सरोकार की मीडिया

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Monday, April 12, 2010

शर्म के बारे में पूछता है कोई जब हमसे


शर्म के बारे में पूछता है कोई जब हमसे



हां कह देते है हम कि हमें भी आती है कभी-कभी


रिश्ता हमारा टूट चूका है वैसे तो शर्म से


पुराने सम्बंधों के आधार पर आ जाती है बस कभी-कभी


भीड़ में रहें तो कह देते है कि आती है शर्म


बाकी नज़रें चुरा-चुरा कर देख लेते है कभी-कभी


चाहते तो नहीं पर समय जब पूछता है हिसाब और


जमाना कहता है तो झांक लेते है गिरेवां में कभी-कभी


Sunday, April 11, 2010

गूंगा नहीं था मैं

गूंगा नहीं था मैं कि बोल नहीं सकता था


जब मेरे स्कूल के मुझसे कई क्लास छोटे

बढे़गें से एक फार के लड़के ने मुझसे कहां

`` ओ-ओ मोरिय! ज्यादें विगडें मत ।

क्मीज कू पेंट में दवा के मत चल ´´

और मैनें चुपचाप अपनी कमीज

पैंट से बाहर निकाल ली थीं गूंगा नहीं था मैं

न अक्षम, अपाहिज था जड़ था

कि प्रतिवाद नहीं कर सकता थां उस लड़के को इस

अपमानजनक व्यवहार का लेकिन

अगर मैं बोल सकता जातीय अहं का सिहांसन डोल जाता

स्वर्ण छात्रों में जंगल की आग की तरह

यह बात फैल जाती कि ढे़ढ़ो का दिमाग चढ़ गया है

फिसल गया है कि एक चमार का लड़का

काफीपुरा के एक लड़के छोरे से अड़ गया है

आपसी मतभेदों को भुलाकर तुरन्त-फुरन्त स्कूल के

सारे स्वर्ण छात्र गोलबदं हो जाते और

ये ना अध्यापक ये होकिया ले -लेकर

दलित छात्रों पर हल्ला बोल देते

इस हल्ले में कई दलित छात्रों के

हाथ -पैर टुटते कई के सिर फूटते

और स्कूल परिसर के अन्दर

हगामा करने के जुर्म में

हम ही स्कूल से

रस्टीगेट कर दिये जाते।

अपना पता न अपनी खबर छोड़ जाऊंगा

अपना पता न अपनी खबर छोड़ जाऊंगा


बे सािम्तयों की गर्द-ए-सफर छोड़ जाऊंगा

तुझसें अगर बिछड़ भी गया तो याद रख

चेहरे पे तेरे अपनी नज़र छोड़ जाऊंगा

ग़म दूरियों का दूर न हो पायेगा कभी

वह अपनी कुर्वतों का असर छोड़ जाऊंगा

गुजरेगी रात - रात मेरे ही ख्याल में

तेरे लिए मैं सिर्फ सहर छोड़ जाऊंगा

जैसे कि शम्आदान में बुझ जाये कोई शम्आ

बस यूं ही अपने जिस्म का घर छोड़ जाऊंगा

मैं तुझकों जीत कर भी कहां जीत पाऊंगा

लेकिन मुहब्बतों का हुनर छोड़ जाऊंगा

आंसू मिलेगें मेरे न फिर तेरे कह कहें

सूनी हर एक राह गुजर छोड़ जाऊंगा

सफर में अकेला तुझे अगले जन्म तक

है छोड़ना मुहाल , मगर छोड़ जाऊंगा

उस पार जा सकेगी तो यादें ही जायेगी

जी कुछ इधर मिला है इधर छोड़ जाऊंगा

ग़म होगा सबकों और जुदा होगा सबका ग़म

क्या जाने कितने दीद-ए - दर (भीखी आंख) छोड़ जाऊंगा

बस तुम ही याद रहोगें,ं कुरेदोगें तुम अगर

मैं अपनी राख में जो शरर(चिनगारी) छोड़ जाऊंगा

कुछ देरे को निगाह ठहर जायेगी जरूर

अफसाने में एक ऐसा खण्डर छोड़ जाऊंगा

कोई ख्याल तक भी न छू पायेगा मुझें

मैं चारों तरफ आठों पहर छो

ऐसा कोई पेड़ नहीं जिसको यह हवा न लगी हो

