सरोकार की मीडिया

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Friday, October 7, 2011

लिव इन रिलेशनशिप का समाजशास्त्र

लिव इन रिलेशनशिप का समाजशास्त्र

            वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज (संस्कृति) बदल रहा है और इस बदलाव के साथ-साथ प्यार व शादी की परिभाषाओं में भी बदलाव हो रहा है। यह बदलाव सदियों से चली आ रही विवाहिक परंपराओं की बंदिशों को तोड़ने का काम कर रहा है। इस बदलाव का कारण अधिकांश लोग पश्चिमी सभ्यता को मानते हैं। हम इस बदलाव को पूर्ण रूप से पश्चिमी सभ्यता पर नहीं मढ़ सकते। यदि हमको इस बदलाव को जानना है तो इसके मूल कारणों की तह तक जाना पड़ेगा, और देखना होगा कि वो कौन-से मूल कारण हैं जिसकी वजह से भारतीय संस्कृति में इस तरह का परिवर्तन हो रहा है। यह परिवर्तन कितना जायज है और कितना नाजायज, इस पर बहस नहीं करनी चाहिए। क्यों कि, जब बदलाव के मूल कारण ज्ञात हो जायेंगे, तो स्वत: ही हमें पता हो जायेगा कि यह जायज है या नाजायज।
           वैसे सदियों की परंपराओं की जकड़न को तोड़ती आज की युवा पीढ़ी का मकसद कुछ भी हो, पर परंपराओं की बेडि़यां तो टूट रही हैं। इस टूटती बेडियों को आज की युवा पीढ़ी स्वतंत्रता का नाम देती है, कि हम स्वतंत्र हो रहे हैं। परंतु, ये कैसी स्वतंत्रता है जो मां-बाप, रिश्ते–नाते, लाज, हया, आदर, सम्मान सभी को ताक पर रख हासिल की जा रही है। भारतीय संस्कृति में ऐसी स्वतंत्रता मान्य नहीं है। वो आज भी सामाजिक नैतिकता और मान-सम्मान को अपना गौरव मानती रही है। जिसका दोहन पश्चिमी सभ्यता ने कर दिया है। और, जिसके पद चिंहों पर आज की भारतीय युवा पीढ़ी निकल पड़ी है। ये कहां जा रही है, कहां तक पहुंचेगी, किसी को नहीं मालूम। शायद मालूम भी नहीं करना चाहते, क्योंकि ‘आज जीओ, कल किसने देखा’ है। इस तर्ज पर जिंदगी जी जा रही है। इस तरह के जीवन यापन के लिए युवा इन दिनों दोस्ती, लिव इन रिलेशनशिप और शारीरिक जरूरतों की पूति को तेजी से अपना ट्रेंड बनाने में लगे हुए हैं। जिसकी मान्यता भारतीय न्यायालय ने भी दे दी है.
          'लिव-इन रिलेशनशिप' से तात्पर्य एक ऐसे रिश्ते से है जिसमें महिला-पुरूष सामाजिक तौर पर बिना शादी के साथ रहते हैं और इनके मध्य संबंध निर्विवाद रूप से पति-पत्नी जैसे ही होते हैं। इस रिश्ते की खासियत यह है कि महिला-पुरूष का भाव एक-दूसरे के प्रति समर्पण का होता है। अंतर केवल इतना है कि वे सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुरूप शादी नहीं करते हैं। यह स्थिति वक्त के परिवर्तन के साथ-साथ आधुनिक संस्कृति का एक हिस्सा बन गई है। कहने का मतलब यह है कि आज की बदलती संस्कृति में युवक-युवतियां इतने आधुनिक हो गए हैं कि वे आपसी मेल-मिलाप, दोस्ती और सामाजिक रूढि़यों की जकड़ने से मुक्ति के लिए एक साथ पति-पत्नी के रूप में रहना खुद के लिए गौरव की बात समझते हैं। इस गौरव को चाहे तो हम इन लोगों की जरूरतों की पूर्ति का भी नाम दे सकते हैं।
          'लिव-इन रिलेशनशिप' एक प्रकार का दोस्ताना संबंध है जिसे विवाह की परिधि में नहीं रखा जा सकता। क्योंकि विवाह एक सामाजिक व पारिवारिक बंधन के साथ-साथ एक रिवाज भी है जिसकी अपनी एक आचार-संहिता है, मान-मर्यादा है, कानूनी प्रावधान हैं। वैसे लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिनों पहले परस्पर विरोधी फैसले दिए। इस फैसले में हाई कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को वॉक-इन, वॉक-आउट रिलेशनशिप की संज्ञा प्रदान की। इसके उलट सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक चलने वाले लिव-इन रिलेशन को शादी के बराबर दर्जा दिया और कहा कि इन संबंधों से उत्पन्न संतानों को भी पिता का जायज वारिस करार दिया जाएगा।
           मोटे तौर पर देखा जाए तो लिव-इन का तात्पर्य एक स्त्री और एक पुरुष का बिना विवाह किए सिर्फ आपसी रजामंदी से एक साथ रहना है। भारत में पारंपरिक रूप से ये रिश्ते प्रचलित नहीं हैं, जबकि आधुनिक पश्चिमी संस्कृति में नौजवान जोड़े अपनी सहमति और पूरे नैतिकता बोध के साथ लिव-इन करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य‍ में देखा जाए तो इस संबंध की शुरूआत शिक्षित और आर्थिक तौर पर स्वतंत्र, ऐसे लोगों ने की है, जो विवाह संस्थाओं की जकड़न से मुक्ति चाहते थे। हालांकि ऐसे कई कारणों से उच्च और उच्च मध्यवर्ग के शहरी युवा पीढ़ी में धीरे-धीरे लिव-इन रिलेशन का प्रचलन जोर पकड़ता जा रहा है। इस आलोक में दार्शनिक तौर से विवाह संस्थाओं से विद्रोह करने वाले भी लिव-इन रिलेशन में रह रहे हैं। ये लोग एक साथ रहने की आपसी सहमति और शादी की सहमति को बहुत सूक्ष्म नजरियें से देखते हैं। इसमें से कुछ लोग इस कारण से भी लिव-इन में रहना पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने रिश्ते को व्यक्तिगत मामला मानते हैं, जिसमें वे नहीं चाहते कि उनका संबंध राजनीतिक, धार्मिक या पितृ सत्तात्मक संस्थानों द्वारा नियंत्रित किया जाए।
