सरोकार की मीडिया

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Thursday, June 16, 2011

बाबाओं की पत्रकारिता छोडकर, मीडिया संस्थाहनों और बाबाओं को गोद लेना चाहिए : एक गांव

शुरू-शुरू में देखा गया कि कुछ चैनल सुबह-सुबह किसी-न-किसी बाबा को उपदेश देते दिखाते थे. अब सभी समाचार चैनलों पर दिखाये जाने लगे हैं. इन बाबाओं द्वारा चैनलों पर जाति, धर्म, हिंसा-अहिंसा, पाप-पुण्या आदि का ज्ञान बांटते दिखाया जाता है. जिसके पीछे इन बाबाओं की चाल काम करती है. एक तो समाज में बाबा अपनी प्रसिद्धि बढाते हैं दूसरी इनके द्वारा किए जाने वाले कुकर्मों को छिपाने में भी मदद मिलती है. इन कुकर्मों को छिपाने में समाचार चैनल भी सहयोग करते हैं. क्योंकि अपना प्रचार-प्रसार करवाने के एवज में बाबा स्वयं बहुत-सा धन इन चैनलों को प्रदान करते हैं. इस कारण से समाचार चैनल इनके द्वारा फैलाए जाने वाले पाखंडों को दिखाने के वजह, इनके योग को दिखाते है, भगवान में आस्था को दिखाते हैं, ज्ञान, बुद्धि और चमत्कार को भी दिखाते रहते हैं. चैनलों के द्वारा बाबाओं का गुणगान गाने से जनता, इनको ही भगवान मानने लगती है, इन बाबाओं में आस्था रखने लगती है. परन्तु ये जनता नहीं जानती कि बाबाओं के भेष में बहुत-से बाबा क्या-क्या कुकर्म करते रहते हैं. ऐसे बहुत-से नामचीान बाबा है जिनके द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार, नरवलि, आस्था के नाम पर लूटना आदि मामले भी प्रकाश में आए हैं, जिनको समाचार चैनलों ने ही उजागर किया है.

पिछले दो सप्ताह से देखता आ रहा हॅू कि सभी चैनलों पर बाबाओं का जमावडा दिखाया जा रहा है, इन बाबाओं द्वारा भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अनशन, सत्याग्रह भी किया गया. जिसको सभी चैनल ने प्रकाशित किया. ये बाबा मीडिया की सुर्खियों में बने रहे. आज एक चैनल ने एक और बाबा को प्रकट किया. इन बाबा का नाम है अर्थी बाबा. ये भी कालेधन तथा भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए शामशान घाट पर सत्याग्रह कर रहें हैं. अब तक ये बाबा 50 अर्थियों के सामने हवन कर चुके है और 58 अभी बाकी हैं. यानि कुल मिलाकर 108 अर्थियों के सामने सत्याग्रह. जिसको मीडिया ने अपनी स्टोरी बनाकर जनता के सामने पेश किया. अब तो एक बात समझ में आ चुकी है कि भारत अंधविश्वासों का देश है, सभ्यताओं के नष्ट और सत्ता् परिवर्तन के बाद भी चमत्कार को नमस्कार करने की प्रथा बदस्तू्र जारी है. भारत की जनता इतनी भोली है या बनने का नाटक करती है. तभी तो कोई भी उसे उल्लू बनाकर चला जाता है चाहे सरकार हो, बाबा हो, या मीडिया.

