सरोकार की मीडिया

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Wednesday, February 13, 2013

तुम्हारे बिन यह ऊंचाईयां बर्दास्त नहीं होती


तुम्हारे बिन यह ऊंचाईयां बर्दास्त नहीं होती

जिंदगी के उतार-चढ़ाव देखने के बाद आखिरकार मैं जीवन के लगभग एक तिहाई साल काटने में कामयाब रहा। हां इन एक तिहाई सालों में बहुत से पल मानों मैंने सौ-सौ सालों के समान जीए हों और कुछ खट्टे-कड्वे पलों को तो मैं मरते समय तक नहीं भुला सकता। सही है अच्छे वक्त और बुरे वक्त को इंसान कभी भी नहीं भुला पता।
आज जीवन के इस पड़ाव पर पहुंचने के बार भी ऐसा लगता है मानों कहीं कोई पीछे छूट गया हो। जिसने आह भरी थी और आवाज़ भी दी थी, शायद हमारे कानों ने सुनने की कोशिश नहीं की। बेहरा बना रहा या बेहरेपन का नाटक करता रहा और वो जाते-जाते भी आवाज़ देता रहा, कि मैं बेवफा नहीं हूं हालात ही कुछ ऐसे रहे होगें! लाख कहा, मिन्नतें की, पर मैंने तो जैसे न सुनने की ठान रखी थी और सुना भी नहीं।
मेरे बेहरेपन और रिश्तों में आई खटास के चलते वो दूर ही होते चले गए, कभी न वापस आने के लिए। मैं भी यही सोचता रहा कि मुझे उनके प्यार की जरूरत नहीं है, रह सकता हूं उनके बिन। कोशिशें लगातार की, करता रहा, पिछले कई सालों से करता आ रहा हूं, उनको भुलाने की। हां यह बात सही है कि न तो उनकी यादों को भुला पाया और न ही उनकी गलतियों को। मैं तो कोशिश करता रहा अपनी ही गलतियों को भुलाने की। जिसमें में बहुत हद तक कामयाब जरूर हुआ, परंतु पूरी तरह से नहीं। उसकी यादों और साथ बिताए पल मुझें कभी कामयाब नहीं होने देते। आज भी बिन बुलाए कहीं भी, कहीं भी चले आते हैं-जैसे वा ेअब भी आवाज़ दे रहा हो कि एक बार तो मेरी वेदना सुनों, मुझ पर विश्वास तो करों कि मैं केवल अपना हूं। उनके विश्वास को मैंने ही चकनाचूर कर दिया।
वो तो कभी भी किसी महफिल में मेरी बुराई सुनते ही भड़क जाया करता था, बर्दास्त नहीं कर पाता था, लड़ने को हमेशा तैयार। कहता था अपने दोस्तों से, मुझे अपने प्यार पर पूरा विश्वास है वो मुझें कभी भी धोखा नहीं दे सकता। हां यह सही है कि मैंने कभी उसे धोखा नहीं दिया और न कभी सपने में सोचा उसे धोखा देने के लिए। क्योंकि मैं उससे दिलों जान से प्यार करता हूं। परंतु गलतियां कहां से उपजी, आज तक समझ नहीं पा रहा हूं, किस की नज़र लगी हमारे प्यार को, जो चूर-चूर हो गया, कभी न जुड़ने के लिए।
आज भी रो लेता हूं मान कर अपनी ही गलती, कि सुन लेता उसकी बात, या अनसुनी कर देता लोगों की बात, कुछ तो करता। पर गलतफहमी तो नहीं पालता। जहां कहीं हो लौट आओं, तुम्हारे बिन यह ऊंचाईयां बर्दास्त नहीं होती।  

Tuesday, February 5, 2013

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आ जा??????


ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आ जा??????
एक व्यक्ति जो कुछ पल पहले तक हमारे साथ हंस बोल रहा था, खा-पी रहा था, उसके होने का एहसास था। और क्षणिक भर में सब कुछ यूं अचानक कैसे बदल जाता है एक हिच्की के साथ? इस अचानक आई हिच्की से दिल की धड़कन थम जाती है, आंखें बंद हो जाती हैं खून का बहाव रूक जाता है, हाथ-पैर काम करना बंद कर देते हैं। और उस जीवित प्राणी के शरीर में दौड़ने वाली ऊर्जा, जिसे हम आत्मा करते हैं शरीर का त्याग कर देती है। यानि जीविन इंसान अब मृत हो चुका है। उस एक हिच्की के साथ सब कुछ पीछे छूट जाता है। मां, बाप, भाई, बहन, पत्नी, बेटा-बेटी, सगे-संबंधी सब बंधनों से एक साथ मुक्ति। यह कैसी मुक्ति। जो कुछ पलों पहले तक हमारे साथ हुआ करता था अब वो नहीं है हमारे बीच। उसका यूं चुपचाप चले जाना इस दुनिया से और छोड़ जाना अपने पीछे परिजनों को रोते बिलखते। उसके जाने की यह असीम वेदना आंखों से और दिल से यूं निकलती है जिससे किसी पत्थर का भी दिल पिघल जाए। उस एक परिजन के बीच से जाने के उपरांत ऐसा प्रतीत होता है मानों उसके रूकसत होते ही हमारे शरीर में जान ही न बची हो। सब कुछ लुट चुका हो, और अब कुछ भी न बचा हो लुटने के लिए। अगर सब कुछ लुटा देने के बाद भी वो शख्स हमारे बीच में पुनः लौट पाता, तो परिजन अपना सब कुछ हंसी-खुशी से लुआ देते। परंतु ऐसा नहीं, ऐसा बार जाने के बाद वहां से कोई सदा लौट कर वापस नहीं आती।
जीवन-मृत्यु के काल चक्र के चक्रव्यूह से कोई भी अछूता नहीं रह सका है। जो इस संसार में एक बार आया है उसे जाना ही पड़ा है। किसी को पहले किसी को बाद में, जाना सभी को है। नियति भी यही कहती है। कि राजा हो या रंक अंत सब का एक सा होता है। यानि मृत्यु??
परंतु किसी की मृत्यु इतनी वेदना क्यों दे जाती है कि उसके जाने के बाद दिल-दिमाग धरातल में आकर ठहर जाता है। वेदना, चीखें, दुख के बादल अपने आप बरसने लगते हैं। इस दुख की घड़ी में किसी की सांत्वना भी मरहम का काम नहीं करती। क्योंकि वह तो चला जाता है और छोड़ जाता है एक शून्य जिसे कोई भर नहीं सकता। केवल एक ही प्रार्थना निकलती है कि ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आ जा??????

