सरोकार की मीडिया

test scroller


Click here for Myspace Layouts

Sunday, November 27, 2011

घरेलू हिंसा का समाजशास्त्र


घरेलू हिंसा का समाजशास्त्र



प्राचीन भारत में पितृसत्तात्मक युग से पहले मातृसत्तात्मक युग था। नारी शक्ति की परिचायक हुआ करती थी। यह पाषाण युग के बाद का काल था।1 लेकिन सहस्त्राब्दियों के बाद नारी के जीवन में बदलाव आने लगा और नारी पर धीरे-धीरे पुरूषों का अधिपत्य स्थापित होने लगा। मातृसत्ता की समाप्ति और पितृसत्ता के उदय ने नारी के जीवन को पूर्णतः बदलकर रख दिया। उनके अधिकारों का दोहन शुरू हो गया था। वैसे महिलाएं शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर होती हैं इसलिए पुरूष जब-तब उन्हें ताकत के बल पर झुका लेना चाहता है। औरतों को घर के बाहर तो शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना ही पड़ता है लेकिन घर के भीतर भी वे सुरक्षित नहीं हैं। घर के भीतर महिलाओं को पति के हाथों पिटना पड़ता है। यह किस्से -कहानियों की बात नहीं है कि कुछ पति अपनी पत्नियों को जानवरों की तरह मारते-पीटते हैं। यह निम्न वर्ग के अशिक्षित लोग ही अपनी पत्नियों को मारते-पीटते हैं तो यह गलत है। सच्चाई तो यह है कि उच्च शिक्षित अत्याधुनिक युवतियां भी घरेलू हिंसा का शिकार होती है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि, ‘‘घरेलू हिंसाएक प्रकार की अनचाही बलि है जो पत्नी के साथ मारपीट करने, उसकी हत्या करने उसे पागल घोषित करने या छोड़ देने, तलाक देने या किसी स्थान पर बंदी बनाने की घटनाओं के रूप में दिखायी देती हैं। घरेलू हिंसामें घमकी देने के रूप में महिलाओं को घूरकर और इशारे से डराया धमकाया जाना  एवं उसकी सम्पत्ति नष्ट किए जाना आदि है।’’2

अक्सर ऐसा होता है कि पति-पत्नी के बीच किसी बात को लेकर विवाद पैदा हो जाता है। विवाद कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि पुरूष हिंसक हो उठता है और वह अपनी पत्नी को लात-घूंसों से पीटने लगता है। चूंकि महिलाएं शारीरिक रूप से पुरूषों के मुकाबले कुछ अक्षम हैं इसलिए पारिवारिक हिंसा का शिकार सदैव औरतें ही होती हैं। घरेलू हिंसाकिसी एक देश या समाज तथा सीमित नहीं बल्कि दुनिया भर की औरतें घरेलू हिंसाका शिकार होती है। निम्न वर्ग के लोग भी घर में औरतों को पीटते है तो उच्च शिक्षित औरतें भी घरेलू हिंसा अभिशप्त हैं। और तो और कामकाजी महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है, पति के हाथों पिटना पड़ता है।

       ‘‘विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों के आधार पर दोनों प्रकार के देशों - औद्योगिक रूप से विकसित और विकासशील देशों में घेरलू हिंसा भड़कने के कारण की एक सूची तैयार की है जो इस प्रकार है’’3 -

§  पुरूषों की आज्ञा न मानना

§  उलटकार बहस करना या जवाब देना

§  वक्त पर खाना तैयार न होना

§  घर के बच्चों की ठीक से देखभाल न करना

§  पुरूषों से घन या गर्ल फ्रेंड्स के बारे में पूछताछ करना

§  पति की अनुमति के बगैर कहीं चले जाना

§  पुरूषों को सेक्स के लिए मना करना

§  पुरूषों को पत्नी पर विश्वासघाती होने का संदेह

लगभग सभी वर्ग और सभी सभ्यताओं में महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। यह बात महिला के व्यक्तित्व पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालती है क्योंकि इसके कारण महिलाओं को अपना अस्तित्व खतरे में नजर आने लगता है। घरेलू हिंसा का सीधा-सा अर्थ घर के भीतर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और मार-पिटाई से है। घरेलू हिंसा के कई आयाम हैं आमतौर पर घरेलू और वैवाहिक हिंसा को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है। वास्तव में ऐसा नहीं है इन दोनों के बीच में एक बारीक-सा अंतर है। घरेलू हिंसाएक व्यापक शब्द है जिसे पारिवारिक हिंसा भी कहते है। इसमें सास, ससुर, देवर, जेठ, नंनद आदि द्वारा स्त्री(बहू) को सताना और मारना-पीटना भी शामिल है। घरेलू हिंसा कानून को बने पांच साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है। पर अब तब तस्वीर साफ नहीं हुई है कि इस कानून के तहत देश भर में कितने मामले दर्ज किए गए है। पर 2009 में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह बात निकलकर सामने आई है कि ‘‘तकरीबन 40 फीसदी महिलाएं रोजाना अपने पतियों से पिटती हैं।’’4