यह बात सौलह आने सच है कि एक उम्र के बाद कोई भी अछूता नहीं रहता, कोई कम, कोई ज्यादा करता जरूर है क्योंकि शारीरिक परिर्वतन एवं आस-पास के माहौल को देखकर, मन भी उसी दिशा में भटकने लगता है। जिस प्रकार हवा चलने पर सभी पेड़ हवा की दिशा में हिलने लगते है वह लाख कोिशश करें अपने आपकों हिलने से नहीं रोक सकते, उनके हिलना ही पड़ता है। चाहे वो चाहे या न चाहे। हर इंसान को उसी दिशा में चलना पड़ता है जहां सभी जा रहे है, जैसा कर रहे है, करना पड़ता है, मन चाहे या न चाहे, पर मन कुछ समय बाद करने लगता है आखिर मन है जिस प्रकार खाना खाते हुए दिखने पर, मन भी खाना खाने का करने लगता है चाहे आपने खाना खाया हो या नहीं। उसी तरह जो एक व्यक्ति करता है वह काम दूसरा भी शुरू कर देता है। आजकल के पहनावे को ले तो समझ आ जाएगा कि एक व्यक्ति जिस प्रकार के वस्त्रों को पहनकर समाज के सामने आता हे धीरे-धीरे उसी तरह वस्त्रों को कई लोग पहनने लगते है और वह फैशन में आ जाता है।


ऐसी ही इंसान की फिदरत में है जिस तरह की प्रेम कहानी सुनायी जाती है लैला-मजंनू, हीर-राझां, सीरी -फरहाद, रोमियो-जूलियट, जो एक दूसरे के लिए अपनी जान कुरवान कर सकते थे और की भी। मैंने शायद शब्द का प्रयोग इसलिए किया, क्योंकि मेरे पास इसके कोई प्रमाण मौजूद नहीं है जिससे मैं यह साबित कर सकूं कि ये लोग भी थे, जिनकी प्रेम कहानी हम सभी को सुनायी जाती है, सुनायी जाती रहेंगी। उन्ही का अनुसरण करने की कोिशश युवा पीढ़ी भी कर रही है वह अपने नामों को इन नामों के साथ जोड़ने की भरकस कोिशश करते है कुछ कामयाब भी हो जाते है इस कोिशश के चलते यह अपनी गली-मोहल्ले में मशहूर हो जाते है, इसके अलावा और कुछ नहीं होता, केवल मोहल्ले मे बदनामी ही फैलती है कि फलां-फलां का लड़का उस लड़की के पीछे पड़ा है या उस लड़की का सम्बंध किसी लड़के के साथ है वह उससे मिलती है जब यह बात माता-पिता को पता चलती है तब वह यह सिद्ध करने के लिए की हमारा बच्चा सही है, हम अपने बच्चों पर प्रतिबंध लगा सकते है, अपने बच्चों को थोड़ा डांट/मार-पीट देते है या कुछ समय के लिए घर की चार दीवारी में बन्द कर देते है। इसके अलावा वो कुछ नहीं हो सकता। बच्चा करता अपनी मर्जी का ही है, और इन प्रेम कहानी की तरह वह अपने प्यार को परवान चढ़ाता रहता है एक समय के बाद वो अपना सब कुछ प्रेम/प्यार के नाम पर लुटा चुका होता है लड़का अपना समय, धन तथा लड़कियां अपनी इज्जत। इन प्रेम कहानियों का अन्त सबको पता होता है सब जानते है कि इन प्यार करने वालों का कभी मिलाप नहीं हो पाया, न ही इन को हो पाएगा।

लड़कों का क्या है वह कुछ भी कर सकते है लड़की को सीता की भान्ति अग्नि परीक्षा देनी ही पड़ती है, चाहे वो कुछ भी कर लें।

ऐसा ही होता है लड़के का लड़की के साथ सम्बंध क्यों न हो, उसे शादी के लिए लड़की कुंवारी ही चाहिए। जिस कारण से वो हमेशा ही शक करता रहता है कि मेरी पित्न का कहीं किसी के साथ सम्बंध तो नहीं है या था, वह यह नहीं सोचता की जब वो राम नहीं बन सकता, तो सीता की आश कैसे कर सकता है। आज न तो कोई राम है न ही सीता। सबका दामन दागदार है चाहे इसका पता चले या न चलें, यह तो उसकी अन्तर आत्मा ही बता सकती है कि वो कितने पवित्र है।

