सरोकार की मीडिया

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Sunday, April 12, 2015

एडीटर्स एसोसियेशन जनपद ललितपुर का सर्व सम्मति से हुआ गठन

एडीटर्स एसोसियेशन जनपद ललितपुर का सर्व सम्मति से  हुआ गठन।
रमेश चंद साहू, अध्यक्ष विभाकांत हुण्डैत महामंत्री, नवीन जैन थनवारा कोषाध्यक्ष

ललितपुर। एडीटर्स एसोसियेशन ललितपुर की आवश्यक बैठक वरिष्ठ पत्रकार शंकरलाल विश्वकर्मा के मुख्य अतिथित्व में एवं वरिष्ठ पत्रकार जमना प्रसाद यादव की अध्यक्षता में स्थान कम्पनी बांग ललितपुर में सम्पन्न हुयी। इस बैठक में एडीटर्स एसोसियेशन के पुर्न गठन में चर्चा की गयी। एवं चर्चा उपरान्त सर्व सम्मति से संगठन के गठन पर सभी पत्रकारों द्वारा अपने अपने विचार व्यक्त किये गये। विचार उपरान्त सर्व सम्मति बनी की संगठन के चुनाव सम्पन्न कराये जाये। जिसमें अध्यक्ष पद हेतु रमेश चंद साहू के अलावा उपाध्यक्ष सुधीर जैन, कोषाध्यक्ष नवीन जैन थनवारा, महामंत्री विभाकांन्त हुण्डैत, मंत्री पद हेतु कन्हैया लाल विश्वकर्मा एवं मीडिया प्रभारी के तौर पर डॉ. गजेन्‍द्र प्रताप सिंह के नामों की चर्चा व्यक्त की गयी। जिसमें संगठन के सभी उपस्थित सदस्यों द्वारा सहमति व्यक्त की गयी। साथ ही साथ सगंठन के सरंक्षक मण्डल का गठन हेतु प्रस्ताव में, शंकरलाल विश्वकर्मा, जमना प्रसाद यादव, कैलाश नारायण सोनी, शैलेनद्र त्रिपाठी तालबेहट, घनश्याम दास सेन (मंत्री), राम पहलवान के नामों पर सहमति जताई गयी। उसके उपरान्त सभी पदाधिकारियों को फूल माला पहनाकर एवं मिठाई खिला कर स्वागत किया गया। एवं सगंठन को गतिशील करने का सभी से अनुरोध किया गया। अध्यक्ष पद हेतु चुने गये रमेश चंद साहू ने कहां कि में पत्रकारों की लडाई को पूर्ण निष्ठा के साथ संधर्ष करने की घोषणा की। और साथ ही साथ कहा कि जो भी पत्रकार बधु हम से भेद भाव भी रखते है वो अपने आप में कुछ भी मांनते रहे अगर मुझे किसी भी पत्रकार का शोषण होने की जानकारी होती है या मुझे खबर दी जाती है या बुलाया जाता है तो हमारा पूरा संगठन उस पीडित पत्रकार के साथ कदम से कदम मिलाने का बादा किया है।
इस बैठक में उपस्थित सम्पादकों में सर्व शंकर लाल विश्वकर्मा, शैलेन्द्र त्रिपाठी, जमना प्रसाद यादव, शान्त सागर साहू, कैलाश नारायण सोनी, घनश्यामदास सेन, संजीव चैरसिया, विजय कुमार नामदेव, असोक कुमार पंथ,  नरेन्द्र ताम्रकार, विनय तिवारी, मुकेश झा, राकेश सिंह, जगदीश झा, नवीन जैन थनवारा, सुधीर जैन, श्यामलाल कुशवाहा, डॉ. गजेन्द्र प्रताप सिंह,  शिभव झां, आदि मौजूद रहे है।

दिनाक- 12.04.2015                                                             भवदीय
कन्हैया लाल विश्वकर्मा
मंत्री एडीटर्स एसोसियेशन



Monday, March 30, 2015

अपना ख़्याल रखना................