Monday, January 28, 2013

जनसंचार माध्यम और युवा वर्ग


जनसंचार माध्यम और युवा वर्ग
जनसंचार का अर्थ जनता के बीच विभिन्न माध्यमों से किया जाने वाला संचार है। जनसंचार का वर्तमान समय इसके परिपक्व समाज की मनोदशा, विचार, संस्कृति आम जीवन दशाओं को नियंत्रित व निदेशित कर रहा है। इसका प्रवाह अति व्यापक एवं असीमित है। जनसंचार माध्यमों द्वारा समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त हो रहा है। स्वतंत्र जनसंचार माध्यम लोकतंत्र की आधारशिला है। अर्थात जिस देश में जनसंचार के माध्यम स्वतंत्र नहीं है वहां एक स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण होना संभव नहीं है। जनसंचार माध्यमों का जाल इतना व्यापक है कि इसके बिना एक सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
हालांकि जनसंचार माध्यमों में हाल ही कुछ वर्षों में एक क्रांति का उदय हुआ है जिसे हम संचार क्रांति कहते हैं। जनमाध्यमों में क्रांति के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी क्रांति आई है। जिसने मॉर्सल मैक्लुहान के वक्तव्य को पूर्णतः सत्य कर दिया कि संपूर्ण दुनिया एक गांव में तब्दील हो जाएगी। मनुष्‍य के बोलने का अंदाज बदल जाएगा और क्रिया-कलाप भी। ऐसा ही हुआ है, आज युवा रेडियों सुन रहा है, टेलीविजन देख रहा है, मोबाइल से बात कर रहा है और अंगुलियों से कंम्प्यूटर चला रहा है। कहने का मतलब यह है कि युवा एक साथ कई तकनीकों से संचार कर रहा है। संचार का विस्तृत रूप जनसंचार है। जनसंचार माध्यमों का युवा वर्ग पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में बाते करें तो हर एक विशय की तरह इसके भी दो रूप दिखाई पड़ते हैं- सकारात्मक और नकारात्मक।
अब मुख्य प्रश्‍न यह उठता है कि आज की युवा पीढ़ी जनसंचार माध्यमों के किस पहलू पर अधिक अग्रसरित हो रही है। सकारात्मक पहलू पर या नकारात्मक पहलू पर। यह बात सही है कि जनसंचार माध्यमों के द्वारा आज का युवा वर्ग अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति कर रहा है। युवाओं पर मीडिया का प्रभाव मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक कहें तो देश की तकरीबन 58 फीसदी आबादी युवाओं की है। ये वो वर्ग है जो सबसे ज्यादा सपने देखता है और उन सपनों को पूरा करने के लिए जी-जान लगाता है। मीडिया इन युवाओं को सपने दिखाने से लेकर इन्हें निखारने तक में अहम भूमिका निभाने का काम करता है। अखबार-पत्र-पत्रिकाएं जहां युवाओं को जानकारी मुहैया कराने का गुरू दायित्व निभा रहे हैं, वहीं टेलीविजन-रेडियो-सिनेमा उन्हें मनोरंजन के साथ आधुनिक जीवन जीने का सलीका सिखा रहे हैं। लेकिन युवाओं पर सबसे ज्यादा और अहम असर हो रहा है न्यू- मीडिया का। जी हां, इंटरनेट से लेकर तीसरी पीढ़ी (थ्री-जी) मोबाइल तक का असर यूं है कि देश-दुनिया की सरहदों का मतलब इन युवाओं के लिए खत्म हो गया है। इनके सपनों की उड़ान को तकनीक ने मानों पंख लगा दिए हैं। ब्लॉगिंग के जरिए जहां ये युवा अपनी समझ-ज्ञान-पिपासा-जिज्ञासा-कौतूहल-भड़ास निकालने का काम कर रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया साइट्स के जरिए दुनिया भर में अपनी समान मानसिकता वालों लोगों को जोड़ कर सामाजिक सरोकार-दायित्व को पूरी तन्मयता से पूरी कर रहे हैं। हाल में अरब देशों में आई क्रांति इसका सबसे तरोताजा उदाहरण है। इन आंदोलनों के जरिए युवाओं ने सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका का लोहा मनवाया तो युवाओं के जरिए मीडिया का भी दम पूरी दुनिया ने देखा। युवाओं पर इसका अधिक प्रभाव इसलिए पड़ा क्योंकि वे उपभोक्तावादी प्रवृति के होते हैं। वे बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी नई तकनीक का उपभोग करना शुरू कर देते हैं।
 यह कहना गलत नहीं होगा कि दूसरी ओर युवा वर्ग जनसंचार की चमक के माया जाल में फंसता जा रहा है। इस आलोच्य में कहा जाए तो युवाओं में तेजी से पनप रहे मनोविकारों, दिशाहीनता और कत्र्तव्यविमुखता को संचार माध्यमों के दुष्‍रिणामों से जोड़कर देखा जा सकता है। पश्चिम का अंधा अनुसरण करने की प्रवत्ति उन्हें आधुनिकता का पर्याय लगने लगी है। इनसे युवाओं की पूरी जीवन-शैली प्रभावित दिखलाई पड़ रही है जिससे रहन-सहन, खान-पान, वेषभूषा और बोलचाल सभी समग्र रूप से शामिल है। मद्यपान और धूम्रपान उन्हें एक फैशन का ढंग लगने लगा है। नैतिक मूल्यों के हनन में ये कारण मुख्य रूप से उत्तरदायी है। आपसी रिश्‍ते-नातों में बढ़ती दूरियां और परिवारों में बिखराव की स्थिति इसके दुखदायी परिणाम हैं।