          अगर लिव-इन के संपूर्ण धरातल को देखा जाए तो यह केवल-और-केवल शारीरिक पूर्ति से जुड़ा हुआ है। जिस पर समूचे विश्व में शोध हो रहे हैं कि शादी से पहले इनके रिश्ते् कितने करीब आ जाते हैं या वो सब कुछ हो चुका होता है जिसे भारतीय सभ्य समाज में शादी के बाद जायज मानते हैं। खैर इस सब कुछ में क्या कुछ शामिल है, यह किसी से छुपा नहीं है। यदि ये युवा चाहे तो सब कुछ हो जाने के बाद भी स्वेच्छा से, अपनी-अपनी इच्छाओं की पूर्ति तथा शारीरिक माँगों की पूर्ति करने के बाद परिवारिक पसंद से शादी-ब्याह कर सकते हैं, और एक नई जिंदगी की शुरूआत भी कर सकते हैं। इस तरह केवल शारीरिक सुख देने वाला रिश्ता केवल इन्हीं सुखों से आरंभ होकर शीघ्र ही खानापूर्ति तक सिमटकर खत्म हो जाता है। इससे आगे ये युवा पीढ़ी लिव-इन के संबंधों को प्यार, दोस्ती, अधिक समय तक बरकरार रखना, या विवाह जैसा कोई नाम नहीं देना चाहते हैं।
इस आलोक में भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों पर प्रश्न चिंह लगाने वाले लिव-इन रिलेशन, एक ओर भारतीय समाज में पश्चिमी संस्कृाति का दर्शन कराते हैं, तो दूसरी ओर भारतीय युवाओं को शर्मसार भी करती है। ये युवा पीढ़ी भारतीय समाज को गुमराह करने वाले अवैध संबंधों को बढ़ावा देकर और लिव इन रिलेशन में रहकर, केवल अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरी करते हैं और कर भी रहे हैं।
          इस परिप्रेक्ष्य में कहा जाये तो किस राह जा रहा है लिव इन रिलेशन, कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे महानगरों में आजकल इन रिश्तों ने काफी रफ्तार पकड़ ली है। लिव-इन रिलेशनशिप के मत में विद्वानों ने कहा कि ये रिश्ते कुछ समय के मेहमान होते है जो ज्या दा दिनों तक नहीं टिकते। गौरतलब है कि कुछ दशक पहले तक जिन रिश्तों को अमान्य माना जाता है वही रिश्ता आज की एक सचाई और फैशन बन चुके हैं. बहरहाल, विद्वान मानते हैं कि कम ही सही लेकिन भारतीय सामाजिक संस्कृरति और उच्चतम न्यायालय ने जिंदगी जीने के पश्चिमी तरीकों पर अपनी मोहर लगाई तो है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ये रिश्तेी सिर्फ अस्थायी इंतजामात हैं। जो शारीरिक जरूरतों की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते है। तभी तो क्या अंतर है दो घंटे और दो साल की रिलेशनशिप में !
           धयातव्य है कि दो घण्टे के लिव इन रिलेशनशिप में स्त्री–पुरुष शारीरिक संबंध बनाते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं माना जाएगा, क्योंकि इन रिश्तों को कानून तौर पर अमलीजामा पहना दिया गया है। हालांकि इस प्रकार की दो–दो घण्टे वाली रिलेशनशिप में कई लोगों से संबंध रखे जा सकते हैं। इस तरह के लिव-इन में रह रहे स्त्री–पुरुषों और वेश्यावृत्ति करने वालों में क्या अंतर रह जाएगा, मेरी समझ सीमा से बाहर की बात है। एक तरफ तो हमारे देश में वेश्यावृत्ति को अपराध माना जाता है, वही दूसरी तरफ विवाह किये बिना शारीरिक संबंध बनाने की छूट भी दे दी गई है। इससे अर्थ में यह साफ प्रतीत होता है कि जो शारीरिक जरूरतें थोड़ी अवधि के लिये बनाये जाये तो वेश्यावृत्ति मानी जायेंगी और यदि वही जरूरतों की पूर्ति लंबी अवधि के लिए की जाये तो उसे पवित्र कर्म माना जाये। ये कहा तक उचित है, सोचने वाली बात है।
          वैसे कुछ दिनों पहले अदालत ने ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के रिश्तों को जायज ठहराया है जिसके पक्ष-और-विपक्ष में बहुत-सी प्रतिक्रियाएं सामने आई। इन प्रतिक्रियाओं में बहुत व्यक्तियों का तर्क था कि यह फैसला शायद विवाह जैसी सदियों पुरानी संस्थांओं के अस्तित्व को खतरे में डाल देगा। हालांकि परिवर्तन कौन नहीं चाहता, परिवर्तन शाश्वत नियम है जो होता ही है। मगर उस परिवर्तन के लिए पूरा जनमानस तैयार है, यह देखने वाली बात है.
          हालांकि न्यायालय हो या कोई और, किसी भी सामाजिक मुद्दे पर विचार व्यक्त करने से पूर्व उसे इस बिन्दु पर जरूर ध्यान देना चाहिए कि क्या भारतीय समाज इस तरह की अनैतिक रिवाजों को स्वी्कार कर सकेगा? क्या हमारा समाज इतना नंगा हो चुका है कि उसे अनियंत्रित स्वतंत्रता की जरूरत महसूस होने लगी है? इस तरह की स्वतंत्रता और नंगापन समाज के ऐसे भोगीयों की उपज है जो तमाम तरह के दुष्कृत्यों में लिप्त रहते हुए भोग के नए-नए साधनों की खोज में लगे रहते हैं, उन्हें बस शारीरिक सुख चाहिए। ऐसी स्वतंत्रता और भोगवादी संस्कृति मेट्रोज़ जीवन की शैली में विकसित होती जा रही है। इस भोगवादी संस्कृति को बढावा उन युवा वर्ग से मिलता है जो घर-परिवार से दूर रहकर जॉब कर रहे हों या पढ़ाई। उन्हें अपनी शारीरिक-मानसिक भूख को मिटाने के लिए ऐसे अनैतिक संबंधों की जरूरत पड़ रही है। वैसे अधिकांश लड़कियां नासमझी में और कुछ तो अपनी भौतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लिव इन का सहारा लेती हैं।
          कुल मिलाकर यह मसला किसी नैसर्गिक आवश्यकता से नहीं जुड़ा है बल्कि भोगवाद का अतिरेक है। सार्वजनिक मंच पर रह-रहकर इस रिश्तों की बातें सुनने को मिल रही हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप वक्त और हालात की मांग है. अगर हम संविधान की बात करें तो वह स्वयं ही अनियंत्रित स्वतंत्रता को अस्वीकार कर लेता है। यानी लिव-इन रिलेशन ऐसी स्वतंत्रता है जो भारतीय संस्कृति को हानि पहुंचा रही है। उसे तो खुद ही निरस्त कर देना चाहिए। ताकि लिव इन जैसी स्वच्छंदता जो समाज की सुस्थापित व्यवस्था और संस्कृति को हानि पहुंचाने में सक्षम है, उसे मानवाधिकार के रूप में परिभाषित करना या वक्त-हालात की जरूरत बताकर प्रोत्साहित करना उचित नहीं है। क्योंकि जीवन का भटकाव मनुष्य को चिता की ओर ले जाता है, जिसका अंत बड़ा भयावह होता है।

