं, उनको भी अपने कार्यक्रमों के द्वारा उन पर मुकद्मा चलावा देते हैं। और दर्शकों को लगता है, कि यही अपराधी होगा। क्योंकि दर्शक जब टेलीविजन कार्यक्रम देखता है तो जो दृश्य उसके समाने परोसे जाते हैं वो उसके चेतन मन में घर कर जाते हैं। चाहे वो सही हो या गलत,  वैसे दो प्रवृत्तियां समाज में काम करती हैं-
एक तत्यपरक रिर्पोटिंग और दूसरी प्रवृत्ति के रुप में पुरानी किसी घटना को जीवंत कर या नाटकीय रुपांतरण करके दिखाना। इस तरह के कार्यक्रमों में अपराध को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। अब तत्यपरक रिर्पोटिंग को देखा जाय तो आज तक, स्टार न्यूज और NDTV चेनलों में अपराध खबरे, सामाजिक प्रभावों के बारे में बिना सोचे दिखा दिया जाता है, कि अपराध आम जन-जीवन के लिए समस्या अंग हो। आज साधारण और असाधारण खबरों में फर्क ही महसूस नहीं हो पा रहा है। कौन खबर सामान्य है? और कौन असामान्य है? ये खबरियां चैनल अपराध को सकारात्मक रुप में पेस कर रहे हैं। अपराधी को किसी ग्रुप से जोड़कर, प्रचार-प्रसार किया जाता है। जिससे अपराधियों को और मद्द मिल रही है। अपराधी के व्यवहार को रोमांटिक रुप में पेश किया जा रहा है। अपराध के बारे में तो बताया जाता है लेकिन अपराधी की गिरफ्तारी को नहीं बताया जाता। आज अपराधियों को ताकतवर रुप, समाज पर तीव्रगति से असर करता है। अपराध की खबरे व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होती है। अपराधिक कार्यक्रमों को देखा जाए तो सभी चैनल का यह एक अभिन्न अंग बन चुका हैं जो चैनल के लिए ज्यादा-से-ज्यादा टी.आर.पी. बढ़ाने के चक्कर में अचार संहिता को भी ताक पर रख दिया जाता है।
 यह बात सही है कि सामाजिक सरोकार नैतिक मान्यताओं के साथ जुड़ा हुआ है। सभी प्रकार के समाजों में कुछ व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार प्रतिमानों का उल्लंघन करते हैं, जिसमें अपराध का प्रतिमान नजर आता है। दुनिया को एक नजर देखा जाए तो पूरे विश्व में किसी-न-किसी रूप में अपराध देखने को मिलता है। भारत में टेलीविजन के आगमन होना और समाज के लिए शिक्षा, सूचना और मनोरंजन के रूप में कार्यक्रमों का निर्माण करना और समाज को एक नई दिशा के रूप अहम भूमिका का निवर्हन करता है।
समाज में घटित होने वाली घटनाओं को दूरदर्शन पर ‘आँखों देखी’ का एक कार्यक्रम में प्रस्तुत किया जाता रहा, लेकिन जैसे ही दूरदर्शन का एकाधिकार समाप्त हुआ और टेलीविजन की दुनिया में निजी चैनलों का आगमन होने तथा वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण ने हर चैनलों को अपने मुनाफे कमाने का एक रास्ता खोल दिया। इसके साथ-साथ अधिक-से-अधिक टी.आर.पी. को बढ़ाने के लिए आपराधिक कार्यक्रमों का बोलबाला होने लगा। अमेरिकन ‘मोस्ट वाटेड’ कार्यक्रम के तर्ज पर सुहेव इलियासी ने इंडियाज मोस्ट वांटेड कार्यक्रम को चर्चित कर दिया। इस कार्यक्रम ने अनेक अपराधी पकड़वाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। निजी चैनलों में क्राइम शो को लेकर सभी चैनलों में एक होड़-सी मच गयी और क्राइम शो के आधार पर हर समाचार निर्मित किये जाने लगे हैं। अपने शो को चलाने के लिए अपने विषय का चुनाव करने वाले NDTV ने FIR शुरू किया तो वहीं आज तक ने (जुर्म) और जी न्यूज ने (क्राइम फाइल) और (रेड एलर्ट) स्टार न्यूज ने शुरू किया। 2005 तक आते-आते क्राइम शो का बाजार इतना फैल गया की अन्य समाचारों की अपेक्षा अपराध कार्यक्रमों की टी.आर.पी. अधिक होने लगी, जिस कारण से अपराध कार्यक्रमों से अधिक-से-अधिक विज्ञापन मिलने लगे।
क्राइम शो के निर्धारण का समय लगभग 11 बजे रात को किया गया, जिसे आज (टी.आर.पी.) की दृष्टि से भी दर्शक की संख्या कम नहीं होती है। क्राइम घटनाओं में मसाला लगाकर इस तरह परोसा जाने लगा कि दर्शक कार्यक्रमों से बंधे रह जाते हैं। हर चैनल अधिक- से-अधिक टी.आर.पी. बटोरने के चक्कर में पड़ गया है व अपराध और सामाजिक नैतिक मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं रह गया है। हर ख़बरियां चैनल ही टी.आर.पी. की लूट-घसोट में पड़ा है। एक-दूसरे से प्रतिस्पद्र्धा है। सभी तरह से समझौता करके चैनल नंबर वन होना चाह रहे हैं। देखा जाय तो टेलीविजन पर सेक्स और अपराध का आधारित कार्यक्रमों की भरमार लगी है।
आज समाज जागरूक हो रहा है। जब ‘इण्डियाज मोस्ट वांटेड’ क्राइम शो शुरू किया गया था तो लगभग छियासी (86 अपराधी पकड़े गये थे। कार्यक्रमों के उपलब्धि के रूप में माना जाता है। जैसे जालसाजी, ठगी, बेईमानी, धोखेबाजी, की वारदातों से समाज का हर व्यक्ति जागरूक हुआ है। आज देखा जाय तो 2011 में हर चैनल आपराधिक कार्यक्रमों समय जरूर दे रहे हैं। आज दर्शक को एक उपभोक्ता के रूप में देखा जा रहा है। फिर भी सामाजिक जन-जीवन को ध्यान में रखकर ही कार्यक्रमों का निर्माण किया जाता है। इससे दर्शकों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अगर समाज का अध्ययन किया जाए तो जितनी भी विचारधारा होती हैं, वे किसी के लिए सकारात्मक होती है तो किसी के लिए नाकारात्मक। उसी तरह से दर्शक में कुछ में नकारात्मक तो कुछ में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। यह कारण सर्वमान्य हो सकते हैं कि समाज में अगर अपराध नहीं होता, तो अपराध खबरों के कार्यक्रमों का निर्माण खबरियां चैनलों द्वारा नहीं किया जाता। इससे समझ में आ रहा है कि समाज में भी हर कोई आपराधिक कार्यक्रमों से कहीं-न-कहीं प्र्रभावित तो जरूर होता है।
अब बात यहां आकर रूक जाती है कि अपराधिक खबरों के प्रसारण से समाज में कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके लिए एक शोध की आवश्यकता महसूस होती है। परंतु संपूर्ण कार्यक्रम के प्रसारण करने का ढंग देखा जाए तो अपराधिक प्रवत्तियों को कहीं-न-कहीं बढ़ावा देती नजर आती है। क्योंकि समाज जितना अच्छाई को स्वीकार करता है उसकी तीव्र गति से उसकी बुराईयों को स्वीकार कर लेता है। इस आलोच्य में कहा जाए तो जब से अपराधिक कार्यक्रमों की बाढ़-सी आई है तब से समाज में अपराध बढ़े हैं कम नहीं हुए, और इन अपराधों की संख्या में इजाफा का जिम्मेवार उन अपराधियों के साथ-साथ मीडिया भी है जिसे मीडिया माने या न माने पर जिम्मेवारी तो उसको लेनी ही पडे़गी। क्योंकि मीडिया, अपराध को जिस तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, और समझता है कि हमारा कम तो हो गया। हां काम तो हो गया, समाज को उस अपराध से रू-ब-रू कराने का, जिनसे अभी तक समाज अनभिज्ञ था। इस तरह अपराधों को यदि मीडिया दिखाता रहा तो समाज में अपराधियों की बढ़ोत्तरी को सरकार तो क्या खुद मीडिया भी नहीं रोक पायेगा। वक्त रहते संभलने की जरूरत है या टी.आर.पी. के खेल के चलते, समाज में अपराध को बढ़ाने की, यह मीडिया और समाज भलीभंति सोच सकते हैं। सोचों, आखिरी सोच आपकी है और समाज हमारा।