इसी क्रम में बात करें तो अति आधुनिक संचार माध्यम जिसे हम न्यू मीडिया के नाम से जानते हैं वो भी जहां एक ओर युवाओं के लिए वरदान साबित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ये एक अभिशाप के रूप में युवाओं की दिशाहीनता को बढ़ा रहा है। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 30 जून, 2012 तक भारत में फेसबुक व सोशल साइटों के उपयोग करने वालों की संख्या लगभग 5.9 करोड़ है जो 2010 की तुलना में 84 प्रतिशत अधिक है। इन 5.9 करोड़ लोगों में लगभग 4.7 करोड़ युवा वर्ग से सरोकार रखते हैं। अगर आंकड़ों को देखें तो भारत दुनिया का चैथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है। इसमें दो राय नहीं कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं की निजता को प्रभावित किया है और युवा अपनी सोच से अपने समाज को प्रभावित कर रहे हैं।
वहीं इंडिया बिजनेस न्यूज एंड रिसर्च सर्विसेज द्वारा 1200 लोगों पर किए गए सर्वेक्षण जिनमें 18-35 साल की उम्र के लोगों को शामिल किया गया था। इसमें करीब 76 फीसदी युवाओं ने माना कि सोशल मीडिया उनको दुनिया में परिवर्तन लाने के लिए समर्थ बना रही है। उनका मानना है कि महिलाओं के हित तथा भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन में ये सूचना का एक महत्वपूर्ण स्रोत साबित हुई है। करीब 24 फीसदी युवाओं ने अपनी सूचना का स्रोत सोशल मीडिया को बताया। करीब 70 फीसद युवाओं ने ये भी माना कि किसी समूह विशेष से संबद्ध हो जाने भर से जमीनी हकीकत नहीं बदल जाएगी, बल्कि इसके लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
वास्तव में जनसंचार माध्यमों ने ग्लोबल विलेज की अवधारणा को जन्म दिया है। जनसंचार के अंतर्गत आने वाले माध्यम है पत्र-पत्रिकाए, टीवी, रेडियों, मोबाइल, इंटरनेट। युवा वर्ग पर इन सभी जनसंचार माध्यमों ने अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा है। इनका प्रभाव इतना शक्तिशाली है की आज के युवा इन जनसंचार माध्यमों के बिना अपने दिन की शुरुआत ही नहीं कर सकते। जैसे पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने से ज्यादा कामुकता तथा अश्लील साहित्य, पत्र-पत्रिकाएं खरीदता व पढ़ता है और अपने चरित्र का नैतिक पतन कर अपने भविष्य को अंधकार में डालता है। इसी प्रकार टीवी जैसे सबसे प्रभावशाली माध्यम का भी युवाओं पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का प्रभाव पड़ा है टीवी श्रव्य के साथ ही दृश्य माध्यम है जिसके कारण युवा वर्ग किसी भी विषय को भली-भांती समझ सकता है भले ही वह अधिक शिक्षित न हो परंतु युवा वर्ग इस माध्यम का भी दुरूपयोग कर नैतिक पतन करने वाले कार्यकर्मों को ही अधिक देखते हैं क्योंकि उनको तत्कालिक आनंद की प्राप्ति होती है और वे दूरगामी विनाश को नहीं समझ पाते जिससे उनका भविष्य बिगड़ता है।
हालांकि नई विद्या मोबाइल और इंटरनेट अत्याधुनिक तकनीकों के उदाहरण है। जिनका निसंकोच उपयोग अधिकांश युवाओं द्वारा किया जा रहा है। मोबाइल यह एक ऐसा माध्यम है जिससे दूर बैठे व्यक्ति के साथ बात की जा सकती है तथा अपने हसीन पलों को चलचित्रों के रूप में कैद किया जा सकता है। यह तो इसका सदुपयोग है परंतु आज युवा इस माध्यम का गलत प्रयोग कर एमएमएस जैसे दुर्व्यसनों में फस जाते हैं। इसी प्रकार इंटरनेट जनसंचार माध्यमों में सबसे प्रभावशाली है जिसने दूरियों को कम कर दिया है। इसका अधिकतर उपभोग युवा वर्ग द्वारा किया जाता है जहां इसके द्वारा युवाओं को सभी जानकारियां उपलब्ध होती हैं। ये ज्ञानवर्धन में तो सहायक है परंतु आज वर्तमान समय में युवा द्वारा इसका दुरूपयोग अधिक होता है। हालांकि संस्कारी व्यक्तियों द्वारा इस मीडिया का सही उपयोग किया जा रहा है वहीं लगभग 100 में से 85 प्रतिशत लोग पोर्न साइटों का प्रयोग करते हैं और हैंरतअंगेंज करने वाली बात है कि सर्वाधिक विजिटर भी इन पोर्न साइटों के ही हैं। इन अश्लील साइटों पर जाकर वे अपनी उत्कंठा को शांत करते हैं। परंतु वे यह नहीं जानते कि इससे उनका और समाज दोनों का नैतिक पतन होता है। साथ ही इंटरनेट के अधिक उपयोग ने साइबर क्राइम जैसे अपराधों को जन्म देकर युवाओं में अपराध करने की नई विद्या उत्पन्न कर दी है। जिससे आज का युवा वर्ग मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पतन की ओर अग्रसरित हो रहा है। जो हमारे समाज के लिए चिंता का विषय है।
अगर निष्‍कर्ष की बात करें तो सभी जनसंचार माध्यमों ने जहां ग्लोबल विलेज, शिक्षा, मनोरंजन और जनमत निर्माण, समाज को गतिशील बनाने तथा सूचना का बाजार बनाने में सहयोग किया वही अश्लीलता, हिंसा, मनोविकार, उपभोकतावादी परवर्ती तथा समाज को नैतिक और सांस्कृतिक पतन की ओर अग्रसर किया है। अब हम युवाओं को स्वयं ही इसका चयन करना होगा कि वो किस ओर जाना चाहते हैं। बुलंदी पर या पतन की ओर?