तकनीकि के युग देश जहां प्रगति के मार्ग पर अग्रसरित होने की कोशिश कर रहा है. वहीं बाबाओं की जमात दिन-प्रति-दिन बढती जा रही है. और जनता भी आंख मूंद कर इन पर विश्वास कर रही है. बचपन में बताया गया था कि ये बाबा बहुत ही ज्ञानी होते हैं, तपस्या करते हैं, अपने ज्ञान के पुंज को बढाते हैं और इनको इस माया नगरी, धन-संपदा से कोई मोह नहीं होता. परन्तु वो सब बातें गलत साबित हुई, कि इन बाबाओं को किसी-न-किसी का मोह होता है, जरूर होता है. आज जितने भी बाबाओं को देखों सभी के पास किसी- न- किसी नाम से करोडों रूपये की संपत्ति है. कहां से आती है करोडों रूपये की संपत्ति. इस पर बात नहीं करना चाहता. यदि ये बाबा वास्तहव में गरीब जनता के लिए कुछ करना चाहते है तो अपने करोडों रूपये में से कुछ करोड रूपये इन गरीब जनता के विकास में खर्च करें. इसके साथ-साथ बाबाओं के साथ मिलकर मीडिया एक-एक गांव को गोद ले. ताकि गांव-गांव से मिलकर देश का विकास हो सकें.