Wednesday, October 5, 2011

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया : तलाश भारतीय मॉडल की


इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया : तलाश भारतीय मॉडल की

अपने शुरूआती दौर में यूरोप और अमरीका में पैदा हुआ नवीन मीडिया यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जहां दुनियां के पैमाने पर एक मजबूत प्रतिक्रिया के रूप में लिया गया, वहीं भारत में मीडिया मुद्दों का उभार अपने शुरूआती दौर में एक अद्द संचार के अलावा कुछ नहीं था। कुछ गंभीर विश्लेषकों, समाज-विज्ञानियों, चिंतकों यानी बुद्धिजीवियों ने थोड़ा ज्या्दा गंभीर होकर भारत में भी मीडिया मुद्दों के उभार को स्थामपित सामाजिक मूल्यों के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के अलावा कुछ नहीं माना.

सत्‍तर के दशक में पत्रकारिता के मूल मुद्दों के साथ-साथ मीडिया के हक में सवाल को तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संगठनों ने जब उठाना शुरू किया था तब तक मीडिया शब्दे न तो उतना प्रचलित हुआ था, और न ही शुद्ध अमरीकी-यूरोपीय मीडिया दृष्टिकोण ऐसे संगठनों के बीच विकसित हो पाया था। अस्सी के दशक के नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भारतीय संस्करण का तत्कालीन इतिहास रचता है और इस दशक के अंत तक विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दृष्टिकोणों के स्थानीय विस्तार का क्षितिज भारत में फैलता नजर आता है। नब्बे के दशक के शुरू होने से पूर्व ही भारतीय संस्कृति-मूल्य-परंपरागत प्रतीकों के जरिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्थाननीय यानी भारतीय प्रारूप तलाशने की कोशिश का विस्तार होता है और भारतीय इतिहास में मीडिया बिंबों को तलाशने की कोशिश भी होती है। नब्बे के दशक के बीचोबीच खड़ा भारतीय मीडिया एक साथ कई ज्वलंत प्रश्नों से जूझ रहा है। ऐसा लगता है कि इस समय भारत में मीडिया चिंतन लगभग हर स्तर पर, एक पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौर से गुजर रहा है।

प्रश्न यह है कि विभिन्न मीडिया नजरियों की सही-सही व्याख्या भारतीय समाज की स्था्नीकृत विशेषताओं, सांस्कृतिक, पारिस्थितिक, पर्यावरण और भौगोलिक राजनीतिक आदि के संदर्भ में, संभव है क्या। यदि हां तो संभावनाएं और प्रासंगिकताएं आखिर क्या और कैसी हैं