Thursday, January 3, 2013

चौथा स्तंभ भी जिम्मेवार है महिलाओं पर हो रहे दुष्कर्म के लिए


चौथा स्तंभ भी जिम्मेवार है महिलाओं पर हो रहे दुष्कर्म के लिए


महिलाओं के संदर्भ में मीडिया की भूमिका की बात करें तो यह कभी संतोषजनक नहीं रही है, मीडिया ने भी पुरूषवादी सोच को आत्मसात करते हुए सदा ही उसकी उपेक्षा की है। इस उपेक्षा के साथ वो इसका इस्ते माल अपने प्रोडेक्ट के प्रचार व अपने विज्ञाप्ति उद्योगपतियों द्वारा निर्मित वस्तुओं के ग्राहक बनाने में करने लगा है। ताकि बाजार में वस्तुओं का उपभोग अधिक हो सके और इस उपभोग से मिलने वाले लाभ का कुछ अंश इन उद्योगपतियों द्वारा चढ़ौत्री के रूप में चैनल को मिले जिससे चैनल अपना गुजारा कर सकें, नहीं तो किसी सरकारी नेता से खबर के बदले में नोट को गिना सके। जैसा कि आज हो रहा है। चाहे वो खबर किसी नेता से संबंधित हो या किसी बाहुबली से, यदि जरा भी गलती नजर आती है तो पहुंच जाते है चंदा मांगने, और यह लोग भी अपने कारनामों को उजागर न करने की हड्डी डाल ही देते हैं। जिस हड्डी को चूस-चूस कर मीडिया दिनों दिन मोटा होता जा रहा है नेताओं की तरह। क्यों कि नेता जनता का खून चूसते हैं और यह बची हुई हड्डिया। बीच में फंस जाती हैं महिलाएं, जो सदा पिसने के लिए ही बनी है। क्योंकि सवर्ण समाज ने उसे कभी पनपने नहीं दिया, हमेशा उसका ति्रस्कार किया है, कभी मनु ने तो कभी सूरदास ने तो कभी भगवान राम ने। उन्हीं के पद चिहनों पर चलने वाली आज की जनता जिसने स्त्रियों को बिस्तर पर या पैरों में पसंद किया है। परंतु वो यह भूल जाते हैं कि उसको जीवन देने वाली भी एक स्त्री ही है। जिसके प्यार की छांव में वो पला बढ़ा। और यह भूल गया कि स्त्री  का सम्मा न भी करना चाहिए।
इसमें गलती किसकी है इस पर विचार करना चाहिए कि जो पुरूष मां के आंचल में पला बढ़ा, पिता के संरक्षण व बहनों का प्या र मिला तथा गुरूजनों के ज्ञान से बुद्धिमान बना, वह पुरूष महिलाओं के प्रति इतना हैवान कैसे बन जाता है। क्याक मां के पालन-पोषण, पिता के संरक्षण व बहन के प्यारर तथा गुरूजनों द्वारा दिए गए ज्ञान में कहीं कोई चूक तो नहीं रह जाती, जिस कारण पुरूष में कभी-कभी हैवानियत का जानवर भाव उत्पन्न होने लगता है और यह भाव पुरूष में अच्छे और बुरे दोनों में फर्क करना तक भूला देता है। और वह महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाने लगता है। कभी पैदा होते ही, कभी दहेज से, कभी खरीद-फरोख्त  करके, कभी घर में ही हिंसा करके तो कभी बलात्कार करके, चारों तरफ महिलाओं पर अत्या्चारों की झड़ी लगी हुई है। जो पुलिस और कानून व्यवस्था के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रही है, यह तो किसी जिंद की भांति दिन-प्रतिदिन लगातर बढ़ती ही जा रही है। चाहे नाबालिग हो, किशोरी हो या फिर वृद्धा हो कोई इस अत्याचार से अछूता नहीं है। हो भी कैसे सकता है जब लोकतंत्र के चारों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा प्रचार-प्रसार के माध्यम यानि मीडिया में पुरूषवादी सोच विराजमान हो। और यह सोच महिलाओं को हमेशा से दोयाम दर्जे पर लाकर खड़ा कर देता है, ताकि यह पुरूषों के समकक्ष कंधे-से-कंधा मिलाकर आगे न बढ़ सकें।
हालांकि इन सब अत्याचारों के बावजूद महिलाओं ने पुरूषों को कहीं पीछे छोड़ दिया है। पर सवाल अब भी वही रह जाता है कि हम पर अत्याचार कब तक। कब तक हमें असुरक्षा का भाव और शोषण को बर्दास्त करना पड़ेगा। क्या कोई रहनुमा इस कलयुग में राक्षसों से हम सब को मुक्ति दिलाएंगा या हमें इन बहसी पुरूषों के हाथों अकाल मौत का ग्रास हमेशा बनना पड़ेगा। क्योंकि जिस-जिस से हमने उम्मीद की वो ही हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। तभी तो तीनों स्तंभों की भांति चौथा स्तंभ भी महिलाओं के पक्ष में बहुत कम खड़ा नजर आता है। वो तो एक तरफ महिलाओं को वस्तु बनाकर बाजार के समक्ष परोसने का काम करता है तो दूसरी तरफ खबर के दृष्टिकोण से, हां सनसनी खबर के दृष्टिकोण से हमेशा परोसता रहता है। वह महिलाओं की छवि को अश्लील बनाकर इस तरह परोसता है कि पुरूषवादी मस्तिष्क प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इस अश्लीलता की बमबारी से पुरूष हैवान बनने लगता है। क्योंकि कहीं-न-कहीं यह कामुक अश्लीलता उसके दिलों-दिमाग में इस कदर घर जाती है कि वो महिलाओं को अकेली पाने की फिराक में लगा रहता है ताकि अपनी हवस मिटा सके।
इस आलोच्य में कहें तो अश्लीलता का सम्राज्य आज इस कदर बढ़ता जा रहा है जिससे नाबालिग बच्चों के दिमाग भी अछूते नहीं रहे हैं वह भी आधुनिक मीडिया यानि न्यू मीडिया द्वारा अश्लील तस्वीरों व फिल्मों को लगातार देख रहें हैं और उसी तरह के कृत्यों को करने की दिन-रात फिराक में बने रहते हैं। यह आधुनिक मीडिया द्वारा उपजी एक फसल है जिसको आज की युवा पीढ़ी काट रही है जिसका खामयाजा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। यह खामयाजा वो कब तक भुगतती रहेगी, क्या कभी वो इस स्वतंत्र समाज की खुली हवा में सांस ले सकेगी। यही प्रश्न वो लगातार मीडिया से कर रही है कि कब तक वो इनकी छवि को वस्तु बनाकर अपना उल्लू सीधा करता रहेगा और समाज के दरिंदों द्वारा उनका शोषण करवाता रहेगा। क्योंकि महिलाओं के साथ हो रहे शोषण में तीनों स्तंभों के साथ-साथ यह चौथा स्तंभ भी बराबर का जिम्मेवार है। अगर मीडिया को अपने ऊपर उठ रहे तमाम प्रश्नवाचक चिह्नों से मुक्ति चाहिए तो उसे अश्लीलता का सहारा छोड़कर महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में सहयोग देना होगा तभी पुरूष समाज द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे अत्याचारों से महिलाओं को मुक्ति मिल सकेगी और वो खुली हवा में आजाद पंक्षी की भांति उड़ सकेगी।
सभी गुरूजनों व मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