Wednesday, June 15, 2011

मीडिया राजनीतिक पूर्वग्रह की गिरफत में

बहुत दिनों से सोच रहा था कि इस मुद्दे पर लिखा जाए या नहीं, रहा नहीं गया. सोचा मन में उथल-पुथम मची रहेगी, मन में जो गुवार उठ रहा है शायद शांत हो जाए. लिखने का एक और मकसद भी है कि मैं इसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट करूगां तो ब्‍लॉग पढने वाले मेरे द्वारा प्रकाशित लेख पर अपनी टिप्पणीयां जरूर देगें, साथ-ही-साथ आम जनता भी इस मुद्दे से मुखातिब भी हो जाएगी, कि किस प्रकार मीडिया राजनीतिक पूर्वग्रह की गिरफत में आ चुका हैं.मैं सही कह रहा हूं या गलत. बहुत से लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं होगा, वो भी मेरे द्वारा कहीं जाने वाली एक-एक बात को कहीं पूर्वाग्रह से ग्रसित न समझ लें. समझ लेने में कोई बुराई नहीं है, परंतु मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रसित हो चुकी है, वो भी राजनैतिक पार्टियों के हाथों में अपनी कमान सौंपकर. फिर इस जनसरोकर से किस को सरोकार रह जाएंगा. वक्‍त–वे-वक्त ये मीडिया हम गरीब बेरोजगारों, भूख से तिल-तिल मरते लोगों,और जब भूख बर्दास्त नहीं होती तो आत्ममहत्या के लिए मजबूर होते लोगों की सुध लेता था. अब वो भी राजनैतिक पार्टियों का बंदर बन गया है. उछलता है, कूदता है, करतब दिखाता है और मादरियों के गुणगान गाता रहता है.पिछले कुछ सप्ताह से मैं देख रहा था कि एक न्यूज चैनल किसी पा‍र्टी विशेष की महिमामडन कर रहा है.कि इस पार्टी की सरकार के कार्यकाल में जनता को क्या-क्या सुख-सुविधा मुहैया करायी गयी,गरीब लोगों के लिए क्या-क्या किया गया, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों के लिए आवास की व्यवस्था करायी गई आदि-आदि. बढा चढाकर दिया जा रहा था.क्या ये राजनीति से ग्रसित मीडिया है,जो सत्ता में काबिज लोगों का व्यखायान कर रही है.इसका तात्पर्य यह है कि मीडिया राजनैतिक पार्टियों के हाथों बिक चुका है. आज बहुत सारे समाचार चैनल खबरों को दिखाने का काम कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश समाचार चैनल किसी न किसी पार्टी का गुणगान गाते रहते है.जिसको आम जनता समझ नहीं पाती कि ये समाचार चैनल किस पार्टी के लिए काम कर रहें है.परंतु मीडिया को सोचना चाहिए कि वो आम जनता के साथ खिलवाड कर रही है.जिस पार्टी के बारे में मीडिया बढा चढाकर प्रस्तुत करती है उसके कार्यकाल में और क्या -क्या घटित हुआ,उसको दरकिनार करने की कोशिश मीडिया द्वारा बखूवी की जाती है. इसका मूल कारण इन राजनैतिक पार्टियों के द्वारा दी जाने वाली मोटी रकम से है जिससे ये चैनल चल रहे है और इन न्यूज चैनल के संवाददाता व रिर्पोटरों को प्राप्त होने वाली सुख-सुविधाओं से भी है जो इन पार्टियों द्वारा दी जाती है.जिसकी वजह से मीडिया इनके आगे-पीछे इनकी बढाई करते नहीं थकता.मीडिया का पूर्वग्रह से ग्रसित होना वा‍कैयी में चिंता का विषय बनता जा रहा है. इस प्रकार से नेताओं और पार्टियों द्वारा किये जाने वाले कार्यों को मक्खन लगाकर परोसने को हम पेड न्यूओज की श्रेणी में भी रख सकते हैं.वैसे सभी समाचार चैनल में कार्यरत पत्रकार भ्रष्ट और लालची नहीं होते, और न ही नेताओं तथा राजनीति के हाथों में खेलने के लिए खुद को प्रस्तु्त करते हैं.परन्तु एक बडी संख्या में पत्रकार व न्यूज चैनल के मालिक इस मक्खलनबाजी में लिप्त हैं.जो पूर्वग्रह से ग्रसित होकर इन नेताओं की गाते बजाते रहते हैं.ये मीडिया आज ये भी भूल गई है कि समाज में हर तबके पर जनता के साथ इन नेताओं द्वारा शोषण किया जा रहा है. किसी भी राज्य के काबिज सरकार की बात करें या फिर केन्द्र में बैठी सरकार या फिर विपक्ष में हल्ला मचाने वाली कोई पार्टी.सभी के द्वारा जनता का शोषण हो रहा है,आये दिन मानवाधिकार का हनन,महिलाओं के साथ छेड्छाड,बलात्कारर,बाहुबलियों द्वारा जमीनों को अधिग्रहण, पुलिस द्वारा निर्दोष लोगों के खिलाफ, तमंचे या चाकू दिखाकर शस्त्रु अधिनियम में मुकदमा चलाना और वाहवाही लूटने के लिए या किसी रंजिश का बदला लेने के लिए किसी-न-किसी व्यलक्ति को मुठभेड में मारने का दम भरना और समाज को बताना कि जिस व्यक्ति को मुठभेड में मारा गिराया है वो फलां-फलां गिरोह का वांछित संगीन अपराधी था.ऐसी बहुत सारी वारदातें आए दिन घटित होती रहती है,जिससे अपराध का ग्राफ दिनों-दिन बढता जा रहा है और मीडिया भी वो ही खबरों को प्रसारित/प्रकाशित करता है जिसमें उसका कुछ स्वार्थ सिद्ध्‍ा हो रहा हो. रह तो वो लोग जाते है जो अपने हक की लडाई लडने में अस्मसर्थ हैं, गरीब है, और हर बार सरकार द्वारा छले जाते है.इन असमर्थ लोगों का सहारा बनी मीडिया ने भी इस तबके से मुंह मोड लिया है और पीडित जनता को अपने हाल पर छोड दिया है. क्यों कि मीडिया अब राजनैतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित हो गई है.

Monday, June 13, 2011

जन्म ले चुकी धंधा पत्रकारिता /अश्लील पत्रकारिता

रह-रहकर एक बात मन में कौंधती है कि आखिर मीडिया किस ओर जा रहा है. मीडिया जनता का पहरूआ था, हितैसी था. अब वो बात नहीं रही. ये पहरूआ अब उद्घोगप तियों के आगे दुम हिलाने लगा है और जनता को काटने. यह जो भी घटित हो रहा है सब टीआरपी की माया है. टीआरी जो न करा दें, मीडिया से. सब करने को तैयार है. किसी को नंगा तो किसी को पूरा नंगा करके दिखाना तो इसके लिए आम बात है. जनता भी क्या करें, जो पहरूआ था वो ही नंगा करने लगा है. अश्लीलता परोसने का काम तो इसके अन्द.र बखूब कूट-कूट कर भरा है या फिर भर दिया गया है,क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्या में अश्लीलता ही टीआरपी का पैमाना नाप रही है.

