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Friday, November 25, 2011

मीडिया में सांप्रदायिक शक्तियाँ


               मीडिया में सांप्रदायिक शक्तियाँ

 हम सबने बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मीडिया की रिपोर्टिग के विषय में सुना है जो वे छोटे-छोटे देशों में संक्रमण के दौरान काम करते हैं। यहां मैं उस बात को दोहराऊंगा नहीं, बल्कि अलग बातें करूंगा। मैं सोचता हूं कि किसी बड़े देश, मसलन भारत में कोई बड़ा मीडिया हाउस संक्रमण के समय कैसे काम करता है। एशिया के विभिन्न देशों के मीडिया के विश्लेषण से अनेक बातें सामने आती हैं। वह भारत हो या पाकिस्तान या श्रीलंका या नेपाल, मैं ऐसे देशों की बात कर रहा हूं जहां प्रसारित समाचार को लाखों की संख्या में दर्शक-पाठक यानी अटूट सत्य के रूप में अंगीकार करते हैं। रेडियो पर प्रसारित एक झूठी ख़बर ऐसी उग्र भीड़ इकट्ठा कर सकती है उसकी कल्पना यूरोपीय देशों में नहीं की जा सकती।

आज से वर्षों पहले भारत की प्रसिळ प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपात्काल की घोषण कर संवैधानिक व्यवस्था को निरस्त कर दिया था, लोगों से उनके मूलाधिकार छीन लिये थे, मानवाधिकर पर बंदिश लगा दी थी। उस समय जार्ज फर्नांडिस पर यह आरोप था कि वे संसद भवन को बम से उड़ाने की साजिश रच रहे थे। तीन वर्ष जेल में बंद रहने के बाद जब फर्नांडिस छूटे तो उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए ये शब्द कहे ‘‘इंदिरा गांधी ने आपको सिर झुकाने के लिए कहा लेकिन आप उनके पैरों पर लेट गए, उन्होंने आपको थोड़ा झुकने के लिए कहा आप उनके तलवे चाटने लगे।मुझे संशय है कि वर्षो के बाद भी भारतीय मीडिया के स्वरूप में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। बड़े पूंजी वाले मीडिया घरानों की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है।

चंद अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के समाचारपत्रों ने तानाशाही शक्तियों के सामने अपनी हार नहीं मानी। उनका संघर्ष आज भी जारी है। लेकिन दुःखद आश्चर्य है कि ऐसे समाचार पत्रों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मीडिया मानवाधिकार से जु़ड़े हुए आंदोलनों का आधार स्तंभ है। उसकी आवाज़ में बुलंदी है जो लोगों के लिए अत्यंत ही आवश्यक है। बहुसंख्यक समाचार पत्र राजनीतिक और प्रशासनिक दबावों के चंगुल में फंसे हुए हैं। महज पैसे, लालच और स्वार्थ के ख़ातिर पत्रकारिता की निष्पक्षता की कुर्बानी दे दी जाती है।

राजनीतिज्ञों द्वारा झूठ की तस्वीर बनाने में मीडिया सहायता करता है। इस झूठ की बुनियाद पर समाज को अपनेऔर दूसरेजैसे खेमों में बांट दिया जाता है। दरअसल, हर जातीय और सांप्रदायिक दंगे की जड़ के पीछे यही झूठ छिपा होता है। बहुसंख्यक समुदाय के बीच यह संशय बना होता है कि उनके बीच भी अल्पसंख्यक समुदाय का बोध किसी न किसी रूप में छिपा हुआ है। भारत की जनसंख्या तकरीबन 105 करोड़ है। हमें नहीं मालूम इस विशाल जनसंख्या के अंतर्गत कितने यूरोप बनाए जा सकते हैं। ईसाई समुदाय का प्रतिशत करीब 2.3 है। मुसलमान करीब 12 प्रतिशत है और सिख 2 प्रतिशत हैं। अगर बहुसंख्यक समुदाय में अल्पसंख्यकवाद की भावना नहीं है तो वह किस भय से ग्रसित है? महज 2.5 करोड़ ईसाई, 2 करेाड़ सिख या 12 करोड़ मुसलमान से उन्हें क्या डर हो सकता है। उनकी तादाद तो 85 करोड़ से भी अधिक है।