Friday, December 28, 2012

आज का प्‍यार

प्‍यार और प्‍यार के नाम पर अपनी शारीरिक भूख की तृप्‍ती, हर रोज प्‍यार को बढ़ावा देती है कभी इसके साथ तो कभी उसके साथ। यही आज की युवा पीढी की चाह है, चाहे वह लड़का हो या लड़की, दिल बहलना चाहिए, दिल बहलता है आपके आ जाने से। क्‍योंकि यह दिल तब तक बहलता है जब तक यह समाज से परे परिवार से परे होता है। प्‍यार की सच्‍चाई तब समझ आती है जब यह परिवार और समाज के समक्ष परिलक्षित होती है। तब यह प्‍यार या तो दोनों के लिए मौत का कारण बन जाता है या फिर लड़के पर थोप दिया जाता है बलात्‍कार का मामला। यही प्‍यार है जो आज अपनी तीव्र गति से समाज की रगों में बिना दिल के दौड़ रहा है। जोश और जज्‍बें के साथ। दवाओं के पुरजोर इस्‍तेमाल के साथ। बिन बारिस के छतरी का प्रयोग हो या 72 घंटे गुजर गए हो आप बेझिझक मांग सकते है वो भी अपने हक से। क्‍योंकि यह प्‍यार की पूजा में इस्‍तेमाल होने वाला प्रसाद है, बिना इसके पूजा करना खतरे से खाली नहीं हो सकता। भगवान नाराज हो सकते है और आपको श्राप के तौर पर कोई खबर कुछ महीनों बाद सुनने को मिल सकती है। यह खबर प्‍यार करने वालों के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है और इस सिरदर्द से छुटकारा पाने के लिए झंडू बाम या पेन किलर काम नहीं करेगी, इस सिरदर्द के झंझट से मुक्ति का मार्ग चंद रूपए खर्च करके पाना होगा। चंद रूपए की चढौत्री चढ़ाने के बाद इस सिरदर्द को वह मुक्तिदाता किसी नाली, कूड़ा घर या फिर कचरे के डिब्‍बे में फिकवा देता है जिसको कीड़े-मकोड़ और गली के आवारा कुत्‍ते नोंच नोंच के खाते हैं और दुआ देते हैं इन प्‍यार के पुजारियों को कि ऐसे ही पूजा करते रहे। ताकि आपकी पूजा का प्रसाद का भोग हम भी समय समय पर लगा सके।