Wednesday, November 23, 2011

मीडिया और मानवाधिकारों का हनन

                                                मीडिया और मानवाधिकारों का हनन



टेलीविजन समाचारों के आने के बाद समाचार के क्षेत्र में क्रांति आई है। जल्दी और ताजा खबरों की मांग बढ़ी है। फोटो का महत्त्व बढ़ा है। स्वयं को देखने सजने, संवरने और ज्यादा से ज्यादा मुखर होने की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। व्यक्तिवाद में वृद्धि हुई है। किंतु इसके साथ साथ खबरों को छिपाने या गलत खबर देने की प्रवृत्ति में भी वृद्धि हुई है। खासकर मानवाधिकारों के हनन की खबरों को छिपाने के मामले में मीडिया खासकर टीवी सबसे आगे है। चूँकि मानवाधिकार का संदर्भ किसी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा से सम्बद्ध है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा 1948 विश्व की एक महत्त्वपूर्ण घटना है और संयुक्त राष्ट्रसंघ की महान उपलब्धि है।

मानवाधिकार स्थैतिक नहीं है। ये गतिशील है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के विकास कार्यक्रम के तहत् हर वर्ष प्रकाशित मानव विकास रिपोर्ट में नए आयामों की झलक मिलती है। वे सब तत्व जो मानव के विकास के मार्ग में बाधक हैं वहां मानवाधिकारों का उल्लंघन है, रोजगार भी उतना ही बड़ा मानवाधिकार है जितना जीने का अधिकार है। मंहगाई भी मानवाधिकार का हनन है, आबादी की विस्फोटक बाढ़ मानवाधिकार का हनन है, प्रदूषित पर्यावरण मानवाधिकार पर अतिक्रमण है।

भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन अक्टूबर 1993 में हुआ। राष्ट्रीय तथा राज्य मानवाधिकार आयोगों को विशेष रूप से उन मानवाधिकारों की रक्षा का भार सौपा गया है जिनका पुलिस तथा सुरक्षा बलों द्वार अतिक्रमण किया जाता है, यह पर्याप्त नहीं है वास्तव में मानवधिकार आयोग को दण्ड तथा राहत देने का भी अधिकार दिया जाना चाहिए।

मानवधिकार आयोग के अब तक जितने अध्यक्ष रह चुके है उन सबने ज्यादा अधिकारों की मांग की है। मानवाधिकारों की मौजूदा परिभाषा में व्यक्ति अधिकारों की मांग की है। मानवाधिकारों की मौजूदा परिभाषा में व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से जुड़े संवैधानिक अधिकारों में वे अधिकार भी जोड़े जाए जो उन अतंरराष्ट्रीय संधियों व परम्पराओं में किए गये है जिनमें भारत का एक पक्षकार है। साथ ही सरकार को आयोग की सिफारिशें भी मानना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पश्चिमी संगठनों का एकतरफा पक्षपातपूर्ण नजरिया रहता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित सभी संगठन केवल अपराधियों एवं आतंकवादियों के मानवाधिकारों को बात करते हैं। लेकिन आतंकवादियों के हाथों मारे गए निर्दोष लोगों के बारे में कुछ नहीं कहते। भारत में जम्मू-कश्मीर में मारे गए निर्दोष लोगों की बात एमनेस्टी इंटरनेशनल नहीं करता है। पाश्चात्य देशों में मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट इतनी ज्यादा एकतरफा और पूर्वाग्रह ग्रस्त होती है कि उनकी नीति और उद्देश्यों पर शक होने लगता है।