घरेलू हिंसा के बारे में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, ‘‘हिंसा के विरूद्ध शिकायत करने वाली महिलाओं में 12 प्रतिशत महिलाएं दहेज के कारण प्रताड़ना की शिकायत करने वाली होती है।’’5  घरेलू हिंसापर काम कर रहे इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन की संचालनात्मक अनुसंधान परामर्शदाता सुश्री नंदिता भाटला ने अपने एक लेख में कैई चैकाने वाले तथ्य दी कि, ‘‘महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के अखिल भारतीय आंकड़े बेहद खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत दे रहे हैं- पिछले पांच साल में ने केवल महिलाओं के विरूद्ध अपराधों में वृद्धि हुई है, बल्कि उत्तरोत्तर अपराधों की संख्या में वृद्धि हुई है। घर के अंदर भी महिलाओं के विरूद्ध घरेलू हिंसा में अत्यंत नाटकीय बढ़ोतरी हुई है। घरेलू हिंसा के मामले में महिलाओं के विरूद्ध हिंसा करने वाले उनके पति और रिश्तेदार शामिल होते हैं। महिलाओं पर घर में हिंसात्मक प्रहार करने वालों में इन लोगों की संख्या सबसे अधिक है।’’6

इंडिया सेफस्टडी द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, ‘‘घरेलू हिंसा पूरे भारत में वर्ग, जाति शिक्षा और रोजगार के स्तर से परे व्यापक रूप से फैली हुई है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि 58 प्रतिशत महिलाओं ने पति द्वारा उन पर की जा रही हिंसा को स्वीकार तो किया पर साथ ही यह भी कहा है कि वे उसके साथ इन मान्यता के आधार पर रह रही हैं, क्योंकि विवाहित जीवन में हिंसा की घटनाएं आम बात होती है।’’7

‘‘भारत एक ऐसा देश हैं जहां हर साल महिलाओं के विरूद्ध अपराध के 1.5 लाख मामले दर्ज किए जाते हैं।’’8 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण कार्यक्रम में घरेलू हिंसा के संबंध में चैकाने वाले आंकडे़ं पेश किये। सर्वेक्षण में 37.2 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया कि विवाह के बाद पति के हिंसात्मक आचरण का शिकार हुई। विवाहित महिलाओं के विरूद्ध की जाने वाली हिंसा के मामलों में बिहार सबसे आगे है जहां 59 प्रतिशत महिला घरेलू हिंसा की शिकार हुई, उनमें से 63 प्रतिशत शहरी इलाकों से थे। दूसरे राज्यों की स्थिति बहुत ठीक नहीं है। मध्य प्रदेश में 45.8, राजस्थान में 46.3, मणिपुर में 43.9, उत्तर प्रदेश में 42.4, तमिलनाडु में 41.9 तथा पश्चिम बंगाल में 40.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा हुई।

घरेलू हिंसाएक विश्व व्यापी समस्या है और दुनिया भर की महिलाएं किसी-न-किसी रूप से इसका शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोश की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की 70 फीसदी महिला किसी-न-किसी रूप से कभी-न-कभी घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में घरेलू हिंसा के मामले में 53 प्रतिशत की दर बढ़ रहे हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी) की धारा 498ए के अंतर्गत दर्ज मामले (पति और रिश्तेदारों द्वारा अत्याचार व क्रूरता) के होते है।

घरेलू हिंसा को रोकने के लिए भारत सरकार ने सन् 2006 के अंत में घरेलू हिंसा निषेध कानून, 2005’ को लागू करने संबंधी अधिसूचना जारी की जिससे यह कानून पूरे देश में लागू हो गया है।‘‘9 महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण विधेयक, 2005 को लोकसभा द्वारा 24 अगस्त, 2005  और राज्यसभा द्वारा 29, अगस्त, 2005 को पारित किया गया। 25 अक्टूबर का दिन देश की महिलाओं ने लिए कोई सामान्य दिन नहीं था। वह भारत में वैवाहिक मामलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन था। ‘‘उस रोज देश के राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। इस कानून के तहत वित्तीय अधिकारों की रक्षा करते हुए पहली बार घर में ‘‘अदृश्य हिंसा’’-शारीरिक यातना और गाली गलौज एवं यौन अत्याचार को दूर करने का प्रयास किया गया है।’’10 प्रारंभ में इस कानून के तहत महिलाओं को पति व बिना विवाह के साथ रह रहे पुरूष और रिश्तेदारों के हाथों हिंसा से बचाने की बात कहीं गयी थी लेकिन बाद में पति की मां, बहन तथा अन्य महिला रिश्तेदारों को भी इसके दायरे में ले लिया गया।