Tuesday, December 18, 2012

बलात्कार के दोषियों को फांसी नहीं- सजा के तौर पर लिंग ही काट देना चाहिए



बलात्कार के दोषियों को फांसी नहीं-
सजा के तौर पर लिंग ही काट देना चाहिए

यह पहला मामला नहीं है बलात्कार का। जिस पर इतना हो-हल्ला मचा हुआ है। अगर बलात्कार की पृष्ठभूमि को देखें तो बलात्कार एक ऐसा जघन्य अपराध है, जो पीड़ित महिला को भीतर तक तोड़ देता है। मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़िता जीते जी मर जाती है। ‘‘सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि एक हत्यारा तो किसी व्यक्ति को केवल जान से मारता है, जबकि बलात्कारी पीड़िता की आत्मा को उसकी स्वयं की नज़रों में गिरा देता है।’’ और जीवन भर उसे उस अपराध की सज़ा भुगतनी पड़ती है जिसे उसने नहीं किया।
बलात्कार की घटना किसी एक क्षेत्र विशेष तक ही सीमित नहीं है। वस्तुतः दुनिया भर की औरतंे बलात्कार का शिकार होती हैं। बलात्कार की घटना अब शहरों की सीमाओं को लांघकर गांव-कस्बों में भी पहुंच गया है। ‘‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ें बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं।इस प्रकार भारत भर में प्रत्येक घंटे दो महिलायें बलात्कारी के हाथों अपनी अस्मत गंवा देती है। लेकिन, आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती। सच्चाई तो यह है कि बलात्कार के अधिकतर मामले थाने तक पहुंच ही नहीं पाते। इसका पहला कारण तो यह है कि पीड़ित स्त्री शर्म के चलते किसी को अपने साथ हुई बदसलूकी नहीं बताती। यदि वह अपने परिवार में इस अपराध को बताती भी है, तो परिवार वाले बदनामी के डर से मामले को घर की चारदीवारी के भीतर ही दबा देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार के बहुत कम मामले ही थाने तक पहुंच पाते हैं। बलात्कार के मामलों का एक शर्मनाक पहलू यह भी है कि केवल अनजान लोग ही बलात्कार नहीं करते, बल्कि परिचित और रिश्तेदारों के द्वारा भी बलात्कार की घटनाओं को अंज़ाम दिया जाता है। पड़ोसी, सहपाठी, शिक्षक और निकट रिश्तेदारों के साथ-साथ सौतेले पिता व भाई भी लड़की को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं। कुछ बलात्कारी मासूम बालिकाओं को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकते।
‘‘केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री ई.के. नयनार ने एक बार कहा था-आखिर यह बलात्कार है क्या? अमेरिका में प्रति मिनट एक बलात्कार होता है। यह चाय पीने के समान सामान्य है।’’ वैसे बलात्कार अधिकतर अनजान/अजनबी लोगों द्वारा किया जाता है, लेकिन अब ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जिनमें किसी परिचित को ही बलात्कार के रूप में पुष्टि की जाती है। इन परिचितों में प्रायः सहपाठी, सहकर्मी, अधिकारी, शिक्षित और नियोक्ता अधिक होते हैं। ‘‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’’ इस आलोक में सेंटर फॉर डेवेलपमेंट ऑफ वीमेन द्वारा किए गए एक अध्ययन से प्राप्त आंकड़े चैंकाने वाले थे। ‘‘रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन 42 महिलायें बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे देश में प्रत्येक 35 वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’’