झूठ इस बुनियाद पर टिका है कि अगर आप मेरे जैसे नहीं हो तो आप अलग हो’, ‘अगर आप अलग हो तो आप मेरे दुश्मन हो। चूंकि आप दुश्मन हो तो आपका अंत निहायत लाज़िमी है। आज की नियति यही है। सच तो यह है कि हंगटिंगटन ने सभ्यताओं की लड़ाईका सिळांत भारत से ही लिया होगा। इस झूठ को फलने-फूलने में राज्य के तंत्र भी उसके साथ हैं। इस बुनियाद पर नए नियम बनाए जा रहे हैं, जिसके अंतर्गत मुसलमानों को मस्ज़िद बनाने का अधिकार नहीं है। ईसाई को चर्च बनाने का अधिकार छिन लिया गया।

अगर आपको अपना धर्म बदलना है तो आपको पुलिस-कोर्ट में हाज़िरी देनी होगी। अगर आपको अपने परिचितों के शव को दफ़न करना हेागा तो आपको कोसों दूरी तय करनी होगी, क्योंकि शवगृह के दरवाजे नगर निगम के जिम्मे आते हैं और वहां पर भी अल्पसंख्यक समुदायों के साथ न्याय नहीं होता। ये परिस्थितियां घृणा और तिरस्कार की राजनीति से उत्पन्न हुई है। जिसके निशाने पर ईसाई, सिख और मुसलमान समुदाय के लोग ही हैं।

मुझे दुख है कि इतना कुछ होने के बावजूद मीडिया चुप है क्योंकि उसे विश्वास है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह सही है। ऐसा इसलिए कि इसमें बहुसंख्यक समुदाय की आवाज मिली है। लोकतंत्र भी तो बहुसंख्यकवाद पर ही टिकी हुई है। लेकिन दर्द इस बात का है कि मीडिया अत्यंत ही घिनौनी और स्वार्थपूर्ण और अन्याय की राजनीति को अपने आंखों से देखने के बावजूद भी चुप है। भारतीय मीडिया एक ओर ब्रिटिश मीडिया के नक्शे कदम को अख्तियार कर अपने आपको निष्पक्ष और स्वतंत्र मानता है। लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। यहां के महत्त्वपूर्ण मीडिया घराने उद्योगपतियों या राजनीतिक दलों के हिमायती बने हुए हैं। आज से पांच वर्ष पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था एक बंद व्यवस्था थी। उद्योगपतियों को मुनाफे के लिए सरकारी तंत्रों की जरूरी थी। ऐसे माहौल में मीडिया की निष्पक्षता कैसे स्थापित हो सकती है। मुनाफे के लिए हर मीडिया हाउस को सरकारी अनुदेशों को मानना होता है। अगर कोई कोलंबिया स्कूल से भी पत्रकारिता की डिग्री करके आया हो तो भी कुछ बात बनने वाली नहीं है। वह भी दमघोटू वातावरण में अपनी निष्पक्षता और गुणवत्ता को भूलकर महज दकियानूसी व्यवस्था का एक पालतू जीव बनकर रह जाता है। मालिक सरकारी हुक्म का हिमायती होता है तो पत्रकार मालिक के आदेशों का पालन करता है। क्या ऐसे माहौल में मीडिया की निष्पक्षता बन सकती है?

सरकारी आगोश में फल-फूल रही मीडिया यही करती है। इसे ही हम राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देशभक्त मीडिया का दर्जा दे रहे हैं। दरअसल, यह राष्ट्रभक्ति एकपक्षीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती है। जिसमें न तो सहनशीलता होती है और न ही सर्वांगीण समाज के विकास की भावना मसलन एक राष्ट्र, एक लोग, एक धर्म और संस्कृतिकी बुनियादी पर यह राष्ट्रवाद टिका होता है। अगर इस विचारधारा को आत्मसात कर लें तो भारत का आधारभूत स्वरूप ही विखंडित हो जाएगा क्योंकि हमारी शक्ति या विशिष्टता तो विविधताओं में एकता की है। वर्षों से विभिन्न समुदाय के लोग सप्तरंगी धनुष में बंधकर भारत की प्रतिष्ठा और श्ािक्त को बढ़ाते रहे हैं। यूरोप में भी 1920 के दशक में अतिराष्ट्रवाद की भावनाओं से उत्पन्न स्थिति को जर्मनवासी देख चुके हैं। जिसने हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाहों को जन्म दिया। इसलिए स्थिति सचमुच में भयावह है। सरकारी तंत्रों में फंसा मीडिया सरकारी अनुदेशों का तो पालन कर सकता है लेकिन अल्पसंख्यक वर्ग के दुख-दर्द को नहीं बांट सकता।