मीडिया ढेर सारे ऐसे प्रश्नों से जूझ रहा है, अपने लगभग 20 साल की उम्र में। ढाई दशक एक व्यक्ति की उम्र का यौवनकाल होता है, लेकिन एक उम्र के लिहाज से यह शैशवकाल भी हो सकता है और प्रौढ़ावस्था भी। वह इस बात पर निर्भर है कि मीडिया के मुद्दे क्या हैं, मुद्दों की प्रकृति क्या है, मुद्दे का हरपक्षीय कैनवास कितना सीमित या विस्तृत है। इस मानदंडों के आधार पर भारतीय समाज में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए 20-25 वर्ष शैशवकाल से ज्यादा कुछ नहीं. किंतु यदि यह शैशवकाल है तो एक शिशु गंभीर और बुनियादी सवालों से जूझ कैसे रहा है। क्याम भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समय से पहले परिपक्व् होना चाहता है. यह 20-25 साल नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उम्र है, न की संपूर्ण मीडिया की. सवाल तो यह भी है कि अगर ऐसा है तो नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उम्र संपूर्ण मीडिया के समकक्ष आंकी ही क्यों जाए। यह तो बात दुनिया के पैमाने पर भी लागू होती है. भारत में मीडिया दृष्टिकोण (जिसे भले ही मीडिया का दर्जा न मिला हो) तो यहां की संस्कृति में मौजूद रहा है. तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पैदाइश जब नहीं हुई थी, तो क्या भारत में या दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसा जज्बा, संस्कृति, व्यवहार आदि था ही नहीं, मैं इतिहास की गलियों में भटककर वहां से मीडिया या मीडिया की उत्पत्ति को तलाशने की बात नहीं करता. मेरा मतलब सिर्फ यह है कि आज भारतीय मीडिया को इस बुनियादी सवाल से जूझने की जरूरत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से उधार ली गई संस्कृति के वाहक मीडिया चिंतन, विश्लेषण और कार्यपद्धति को जिसकी असफलताएं दुनियां के तथाकथित विकासशील देशों में पिछले डेढ़ दशको में साबित की जा चुकी हैं, यहां से अपनी जमीन से कैसे अलग करना है। 20 वर्ष की उम्र में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस बुनियादी सवाल से जूझना है कि भारत में मीडिया का भारतीय मॉडल क्या होना चाहिए।

अब यह कहने का वक्त गुजर चुका है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रारूप ने भारतीय मीडिया की अधकचरी संस्कृति को ओढ़ने-बिछाने वाले एक छोटे से तबके को भले ही कुछ दे दिया हो, एक आम भारतीय समाज के लिए उसका कोई मूल्य या महत्व नहीं। यह क्लासका मीडिया मासका मीडिया बन ही नहीं सकता। तो भारत की मीडिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दावों, विश्लेषणों, व्यारख्याओं की प्रासंगिक तस्वीर कैसी होनी चाहिए, यह सबसे गंभीर और बुनियादी सवाल 20 वर्ष की उम्र में एक औसत भारतीय मीडिया की तरह वक्त से पहले परिपक्‍व हो चली भारतीय मीडिया की आंखों में चस्पां है।

Tuesday, October 4, 2011

गांधी और नेहरू की तरह क्यों याद नहीं करते लालबहादुर शास्त्री और भगत सिंह को

2 अक्टूबर यानी गांधी जंयती, पूरे भारत में बड़े धूम-धाम से मनायी गई. समस्त  भारतवासियों ने गांधी को याद किया और उनकी याद में हर साल की तरह इस साल भी जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. परंतु, लगभग देशवा‍सी उस शक्स को भूल गये, जिसका योगदान भी भारत की आजादी में रहा. हां मैं बात कर रहा हूं- लाल बहादुर शास्त्री जी की. जिसको कुछ एक लोगों ने ही याद किया. बाकि सभी गांधी जंयती के जश्न में चूर रहे. सही बात है बड़े लोगों को ही ज्यादा तबज्जों दी जाती है छोटे लोगों को कौन पूछता है. जिस तरह 24 सितंबर का दिन कुछ लोगों को ही याद‍ रहता है, बाकि सभी ....................   हां मैं भगत सिंह की ही बात कर रहा हूं, सभी अपने अंतरमन में झांककर बोलिए कितने लोगों ने 24 सितंबर के दिन भगत सिंह को याद किया. या फिर 2 अक्टूबर के दिन लाल बहादुर शास्त्री जी को.

इस तरह का भेदभाव कितना उचित है कितना अनुचित. कौन बता सकता है. क्या  भगत सिंह या लाल बहादुर शास्त्री ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान नहीं दिया. क्याय केवल-और-केवल अहिंसा के बल पर भारत को आजादी नसीब हो सकी. सोचने की बात है. यदि कोई यह नहीं सोच सकता तो सोचों कि हम उन लोगों को क्यों याद कर लेते है जिसका सरोकर हमको हमारा हक दिलाने में था भी और नहीं भी या फिर जातिगत था, धार्मिक था, या बाहुबली.

ऐसे बहुत सारे महान लोग है जिनको याद किया जा सकता है. परंतु नहीं. हम याद क्यों करें, यही सोच में सभी मदहोश रहते है. यदि पूरे भारत में देखा जाए तो लगभग अधिकांश जगहों पर गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी की प्रतिमायें दिख जायेंगी, यहां तक कि भारतीय मुद्रा पर भी इन्हीं लोगों का दबदबा बरकरार है, परंतु खोजने पर भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लालबहादुर शास्त्री की प्रतिमायें या मुद्रा नहीं मिलेंगी. इसका क्यां कारण है कोई हमको बता सकता है. शायद किसी के पास इसका कोई जबाव न हो. बड़े शर्म की बात है क्योंकि यहां भी कहीं-न-कहीं इन लोगों की जाति ही जिम्मेदवार है यदि ये लोग भी उच्च जाति के होते, तो इन लोगों को भी गांधी, नेहरू की तरह याद कर लिया जाता.