महिलाओं के सतत विकास के लिए कार्य कर रहे एक गैर सरकारी स्वैचिछक संगठन स्वप्निल भारतद्वारा किए गये एक सर्वेक्षण, जिसमें राजधानी दिल्ली सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी कुल शहरों को शामिल किया गया है, से पता चला कि महिलाओं के साथ बलात्कार या यौन उत्पीड़न के लगभग 71 फीसदी मामले परिवार के इर्द-गिर्द ही शक़्ल अख़्यितार करते हैं। बलात्कार के लगभग 42 फीसदी मामलों को मामा, चाचा अथवा चचेरे या ममेरे भाइयों द्वारा अंज़ाम दिया जाता है। 26 प्रतिशत मामलों में दोषी पारिवारिक मित्र या पड़ोसी होते हैं, जबकि नौकरों व ड्राइवरों द्वारा लगभग 23 फीसदी बलात्कार किए जाते हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल-कॉलजों के अध्यापकों द्वारा भी बलात्कार किए जाते हैं, जिनका प्रतिशत लगभग 10 के आसपास रहता है। इसी प्रकार बलात्कार के लगभग 5 फीसदी मामलों में खास दोस्त, मंगेतर या प्रेमी होते है। सर्वेक्षण का सबसे शर्मनाक तथ्य यह था कि लगभग चार प्रतिशत मामलों में लड़कियों के सगे पिता बलात्कार को अंज़ाम देते हैं।
हालांकि बलात्कार तो बलात्कार होता है चाहे जिस के द्वारा इस कृत्य को अंजाम दिया जाए। मगर हो-हल्ला मचाने से या दोषियों को फांसी की सजा सुनाने से क्या इस अपराध का समाज से खात्मा संभव है? विचार करने वाली बात है। अगर रिपोर्टें उठाकर देखी जाए तो महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों की हकीकत से पूरा भारत वाकिफ है, कि किस प्रकार महिलाओं के साथ अपराध की घटना दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं और यह आंकड़े केवल साल दर साल कागजों की शोभा बढ़ाने और रिपोर्ट तैयार करने के अलावा कोई काम नहीं आते। जिस पर केंद्र हो या राज्य की सरकारें या फिर पुलिस प्रशासन हमेशा मौन बना रहता हैं। शायद इसका एक कारण जो मेरी समझ में आ रहा है कि तरह की घटना इनके परिजनों के साथ घटित नहीं होती। यदि होती तो यह अभी तक गूंगा मशान बने नहीं बैठे रहते। और न ही पूरे मामले में लीपापोती करते।
लीपा-पोती से एक उत्तर प्रदेश की एक घटना याद आ रही है कि कुछ सालों पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के करीबी रहे मंत्री के रिश्तेदार द्वारा बलात्कार का मामला सामने आया था जिसकी पुरजोर तरीके से साम, दाम सभी से लीपा पोती की गई। और यह भी कहा गया कि कुछ लाख रूपए लेकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाए। यदि रूपयों से ही किसी महिला की इज्जत, उसका सम्मान वापस आ सकता है तो नेताओं को चाहिए कि अपनी बहू-बेटियों को बाजार में उतार दें ताकि रूपयों से उनकी इज्जत का सौदा किया जा सके! मेरी इस तरह की बातों से शायद नेताओं को मिर्ची लग सकती है पर मिर्ची की जलन है बर्दास्त तो करनी पडे़गी।
इनके साथ-साथ इस तरह की घटना महिला अधिकारों की रक्षा के लिए बना महिला आयोग पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है कि अधिकारों की लड़ाई और हक की बात करने वाला यह आयोग कहां तक अपने कार्यों को अंजाम देने में सक्षम हो पा रहा है। आंकड़ों की लिस्ट इनकी खुद ब खुद पोल खोल रही है।
आज सड़क से लेकर संसद में हुए बवाल और दोषियों को फांसी की सजा दिए जाने की बात, क्या पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए काफी है? नहीं कदापि नहीं। बलात्कार के दोषियों को फांसी देने के वजह उनका लिंग काट देना चाहिए और उनके माथे पर लिख देने चाहिए कि मैंने बलात्कार किया था और सजा के तौर पर मेरा लिंग काट दिया गया। इससे विकृत मानसिक प्रवृत्ति के लोग किसी नारी की आबरू को तार-तार करने से पहले 100 बार नहीं, लाख बार जरूर सोचेंगे कि बलात्कार की सजा सात साल या फांसी नहीं सीधा साफाया ही है।