घरेलू हिंसा निवारण कानून एक महत्वपूर्ण कानून है और इसके द्वारा घरेलू हिंसा को प्रभावी तरीके से रोका जा सकेगा। इस कानून में निम्नलिखित कृत्यों को अपराध घोषित किया गया है।

§  महिला का शारीरिक, भावनात्मक, आर्थिक या यौन शोषण करना या इसकी धमकी देना।

§  महिला को ताने मारना।

§  पुरूष द्वारा घर में महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा जीवन और शरीर को कोई नुकसान या चोट पहुंचाना।

§  महिला को किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक कष्ट देना या ऐसा करने की मंसा रखना।

§  महिला का यौन उत्पीड़न

§  महिला की गरिमा व प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना

§  बच्चे न होना या पुत्र न होने पर ताने मारना

§  महिला को अपमानित करना।

§  महिला की आर्थिक व वित्तीय जरूरतों को पूरा न करना।

§  महिला (पत्नी को ) शारीरिक संबंध बनाने या अश्लील चित्र आदि देखने को मजबूर करना।

§  सेक्स के दौरान ऐसा कृत्य जिससे पत्नी को चोट पहुंचती हो।

§  दहेज न लाने के लिए प्रताड़ित करना।

§  महिला या बच्चों को पीटना, धक्के मारना, घूंसे मारना।

§  महिला को आत्महत्या की धमकी देना।

इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना जायेगा। दोषी पाए जाने पर एक साल की सजा या 12 हजार रूपये का जुर्माना या दोनों सजा साथ-साथ दी जा सकती है। कानून में पीड़ित महिलाओं की मद्द के लिए एक संरक्षण अधिकारी और गैर-सरकारी की नियुक्ति का प्रावधान है ये पीड़ित महिला की मेडिकल जांच, कानूनी सहायता, सुरक्षा व छत मुहैया कराने का काम करेंगे। इन कानून में घरेलू हिंसा को रोकने के लिए बेहद सख्त प्रावधान बनाये गये हैं। लेकिन कानून बना देना ही समस्या का समाधान नहीं है। कानून के बावजूद महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। इस कानून में यह प्रावधान किया जाये कि प्रत्येक जिले में कम-से-कम एक संरक्षण अधिकारी अवश्य नियुक्त किया जाये और कोशिश की जाये कि यह अधिकारी यथासंभव महिला ही हो, और इन अधिकारी द्वारा ग्रामीण और निम्न वर्ग की महिलाओं को इस कानून और इसके प्रावधानों के बारे में विस्तार से समझाया जाये ताकि वे घरेलू हिंसा निवारण कानून के लाभ को प्राप्त कर सके और घर में भी सिर उठकर सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सके।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1- कादम्बिनी-मातृसत्तात्मक युग से अब तक नारी-नवंबर, 2009, पृ. 24

2- ममता, प्राक्कथन प्रो. आभा आहूजा- घरेलू हिंसा अधिकारों के प्रति महिलाओं की जागरूकता-   रीजनल  पब्लिकेशन, नई दिल्ली-2010, पृ. 15

3- देवसरे, विभा- घरेलू हिंसाः वैश्विक संदर्भ- आर्य प्रकाशन मंडल, दिल्ली- 2008, पृ. 124-125

4- पति से रोज पिटती हैं, चालीस फीसदी महिलाएं- बेवदुनियां, हिंदी- 26 अक्टुबर, 2008

5-देवसरे, विभा- घरेलू हिंसाः वैश्विक संदर्भ- आर्य प्रकाशन मंडल, दिल्ली- 2008, पृ. 113

6- वही,  पृ. 114

7- वही, पृ. 115

8- इंडिया टुडे- नए कायदे विवाह के- 6 दिसंबर, 2006, पृ. 20

9- अरोड़ा, सत्यार्थ- घरेलू हिंसा से महिलाओं का सरंक्षण अधिनियम, 2005- अरोड़ा बुक कम्पनी, मेरठ-2010, पृ. 8

10-इंडिया टुडे- नए कायदे विवाह के- 6 दिसंबर, 2006, पृ. 18

No comments:

Post a Comment