कुछ बड़े विद्वानों का मत है कि गांधी तेरे देश में भांति-भांति के लोग, क्या  यह देश सिर्फ गांधी का ही है, नहीं यह देश सिर्फ गांधी का नहीं है यह देश उन सभी का भी है जिन्होंने अपना खून बहाकर इस देश को आजादी दिलाने में बराबर का योगदान दिया. मैं गांधी की अलोचना नहीं कर रहा हूं, पर मैं उन सभी लोगों को याद दिलाने की कोशिश कर रहा हूं जिनकी कुर्बानी से आज हम आजाद हैं, ये मेरे वतन के लोग जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो वो कुर्बानी.


Friday, September 30, 2011

एक वोट का लोकतंत्र और उसकी राजनीति

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां चुनाव के जरिये सरकार का निर्माण किया जाता है और वही सरकार आम जनता पर राज्य करती है. अपनी हुकूमत चलती है अपने द्वारा निधारित कानूनों को समय-समय पर लागू करती रहती है. जो उनके पक्ष में हो केवल उन्हीं कानूनों को. बाकी सभी कायदे-कानून बनते ही है टूटने के लिए.

आज का लोकतंत्र एक वोट पर टिका हुआ है, सभी राजनैतिक पार्टियां एक वोट की राजनीति करती है. और कर रही है. यह वही वोट है जो एक पार्टी को सत्ता में लाता है और एक पार्टी को विपक्ष में खड़ा होने के लिए मजबूर कर देता है. इस एक वोट के गुनताड़े के लिए पार्टियां जनता से न जाने कितने झूठे वादे करते हैं, और जनता आस्‍वत होकर इनके झूठे बहकावे में अकसर आ ही जाती है. जैसे-जैसे समय बीतता है इन नेताओं के द्वारा किए गए वादों की पोल भी खुलती रहती है. और जनता सिर्फ एक ही गाना गुनगुनाती है. क्या हुआ तेरा वादा. और इनके पास कोई चारा नहीं बचता.

इन नेताओं के झूठे वादे पर टिकी सरकार अकसर चल ही जाती है कभी धर्म के नाम पर, तो कभी जाति के नाम पर., आखिर सरकार तो बन ही जाती है. बिना किसी रोक-टोक के. उस एक वोट से, जिसके पीछे यह दिन-रात एक करते हैं. अगर देखा जाए तो चुनाव में किसको कितने वोट मिले यह मायने नहीं रखता, मायने तो बस यह रखता है कि कौन-सी पार्टी को जीत मिली और किस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा. इस एक वोट की जुगाड़ करने के लिए अधिकांश पार्टियां हत्याक, लूटपाट, आतंकवाद, चोरी-डकैती आदि तमात घटनाओं को अंजाम देने से भी पीछे नहीं रहती. वो भी मात्र एक वोट के लिए.

इस एक वोट की राजनीति पर टिकी सरकार किसका कितना भला कर रही है और कितना भला हुआ है, यह जग जाहिर हो चुका है. अगर इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो आजादी के बाद से अब तक न जाने कितनी सरकारें आई और न जाने कितनी आके चली गई. उनके द्वारा निर्धारित की गई प्रणालियों, नीतियों से अब तक कितना विकास हुआ भारत का. समझ से परे की बात लगती है. क्या, आर्थिकीकरण और पूंजीवादी व्यवस्था  का हावी होना विकास की परिभाषा है. गरीबों की जमीनों का अधिकारण करना, और अपनी तिजौरियों को भरना, ही विकास है, एक सरकार बनती है तो कुछ नये कार्यों की नीतियां निर्धारित होती है जैसे ही दूसरी सरकार आती है तो पहले की नीतियां पता नहीं कहां विलुप्त हो जाती हैं. यह विकास का कौन-सा पैमाना तय करती है. यह तो सत्ता पर काबिज सरकार ही आसानी से बता सकती है. कि अब तक कितना विकास हुआ. कितना हो रहा है और कितना होगा. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि विकास नहीं हुआ है, विकास तो हुआ है पर किसका, अमीरों का, उच्च वर्गों का. क्या गरीब जनता का विकास हुआ है, वो तो आज भी अपने परिवार को दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है. इस डायन मंहगाई के दौर में. और नेता बात करते है विकास की, कि विकास तो हो रहा है, नजरिये-नजरिये का फर्क है. अपना नजरियां बदलो. देखा हमारी दृष्टि से. हम क्या देखें इनकी दृष्टि से, एक वोट की राजनीति को जो सदियों से चली आ रही है. और शायद चलती ही रहेगी. जिसके लिए हम ही जिम्मेदार है. जो बार-बार इनके बहकावे में आ जाते हैं. जब उस सरकार से पीडि़त होते है तो दूसरी और जब उससे पीडि़त होते है तो तीसरी, यही रोना सदियों से हो रहा है. जो एडस की तरह लाईलाज हमारे समाज को दीमक की भांति खोखला बना रहा है. जिसका इलाज किसी न किसी को तलाश करना पड़ेगा, नहीं तो एक वोट की राजनीति का शिकार एक दिन हम सब को कहीं फिर न गुलाम बना दें.