मीडिया द्वारा बार-बार दिखाये जाने वाली अश्लीलता के कारण, युवा पीढी अश्लीलता के माया जाल में इस कदर फंस चुकी है कि उससे निकलना मुश्किल ही नहीं न मुमकिन हैं. चारों तरफ अश्लीलता की मंडियां लगी हुई हैं, चाहे समाचार पत्र-पत्रिकायें, विज्ञापन, होडिंग, टीवी, न्यूज चैनल एवं इंटरनेट ही क्यों न हो. अश्लीलता बेचने का काम बखूबी हो रहा है. कहना न होगा कि मीडिया दलाल की भूमिका में आ चुका है. यदि कोई इस तरह परोसी जा रही अश्लीलता का विरोध करता है तो ये लोग साफ कहते हैं कि हमें वी यंग बनना चाहिए, किस तरह के ढर्रे में जी रहे हो, वी यंग बनों. क्योंकि हम जो बाजार में बिकता है वही दिखाते हैं.दिखाने के नाम पर जो जी में आता है दिखाते ही रहते हैं, आखिर 24 घंटे कैसे खबरें ही खबरें दिखा सकते है; क्योंकि टेलीविजन की शुरूआत तो मनोरंजन के लिए ही हुई थी.मीडिया के लिए मनोरंजन का मतलब मात्र-और-मात्र अश्लीलता को भिन्न-भिन्न एगलों से केसे डिफरेंट करके परोसा जाए, और व्यवसायियों से कैसे मौटी रकम बसूल कर सकें.

मीडिया ने तो अपने आप को अश्ली्लता के रंग में रंग लिया है.चारों तरफ युवा पीढी भी अश्लीरलता को अपना चुकी है. ये युवा पीढी मीडिया द्वारा परोसी जाने वाली अश्लील सामग्री को सही माने या गलत, इसके बाद भी युवा पीढी इसको अपना रही है. क्योंकि अश्लीलता में एक तरह का लगाव होता है जो युवा पीढी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है. इस आकर्षण को मीडिया ने भाप लिया है. और अश्लीलता को परोसने का काम शुरू कर दिया है. बिना की रोकटोक के. वैसे अश्लीलता को समाज में फैलने से रोकने के लिए धारा 292-294 तक में कानून बनाये गये हैं, कि कोई भी व्यक्ति अश्लीलता को प्रदर्शित नहीं करेगा, और न ही स्त्री के नग्न शरीर को या फिर स्त्रीं के किसी आपत्तिजनक छाया चित्रों को या फिल्म को नहीं दिखा सकेगा. यदि कोई ऐसा करता है तो वह सजा का भोगी होगा. और उसे कडी से कडी सजा दी जाएगी. इसके बावजूद भी सभी कानूनों को तांक पर रखते हुए परोसते रहते है अश्लीलता.

अश्ली्लता को रोकने के लिए बने कानून कहां तक संज्ञान में लाए जाते है समझ से परे है. क्योंकि समाचार पत्र हो या न्यूज चैनल सभी जगह अश्लीलता परोसी जा रही है और किसी के खिलाफ कोई कार्रवाही नहीं होती. इंटरनेट की बात को छोड दें. शायद इंटरनेट इस कानून के दायरे में नहीं आता.सारी मर्यादाओं को लांघकर ये भी अश्लीलता को उच्च स्तर पर परोसता रहता है.क्योंकि इनको भी अपना धंधा चलाना है.आज इंटरनेट पर लगभग 386 साइटें ऐसी है जिनमें मात्र अश्लीलता ही दिखाती है. इन सबकों ध्यान में रखते हुए हम कर सकते है कि मीडिया अब धंधा पत्रकारिता पर उतारू हो चुकी है. इक ऐसा धंधा, जिसमें मुनाफा ही मुनाफा हो हानि न हो. तभी तो टीआरपी और अपने वीवरसिपों को बढाने के लिए अश्लीलता को सभ्य समाज में फैलाने का काम मीडिया ही कर रहा है. और उसने एक नई पत्रकारिता को जन्म भी दे दिया है. ये पत्रकारिता, अश्लील पत्रकारिता या फिर धंधा पत्रकारिता हो सकती है.जिसमें सिर्फ-और-सिर्फ धंधा किस तरह से किया जाए और अश्लीलता को किस तरह से दिखाकर अपने चैनलों को लाभ पहुंचाया जाए. ताकि चैनल नम्बर वन की पदवी हासिल कर सकें.