अपना ख़्याल रखना................
सूरज की पहली किरण के साथ चिड़ियों के झुंड चहचहाते हुए अपने-अपने घोंसलों से निकलकर एक नए आसमान की तलाश में दूर कहीं दूर शहरी शोरगुल से दूर सुकून व शांति की तलाश में उड़े जा रहे थे। समय की गति अपने समयानुसार टिक-टिक करती हुई सेकेंड, मिनट और घंटों को पीछे छोड़ती जा रही थी, भागी जा रही थी जैसे रूकने के लिए समय बना ही न हो। हां यह हकीकत है कि समय किसी के लिए कभी भी नहीं ठहरता और क्यूं ठहरे? ठहरना उसकी फितरत में सुमार कहां? समय के भागते और सूरज की तपिश के बावजूद वो कभी इस करवट तो कभी उस करवट नींद के आगोश में समाया हुआ था। अपनी नींद को पूरा करने के चेष्ठा कर रहा था, जिसमें वह नाकाम-सा प्रतीत हो रहा था। देर रात्रि तक शराब और शबाब को भोगने के उपरांत जब वो अपने घर लौटकर कमरे में दाखिल हुआ, तो उसे लगा कि बिस्तर पर लेटने के बाद नींद उसको अपने आगोश में ले लेगी, परंतु जैसा हमेशा से उसके साथ होता आया वैसा ही हुआ। कोई खास परिवर्तन नहीं, जिस हालात में वो निकला उसी हालात में वापस आया, परंतु शराब और शबाब उसे मस्तिष्क पर किसी भूत की तरह सवार थे। जो गहरी नींद के बाद थोड़ा रफूचक्कर होता पर नींद तो उससे कोसों दूर थी। भूत के मस्तिष्क पर सवार होने की वजह से वो बिना कपड़े उतारे, बिना जूते उतारे बिस्तर पर धडाम-सा गिर पड़ा, बेसुध होकर। चाहकर भी जूते उतारने में खुद को असक्षम महसूस कर रहा था।
जैसे-जैसे सूरज की तपिश में गर्मी बढ़ती गई, आती हुई नींद भी भाग गई। कुछ समय बिस्तर पर लेटने के बाद उसे कुछ होश आया। यानि भूत ने अपना प्रकोप कम करना शुरू कर दिया था। पर नींद पूरी न होने की वजह से सिर किसी पहाड़ के समान लगने लगा था, चाह कर भी वो पहाड़ को हटा पाने में असफल रहा। मन मारके पहाड़-सा सिर लेकर किचिन में जा पहुंचा। फ्रीज से दूध निकाला और पतेली में डाल दिया, फिर चाय पत्ती, शक्कर डालकर चाय बनाने की कोशिश करने लगा। जिसमें वह कामयाब हुआ, कुछ मशक्कत करने के बाद। मशक्कत यह कि चाय में आए उबाल को वो संभाल न सका और पतेली ने आधे से ज्यादा अपने में मौजूद द्रव पदार्थ को बाहर फेंक दिया। फिर भी कुछ चाय उस पतेली में बची रही। जिसको उसने छानकर अपनी प्याली में उडेल लिया। प्याली को महबूबा के समान अपने हाथों में लेकर, ताकि उसकी गर्माहट से प्याली छूट न जाए, मजबूत पकड़ के साथ उसको लेकर अपने शायन कक्ष में जा पहुंचा। धीरे-धीरे चुस्की दर चुस्की चुस्कियां लेते हुए सोचने लगा, कि रात का वो मन मोहक सफर, शराब और शबाब का वह दौर, फिर एक अनजाने जिस्म की तपिश की गर्माहट अंदर तक मन को सराबोर करती, हवा के झोंकों से शुरू होकर तूफान में तब्दील हुई और फिर तूफान के बाद का वो वीरान, सुनसान-सा भयावह मंजर, सोचकर मन विचलित हो उठा। कौन थी वो? न चाहते हुए मन बार-बार उसी के चेहरे पर केंद्रित हो रहा था। एक बार फिर मुलाकात की आस दिल में किसी अनउपजे बीज की भांति अंकुरित होने की नकामयाब कोशिश में जुट गया। इस अंकुरण के पीछे कहीं जिस्म में मौजूद उसकी वो मदमोहक खुशबू तो नहीं जो रह-रहकर सांसों के रास्ते दिल में उतरती जा रही थी।