Thursday, September 29, 2011

मीडिया से नदारत इरोम चानू शर्मिला

5 नवम्बर, 2000 से सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला आज भी 11 साल बाद अपने अधिकारों की लड़ाई लड़े जा रही है. और इंफाल के जबाहर लाल नेहरू अस्‍पताल में आज भी जिंदगी और मौत से जंग लड़ रही है. जिसकी सुध-बुध लेना किसी ने मुनासिब नहीं समझा. चाहे सरकार हो या फिर मीडिया. कहने को तो मीडिया समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करने में मद्दगार साबित होता है परंतु ऐसा मीडिया किस काम का जो केवल अपने मतलब के लिए ही काम करें, जिसका समाज से कोई सरोकर न हो. वैसे कानून समाज में अपराध कम करने के एवज में बनाये जाते हैं, जब सरकारी तंत्र द्वारा ही मानवीय अधिकारों का हनन किया जाने लगे तो आम जनता किस के सामने अपनी फरियाद लेकर जाए. यह एक शोध का विषय हो सकता है. जिस पर गहन चिंतन की आवश्यकता जरूरी है.
अगर पूरे मामले पर विस्तार से गौर किया जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सबके सामने आ जाएगी कि जब से सरकार द्वारा मणिपुर में सशस्त्र  बल विशेषाधिकार कानून पारित किया गया. और जिसका फायदा उठाकर सशस्त्र बलों ने 11 लोगों को दिन दहाड़े गोलियों से भून दिया. यह एक घटना नहीं थी बल्कि ऐसी बहुत-सी मानवाधिकार हनन की घटनाये आये दिन मणिपुर में होती रहती हैं; इसी के विरोध में इरोम शर्मिला चाहती है कि मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (ए.एफ.एस.पी.ऐ.) को हटा दिया जाए. जिसके तहत अशांत घोषित क्षेतों में सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियां प्राप्त होती हैं. और वह राज्‍य सरकार के कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं भले ही इसमें किसी की जान क्यों न चली जाए. इसका परिणाम यह है कि सैनिक दल इसका दरूपयोग करते हैं. और इस कानून की आड़ में हत्या, बलात्कार, र्टाचर, गायब कर देना और गलत गिरफतारी जैसे कार्य सशक्त बलों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं.
सरकार द्वारा गठित सशक्त बल विशेषाधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) के जवानों द्वारा लगातार मानव अधिकारों का हनन किया जा रहा है जिस पर मीडिया लगातार चुप्पी साधे हुए है, ऐसी कौन-सी मजबूरी है जिसके कारण 11 सालों से मीडिया में इरोम शर्मिला लगभग पूरी तरह से नदारत रही. उसकी मांग के समर्थन में कुछ एक लोगों के आवाज उठायी, मगर मीडिया मुंह पर ताला लगाए हुए नजर आता रहा. जिस तरह से मीडिया ने अन्ना हजारे के अनशन को तबज्जों दी, और सरकार को आखिरकार अन्ना हजारे के पक्ष में झुकना ही पड़ा. वही मीडिया ने इरोम शर्मिला के 11 साल से चले आ रहे अनशन को दी, नहीं, बिलकुल नहीं दी. अगर मीडिया थोड़ा-सा ध्यान इरोम शर्मिला के अनशन पर केंद्रित करता तो कब का इस महिला को अधिकार मिल गया होता और सरकार ने इस महिला की मांग मान ली होती. परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. न तो मीडिया ने तबज्जो दी और न ही सरकार ने इसकी मांगों को जायज माना.
इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मीडिया का चरित्र उसकी भूमिका पर सवालिया निशान लगता है, कि ऐसे वो कौन-से मूल कारण है जिसकी वजह से मीडिया इन मांगों को उठाने में कोताही बरत रही है. क्या मीडिया का फर्ज पीडि़तों को न्याय दिलाने का नहीं बनता. ऐसे बहुत-सारे सवाल हमारे जहन में अक्सर उठते रहते हैं, कभी सरकार से तो कभी मीडिया से. वही साल-दर-साल इरोम शर्मिला पूरे मणिपुर को अधिकार दिलाने के लिए अकेले अनशन पर बैठी है.  अपनी जिंदगी, अपना परिवार, सबका मोह त्यागकर. क्या कभी हम इस महिला का वो मूल्यावान समय वापस लौटा सकेंगे. जो इसने गंवा दिये, सरकार के खिलाफ लड़ते-लड़ते, अपनी मांगों को लेकर. और मीडिया चुप्पी साधे तमाशबीन की भांति तमाशा देख रहा है. शायद आशा करता हो की कहीं कोई सनसनी खबर मिले जिस पर एक-दो दिन बहस की जा सके. इरोम शर्मिला में क्या रखा है. जैसे 11 साल बीत गये वैसे ही और साल बीत जायेंगे. इनका क्या बिगड़ने वाला है. तभी तो एक सिरे से नदारत है मीडिया से इरोम चानू शर्मिला.

