सरोकार की मीडिया

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Friday, August 14, 2015

स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न भी जरूरी है!

स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न भी जरूरी है!

लोकतंत्र की आयु जैसे-जैसे परिपक्व हो रही है लोग विकास और राष्ट्रहितकारी विचार के विपरीत भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जा रहे हैं।
‘‘हम आजादी का जश्न तो मना रहे है लेकिन कुछ प्रश्नों को क्यों झुठला रहे है? सार्वजनिक स्तर पर लोकहित, उत्तरदायित्व, विवेकाधिकार, संरक्षण, सामन्जस्य और समन्वय कमजोर होते नजर आ रहे है तो न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व की संकल्पना आज कटघरे में भी साबित हो रही है। ऐसे में वर्तमान भारत की बदलती तस्वीर के बरक्स स्वतंत्रता की पड़ताल और प्रश्नचिह्न भी लगना जरूरी है ।’’
स्वतंत्रता के बाद भारत को पुनः स्थापित करने के लिए जिन विचारों और सैद्धांतिकी को स्थापित किया गया था। उसे अक्सर इतिहास की पुस्तकों में हम सभी मौजूद पाते हैं। स्वतंत्र भारत ने समृद्ध संस्कृति के साथ देश को विकसित करने की चुनौती के अलावा जरूरी-गैरजरूरी कई झंझावत झेले जिनकी तस्वीर और सिलसिला आज भी रोजमर्रा है। देश की आबादी किसी न किसी रूप में अधिकांशतः निर्भरता में है। अलग-अलग समुदाय अभी विभिन्न बुनियादी आवश्यकताओं के लिए किसी ना किसी रूप में सरकारी या गैर सरकारी ईकाईयों पर निर्भर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि देश की निर्भर अवाम के लिए संचालन और समन्वय की स्थिति कब सुनिश्चित हो पाएगी।
देश में गुलामी के समय से विरासत में मिली समस्याओं से इतर विभाजन की स्थिति से आरंभ समस्याओं की गिनती अभी घटती नजर नहीं आ रही है। समय बदलाता रहा और समस्याओं के सापेक्ष निवारण स्थापित नहीं हो पाए। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में जो कुछ विकास हुए हैं उन्हें बड़े स्तर पर देखे जाने से पहले जमीनी स्तर भी देखा जाना चाहिए। विविधताओं के देश में संतुलित और समग्र विकास एक चुुनौती अवश्य है। लेकिन कार्य शैली के अनुसार कार्यपालिका विधायिका और न्याय पालिका के क्षेत्र सर्व सार्वजनिक स्तर पर लोकहितकारी साबित होते नहीं दिख रहे हैं। यही कारण है कि आज जनता में कई अविश्वास पनप रहे है। यही अविश्वास प्रगति के बाधक भी है। स्वतंत्रता आंदोलन से उपजी राष्ट्रहित की भावना और प्रतिरोध का परिवेश लगातार सीमित हो रहा है। आंदोलनों के संचालन जिनके हाथों पहुंचते है वह समूह राजनीतिक हितों व लोभ में जन आंदोलनों को करिश्माई तरीके से शून्य कर दते है। सार्वजनिक क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधन, व्यापार वाणिज्य, उद्योगजगत में हमें भारत की विविधता में एकता अजीब सी दिखती है। शीर्ष स्तर पर ऐसे अनेक क्षेत्रों में आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े समाज के लोगों की उपस्थिति लोकतंत्र स्थापित होने के अरसठ वर्ष में भी न्यूनतम है। वहीं कई समाज तो अभी भी शून्य की स्थिति में हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर विकास के किस माॅडल पर देश चल रहा है? स्वतंत्र परिवेश में प्रत्येक को अवसर की समानता के साथ विकसित करने का सपना कब साकार होगा?