शादी की रात लड़का अपने जीवन की सारी दास्तान किताब के पन्नों की तरह धीरे-धीरे खोल देता है परन्तु लड़कियां कभी यह नहीं बताती कि उसकी किसी लड़के के साथ दोस्ती थी या सम्बंध। वह शादी के बाद पतिवत्रा बनने की भरकस कोिशश में लगी रहती है। अपनी पुरानी जिन्दगी को किसी कब्र में दफन कर देती है। जब उस प्यार की पूण्यतिथि आती है तो उसे याद कर लिया जाता है, वह उसे पूर्णत: नहीं भूलती। वो अपने पति में भी उसको तलाशती है चाहे साथ खाना हो या सम्बंध बनाते समय, उसकी याद आ ही जाती है कि वो ऐसा करता था वो वैसा करता था, पर उसे भूला नहीं पाती।

लड़कियां लाख कोिशश कर लें वो पहले प्यार को नहीं भूला पाती। प्यार हो या अपने जीवन में घटित कोई भी घटना, इंसान उसे कभी नहीं भूला पाता i

प्रत्येक मौत इंसान को एक ही सीख देती है कि मैं ही सत्य हंू और मैं ही अमर

ऐसे तो जिन्दगी को हम देखे तो हमको दिखाई पड़ जाएगी कि मैं कुछ भी नहीं हूं इसे दिखाई पड़ने में कौन सी कठिनाई है मृत्यु रोज इसकी खबर लाती है कि हम कुछ भी नहीं है लेकिन हम मृत्यु को कभी गौर से नहीं देखते कि वह क्या खबर लाती है मृत्यु को तो हमने छिपाकर रख दिया है मरघट गांव के बाहर बना देते है ताकि दिखाई न पडे़, किसी दिन इंसान समझदार होगा तो मरघट गांव, शहर के चौराहे पर बना होगा कि रोज दिन में दस दफा निकलते आते-जाते दिखाई पड़े मौत का ख्याल आए कि मौत है अभी कोई लाश निकलेगी, मुर्दा निकलेगा , जब कोई लाश निकलती है तो हम बच्चों को घर के भीतर बुला लेते है कि मुर्दा निकल रहा है अन्दर आ जाओ। मुर्दा निकले और हममें समझ हो , तो सब बच्चों को बाहर इक्ठठा कर लेना चाहिए कि देखो यह आदमी मर गया ठीक इसी प्रकार हम सबको मर जाना है। केवल यह एक हकीकत है इसके अलावा दुनियां में सब निरंकार है मेरी मानें तो दुनियां में मृत्यु ही एक सत्य है इसके परे और दुनियां में कुछ भी नहीं बचता। आज का इंसान समझदार होते हुए भी नसमझ बना हुआ है वह यह जानता है कि मौत एक दिन किसी न किसी प्रकार से आयेगी और उसको सब कुछ यह इसी नशवान संसार में छोड़कर जाना पडे़गा। बावजूद इसके वह जीवन से इस कदर मौह करने लगता है और अपने आप को पूरी तरह से मोह-माया के चंगुल में जकड़ जाता है जैसे उसे कभी यह संसार छोड़कर जाना ही न हो।


कहते है कि जीवन और मरण सब प्रभु के हाथ में है कब किसकों भेज दे कब बुला लें ये तो सिर्फ उसी की लीला है वैसे एक जन्म लेने वाले बच्चों को कोई नहीं रोक सकता वो तो जन्म लेगा ही। ठीक उसी प्रकार जाने वाले को तो भगवान भी नहीं रोक पाते , उसे तो जाना ही है, पर जाने का रास्ता तो एक ही है वह है मौत।

प्रत्येक मौत इंसान को एक ही सीख देती है कि मैं ही सत्य हंू और मैं ही अमर।

मृत्यु की सच्चाई

मृत्यु के अलग अलग प्रकार परन्तु रूप एक


मृत्यु इंसान को विभिन्न प्रकार से मारती है

• किसी बीमारी के चलते होने वाली मौत

• दुघटना से होने वाली मौत

• पैदा होते समय हुई मौत

• किसी के द्वारा किसी अस्त्र के प्रयोग से मौत

• स्वयं ही अपनी जीवन लीला समाप्त करना

• वृद्धावस्था से होने वाली मौत

आदि प्रकार से मनुश्यों को मौत आती है परन्तु विभिन्न प्रकार से होने वाली मौत का रूप एक ही है वह है मृत्यु।