Tuesday, December 11, 2012

एक नई प्रथा की शुरूआत


एक नई प्रथा की शुरूआत
            ‘‘अनुच्छेद 2 के अनुसार, ‘दहेजका शब्दिक अर्थ ऐसी प्रॉपर्टी या मूल्यवान वस्तु (समान, पैसा या और कोई वस्तु) से है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लड़की पक्ष द्वारा लड़के पक्ष को दी जाती है।’’ दहेज की परिभाषा देते हुए फेयर चाइल्ड ने लिखा है कि, ‘‘दहेज वह धन या संपत्ति है जो विवाह के उपलक्ष्य पर लड़की के माता-पिता या अन्य संबंध्यिों द्वारा वर पक्ष को दिया जाता है।’’ दहेज एक ऐसी कुप्रथा है, जिसके चलते सैकड़ों नव विवाहिताओं को आज भी असमय मौत का ग्रास बनाना पड़ता है। इसमें भी सबसे ज्यादा मौतें जलने के कारण ही होती हैं। कुछ युवतियों को ससुराल पक्ष द्वारा जबर्दस्ती जिंदा जला दिया जाता है, तो कुछ औरतों को दहेज के लिए ससुराल में इतना परेशान किया जाता है कि वे जलकर आत्महत्या कर लेती हैं।
‘‘आंकड़ें गवाह हैं कि अधिकांश दुल्हन जलाने की घटनाएं या दहेज मौतें या विवाहिता हत्या के मामले लड़की की ससुराल वालों की उन अतृप्त मांगों के परिणाम होते हैं, जिन्हें लड़की के माता-पिता पूरा नहीं कर पाते हैं।’’ दहेज का आर्थिक पक्ष इस कुरीति का सबसे खौफ़नाक पक्ष है। यदि वर पक्ष को इच्छित दहेज नहीं मिलता, तो वह नव विवाहिता पर शारीरिक और मानसिक जुल्म देना शुरू कर देता है। नव विवाहिता को तरह-तरह से तंग किया जाता है। उसे अधिक-से-अधिक दहेज लाने के लिए विवश किया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि वधू पक्ष द्वारा मांगों की पूर्ति न होने पर नव विवाहिताओं की हत्या तक कर दी जाती है। इसके अलावा कई बार ससुराल पक्ष की शारीरिक प्रताड़ना और दुव्र्यवहार से तंग आकर नव विवाहिता भावनात्मक रूप से बिल्कुल टूट जाती है। और, अंततः वह आत्महत्या का रास्ता चुन लेती है।
वैसे लड़कियों के परिजनों व लड़कियों को अब दहेज के लिए प्रताड़ित व ससुरालजनों का शोषण नहीं सहना पड़ेगा। आप सभी सोच में होगें कि सरकार ने कोई विशेष कानून को पारित किया है जिसके चलते लड़कियों को दहेज का दंश नहीं झेलना पडे़गा। तो ऐसा कुछ भी नहीं है। सरकार तो अपने ढर्रें पर चल रही है। हालांकि पूर्व में दहेज की पृष्ठभूमि को देखें तो दहेज जिसके लिए लड़कियों को सदियों से प्रताड़ित किया जाता रहा है और साथ ही साथ लड़कियों के परिजनों को दहेज की प्रतिपूर्ति हेतु स्वयं को बेचने पर मजबूर किया जाता रहा है। ताकि वह विवश होकर दहेज की पूर्ति कर सकें। क्योंकि उनको अपनी लड़की को हर हाल में खुश जो रखना है, नहीं तो ससुराल वाले दहेज की पूर्ति न होने पर लड़की पर अत्याचार करने लगते हैं।
हालांकि मैं दहेज के दंश की बात कर रह हूं कि अब लड़की वालों को दहेज के लिए न तो चिंता करने की बात है और न लड़की को अत्याचार सहने की। क्योंकि उत्तर प्रदेश के जिला ललितपुर में एक नई प्रथा की शुरूआत हो चुकी है जिसमें लड़की के परिजनों को दहेज देने की वजह उसके विपरीत दहेज मिलना शुरू हो चुका है। चैंकिए मत मैं कोई मजाक नहीं कर रहा हूं मैं, आप लोगों को हकीकत से रूबरू करवा रहा हूं कि जिला ललितपुर में उल्टी गंगा बहने लगी है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि जिला ललितपुर में जहां जैन समुदाय के लोगों की संख्या अन्य समुदाय के लोगों से ज्यादा है और इस जैन समुदाय के लड़कों की शादी हेतु लड़कियों का आकाल पड़ा हुआ है। जिस कारण से जैन समुदाय के लड़कों की शादी नहीं हो पा रही है। और उन्हें शादी करने के लिए लड़की वालों को मुंह मांगी रकम देकर विवाह करने के लिए राजी करना पड़ रहा है। यह एक नई प्रथा जिसका बीज अंकुरित हो चुका है और जो धीरे-धीरे हर क्षेत्र में रोपित होकर वृक्ष बनने का आतुर होने वाला है। जिसका मुख्य कारण दिन-प्रतिदिन लिंग अनुपात में होने वाली कमी है।
वैसे वो दिन अब दूर नहीं है जब यह पौधा एक विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेगा और दहेज का खात्मा तो न सही परंतु हर समूदाय में यह परावर्तित हो जाएंगा। तब कहीं जाकर लड़के वालों को दहेज की वास्तविक पीड़ा की अनुभूति होगी कि किस प्रकार चंद रूपयों के खारित हम लड़कियों व उसके परिवार वालों को प्रताड़ित करते आए हैं।