सिद्धांतो के मूर्त रूप विरले ही पाए जाते है! बाकी कोरी कल्पनाएं संसद, विधानसभा, नियमों में यथावत विद्यमान और ढर्रे पर गतिमान हैं। आज सामाजिक आंदोलनों की स्थिति यह है कि वह किसी मुद्दे को सूचना तकनीक युग में बड़ी तेजी से प्रसारित होते दिखते है लेकिन उनकी परिणति प्रायः किसी मुकाम तक नहीं पहुचती। इसलिए वर्तमान में हो रहे आंदोलन प्रायः बुलबुला साबित होते हैं। राजनंीति में अत्यधिक धन व अपराधीकरण का शामिल होना मूल प्रेरणा साबित हो रही है। भविष्य की राजनीतिक परिपाटी के लिए यह चिंता का विषय है। इसी कारण सुयोग्य व्याक्ति राजनीति में फेल हो रहे हैं। गाहे-बगाहे राजनीति में आए सुयोग्यों की दूरगामी संभवानों को देखते हुए समीकरण और अवरोध तैयार कर सीमित कर दिया जाता है। लोकतंत्र की आयु जैसे-जैसे परिपक्व हो रही है लोग विकास और राष्ट्रहितकारी विचार के विपरीत भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जा रहे हैं। हमारी सरकारें कई मामलों में मूकदर्शक बनकर बैठी रहती है और समस्याओं का चक्रवृद्धि विस्तार होता रहता है। अधिकांश लोकसेवा के क्षेत्र आज पर्याप्त सेवा देने में सक्षम नहीं है यही नहीं उनमें सेवा की भावना भी लुप्त हो रही है। इस नकारात्मकता के पनपने से प्रायः लोग सहजता से स्वीकार करते हैं। लोक सेवा के कार्यालयों को भ्रष्टाचार की फुलवारी के रूप में फलते-फूलते देखा जा सकता है। सरकारी धन व संसाधनों का दुर्पयोग, लूट-घसूट, रिश्वतखोरी और सामान्य कार्य की गति में अवरोध देश भर में कहीं भी देखा जा सकता है। सरकारी क्षेत्र में तो मानों पूरा वेतन लेकर कार्य को रोकने का वाकया धीरे-धीरे सामाजीकृत हो गया है। निजी क्षेत्रों में अवसर की समानता कहने को तो कौशल आधारित माॅडल पर वितरित की जानी थी। लेकिन निजी क्षेत्रों में योग्य व्यक्ति से अधिक उनकी शर्तों के सिर्फ लक्षित कार्य करने वाला और लक्ष्य को चाणक्य के साम, दाम, दण्ड, भेद से क्रियान्वित करने वाला व्यक्ति चाहिए। ऐसे में उत्तदायित्व का बोध व नैतिकता का गायब होना स्वाभाविक होगा। निजी क्षेत्रों में प्रायः सेवा और गुणवत्ता को केंद्रित किया जाता है, लेकिन अधिकांशतः सिविल अधिकारों का हनन इन्हीं क्षेत्रों द्वारा होता है। न्यायपूर्ण दृष्टि की रिक्तता आज समाज और विविध क्षेत्रों के लिए खतरनाक साबित हो रही है। लोगों के व्यवहार में कर्तव्य, न्याय, समानता, बंधुत्व, और नैतिकता के सहज सिद्धांतों की छवि नहीं दिखती। परिणमतः लोकतंत्र मानों वेन्टिलेटर पर आ गया है जिसे सत्ता के लोग, बड़े अधिकारी, कॉरपोरेट, राजनीति के मठाधीश, आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग और उद्योगजगत के लोग अपनी सुविधानुसार ऑक्सीजन देते हैं और पूरी प्रणाली को संचालित करते हैं। किसानों से सहज ही भूमि लेकर चंद दिनों में एक बिल्डर लाभ के अंश को अधिकाधिक बना लेता है। वहीं