मृत्यु की सच्चाई

मृत्यु एक ऐसा सत्य है जिसे आज तक दुनियां में कोई भी भगवान से लेकर जानवर तक नही झूठला सका है। वह किसी न किसी माघ्यम से उसे अपने आगोस में ले लेती है परन्तु कारण किसी न किसी को बनना पड़ता है।

किसी इंसान की मृत्यु के बाद इंसान ही चर्चा करते है वह इस प्रकार से मौत का ग्रास बन गया ,लेकिन वह यह नहीं समझते की कारण तो केबल एक ही है वह है मौत। जन्म को तो सब देखते है परन्तु मौत को केबल वहीं इंसान देख पाता है जिसकी मृत्यु हो रही होती है।

मृत्यु का आसान तरीका

मृत्यु का एक मात्र तरीका है वह है चिन्तन मन से मृत्यु की अराधना करना जिस व्यक्ति ने मृत्यु की सच्चे मन से अराधना कर ली हो उसकी मृत्यु या फिर यह कहों कि उसको अपने प्राण त्यागने में कोई भी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। वैसे देखा गया है कि जब मनुश्य अपने जीवन के अन्तिम छडों में होता है और वह कश्ट छेल रहा होता है तो उसे उतना ही प्यार मौत से ठीक उतनी ही नफरत जीवन से होने लगती है।

परिभाशा

जीवन को हर प्राणी परिभाशित कर सकता है परन्तु मौत को कोई भी परिभाशित नहीं कर सकता है। क्योंकि जीवन जीने की कला है क्या यह कहें की मृत्यु मरने की कला है। मृत्यु तो केवल प्रभू के चरणों में अपना स्थान पाने का तरीका है अब लोग यह भी कह सकते है कि एक आदमी 150 साल जीवन जीता है वहीं दूसरा जन्म लेने के बाद या फिर जन्म लेते वक्त ही मर जाता है इसे क्या कहेगे। यह सब मनुश्य के भाग्य के ऊपर नहीं है जिस मनुश्य की प्रभू को जिस समय अवश्यकता पड़ने लगती है वह उसे उसी अवस्था में बुला लेता है और उसे जाना ही पड़ता है वह किसी भी प्रकार से आग्रह नहीं कर सकता या फिर वह समय नहीं मांग सकता कि मैं कल आऊगा या 10-15 मिनट के बाद आऊगा , उसे तो जाना ही पड़ता है

लोगों ने देखा होगा कि जो इंसान जितने अच्छे कर्म करता है उसे ही प्रभु अपने पास बुला लेता है और जो जितने बुरे कर्म करता है उसे उतनी ही देर में बुलाते है क्योंकि उस प्रभु के दरवार में अच्छे लोगों की कमी है देखा जाये तो इस संसार में बुरे लोगों का जमघट लगा रहता है कोई आता है कोई आने की कोिशश करता है जाने का कोई नाम ही नहीं लेता चाहिता।

मृत्यु की परिभाशा मेरे अनुसार तो मृत + यु से बना है मृत का मतलब मरा हुआ यु का मतलब तुम ं।

जब कोई िशशु जन्म लेता है तो उसे हमें रोक सकते है उसका इस संसार में पैदा होना रोक सकते है या फिर यूं कहे उसका गर्भ पात करके उस बच्चें को जन्म नहीं लेने दे सकते हैं ठीक इसके विपरीत जब कोई इंसान या फिर कोई भी जीवित प्राणी हो अगर वह मरने वाला है तो कोई भी लाख कोिशश कर ले उसे इस संसार से जाने से नहीं रोक सकता , उसे तो जाना ही पडे़गा, कोई कुछ भी नहीं कर सकता।

Monday, April 5, 2010

Hai koi saath nahi

Hai koi saath nahi



Phir bhi koi hai aise



Saans mein jaise hawa hai



Dil mein dhadkan jaise.



Hum akele hain ye logon se



suna hai hum ne



saath hai jo use dekha nahi



khud bhi hum ne



Jaane kyon log bichhadne



ka gila karte hain



hum se woh aise mila ki



kabhi bichhada hi nahi



Fule the hum to raha saath



wah khusboo ki tarah



hum hue jhil to wah



aa basa paani ki tarah



Aakhaen kahti hai ki



hum ne dekha hi kahaan



dil yeh kahta hai ki



wah humse juda hai hi kahaan



Kaan kahte hain ki hum ne



na suni uski jubaan



dhadkane kahti hain hum hi



to hain uski jubaan



Jo nahi aata nazar



na hi kabhi milta hai



band aakhon ke jharokhon ne



use dekha hai.