 जर्मनी यदि भारत के कालीन उद्योग में बच्चों के अधिकार का सवाल उठाता है तो इसके पीछे उसका व्यावसायिक हित छिपा दिखाई देता है। अमेरिका भी यदि चीन में किसी घटना के बहाने मानवाधिकार का प्रश्न उठाता है तो उसके पीछे मकसद वहां की सरकार और उसकी व्यवस्था को बदनाम करना होता है। वास्तव में मानवाधिकार का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के ब्रिटिश विभाग के एक पत्र में मुखपृष्ट पर इस मानवाधिकार संघ ने कश्मीरी महिलाओं पर सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले अत्याचार बताने के नाम पर एक दक्षिण भारतीय स्त्री का चित्र दे दिया था। ऐसे कई उदाहरण है जिनमें इन संगठनों का पक्षपातपूर्ण रवैया रहा है।

प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान, सूचना और बौद्धिक संतुष्टि पाने का मानवाधिकार है। इसके लिए मीडिया उसका उपयुक्त एवं स्वतंत्र साधन है। मीडिया लोकतंत्र की आत्मा है, राजनैतिक और सामाजिक संवाद का प्राण तत्व है। यह स्वतंत्रता का प्रतीक है। जन-जन की आवाज है, लेकिन मीडिया यह तभी कर सकता है, जब उस पर सरकारी अंकुश न हो, उसकी आवाज दबाई न जाए। जैसे-जैसे सरकार राजनैतिक, संगठन अपनी मर्यादाओं और नियमों के बाहर जाकर फायदा उठाने की कोशिश करंगे, उतना ही मीडिया पर दबाव और हमले बढ़ते जाएंगे। लोकतंत्र के आधारों में से मीडिया एक महत्त्वपूर्ण आधार स्तम्भ है। परंतु विश्व में मीडिया के ऊपर हमले बढ़ते जा रहे हैं। मीडियाकर्मी की हत्याएं बढ़ती जा रही हैं। इंटरनेशनल प्रेस इंस्ट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पत्रकारों का पूरे विश्व में सरकारी दमन हो रहा है। पत्रकारों पर हमले की घटनाएं विश्व के अधिकांश देशों में हो रही हैं। इनमें कई विकासशील तथा पूर्वी यूरोप के देश शामिल है। मीडिया को दबाने की कोशिश पश्चिमी देशों में भी हो रही है। विश्व के विभिन्न देशों में पिछले वर्षों में कई पत्रकारों की हत्याएं हुई।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिकांश देशों में से कुछ ही मीडिया की स्वतंत्रता का गंभीरतापूर्वक सम्मान करते है। सत्तारूढ़ व्यक्तियों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का दमन किया जाता है। युनेस्को के महानिदेशक ने कहा कि सच्चाई बताने वालों को अक्सर राजनैतिक, जातीय, धार्मिक, असहिष्णुता का कोपभाजन बनना पड़ता है। चीन, इरान, म्यांमार, जाम्बिया, इण्डोनेशिया, मैक्सिको, सर्बिया टयूनीशिया और यमन में हालात खराब है। उगांडा तथा अलजीरिया में मीडिया के विरूद्ध हिंसा की घटनाएं इस्लामी विद्रोहियों तथा सरकारी सैनिकों दोनों ही पक्ष से हुई है। इसके कारण कई पत्रकारों को देश छोड़कर भागना पड़ा है। रूस में भी पत्रकारों के लिए काम करना कठिन रहा है।

संपादकों को रासुका में बंद रखना तानाशाही मानसिकता के सूचक है। कोयंबटूर में राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों को चाकू मारे। कश्मीर घाटी में पत्रकारों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। वहाँ पत्रकारों को सरकार तथा आतंकवादियों दोनों का शिकार होना पड़ता है। महाराष्ट्र से प्रकाशित समाचार पत्रों के कार्यालयों पर शिवसैनिकों ने कई बार हमले किए।

तमिलनाडू में पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमें लगाए गए। तहलका डाट काम के पत्रकारों पर भी मुकदमें दायर किए जा रहे है। नागालैण्ड में पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों पर हमला किया। मानवाधिकार आयोग ने इसे घोर आपत्तिजनक माना है। शिवानी हत्याकाण्ड में एक आई.पी.एस. अधिकारी पर मुकदमा चल रहा है। बहुजन समाज पार्टी के सुप्रिमों भी पत्रकारों को पीट चुके है। फिल्मों में काम करने वाले कलाकार भी कई बार पत्रकारों पर हमला बोल देते है। राजनैतिक लोगों के अपराधियों से संबंध होते है और उनके माध्यम से पत्रकारों को डराया धमकाया जाता है।

उपर्युक्त सभी घटनाएँ यह परिलक्षित करती है कि मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा और दबाव बढ़ रहा है उस पर नियंत्रण आवश्यक है। लोकतंत्र के लिए विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं खबरपालिका चारों स्तंभ महत्त्वपूर्ण है। भारत के संविधान में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के संबंध में स्पष्ट प्रावधान है परंतु मीडिया के संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। न तो उनके अधिकारों के बारे में और न ही उनकी सुरक्षा के संबंध में। बल्कि शासनीय गुप्त बात अधिनियम जैसे कानून आज भी विद्यमान है। इस अधिनियम के प्रावधानों से मीडियाकर्मियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। सूचना के अधिकार बिल को संसद में रखा जा रहा है परंतु सरकारी गोपनीय कानून को समाप्त करने या संशोधन करने के विषय में सरकार बिल्कुल भी नहीं सोच रही है। वर्तमान समय में सरकारी गुप्त बात अधिनियम अप्रासंगिक हो चुका है। इसी प्रकार मानहानि तथा न्यायलय की अवमानना कनूनों में भी संशोधन की आवश्यकता है। इस संबंध मं सरकार को गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