किसान की उपज को लाभ की नजर से बढ़ाने का उपाय स्वतंत्रता के बाद आज तक नहीं इजाद किया जा सका है! जबकि राष्ट्रीय स्तर पर आज व्यापार वाणिज्य के सभी नियंत्रण और व्यापार नीति पराधीन नहीं है। मल्टी नेशनल कंपनियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है उन्हंें जमीने और प्राकृतिक संसाधन सौपे जा रहे है। नीतियों को नीजी क्षेेत्रों के हित में बड़ी सहजता से सौंपा जा रहा है। शायद यही ऐसा तरीका है जिससे भ्रष्ट तरीके से धन अर्जित किया जा सकता है। क्योंकि यदि ऐसे व्यापार क्षेत्र किसी राज्य सरकार या सरकारी इकाई को सौपेगे तो कालाधन उगाही की गुंजाइश कम होेगी। हमारे सामने फिलीपीन्स, सउदी अरब, यूरोप सहित अमेरिका के कुछ राज्यों के उदाहरण है जहां सरकारी क्षेत्र नीजी क्षेत्रों से बेहतर और गुणवक्तायुक्त होने के साथ सरकारी खजाने को बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। वहीं भारत अधिकांशतः सिर्फ राजस्व (टैक्स) पर सीमिति है। जनता के सामने विकल्प ना रखकर नीजीकरण को तो जैसे मसीहा बनाकर पेश किया जा रहा है कि देश का विकास सिर्फ नीजीकरण ही कर सकता है। यदि सरकारी क्षेत्रों के ईमानदार कर्मियों को प्रोत्साहित कर आगे नई परियोजनाओं को सौपा जाए तो सरकारी क्षेत्र भी प्रबल हो सकते हैं। ईमानदारों के प्रोत्साहन की परम्परा आज नहीं दिखती जिससे भविष्य के ईमानदार भी निर्मित नहीं हो रहे हैं।
आज स्वतंत्रता दिवस को सिर्फ कैलेण्डर मे दर्शाए गए लाल कोष्ठक या अवकाश दिवस के रूप में देखकर दस्तूर निभाने की जरूरत नहीं है। स्वतंत्रता दिवस को अवकाश की बजाए कर्मठ कार्य दिवस घोषित किया जाना चाहिए। क्योंकि इस अवकाश को अधिकांशतः लोग मनोरंजन के अवसर के रूप में देखते हैं। लोग स्वतंत्रता दिवस को क्लब, डिस्को, पब, सिनेमा और पार्टी तक सीमित कर देते हैं। ऐसे में राष्ट्र निष्ठा, उत्तरदायित्व और मूल्य की उपज पाना कोरी कल्पना ही साबित होगी। आने वाली पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मूल भावना के स्रोतों को समझने का वातावरण ही नहीं दिखेगा तो आने वाले समय का सृजन भी एक बड़ी चुनौती होगा। देश में जनसामान्य के लिए न्यायपूर्ण स्थितियां, सुरक्षा, भेद-भाव मुक्त परिवेश, भ्रष्टाचार मुक्त शिक्षा और रोजगार प्रणाली नहीं हैं। बाजार में उद्योग जगत द्वारा अनियंत्रित दाम निर्धारित कर सामग्री और सेवाएं दी जा रही हैं जबकि देश के लिए यह कोई मजबूरी नहीं है। संविधान और कानून में परिभाषित स्वतंत्रता को सुविधानुसार बना लिया जाता है। ऐसे में जनसामान्य के लिए ऐसी स्थिति नहीं दिखती जिससे समाज का अंतिम व्यक्ति स्वतंत्रता दिवस के रूप में गर्व से स्वीकार करे। देश भर में समस्याओं की सूची में अभी भी वही पुरानी समस्याएं हैं। तो फिर प्रश्न स्वाभाविक है कि यह विकास यात्रा जिसमें अनेक लोग करोड़पति, उद्योगपति और भूमण्डलीकृत हुए हैं उनमें शोषित, वंचित वर्ग की स्थिति लगातार कमजोर क्यों है? आज स्वतंत्रता और लोकतंत्र के सामने खड़े प्रश्नों का सामना करना जरूरी है और नीति और नियति तय करने की भी आवश्यकता है।