Sunday, June 12, 2011

भटक रही मीडिया : मिशन से कम्पी्टीशन तक

मीडिया ने बाबा को हीरों बना दिया, चारों तरफ बाबाओं की गूंज सुनाई दे रही है. रामदेव-रामदेव. बाबा न हो गया कोई अभिनेता हो गया, या देश पर मर मिटने वाला सिपाही. सपाही ही होता तो मान लेते कि हमारी रक्षा का उत्तरदायित्वो इनके कंधों पर है, और हम चैन की नींद सो सकते हैं. पर ये तो बाबा हैं. मीडिया ने हीरों बना ही दिया. आखिर मीडिया करती भी क्याप. खुद में तो कुछ करने का सामर्थ नहीं बचा, चलो किसी के पिछलग्गू ही सही, खुद को जनता के सुख-दुख में शामिल करने का दिखावा तो किया.

मीडिया का आगमन होते ही इसने जनता के दिलों में अपनी एक नई पहचान बना ली थी, कि हम जनता के हितैसी है, और समाज के सामने उन लोगों के बेनकाव करेंगे जो अपराध, हिंसा और भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं. और किया भी. परन्तु मीडिया अब अपने मिशन से भटक चुका है, मीडिया मिशन से प्रोफेशन में और प्रोफेशन से कमीशन में अपने आप को तबदील कर चुका है. उसका मिशन अब कमीशन बन चुका है. धीरे-धीरे इस कमीशन में भी बदलाव देखा जा रहा है अब कमीशन से कम्पीटीशन का रूप धारण कर लिया है. मीडिया में इसकी होड मच चुकी है और कम्पीटीशन चल रहा है कि कौन कितना कमीशन लेकर जनता को उल्लू बना सकता है. जनता भी इनके बहकावे में आ ही जाती है. क्योंकि मीडिया ऐसा माध्यम है जो समाज के मनमस्तिष्क पर सीधा प्रभाव छोडता है.