मीडिया से संबंधित लोगों पर हो रहे हमलों के संबंध में सरकार को कारगर कदम उठाना चाहिए। जो मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है यदि उसी के मानवाधिकारों का हनन होगा तो वह इतनी महत्त्वपूर्ण जिम्मदारी कैसे निभायेगा। इसलिए मीडिया पर बढ़ रहे दबाव एवं उनके मानवाधिकारों के हनन को रोकना होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना होगा तभी मीडिया अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा पायेगा। इस प्रकार मानवाधिकार संस्कृति को बढ़ावा देने में मीडिया महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।

Tuesday, November 22, 2011

मुख्‍यमंत्री जी ये आप क्‍या करने जा रही हैं


                            मुख्‍यमंत्री जी ये आप क्‍या करने जा रही है

उत्तर प्रदेश में चौथी बार मुख्यामंत्री के पद पर विराजमान मायावती अपने किसी स्वार्थ पूर्ति के चलते उत्तर प्रदेश का बंटवारा करने पर उतारू हो गयी है। शायद ये अंग्रेजों की किसी रणनीति को अपने राजनीतिक क्रियाकलापों में ग्रहण कर, बंटवारा चाह रही हैं। जो अंग्रेजों ने किया उसी तर्ज पर मायावती चल रही हैं, यानि फूट डालों और शासन करो। शासन करने का ये कौन-सा नियम है समझ से परे की बात लगती है कि एक प्रदेश के इतने बंटवारे कर दिए जाए कि कुछ समय सीमा के उपरांत के बाद हम आपस में ही लड़ने लगे।
जैसा कि सभी जान रहे हैं कि मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित कर चुकी हैं। अगर ये प्रस्तार केंद्र सरकार द्वारा भी पारित कर दिया गया तो उत्तर प्रदेश चार भागों बंटने से कोई नहीं रोक सकता। क्योंकि किसी दबाव के चलते केंद्र सरकार को यह फैसला मानना पड़ सकता है। शायद सरकार को गिरने से बचाने के लिए। फिर चार मुख्यमंत्रियों का कब्जा उत्तर प्रदेश पर होगा। जो थोड़ा कुछ विकास हो रहा है गरीब जनता का, वो भी पूर्ण रूप से रूक जायेगा। क्योंकि इन मंत्रियों को अपनी झोली भरने से फुरसत ही कहां मिलेगी।
उत्तर प्रदेश का एक बंटवारा पहले भी हो चुका है जिसे हम उत्तराखंड़ के नाम से जानते हैं। इस प्रदेश के उत्तर प्रदेश से विभाजित होने पश्चात् उत्तराखंड़ का तो विकास हुआ, वहीं उत्तर प्रदेश के विकास की गति में एक और अवरोध उत्पन्न हो गया। यदि ऐसे ही बंटवारे का सिलसिला चलता रहा तो एक दिन उत्तर प्रदेश के कई भाग हो जाएंगें। ऐसा भी हो सकता है कि पूर्व में चलती रही राजा-रजवाड़ों की प्रथा, फिर से अपने पुरजोर पर हावी हो जाएगी। जितने जिले अभी हैं उतने प्रदेशों में तबदील हो जाएंगें, जिसमें किसी-न-किसी नेता की हुकूमत चलेगी। और वो जनता को कहीं अधिक लूट सकेगा। ध्यातव्य है कि हमारा देश एक बंटवारे की मार पहले ही झेल चुका है जिसकी मार हम आज भुगत रहे हैं। मैं पाकिस्तान के भारत से अलग होने की बात कर रहा हूँ।
इस परिप्रेक्ष्य में कहें तो क्या घरों का बंटवारा करने से कभी विकास हुआ है। जो गरीब है वो गरीब रह जाता है, जो अमीर है और अमीर बन जाता है। आज मुख्यामंत्री प्रदेश का हिस्सा करने पर अमादा हैं, तो कल दूसरा मुख्य मंत्री उसी प्रदेश को और भागों में विभाजित करवा देगा। यही सिलसिल चलता रहेगा, फिर एक दिन ऐसा भी हमारे समक्ष आ खड़ा होगा जब प्रदेश के कई हिस्से हो चुके होंगे और हर हिस्सा अपने आप में एक प्रदेश तो होगा पर जाति पर आधारित। कि फलां प्रदेश इस जाति का है और फलां इस जाति का। साफ शब्दों में कहा जाए तो जातिगत बंटवारा। यह बंटवारा कहीं-न-कहीं एक संकेत दे रहा है कि हम फिर से गुलामी की ओर बड़ी तेजी से बढ़ हैं। और सब-के-सब बुद्धजीवी लोग चुपचाप हाथों-पे-हाथ रख कर तमाशा देखने में लगे हुए हैं। कोई इसके विरोध में आवाज उठाने की जहमत नहीं करना चाह रहा है। क्योंकि सभी पार्टियों को इसमें अपना-अपना उल्लू सीधा करने को मिल जाएगा। पर वो आने वाले संनाटेपूर्ण विनाश की तबाही से बेखबर, अपनी-अपनी रोटियां सकने में तुल हुए हैं।
मेरा तो यही कहना है कि उत्तर प्रदेश की जनता को इस बंटवारे का पूर्णरूप से विरोध करना चाहिए, ताकि विकास के नाम पर होने वाली तबाही से हम सब बच सके। नहीं तो एक दिन यहीं नेता हम सबको बेच देगें,और हम यही कहेंगे कि अब पछतायें होत क्या, जब चिडियां चुग गई खेत।