सभार-
संदीप कुमार वर्मा
सहायक प्रोफेसर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
yesandeep@gmail.com


Tuesday, August 11, 2015

दैनिक सरोकार की मीडिया द्वारा एक बहुत बड़े घोटाले का पर्दाफाश पॉवर टेक इंजीनियर्स कंपनी विद्युत विभाग को लगा रहा करोड़ों का चूना मिली भगत से चल रहा जिले में गोरखधंधा?


दैनिक सरोकार की मीडिया द्वारा एक बहुत बड़े घोटाले का पर्दाफाश
पॉवर टेक इंजीनियर्स कंपनी विद्युत विभाग को लगा रहा करोड़ों का चूना
मिली भगत से चल रहा जिले में गोरखधंधा?
ललितपुर। यदि आपका मीटर भाग रहा है? अधिक रीडिंग दे रहा है? बिजली के ज्यादा बिल से आप परेशान हैं? इसमें कटौती चाहते हैं? वो भी बिना किसी झंझट के, तो परेशान मत हो। आपके जनपद में आ चुके हैं मीटर से छेड़खानी करने वाले। देखते ही देखते जहां आपका मीटर उचित यूनिट निकाल रहा था वहीं मीटर में छेड़खानी के बाद कछुएं की चाल से चलने लगेगा। आप हैरान न हो, यह कोई आम आदमी नहीं है। इसका दावा है यदि कोई भी विद्युत विभाग का अधिकारी मीटर में हुई इस छेड़खानी को पकड़ लेगा तो जितना पैसा मैंने आपसे लिया है उससे दुगना वापस कर देगा। वैसे अब आप लोगों के मन में जिज्ञासा जरूर उत्पन्न हो रही होगी कि यह कौन है? और कितना पैसा लेता है? मीटर को स्लो करने का। तो हम आपको बता दे यह कोई और नहीं बल्कि जो पॉवर टेक इंजीनिर्यस जिसने जनपद में लगभर 2300 से अधिक मीटर लगाए हैं उसी कंपनी का एक कर्मचारी है। जो मात्र 3000 से 5000 रुपए लेकर मीटर में कुछ ऐसा करता है कि मीटर स्लो रीडिंग बताने लगता है। और किसी को पता भी नहीं चलता। जब मीटर की रीडिंग लेने के लिए विद्युत विभाग के कर्मचारी आते हैं तो वह मीटर में दर्ज उक्त कम रीडिंग का बिल बनाकर उपभोक्ता को दे देते हैं। जिससे उक्त कर्मचारी को दिए गए रुपए उपभोक्ता को नहीं अखरते हैं। क्योंकि जहां पहले उसका बिजली का बिल 1000 से 1500 रुपए के आस-पास आता था अब वह 400 से 500 आने लग जाता है। हैं न फायदे का सौदा। 4000 रुपए दीजिए और आप भी करवा सकते है अपनी मीटर को स्लो। तो देर किस बात की। अभी कॉल करें, मीटर लगाने वाले को।

मैं आपसे मजाक नहीं कर रहा हूं। हमारे प्रधान संपादक और संपादक महोदय द्वारा स्टिंग ऑपरेशन कर एक बहुत बड़े घपले का पर्दाफाश किया है। इसमें विद्युत विभाग को करोड़ों रुपए का चुना लगाने पॉवर टेक इंजीनिर्यस कपंनी में कार्यरत रॉबिन पाण्डेय उर्फ गोविंद पाण्डेय निवासी मेरठ, कार्यरत कर्मचारी ललितपुर की वीडियों बनाकर खुलासा किया है। जिसमें वह प्रधान संपादक से मीटर में छेड़खानी करवाने के एवज में 5000 रुपए की मांग कर रहा है। और यह भी दावा कर रहा है कि कोई भी अधिकारी इस मीटर में हुई छोड़खानी को पकड़ेगा तो दुगना वापस करूंगा। मैं ही पूरे जिले में मीटर लगाने का काम कर रहा हूं और जहां भी चैकिंग होती है, अधिकारियों के साथ ही रहता हूं। फिर भी वह लोग मेरी इस कारगुजारी को पकड़ नहीं सकते। और मैं आपको बता दूं कि ललितपुर मैं मैंने अभी तक जितने भी मीटर लगाए है उनमें से लगभग 80 प्रतिशत स्लो रीडिंग देने वाले मीटर लगाए हैं। यह काम मैंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में भी किया है। इससे मुझे प्रति मीटर 4000 से 5000 रुपए मिल जाता है और उपभोक्ता को प्रति माह बिजली का बिल कम। 
 