अगर वर्तमान में चल रहे बाबा के मुद्दे की बात करें तो हम सुनते आए है कि बाबा मोह माया से परे होते हैं, वो तो केवल ईश्वमर में आस्था रखते हुए अपना पूरा जीवन उनको समर्पित कर चुके होते हैं. पर देखने में ठीक उल्टा ही आ रहा है. ये बाबा आलीशन घरों में, मंहगी गाडियों में और मौज मस्ती करते देखे जा सकते हैं. कहने को अपने को बाबा कहते है. यदि बाबा रामदेव की बात करें, या फिर बाबाओं की जमात की. ये मात्र धर्म ने नाम पर जनता को दीमक की तरह चूस रहे है. और जनता को अपने पीछे धर्म के नाम पर जोड लेते हैं. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार जिहाद के नाम पर लोग जुड जाते है और इनके मुखिया के आदेशानूसार अपराध को बढावा देते रहते हैं. अगर बाबाओं की सम्पत्ति की बात की जाए तो इनकी सम्पत्ति करोडों रूपये है. जिसका ब्योरा सरकार के पास नहीं है. ये बाबा भ्रष्टाचार से कमाये कालेधन की बात करते हुए उसकी वापसी के लिए अनशन पर बैठते जरूर है परन्तु यह भूल जाते है कि उनके खाते में जो करोडों रूपये जमा है उसमें से कितना पैसा भ्रष्टाचार की काली कमाई का है.जो कहीं-न-कहीं जनता की मेहनत का पैसा है.जिसको उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों ने हडपकर अपने खाते में जमा कर लिया है. और उसमें से कुछ रूपया इन बाबाओं को धर्म के नाम पर दे दिया जाता है. आखिर पैसा है आता हुआ रूपया किसको बुरा लगता है चाहे वो मेहनत का हो या फिर लूट का. आज पैसे ने भगवान का रूप धारण कर लिया है तभी तो आम आदमी की बात क्याह करें, ये बाबा लोग भी पैसे के पीछे पडे रहते हैं. पैसा ही भगवान है. इस तरह से पैसा कमाने में मीडिया भी इन बाबाओं की मदद करती है. बाबाओं को इतना हाईलाईट करके दिखाया जाता है कि आम जनता इनको ही सब कुछ मान लेती है. क्योंकि मीडिया चाहे तो किसको राजा तो किसी को राजा से रंक बना सकती है. आज मीडिया भी इन बाबाओं को बाबाओं से भगवान बनाने पर आमदा है, इसका मुख्य कारण है कि बाबाओं से मोटे तौर पर कमीशन मिलता रहता है. इसलिए जिससे भी इनको फायदा होना दिखाई देता है उसके पीछे दुम हिलाते हुए देखे जाते है.

यदि मीडिया इसी तरह अपने मिशन से भटककर बाबाओं को हीरों बनाने में लगा रहा तो आम जनता का क्या होगा. जिसको मीडिया ने पहले ही भुला दिया है और जनता अब भी इनका आसरा तांके हुए है. कल एक समाचार चैनल पर एक विद्वान ने ठीक ही कहा था कि, मीडिया ने ही बाबा रामदेव को हीरों बना दिया है. अगर सभी समाचार चैनल खबरों को बार-बार प्रकाशित नहीं करते तो बाबा का अनशन बहुत पहले ही खत्म हो चुका होता. परन्तु सभी चैनलों ने बढचढ कर बाबा को दिखाया. क्योंकि मीडिया का मिशन अब कम्पीटीशन बना गया है

Saturday, June 11, 2011

सवाल कालेधन के 280 लाख करोड़ का है ...

भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा"* ये कहना है स्विस बैंक के डाइरेक्टर का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपये उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है. या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है. ऐसा भी कह सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है. ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60 साल तक ख़त्म ना हो. यानी भारत को किसी वर्ल्ड बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है. जरा सोचिये ... हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नोकरशाहों नेकैसे देश को लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी तक 2011 तक जारी है. इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रस्टाचार ने 280 लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64 सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है. भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है. हमे भ्रस्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है.हाल ही में हुवे घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, २ जी स्पेक्ट्रुम घोटाला, आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले है ........

Friday, June 10, 2011

मीडिया भी भ्रष्टा चार में लिप्त हो चुकी है

भ्रष्टाचार सरकार और जनता में समान रूप से अविश्वास पैदा करता है तथा दोनों के नैतिक बंधनों को तोड देता है. इससे नागरिक का दैनंदिन जीवन भी प्रभावित होता है. भ्रष्टाचार ही वह कारण है कि आज हमें मिलने वाला खाद्धान्नक, यहां तक कि दवाएं भी मिलावटी और नकली हैं. न सिर्फ इतना भ्रष्टाचार किसी राष्ट्र के भविष्य और विकास को भी प्रभावित करता है, जनकल्याण के लिए बनाई और लागू की जानेवाली विभिन्ना विकास योजनाओं में भ्रष्टाचार नामक छिदों के कारण आज जो अमरण अनशन और घरना प्रर्दशन हो रहा है इससे सरकार जरूर सकते में होगी.