Sunday, November 20, 2011

मीडिया और मानवाधिकार


                              मीडिया और मानवाधिकार



मीडिया का प्रमुख कार्य है, आम जनता तक सही सूचनाएं सही समय पर पहुंचाना ताकि वे अपना निर्णय स्वयं ले सकें और अपनी परिस्थितियों को अच्छी तरह आंक सकें। मीडिया से निर्भीकता तथा सत्यनिष्ठा की जो उम्मीदें की जाती हैं, वे इस कारण कि वह जनसामान्य के प्रति अपनी इस प्रतिबद्धता से विचलित न हो।

‘‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसके समानांतर ही एक भूमिका निभाता है। वह जनसामान्य को उसके सभी रिश्तों में वास्तविक भूमिका और उचित जानकारी से संपन्न कराने का उत्तरदायित्व लेता है। जब कभी भी मनुष्य को उसकी गरिमा से वंचित करने की कोशिश की जाती है, तो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अपने अनिवार्य हस्तक्षेप से उसे दूर करने का प्रयास करता है। इस प्रकार मानव अधिकार एक आंदोलन है। जब हम मानव अधिकारों के वर्तमान संदर्भ की बात करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया का मूल स्वरूप मानव अधिकारों के पैरोकार के रूप में सामने आता है तथा उसका मूल उद्देश्य दुनियाभर के लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना है।’’

भारतीय परिपे्रक्ष्य में संचार माध्यमों को अपनी ताक़त का अंदाजा स्वाधीनता आंदोलन से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व स्वयंसेवी संगठनों का आपस में गहरा रिश्ता रहा। और, यही रिश्ता आज मानव अधिकारों के संदर्भ में और अधिक सबल हुआ है। आयोग का मीडिया के साथ चोली-दामन का संबंध है। आयोग द्वारा मीडिया के साथ अपने संबंधों को बहुत व्यापक परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र हित को ध्यान में रखकर एक ऐसे तंत्र की स्थापना की कोशिश की गई है, जो देश भर में मानव अधिकारों के आंदोलन की ज़मीन तैयार कर सके।

आज मीडिया ने अपनी अहमियत से सबको परिचित करा दिया है। मीडिया ने वर्तमान संदर्भ में एक नयी संस्कृति को विकसित करने की कोशिश शुरू की है, जिसे हम सशक्तिकरण की संस्कृति भी कह सकते हैं। निःसंदेह, अब मीडिया शक्तिशाली भूमिका में आया है। आज मीडिया के कारण ही मानव अधिकारों के बहुत सारे संवेदनशील मामले सामने आए हैं।

मीडिया मानव अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। हालांकि, समाचारपत्रों में मानवाधिकारों के हनन के नाम पर सिर्फ़ पुलिस हिरासत और जेल हिरासत में होने वाली गतिविधियों तथा मौतों की ख़बरें ही अधिकांश रूप से प्रकाशित की जाती हैं। परंतु, सामाजिक घटनाओं को (मानवाधिकार हनन) अब भी वह स्थान नहीं मिल पा रहा है, जो उसे मिलना चाहिए। उल्लेखनीय है कि मानव अधिकार आयोग ने भी संवाददाता द्वारा प्रकाशित बहुत-सी मानव अधिकार हनन जैसी घटना को आधार मानकर कार्रवाई की है। कई बार तो मामले प्रकाश में आए हैं, और बहुतों को इससे राहत भी मिली है। उदाहरणस्वरूप देश के समक्ष बाटला हाऊस मुठभेड़ काफी सुर्खियों में रहा। तत्कालीन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस. राजेंन्द्र बाबू ने कहा कि ‘‘मीडिया केवल सामाजिक मुद्दों, गरीबी से उत्पन्न समस्याओं तथा कुपोषण से होने वाली मौतों पर ज्यादा ध्यान दें न कि मुठभेड़ों और पुलिस हिरासत में हुई मौतों को अधिक ऐहमियत दें। मीडिया को आज अपने अधिकारों से वचित लोगों के अधिकारों की रक्षा के मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।’’ समाचारपत्रों की अपेक्षा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मानवाधिकार से संबंधित ख़बरों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

मानव अधिकारों का दायरा बहुत व्यापक है। इसके बाद भी आज मीडिया से जुडे़ लोगों को इसकी विस्तृत जानकारी नहीं है। इससे यह पता चलता है कि मीडियाकर्मी कितने संवेदनशील हैं। अधिकांश मामलों में होता यह है कि संवाददाता या रिर्पोटर पुलिस द्वारा दी गई रिपोर्ट/जानकारी को ज्यों-का-त्यों प्रकाशित कर देते हैं, चाहे वो गलत ही क्यों न हो। इसके साथ-साथ मानवाधिकार से संबंधित बड़ी ख़बरों को समाचारपत्रों में स्थान नहीं मिल पाता। सन् 1984 में इलाहाबाद जिले में पुलिस द्वारा आदिवासियों के साथ उत्पीड़न की ख़बर को बहुत से पत्रकार कवरेज करने पहुंचे। परंतु, यह ख़बर केवल जनसत्ता में ही प्रकाशित हुई, और किसी अन्य समाचारपत्र ने इस ख़बर को महत्त्व देने की जरूरत महसूस नहीं की। जनसत्ता में छपी इस ख़बर से विधानसभा में खलबली मच गई और सभी दोषियों को सज़ा मिली। हालांकि, इस ख़बर को जो प्रमुखता दी जानी चाहिए, वह नहीं मिल सकी। कहना गलत न होगा कि समाचारपत्र और टी.वी. चैनल मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता का प्रचार-प्रसार करने में एक अहम् रोल निभा सकते हैं। परंतु मीडिया मानव अधिकारों से संबंधित मामलों से कन्नी काटते रहते हैं।