विद्युत विभाग को अभी तक बिलिंग नहीं होने के कारण पूर्व व वर्तमान संयोजनधारी उपभोक्ताओं से प्रति माह लगभग 45 लाख रुपए का नुकसान सहना पड़ता था। बिना मीटर के चलते बिलिंग एक या दो माह से नहीं, बल्कि साल दो साल से इसी प्रकार बाधित चल रही है। इसके चलते विद्युत विभाग को एक वर्ष में करोड़ों का घाटा हो चुका है। और हो रहा है। इस घाटे में इजाफा जिले में मीटर लगाने वाली पॉवर टेक इंजीनियर्स कंपनी ने आग में घी डालकर कर दिया है। यानि अब विद्युत विभाग को लाखों का नहीं, करोड़ों का नुकसान सहना पड़ेगा। अगर आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पॉवर टेक ने जनपद में लगभग 2300 से अधिक मीटर लगाए हैं उनमें से लगभग 70 प्रतिशत मीटर में छेड़खानी की गई है। इसके हिसाब से 1600 से अधिक मीटर में छेड़खानी की गई है। जहां एक घर से रिडिंग के बाद 1000 से 1500 रुपए आता था वहीं वह घटकर 500 से 600 रुपए प्रति मीटर हो जाता है। इससे प्रति घर से लगभग 700 से लेकर 900 रुपए का घटा विद्युत विभाग को सहन करना पड़ता है। यानि प्रति माह लगभग 11 लाख का और एक वर्ष में 13524000 रुपए का चुना पॉवर टेक इंजीरियर्स के कर्मचारी द्वारा विद्युत विभाग का लगाया जा रहा है। और यह सब विद्युत विभाग की नाक के नीचे ही मीटर लगाने वाले कर्मचारी कर रहे हैं। जनपद में इस गोरखधंधा का काम बिना किसी उच्च अधिकारी की मिलीभगत के शायद ही संभव हो सकता है। तभी तो वह बिना किसी डर के अन्य जिलों की भांति यहां भी मीटर में छेड़खानी करके विद्युत विभाग को करोड़ों रुपए का चुना लगाने का काम कर रहा है। यह तो ताजुब की बात है कि अभी तक उसने जितने भी मीटरों में छेड़खानी करके स्लो किया है उनमें से कोई भी पकड़ा क्यों नहीं गया? वैसे एक सवालिया निशान तो विद्युत विभाग में कार्यरत जेईयों व एईयों पर भी लगता है जो इंजीनीयरिंग की डिग्री लेकर जेई व एई के पद पर तैनात होने के बावजूद भी मीटर में हुई छेड़खानी को पकड़ पाने में असक्षम साबित होते हैं। वहीं चंद क्लास पास मीटर लगाने वाले मास्टर माइड ने जेई व एई की डिग्रियों को कहीं पीछे छोड़ दिया है। क्या इनकी डिग्रियां भी.....................।

वहीं मीटर में छेड़खानी के संदर्भ में अजय कुमार सविता सहायक अभियंता मीटर परीक्षण ललितपुर का कहना है कि हमारे यहां से मीटर में किसी भी प्रकार की कोई छेड़खानी नहीं की जाती है। यदि कोई व्यक्ति मीटर से छेड़खानी करता है या करवाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाएगी। इसके साथ पॉवर टेक इंजीरियर्स कंपनी में प्रोजेक्ट इंजीनियर्स के पद पर कार्यरत अजीत सिंह से बात करने पर उन्होंने कहा कि हमारी कंपनी ने जिले भर में लगभग 2300 से अधिक मीटर लगाए हैं और अभी भी कुछ मीटर लगने बाकि हैं। और रही बात मीटर में छेड़खानी की तो हमारे यहां कार्यरत कर्मचारी इस तरह की कोई हरकत नहीं कर सकते। यदि कोई इसमें लिप्त पाया जाता है तो उसे कंपनी हटा देगी। वैसे हमारी कंपनी को इससे कोई भी नुकसान नहीं होगा। चाहे जिस तरह की कार्यवाही प्रशासन द्वारा क्यों न की जाए। क्या चढ़ौत्री नीचे से लेकर ऊपर तक चढ़ चुकी है या चढ़ाई जा रही है? इस बात का खुलासा शायद इस खबर के प्रकाशित होने के बाद चल जाए कि कहां-कहां उक्त पॉवर टेक इंजीनियर्स कर्मचारी ने मीटर में छेड़खानी की है और कौन-कौन अधिकारी उसके इस गोरखधंधे में शामिल हैं?