वस्तुत सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की बीमारी के लक्ष्ण प्रकट हो चुके हैं. इस बीमारी का इलाज ढुढने के लिए मीडिया भी अपनी भूमिका में रही थी.और मीडिया ही भ्रष्टारचार की गांठों को खोलकर जनता के सामने असलियत रखती थी तथा दोषियों के चेहरे से नकाब उतार में मददगार साबित हो सकती हैं. परन्तु मीडिया भी इन्हीं की जमात में शामिल होती नजर आ रही है. इसका मुख्य कारण सरकार द्वारा मीडिया को दी जाने वाली सुख सुविधाओं से है. जिसके बलबूते पर सरकार इन चैनलों व अखबारों को अपने वश में करती जा रही है.

आज मीडिया की भूमिका में दोहरापन आ चुका है, उसे देखना और उसका इलाज करना भी जरूरी हो गया है. अगर भ्रष्टाचार को उजागर करने की बात करें तो कुछ बडे घोटालों या भ्रष्टाचार के मामले तो मीडिया ने बखूबी जनता के सामने लाए हैं, लेकिन देश के कमजोर और बेआवाज आम नागरिक के साथ हर दिन जो बेइंसाफी और ज्यादती के हजारों मामले घटित होते हैं, उनसे मीडिया आंखें चुरा लेता है.पिछले दो दशकों में पत्रकारिता के कामकाज का यह सर्वमान्य तरीका बना गया है कि पुलिस और प्रशासन द्वारा जारी की जाने वाली विज्ञाप्तियों को उनमें किए गए दावों और दिए गए विवरणों को तथ्यों की जांच पडताल के बिना ही प्रकाशित किया गया. क्योंकि भ्रष्टाचार के दलदल में मीडिया भी पूरी तरह से घस चुका है.ऐसे मीडिया के खिलाफ बहुत मामले भी प्रकाश में आते रहे हैं उनमें से एक मामला जिला स्तर पर सरकारी जमीन को कौडियों के भाव में लेने का भी है. एक और मामला लगभग पंद्रह वर्ष पुरान है जिसमें इंडियन एक्सजप्रेस के तत्कालीन संवाददाता ने मध्य प्रदेश में अखबारनवीसों को बडे पैमाने पर मकानों की मिल्कियत बांटने का भी है. इसके साथ साथ आज पेड न्यू ज का मामला भी रह रहकर सामने आता रहता है.

ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें मीडिया में कार्यरत संवाददाता, पत्रकार तथा मीडिया के सर्वेसर्वाओं का भी नाम आता है जो सरकार द्वारा या सरकार पर दबाव बनाकर उनसे अपना उल्लू सीधा करते हैं, और सरकार भी किसी पचडे में पडने के वजह इनकी मांगों को निसंकोच पूरा कर देती है. ये बात कहने में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए कि भ्रष्टा्चार के कालेधन में मीडिया भी लिप्त हो चुका है. जनसंचार के एक विद्वान ने सही कहा था कि संचार माध्याम जनता के मन मस्तिक पर सीधा प्रभाव करता है और इन मीडिया संस्थानों के हाथों में अपनी बागडोर सौंप देता है.जिसे आज मीडिया भ्रष्टाचार के मामलों को जनता के सामने रखने के बजह, खुद ही बागडोर सरकार के हाथों में दे चुका है.जब मीडिया सरकार का दल्ला बन चुका है तब क्या मीडिया समाज के सामने भ्रष्टाचार को उजागर कर सकेंगा.ये मात्र और मात्र सरकार के कालेधन में लिप्ते रहकर अपनी अयस्सीम के साधनों ही जुटाता रहेगा.यहा एक कहावत सही सबित हो सकती है कि मीडिया का काम बनना चाहिए, चाहे जनता भाड में क्यों न जाए.