भारत सरकार के ऐसे बहुत से आयोग है, जिनका मीडिया से कोई संवाद का रिश्ता नहीं है। ये आयोग मीडिया को किसी वार्षिक आयोजनों में ही आमंत्रित करते हैं। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के गठन के बाद आयोग और मीडिया के बीच एक गहरा रिश्ता बना है। इस रिश्ते के कारण आयोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञाप्तियों, न्यूज़़ लेटर और पत्रिकाओं को भी प्रकाश में लिया जाता है। आयोग ने मीडिया और मुख्य तौर पर क्षेत्रीय भाषाई पत्रकारों को अपने अभियान में जोड़ने की पहल की है। परंतु, मानव अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले पत्रकारों को ही पुलिस और प्रशासन की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ता है। इसके साथ-ही-साथ मीडिया यह भी मानता है कि लाइव कावरेज के नाम पर और टी.आर.पी बढ़ाने के लिए उसने सारी हदें पार कर कर दी है। परिणामस्वरूप ताज होटल में फंसे बंधकों और सुरक्षा बलों की जान को भी खतरा पैदा हो गया था। इसी क्रम में मीडिया ने कई गलत ख़बरें भी प्रकाशित की। यह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरे पहलू में सैकड़ों पत्रकार देश और समाज के लिए अपनी जान भी जोखिम में डाल रहे हैं।

आज कई इलाकों में सशस्त्र टकराव की स्थिति बनी हुई है। इससे निपटने के लिए प्रायः पुलिस, अर्ध सैन्य बलों तथा सेना की तैनाती की मांग उठती रहती है। छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, बिहार आदि समेत एक दर्जन राज्यों में लगभग 127 जिले नक़्सलवाद की चपेट में आ गए हैं। इनमें भी 9 राज्यों के 76 जिलों की हालत अत्यंत गंभीर बनी हुई है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत 14 राज्य सांप्रदायिक दृष्टिकोण से संवेदनशील हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जातीय सेनाओं का गठन और राजनीतिक दलों में गिरोहबंदी का गठन हो चुका है। और इस तरह के गठनों ने कई नरसंहार को अंज़ाम भी दिया है।

हिंदी और भाषाई पत्रकारों को ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक तरफ तो वे आंतकियों या असामाजिक तत्वों के हत्थे चढ़ते हैं, तो दूसरी तरफ मानव अधिकार उल्लंघन जैसे मुद्दों में रिपोर्ट प्रकाशित करने पर सुरक्षा बलों की भी नराज़गी मोल लेनी पड़ती है। ऐसा प्रतीत होता है कि पत्रकारों को पुलिस के अधिकारियों और जवानों ने अपनी राह का रोड़ा मान लिया है। कई बार तो सामान्य जानकारियों को शासकीय गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर सूचना देने से मना कर दिया जाता है। लोगों में ऐसी धारणा है कि अधिकांशतः पुलिस द्वारा ही मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है। यदि पत्रकार उचित तथ्यों के साथ उजागर करते हैं, तो उन्हें उग्रवादी गुटों का समर्थक बताकर नाहक ही परेशान किया जाता रहा है। सन् 1993 में भारतीय सेना मुख्यालय में मानवाधिकार प्रकोष्ठ का गठन किया गया था, और सैनिकों को, खासतौर पर मानवाधिकारों के लिए क्या करें?, क्या न करें? की सूची भी प्रदान की गई थी। फिर भी, मानव अधिकार हनन और उल्लंघन के मामले प्रकाश में आते ही रहते हैं। यदि मीडिया द्वारा ऐसे मामलों को प्रकाश में लाने की कोशिश की जाती है, तो सुरक्षा बलों के कई अधिकारी उन्हें परेशान करते हैं।

यह कटु सत्य है कि देश के सभी हिस्सों में पुलिस के साथ प्रेस का संबंध तनाव पूर्ण रहा है। पुलिस की अकर्मठता, निष्क्रियता, बलात्कार, नरसंहार और खराब कानून व्यवस्था आदि के बारे में जब पत्रकार लिखते हैं, तो वे पुलिस के बड़े अधिकारियों की आंख में किरकिरी बनने लगते हैं। मानवाधिकारों के संरक्षण का पूरा दायित्व पुलिस पर भी है। पुलिस के पास कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए गिरफ़्तार करने, तलाशी लेने, समान जब्त करने, अदालत में फौजदारी जैसे मामलों को दायर करने के अधिकार हैं। परंतु, विडंबना है कि जिसके पास मानवाधिकारों की रक्षा का भार है अधिकतर उसी के द्वारा ही उसका का गला घोंटा जा रहा है।

मानव अधिकार आयोग तथा आम कार्यकत्र्ताओं के लिए यह चिंता का विषय बना हुआ है कि तमाम प्रयासों के बाद भी पुलिस की मनमानी पर लगाम नहीं लग पा रहा है। भारत में सबसे अधिक मानवाधिकार हनन के मामले पुलिस हिरासत में ही होते हैं। पुलिस हिरासत में कैदियों की मौतें, महिला कैदियों तथा बच्चों के यौन-उत्पीड़न की घटनाएं, समय-समय पर प्रकाश में आती रहती हैं। अधिकांश राज्य के थानों में प्राथमिकी दर्ज कराना भी बड़ी मुश्किल का काम है। इसका कारण यह है कि प्रभारी अपने इलाकों के अपराध की दरों को कम दिखाना चाहते हैं। इसके चलते मीडिया और पुलिस के मध्य जगह-जगह तनाव के मोर्चे खुल गये हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के गठन से पूर्व तो अधिकतर जेलों की दयनीय दशा की जानकारी कभी-कभी मिलती थी। हालांकि, आयोग के गठन के बाद मीडिया और जेलतंत्र के बीच संवाद का अभाव अब भी बना हुआ है। परिणामस्वरूप मानवाधिकार हनन की ख़बरें प्रकाश में नहीं आ पाती हैं।