Tuesday, June 30, 2015

Monday, May 18, 2015

अलविदा...................अरूणा रामचंद्र शानबाग

अलविदा...................अरूणा रामचंद्र शानबाग

अरूणा रामचंद्र शानबाग को लोग शायद समय के साथ-साथ भूल गये। या फिर बहुतों को आज भी उसके साथ घटित घटना के बारे में याद होगा। ‘‘अरूणा शानबाग वह महिला थी, जिसने लोगों की देखभाल के लिए 1966 में के.ई.एम. अस्पताल में नर्स के पेशे को चुना।’’  उसी अस्पताल में सफाई के तौर पर कार्यरत एक सफाई कर्मी सोहन लाल वाल्मीकि, ने 27 नवम्बर, 1973 को अरूणा पर हमला किया। और, उसके साथ बलात्कार की घटना को अंज़ाम दिया।’’  घटना के दौरान बलात्कारी ने अरूणा के गले को कुत्ता बांधने वाली जंजीर से बांध दिया और, उसे पकड़कर खिचने की वजह से अरूणा के मस्तिष्क से ऑक्सीजन की आपूर्ति रूक गई तथा कार्टेक्स को क्षति पहुंची। परिणामस्वरूप, वह कोमा में चली गयी। अरूणा को इलाज के लिए के.ई.एम. अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन, अच्छे-से-अच्छे डॉक्टर भी उसे कोमा से बाहर न निकाल सके। तब से अरूणा शानबाग मुसलसल वार्ड नं. 4 में जिंदा लाश की तरह पड़ी थी।
अरूणा की संरक्षिका पिंकी वीरानी के अनुसार घटना के बाद से विगत 42 वर्षों से वह कोमा में थी। उसका वजन काफी घट गया था। और, उसकी हड्डियां नाजुक हो गई थीं। बिस्तर पर पड़े रहने से कई अन्य बीमारियों ने भी उसे जकड़ लिया था। उसकी कलाइयां अंदरूनी हिस्से की ओर ऐंठ गई थीं। उसके दांत झड़ गए थे। उसे सिर्फ़ छोटे-छोटे टुकड़ों में ही खाना दिया जा सकता था, जिसके जरिये वह जीवित थी। 37 वर्षों के संघर्ष के बाद संरक्षिका पिंकी वीरानी की उम्मीदों ने भी हार मान ली, तब उसने सुप्रीम कोर्ट में अरूणा की मृत्यु के लिए आवेदन किया था। उसने कहा कि लगातार 37 साल से कोमा में पड़ी 59 वर्षीया अरूणा शानबाग बिल्कुल निष्क्रिय अवस्था में है, और उसका मस्तिष्क वस्तुतः मृत हो गया है। वह बाहरी दुनिया से बिल्कुल बेख़बर है। वीरानी ने अरूणा को इच्छा मृत्यु देने के संबंध में दायर अपनी याचिका में कहा है कि वह न तो देख सकती है और न ही सुन सकती है। वह न तो कुछ अभिव्यक्त कर सकती हैं और न ही किसी भी तरीके से संप्रेषण कर सकती है। इस कारण से उसे इच्छा मृत्यु देने की अनुमति दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट के तत्‍कालीन न्यायमूर्ति मार्कण्डय काटजू और तत्‍कालीन न्यायमूर्ति ज्ञान मिश्रा की पीठ ने विभिन्न पक्षों की विस्तृत दलील सुनने के बाद नर्स अरूणा रामचंद्र शानबाग को इच्छा मृत्यु की अनुमति देने के सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इच्छा मृत्यु की अनुमति देने के विवादास्पद मुद्दे पर कई वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। ‘‘दलील के दौरान अटॉर्नी जनरल जी.ई. वाहनवती ने कहा कि न तो किसी कानून और न ही संविधान में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने का कोई प्रावधान है।’’  सिसोदिया ने याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि अस्पताल कर्मी, और खासतौर पर नर्स तथा चिकित्सक विगत 37 वर्षों से अरूणा की अच्छी तरह से देखभाल कर रहें हैं, और वे उन्हें इच्छा मृत्यु दिए जाने के खिलाफ़ हैं। दूसरी ओर चीफ़ जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच ने भी कहा कि हम किसी व्यक्ति को मरने की अनुमति नहीं दे सकते।’’ 
पूरे मामले को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि नर्स अरूणा रामचंद्र शानबाग अपने साथ घटित बलात्कार की घटना के बाद 42 वर्षों से कोमा में थी। ‘‘आरोपी सोहन लाल वाल्मीकि सात साल की सज़ा काटने के बाद रिहा हो चुका है। और वह आराम की जिंदगी जी रहा है।’’  लेकिन बलात्कार की शिकार 42 वर्षों से जिंदा लाश बनी हुई थी। इस मामले ने अब समाज और मीडिया चिंतकों के बीच एक बहस छेड़ दी है, जिसमें तमाम सवाल जन्म ले रहें हैं; यथा-
§  क्या बलात्कारी के लिए 7 साल की सज़ा काफी है? क्या उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए?
§  क्या कोमा में पड़ी अरूणा को मरने का अधिकार मिलना चाहिए था?
ऐसे बहुत सारे प्रश्न इस मामले पर उठते नज़र आते हैं। उल्लेखनीय है कि इच्छा मृत्यु को साफ तौर पर मना कर दिया गया था, क्योंकि संविधान में जीने का अधिकार है। मरने का कोई अधिकार नहीं है। इस पर मीडिया और मानवाधिकार आयोग अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे थें। मीडिया तरह-तरह से इस मामले को समाज के सामने रखने के लिये संघर्ष कर रहा था। मानवाधिकार आयोग इस मामले में इच्छा मृत्यु देने का विरोध कर रहा था। कहना गलत न होगा कि मानवाधिकार आयोग 66 वर्ष की अरूणा, जो विगत 42 वर्षों से कोमा में थीं, को न्याय दिलाने में असफल साबित हुआ है। 7 मार्च, 2011 को न्यायालय ने अपने फैसले में अरूणा को इच्छा मृत्यु देने से इंकार कर दिया।’’  इस आलोक में 8 मार्च, 2011 को महिला दिवस के अवसर पर इस ख़बर को लगभग सभी समाचारपत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। हालांकि, इस पूरे प्रकरण में मीडिया की अपेक्षित भूमिका संतोषजनक नहीं रही है। वहीं कोमे में 42 वर्षों पड़ी अरूणा ने आखिरकार जीवन से लड़ते हुए आज अपने प्राण त्‍याग दिए। यह वास्‍तव में एक दुखद खबर है कि 42 वर्षों से उसे जिस न्‍याय की तलाश थी वो उसे मरने के बाद भी नहीं मिल सका। और न ही 42 सालों से बलात्‍कार के संदर्भ में आती-जाती सरकारों ने कोई भी ठोस कानून नहीं बना पाने में सक्षम साबित हो सकी। वाह रे हमारा कानून वाह री सरकारें................