Wednesday, September 28, 2011

मीडिया का बदनाम चेहरा

आम तौर पर मीडिया का जो चेहरा हमारे सामने आता है वो स्‍वच्‍छ–साफ होता नहीं दिखाया जाता है. जिसमें हमको कोई बुराई नजर नहीं आती. परंतु यह सच्‍चाई नहीं है, परत-दर-परत, नकाब-पे-नकाब लगा हुआ चेहरा हमारे सामने परोसा जाता है, और पर्दे के पीछे की सच्‍चाई से हम रूबरू नहीं हो पाते. किस तरह मीडिया खबरों को बनाकर हमारे सामने परोसने का काम करती है यह जग जाहिर है, बावजूद इसके हम उन खबरों पर आंख मूंद कर विश्‍वास कर लेते हैं. शायद यह हमारी मजबूरी है. इसके अलावा और कोई रास्‍ता नजर नहीं बचता. क्‍योंकि सभी स्‍तंभ पूर्ण रूप से खोखले हो चुके है, हम यह कह सकते है कि अभी भी चौथे स्‍तंभ में जान बाकी है, पूरी तरह से खोखला नहीं हुआ है. हां यह बात और है कि कुछ एक मछलियों ने पूरे मीडिया समुदाय को गंदा कर दिया है. जिस प्रकार गेंहू के साथ घुन भी पीस जाता है और पता नहीं चलता, ठीक उसकी प्रकार मीडिया के कुछ बदनाम चेहरे जो मीडिया को दलदल की तह तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं उनके साथ स्‍वच्‍छ, साफ छावि और ईमानदार लोग भी बदनामी का दंश झेलने को मजबूर हैं..
देखा जाए तो स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में मीडिया की लड़ाई, मीडिया की आवाज अंग्रेजों के खिलाफ थी, खुद को और आने वाली पीढ़ी को स्‍वतंत्रता दिलाना उनका एक मात्र मकसद था. जिसके लिए मीडिया कोई भी कीमत चुकाने को तैयार था और कीमत चुकाई भी. हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि आजादी की लड़ाई में जितनी भूमिका क्रांतिकारियों, नेताओं की रही, उतनी ही भूमिका मीडिया ने भी निभायी. आखिरकार 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों के जुल्‍मों से भारत को आजादी मिल गई, आजादी मिलने के बाद लगा की हम स्‍वतंत्र हो गये हैं, परंतु ऐसा नहीं था. अंग्रेजों के जुल्‍मों–सितमों के बाद जिन नेताओं को हम अपना रहनूमा मान बैठे थे, उन्‍होंने भी हम पर कहर बरपाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे हुए जो अमीर थे वो और अमीर होते चले गये, और जो गरीब से उनकी स्थिति बद-से-बदतर होती चली गई. लगा कि कोई हमारी लाज बचाने नहीं आएगा. तब मीडिया ने अपनी शक्ति से सभी को वाकिफ करवाया. और पीडि़तों की आवाज बनकर समाज और बाहुबलियों के सामने खड़ा हो गया. गरीब व शोषित जनता को लगा कि मीडिया श्रीकृष्‍ण की भांति हमारी लाज बचाने आ गये हैं, परंतु जल्‍द ही उनका यह भ्रम भी टूटता चला गया.
आधुनिकीकरण और पूंजीवादी व्‍यवस्‍था ने मीडिया को भी अपनी चपेट में ले लिया. मीडिया अब गरीब जनता और पीडि़त व्‍यक्ति को न्‍याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि मात्र खबरों के रूप में इस्‍तेमाल करने लगा. क्‍योंकि पूंजीवादी व्‍यवस्‍था जिस प्रकार समाज पर हावी होती गई, मीडिया पर उसका असर साफ दिखाई देने लगा. अब आलम यह हो चुका है कि समाज की नजरों में मीडिया की छवि श्रीकृष्‍ण से कंस में तबदील हो चुकी है. हम पूरे मीडिया समुदाय को कंस नहीं कह सकते, शकुनी, द्रोणाचार्य, भीष्‍म पितामाह, धृष्‍ट्रराज, द्रोयोधन, युधिष्‍टर, अर्जुन, भीम का भी दर्जा दे सकते हैं. जो अपनी कूटनीतियों में माहिर हो चुके हैं. उनको समाज से कोई सरोकार नही. वो खबरों को परोसने के साथ-साथ चटखारे भी ले रहे हैं, उससे उसको टी.आर.पी. मिल रही है, एक होड़ मची हुई है. कौन सबसे पहले द्रौपदी को दांव पर लगायेगा, कौन सबसे पहले उसको नंगा करेगा. उसके लिए वह कुछ भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं, क्‍योंकि मीडिया को द्रौपदी के नंगे होने में फायदा नजर आता है उसकी इज्‍जत बचाने में नहीं. मीडिया द्रौपदी जैसी न जाने कितनी महिलओं को नंगा करके परोस चुका है और कहता है, कि जो बिकता है उसी को दिखाया जाता है. शायद यह एक पहलु की हकीकत है कि समाज में व्‍याप्‍त पुरूष मानसिकता अब भी उसी पुरजोर तरीके से अपनी पकड़ बनाये हुए है, जिसका फायदा लगातार मीडिया उठाता आया है, और उठा भी रहा है. दूसरा पहलू यह भी है कि मीडिया गरीब व पीडितों (महिलायें भी शामिल) को अपनी ठाल बनाकर वार करता है, और खबरों को नमक-मिर्च लगाकर बार-बार नंगा करता है. मैंने पहले ही कहा है कि मीडिया में अब भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो मीडिया की साख बचाये हुए हैं, और गरीबों व पीडितों को खबर बनाकर नहीं बल्कि, उनको न्‍याय दिलाने के लिए लड़ते नजर आते हैं, परंतु इनकी संख्‍या 10 में 1 या 2 ही है, बाकी सब-के-सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको हम अपना आइकन मानते थे, समाज में उनकी अपनी एक अलग पहचान थी. परंतु पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के मोहमाया जाल की जकड़न से खुद को नहीं बचा पाए. और, समाज को नेताओं की भांति अपने मतलब की वस्‍तु व बिकाउ बना दिया.
मैं मीडिया पर टिप्‍पणी नहीं कर रहा हूँ, मैं तो बस मीडिया का बदनाम चेहरा दिखाने की कोशिश कर रहा हूं, जिससे समाज अभी तक बाकिफ नहीं हो पाया है, इस आलोक में यह भी कहा जा सकता है कि इस तरह मीडिया का चेहरा बदनाम होता गया तो वो दिन दूर नहीं जब समाज का भरोसा मीडिया पर से पूरी तरह उठ जाएगा, और मीडिया शेयर बाजार के सेंसेक्‍स की तरह औंधे मुंह गिर पड़ेगा. अभी भी वक्‍त है वक्‍त रहते चेत जाए तो ठीक है नहीं तो मीडिया के पास पछताने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा.