एक सच बलात्कार से जुड़ी श्रेणियों का भी है। मीडिया में बलात्कार की कवरेज पीड़िता की क्लास (निम्न, मध्य या उच्च वर्ग), जगह (स्लम, पॉश या मध्यम वर्गीय), पारिवारिक पृष्ठभूमि, शहर, शैक्षिक योग्यता आदि के आधार पर जगह और प्राथमिकता पाती है। इसके अलावा आरोपी की पृष्ठभूमि भी काफी मायने रखती है। कहना गलत न होगा कि बलात्कार जब तक ठोस ख़बर की वजह नहीं बनता, वह मीडिया की नज़रों से अछूता रहता है। और, कई बार तो वह न्याय पाने में भी पिछड़ जाता है। ऐसे तमाम बलात्कार, जो कि मीडिया को किसी भी तरह से कौतूहल बनाने लायक लगते रहे हैं, की कवरेज भरपूर रस के साथ की जाती रही है। मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज का बलात्कार मामला (15 नवंबर, 2002) मध्यम वर्गीय पढ़ी-लिखी युवती का था, जिसमें बलात्कार पुलिस मुख्यालय के एकदम करीब हुआ था। दिल्ली में ही राष्ट्रपति के सुरक्षा गार्डो ने जब बुद्धा गार्डेन में एक युवती से बलात्कार किया (6 अक्टूबर, 2003), तो उसे मीडिया ने खूब जगह दी। यह मामला भी कुछ ही घंटों में सुलझा लिया गया। इसी तरह जयपुर में एक विदेशी महिला के बलात्कार के मामले पर तो फास्ट कोर्टका ही गठन कर दिया जाता है, और अपराधियों को चुटकियों में सज़ा दे दी जाती है। लेकिन, दूसरी तरफ गरीब बस्तियों में होने वाले बलात्कार बमुश्किल दो कॉलम की ख़बर बन पाते हैं। एक तो मीडिया इन्हें खासनहीं मानता और दूसरे, इसमें चटखारे लेने लायक कुछ नहीं होता। वैसे भी, मीडिया ऐसे वर्ग से जुड़े लोगों को कवर करने में दिलचस्पी लेता है, जिससे वह खुद का जुड़ाव महसूस करता हो। चूंकि, मीडिया में एक बड़ी हिस्सेदारी मध्यम या उच्च वर्ग के पत्रकारों की है, अतः इसी श्रेणी से कवरेज अपेक्षाकृत ज्यादा तवज्ज़ो भी पाती है। मीडिया के इस रवैये को अब पुलिस भी पहचानने लगी है। यही वजह है कि निम्न वर्ग पर हुए आपराधिक मामले आज भी थानों में आसानी से दर्ज नहीं हो पाते। अगर दर्ज होते भी हैं, तो बड़े सच को छोटे में तब्दील कर दिया जाता है। यहां बलात्कार को अक्सर छेड़छाड़का मामला बना दिया जाता है।

अपराध की हर पल की रिपोर्ट से भले ही पुलिस पर अतिरिक्त दबाव पड़ जाए, लेकिन इस वजह से कई बार या तो सही अपराधी पकड़ में नहीं आता या फिर उसे अपनी बात कहने का पूरा मौका नहीं मिला पाता। साथ-ही-साथ मामला आनन-फानन में सुलझा हुआ दिखा दिया जाता है। बाद में न्यायिक प्रक्रिया भी कई बार मीडिया रिपोर्ट से प्रभावित होती दिखाई देती है।

वैसे इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि मीडिया का महिला अपराध के प्रति शुरू से ही भेदभाव पूर्ण नज़रिया रहा है। पुरूष द्वारा किसी महिला का यौन-शोषण होना कोई बड़ा व तीखा सवाल खड़ा नहीं करता। लेकिन, महिला अगर पुरूष पर हमला कर देती है, तो यह मेन बाइट्स डॉगकी तरह देखा जाता है। यह दिलचस्प है कि पूरी दुनिया में मुख्यधारा की मीडिया में इस तरह की मानसिकता रही है।


क्‍या होगा उत्‍तर प्रदेश का


                            क्‍या होगा उत्‍तर प्रदेश का

कुछ महीने और बाकी हैं और वो समय जल्द् ही हमारे नजदीक आ जाएगा जब उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से चुनाव का बाजार गर्म होगा। और यह बाजार का भाव (चुनाव के परिणाम) यह निर्धारित करेंगा, कि उत्तर प्रदेश का अगामी मुख्यमंत्री कौन बनेगा। कौन पांच साल तक गरीब जनता पर राज करेगा। वैसे अभी से सभी पार्टियों के कार्यकर्ता आने वाले चुनाव के लिए जी-तोड़ कोशिश में जुट गये हैं। सभी पार्टियां ये आश लगाये हुए हैं कि अगामी मुख्यमंत्री हमारी ही पार्टी का होना चाहिए। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री पुन: गद्दी पर विराजमान होने के गुनताड़े बिठाने में लगीं हैं। शायद हमें परिणामों की बात नहीं करनी चाहिए, जब चुनाव होंगे तो स्व़त: सभी को ज्ञात हो जाएगा कि ऊंठ किसी करवट बैठेगा।

इस आलोच्य में देखा जाए तो आजादी के बाद से बहुत-सारे मुख्यमंत्रियों ने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी सपा, तो कभी बसपा। जिसका क्रम लगातार चलता रहा। और सभी मुख्यमंत्रियों द्वारा यही बयान दिया गया कि उत्तर प्रदेश का विकास हो रहा है। किस तरह का विकास है जो सिर्फ मुंह जबानी या कागजों में दिखाई देता है और जिसे विकास को नाम दे दिया जाता है। हां ये बात सोलह आने सही है कि विकास तो हुआ है पर किसका, यह भविष्य के गर्द में है। परंतु विकास उत्तर प्रदेश का नहीं हुआ, बल्कि मुख्यमंत्रियों और उनके रिश्तेदारों व पार्टियों के कार्यकर्ताओं का हुआ। जिन्होंने दिन दूनी-रात चौगनी तरक्की की है, इजाफा किया है अपनी कमाई में।