Friday, May 8, 2015

उसके लिए ..................

उसके लिए 

उसके लिए 
आधी से ज्यादा जिंदगी 
एक दुस्वप्न सी बीती
उसने 
ना जाने कितना ही समय  
एक ही साड़ी में  
निपटा दिया  
मांगे हुए या दिये गए 
कपड़ों में 
ताउम्र गुज़ार दी 

घर की बड़ी बहू होते हुए भी
वो कभी ना सजी, 
ना संवरी
हाथ में चार पितल की चुड़िययाँ डाले 
हमेशा करछी हिलाते हुए ही मिली 

ना जाने कितने ही सपने 
उसके भीतर 
अपनी मौत मर गए 
पलंग का एक कोना पकड़े हुए 
कभी खुद पर हँसती 
कभी खुद पर रोती
बहुत बार खुद पर नाराज़ होती 
नज़र आ जाती थी  

अच्छे दिनों की आस में
उसका 
पल पल बीत गया  
दहेज का भी समान 
धीरे धीरे हाथ से 
फिसल गया 
ना कोई अच्छा दिन आया
ना इज्ज़त ना सम्मान मिला 
पर उम्मीद और इंतज़ार का 
एक बड़ा सा पहाड़ 
काटने को मिल गया 

कुछ खास सी 
';दिव्य'; थी वो मेरे लिए 
उसके टूटे-फूटे ब्यान 
आज भी दर्ज है
मेरी यादों में 
उसका चलना, बैठना,उठना 
बात बात पर बिदकना 
और फिर मान जाना 
ऐसी ही बहुत सी संभव बाते  
जो वो किया करती थी 
आज भी अंकित है 
स्मृतियों में मेरी  

मेरे रीति -रिवाजों की तरह ||