Tuesday, September 27, 2011

मीडिया का दोहरा चरित्र या दोगलापन

आज मीडिया किस तर्ज पर काम कर रहा है, समझ से परे है; जिस भेड़चाल की भाषा का इस्‍तेमाल हो रहा है, वो सभी जानते हैं कि एक उच्‍चवर्ग की भाषा बोली जा रही है. कौन कह सकता है कि यह सभ्‍य मीडिया है, जो समाज में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को मिटाने में कारगर साबित होगा, जिसका पूरा गिरेवान दागदार हो और जो खुद पूरी तरह से इस दलदल में धस चुका हो, वो क्‍या समाज का उद्धार करेगा. अगर देखा जाए तो आज तक किसी भी मीडिया संस्‍थान ने यह दिखाने की जहमत नहीं उठायी कि फलां फलां समाचार पत्र में या न्‍यूज चैनल में फलां फलां व्‍यक्ति भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त है, या अपराधी है. जिस तरह से पुलिसवाले अपने भाईयों को (सहकर्मी) जल्‍द ही नहीं पकड़ती, जब तक उसने उपर कोई दवाब न पड़े, उससे भी बुरी दशा मीडिया की है, वो तो दवाब पड़ने के बावजूद भी उनके द्वारा किये गये अपराधों को समाज के सामने नहीं लाता, और पूरा मामला गधे के सिर से सींग की तरह गायाब कर दिया जाता है. शायद मीडिया डायन के तर्ज पर काम कर रहा है क्‍योंकि डायन भी सात घर छोड़कर वार करती है; उसी प्रकार मीडिया भी अपने भाईयों को और अपने रहनूमाओं को छोड़कर बाकी सभी को खबर बनाकर पेश करता रहता है. यह एक तरह का दोगलापन है, दोहरा चरित्र है.
वैसे मीडिया में दिखाई जाने वाली तमाम खबरों को देखकर आमजन की धारणा खुद ब खुद बन जाती है कि जो दिखाया जा रहा है वो सोलहआने सत्‍य है. उसमें झूठ की कहीं कोई गुंजाइस नहीं है. पर आमजन की कसौटी पर मीडिया पूरी तरह खरी नहीं उतरती. वो एक एक खबर की धाज्जियां उड़ाते हुए उस खबर से तालुक रखने वाले व्‍यक्ति का व उसके परिवार का समाज में जीना हराम कर देते हैं. क्‍योंकि वो खबर मध्‍यमवर्ग या फिर निम्‍न वर्गीय लोगों से होती है. उच्‍चवर्गीय लोगों से ताल्‍लुक रखने वाली खबर तो बस, खिलाडि़यों की, फिल्‍मी अभिनेता व अभिनेत्रियों की, नेताओं की, पार्टी में सिरकत लोगों की अधिकांश होती है. क्‍योंकि कहीं न कहीं इन उघोगपतियों और राजनेताओं द्वारा गरीबों का खून चूस चूसकर इक्‍ठ्ठा किया जाता है और उस धन से खोल लिया जाता है एक मीडिया संस्‍थान. काली कमाई को सफेद बनाने का एक आसान जरिया, और बड़ी आसानी से बन भी जाती है,
आज तक मैंने किसी भी मीडिया में यह खबर चलते नहीं देखा कि इस मीडिया संस्‍थान में इनकम टैक्‍स का छापा पड़ा हो, उसके मालिक के घर छापा पड़ा हो, और उसका घर या फिर मीडिया चैनल को सील कर दिया हो. क्‍या मीडिया इनता पाक साफ है कि उसके द्वारा कोई भी अपराध या लेनदेन की घटनायें नहीं होती. इस परिप्रेक्ष्‍य में क्‍या कहा जा सकता है; आमजन तो गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी  बांधकर सबकुछ सहन कर रहे है; वो सोचते है शायद हमारी यही नियती है; सदियों से झेलते आये है अब भी झेलना पड़ रहा है; जिस चौथे स्‍तंभ से न्‍याय की आस लगाये बैठे है वो ही अपराध में लिप्‍त हो चुका है, जो खुद अपराध में लिप्‍त है वो बाहुबलियों से पीडि़त व्‍यक्ति को क्‍या इंसाफ दिला पाएगा; इस न्‍याय आस में पीडि़त साल दर साल जीवित रहते है, और मर जाती हैं आस की वो सारी किरण, जो न्‍याय की दहलीज तक पहुंच सकें.