मैं किसी पार्टी विशेष पर इल्जाम नहीं लगा रहा हूँ। मैं सिर्फ विकास बता रहा हॅू कि विकास हुआ है। चाहे जिसका हुआ हो। वैसे सभी ने विकास के नाम पर लूटा बहुत। किसी ने आवास के नाम पर, किसी ने अधिकरण के नाम पर, किसी ने मनरेगा के नाम पर, किस ने रोजगार के नाम पर, किसी ने भर्तियों ने नाम पर, किसी ने बैकलोक के नाम पर, किसी ने पैंशन के नाम पर। लूटा सभी ने है। किसी ने कम लूटा तो किसी ने अति से भी अधिक। और इस लूट का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

यह बात कहने में गलत नहीं होनी चाहिए कि नेताओं ने गरीब जनता को लूट-लटकर अपने घर में रोशनी की है। जिसको जनता ने अपनी किस्मत मान लिया है। इसी बदनसीबी और अपनी भूल को बदलने के लिए जो उन्होंने पांच साल पहले की थी। पर होता ढांक के तीन पात। कि सांज हुई सजने लगे कोठों के बाजार, और ग्राहक मन का न मिल बदन लुटा सौ बार।

Friday, November 4, 2011

इरोम बचाओं, सशस्‍त्र बल अधिनिम हटाओं

आहवान, जागों और इरोम बचाओं

5 नवम्बंर, 2011 पूरे 11 साल हो चुके हैं, एक महिला को अनशन पर बैठे हुए। हम और हमारा सभ्यं समाज, देश मौन होकर तमाशवीन की भांति तमाशा देख रहा है। मैं उन लोगों को बता दूं जो इनके बारे में नहीं जानते। जी हां मैं इरोम शर्मिला चानू की ही बात कर रहा हूं। जो अपने समाज के अधिकारों की लड़ाई के लिए पिछले 11 साल से लगातार अनशन पर बैठी है। जिसने अपने जीवन के अमूल पल सरकार द्वारा थोपे गये कानून सशक्त बल विशेषाधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) के लिये गंवा दिये।

अगर पूरे मामले पर विस्तार से गौर किया जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सबके सामने आ जाएगी कि जब से सरकार द्वारा मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून पारित किया गया. और जिसका फायदा उठाकर सशस्त्र बलों ने 12 लोगों को दिन दहाड़े गोलियों से भून दिया. यह एक घटना नहीं थी बल्कि ऐसी बहुत-सी मानवाधिकार हनन की घटनायें आये दिन मणिपुर में होती रहती हैं; इसी के विरोध में 5 नवम्बर, 2000 से इरोम शर्मिला अनशन पर बैठी हैं। वो चाहती हैं कि मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (ए.एफ.एस.पी.ऐ.) को हटा दिया जाए. जिसके तहत अशांत घोषित क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को सरकार द्वारा विशेष शक्तियां प्रदान की गई हैं। जिसका फायदा सशस्त्रि बल आये दिन उठाते रहते हैं। सरकार द्वारा इन सेना बलों को कुछ ऐसे विशेष अधिकार प्रदान किये गये हैं  जो राज्यन सरकार द्वारा पारित कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं भले ही इसमें किसी की जान क्यों न चली जाए. इसका परिणाम यह है कि सैनिक दल इसका दरूपयोग करते हैं. और इस कानून की आड़ में हत्या, बलात्कार, र्टाचर, गायब कर देना और गलत गिरफतारी जैसे कार्य सशक्त बलों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं.

मेरे जहन में यह सब देखकर एक बात बार-बार कौंधती है कि क्या हमारा देश वाकैई में आजाद है। या फिर आजाद भारत का एक राज्य अब भी गुलामों की जिंदगी बसर कर रहा है। जहां अंग्रेजों की जगह हमारे सैनिकों ने ले ली है। जो आये दिन मणिपुर की जनता के साथ बर्बरतापूर्ण कार्यवाहियों को अंजाम देते रहते हैं। क्या कारण है कि 58 सालों से अब भी वहां पर सशस्त्र बलों का जमावड़ा लगा हुआ है, जो दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है।

मैं और शायद मेरे जैसे हजारों लोगों तत्कालीन व वर्तमान सरकार साथ-ही-साथ कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ये यह प्रश्ना पूछ रहे हैं कि वो कौन-से कारण हैं जिस कारण से अब भी सशस्त्र बल वहां पर तैनात हैं। जिसको अभी तक नहीं हटाया गया। उसी के विरोध में पिछले 11 सालों से अपनी जिंदगी व अधिकारों की लड़ाई को लड़ती इरोम शर्मिला, जिसकी सुध-बुध आज तक किसी सरकार ने नहीं ली और न ही किसी सरकार ने इस बात पर विचार किया कि सशस्त्र बलों की तैनाती अभी भी वहां पर क्यों है। इसे क्या हम सरकार की मिलभगत कहे या फिर लाचारी, जिस कारण से सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही है और मणिपुर की जनता को इस तरह के अत्याचार की आग में झोंक रही है।

आज मैं पूरे देशवासियों से यह आवहान करता हूं कि इरोम शर्मिला का साथ दें, और मणिपुर में लागू विशेष सशस्त्र बल अधिनियम को हटाने के लिये सरकार से मांग करें। क्योंकि हमें खुश होने की जरूरत नहीं है ये सरकार गद्दी की आड़ में कही भी ऐसा मंजर करवा सकती है। हम सभी को जागने की जरूरत है नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे देश के अधिकांश राज्यों में मणिपुर जैसा मंजर दिखेगा।