सभार- हर्षदेव (क्राइम, कानून और रिपोर्टर)





Sunday, June 5, 2011

बाबा को धरने पर बैठना है तो अकेले बैठकर दिखाए

क्रांतिकारियों का अपनी क्रांति दिखाने के लिए एक सुनहरा अवसर मिल गया है, इस अवसर को तथाकथित क्रांतिकारी भुना सकते है. और अपने आप को क्रांतिकारी साबित भी कर सकते हैं. शायद ऐसा न हो. वैसे जिस तरह का माहौल कल से लेकर आज तक गरमाया है सभी उससे भलीभांति परिचित है, और शायद ये भी कयास लगा रहे होगें कि कल क्या घटित होने की संभावना है.

जिन मुद्दों को लेकर बाबा रामदेव रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे, उनमें से 99 प्रतिशत मुद्दों को सरकार ने मान लिया था. पर हालात को मद्देनजर रखते हुए सरकार ने रात को कार्रवाही करते हुए बाबा रामदेव को धरना स्थ ल से पकडकर उनको हरिद्वार भेज दिया. ये जो हुआ प्री प्लान था. परंतु इसमें निर्दोष जनता बीच में मारी गई. ये कहावत यहा उचित बैठेगी कि गेंहू के साथ घुन भी पिसता है. वही आलम जनता का भी हुआ. जनता बाबा रामदेव के बोल वचनों में आकर फंस गई और पुलिस की लाठयों का शिकार हुई. ये वाकई सरकार के द्वारा कराया गया निन्दनीय कार्य है. जिसका खामयाजा सरकार को भुगतना पडेगा. वही केन्द्रा में बैठे विपक्षी सरकार भी मौन साधे हुए है. मात्र 24 घण्टों का सत्या ग्रह. क्या साबित करना चाहते है. कि हम भी क्रांतिकारी है और सरकार द्वारा जिस तरह का कार्य किया गया है उसके खिलाफ हैं. नहीं, मात्र विपक्षी हीरों बनने की फिराक में हैं.

मैं बाबा रामदेव से एक बात पूछना चाहता हूँ कि कुछ समय पहले इन्होंने कहा था कि मेरे पास उन लोगों की सूची है जिनका पैसा विदेशी बैंकों में जमा है. कहां है वो सूची. उनमें किन-किन लोगों का नाम है. जिनकों बाबा रामदेव ने अभी तक उजागर नहीं किया. क्याम वो किसी को बचाना चाहते हैं. यदि वो वास्तिव में जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार के खिलाफ खडे हुए हैं तो ठीक है, नहीं तो चोर-चोर मौसेरे भाई का किस्साक यहां उचित बैठेगा. वैसे बाबा रामदेव ने हरिद्वार में अपना अनशन जारी कर दिया है, मेरे अनुसार कल तक हरिद्वार से भी उनका अनशन समाप्त हो जाएगा.

आज मैं उन माक्सववादी, समाजवादी, लेनिनवादी और क्रांतिकारी लोगों की तरफ मुंह तांक रहा हूँ जो अपने आप को उमदा किस्म के जनता के नुमायदे मानते है, और जनता पर हो रहे अत्यालचारों के खिलाफ आवाज उठाते है. फिर क्योंत चुप हैं सभी के सभी.
बाबा रामदेव में यदि कुवत है तो अकेले, बिना पंडाल के, बिना फंखे के और बिना किसी के सहयोग के धरने पर बैठकर दिखाये, तो उनको उनकी औकात समझ में आ जाएगी. कि जिस तरह से गरीब जनता अपने हक की लडाई लडता है तो उस पर क्या -क्या बितती है, ये तो वो ही जानता है. जब बाबा रामदेव कहां चले जाते है. शायद अलोम-विलोम करने.

बाबा को सभी योग गुरू के नाम से जानते है, वो खुद गरीब जनता को लुटते है. तब कहा जाता है बाबा रामदेव का का अनशन. वक्त रहते सभंल जाये तो ठीक है, नहीं तो जो जैसा करेंगा वैसा ही भरेंगा.