बहुतेरे बड़े समाचार पत्रों के संपादक सत्ताधारी पार्टी के सहयोग से संसद के सदस्य बने बैठे हैं। कुछ संपादक जो राजनीतिक समीकरण के जरिए संसद भवन में पहुंचे हैं और कुछ की सांठगांठ सत्ताधारी पार्टी से है। ऐसे माहौल में निष्पक्ष पत्रकारिता की कल्पना भी बेकार है। दक्षिणपंथी विचारधारा की बातें समाचार पत्र की सुर्खियों में हर सुबह दिखाई देती है और लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाओं का हनन होता है। दरअसल, यही स्थिति टेलीविजन इलेक्ट्रॅनिक मीडिया की है। बहुत हद तक यह मीडिया सरकारी तंत्रों द्वारा नियंत्रित है।

दूसरी तरफ अंतराष्ट्रीय मीडिया है जिनके पुरोधा स्टार टेलीविजन के श्री मडॉक हैं। उनके द्वारा भारत में एमटीवी, विदेशी फिल्में और समाचार चैनेल दिखाए जाते हैं। वर्तमान कानूनी पेचीदगियों की वजह से स्टार चैनेल की अपलिंकिंग विदेशों से ही होती है। ऐसी स्थिति समस्याओं का हू-ब-हू चित्रण संभव नहीं हो पाता। कभी-कभी लोग बीबीसी और सीएनएन की तरफ मुड़ते हैं। लेकिन बीबीसी भारत में अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रहे समाचार को कहां-कहां कवर कर पाएगी?

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में फेरबदल की वजह से भारत अमेरिका का सहयोगी बन गया है। इसकी वजह से अमेरिका का नजरिया भी भारत के प्रति बदल गया है। मानवाधिकार के विषय पर अमेरिका भारत की खिंचाई नहीं करता। यह परिवर्तन खतरनाक संकेत का सूचक है। हमें नहीं मालूम कि जर्मनी में भारत संबंधी मानवाधिकार हनन के मसले पर कितना विचार विमर्श होता है। भारत में बाल मजदूरी से लेकर बहुओं को जलाने तक की घटनाएं रोज होती हैं। मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय पर अत्याचार का सिलसिला अनवरत जारी है। इसलिए जरूरी है कि एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की जाए जिसमें मीडिया के लोगों को शिक्षा दी जाए कि मानवाधिकार से संबंधित मसलों पर निष्पक्ष और संतुलित रिपोर्टिं कैसे की जाए।

भारत के इर्द-गिर्द भी माहौल वैसा ही है। श्रीलंका के जातीय युद्ध की लड़ाई समाचार पत्रों की सुर्खियों में भी दिखाई देती है। समाचार पत्र भी दो खेमों में बंटे हुए हैं। ये खेंमे एक-दूसरे पर छींटाकशी से बाज नहीं आते। पाकिस्तान और नेपाल में भी प्रेस की निष्पक्षता खतरे में है। इसलिए हमारी कोशिश पूरे दक्षिण एशिया में और विशेषकर भारत में ऐसी प्रशिक्षण संस्थाओं की स्थापना से है।

मैं मीडिया से अपील करना चाहता हूं कि आप विषयों को भलीभांति समझें, उनकी समीक्षा करें। यूरोप भारतीय उपमहाद्वीप में कई और सरकारी संस्थाओं को सामाजिक कार्यों के लिए आर्थिक सहायता मुहैया कराती है। दरअसल, इन्हीं संस्थाओं में कई संस्थाएं किसी खास विचारधारा से जुड़ी हैं। उन्हीं के द्वारा अल्पंसंख्यक वर्गों पर अत्याचार होता है। इसलिए जरूरत है उनके चेहरे पर लगे नकाब को हटाकर पहचानने की, उनकी विगत गतिविधियों की जांच करने की। जब तक ऐसा नहीं होगा अल्पसंख्यक वर्गों का शोषण होता रहेगा। हमारी अपील है कि आप ऐसी किसी संस्था को आर्थिक सहायता न दें जो विषवमन करती हो और उस विष के पीने से हजारों लोग मरते हों।

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