एकाएक मोबाइल अपने कंपन से भनभना उठा। जेब से फोन निकाला और देखा तो मित्र राकेश का फोन था। बटन दबाकर फोन रिसीव किया.... वहां से आवाज आई हैलो, डॉ. साहब सुबह हुई या फिर रात की सरगोशियों में बिस्तर की चादर में लिपटे पड़े शोभा बढ़ा रहो हो........?? नहीं यार ... उठ चुका हूं बस चाय की चुस्कियों का लुत्फ उठा रहा था। पुनः पूछा गया तो आज का क्या कार्यक्रम है हमें बाजार चलना था। कब तक चलने का विचार है? ‘‘मैंने कहां 1-2 घंटे में तैयार होकर चलते हैं। मैं तुमको कमरे से रिसीव कर लूंगा……… ठीक है... बाय‘‘ और फोन काट दिया। चाय अब खत्म हो चुकी थी। प्याली को किचिन में रखकर स्नान करने चला गया। चाय की गर्माहट और बाद में सिर पर ठंड़े पानी के पड़ते ही रहा सहा भूत पूरी तरह मेरे सिर से उतर कर भाग खड़ा हुआ। तैयार होने के बाद मैंने गाड़ी निकाली और रवाना हो चला मित्र के कमरे की ओर। वहां पहुंचने के बाद गाड़ी से ही मित्र को कॉल किया कि मैं तुम्हारे कमरे के बाहर खड़ा हूं आओं। राकेश ने जबाव दिया बस दो मिनट में आता हूं......। और फोन काट दिया। ठीक दो मिनट में वो आया और मेरे साथ वाली सीट पर बैठ गया। मैंने गाड़ी स्टार्ट की, तभी उसने मेरे चेहरे की तरफ देखा, ‘‘क्या हुआ....आज तेरे चेहरे से रौनक कहां लापता है, बुझा-बुझा सा क्यों दिख रहा है...??‘‘‘‘नहीं यार ऐसा नहीं है।‘‘‘‘मैं कैसे मान सकता हूं कि ऐसा वैसा कुछ नहीं है.....??‘‘‘‘छोड़ न यार, जाने दें।‘‘ बाजार से कुछ घर का सामान और कुछ बोतले शराब की लेकर हम लोग वापस आ गए। मैंने राकेश को उसके कमरे पर छोड़ा और अपने कमरे पर आ गया। जैसे ही रूम का लॉक खोलकर अंदर दाखिल हुआ, फोन फिर भनभना उठा। देखा तो अजनबी नंबर?? थोड़ी देर सोचने के बाद फोन उठाया। ‘‘हैलो कौन....??‘‘ दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई। हैलो.... हैलो....हैलो..... कौन....?? और फोन कट गया। दुबारा फोन भनभनाया, उठाया हैलो कौन...?? फिर कोई जबाव नही आया और फोन कट हो गया। ऐसा पांच बार हुआ। दिमाग वैसे की भनभनाया हुआ था फोन भी भनभनाकर परेशान करने लगा तो उसकी गर्दन पकड़कर टेंटूआ दबा दिया। फोन बेचारा एक छोटी से भनभनाहट के बाद शांत पड़ गया।
मोबाइल को बंद करने के बाद सोचा कुछ काम कर लिया जाए और इस बावत् अपना लैपटॉप ऑन कर लिया और अपने काम को पूरा करने लगा। काम में कुछ इस तरह मसरूफ हुआ कि समय का पता ही नहीं चला। जब आंखें और सिर दर्द करने लगा तो लैपटॉप की घड़ी को देखा तो सात बजकर अडतालीस मिनट हो चुके थे। मैंने काम को वहीं पर विराम दिया और फिर तैयार होने लगा, रात्रि के कार्यक्रम के लिए। आठ बजकर पैंतीस मिनट पर कमरे में पुनः ताला जड़ा और गाड़ी लेकर बार की तरफ रवाना हो चला। बार के पास पहुंचकर मैंने गाड़ी को पार्किंग में लगाई और बार के अंदर जा पहुंचा। जहां पर रखी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। वेटर आया बिना मेरे कुछ कहे मेरे इशारे को समझते हुए वो मेरा पसंदीदा जाम, वोडका प्लास लैमन लेकर आ गया। उसने उसे टेबल पर रखा और चला गया। जिसे मैंने देखा भी नहीं, मेरी नजरें तो सिर्फ-और -सिर्फ उस अनजाने चेहरे को तलाशने में जुटी हुई थीं जिसका मैं नाम तक नहीं जानता था। समय बितता गया मेरा पैंग उसी तरह टेबल पर रखा मुझे मुंह चिडाता रहा। मैंने उसको हाथ भी नहीं लगया। वेटर पुनः आया ‘‘क्या हुआ सर जी.....?? तबीयत तो ठीक है न आपकी...????‘‘‘‘हूं ठीक है तुम जाओं।‘‘ आदेशा पाकर वो चला गया। बैठे-बैठे रात्रि के एक बज चुके थे। कुछ लोग अपने-अपने अनुसार शराब का लुफ्त उठाकर जा चुके थे तो कुछ लोग अब भी लुफ्त उठा रहे थे। मैं खामोश बैठा रहा, परंतु निगाहें चंचल भाव से पूरे बार का निरीक्षण कर रहीं थीं कि कहीं दिख जाए। पर नहीं..?? मन मारकर दो बजे बिना पीए वापस आ गया। सोचा आज गहरी नींद आ जाएगी। मुझे क्या पता था कि न पीने के बाद भी नींद मुझसे कोई संबंध नहीं रखना चाहेगी। बस बिस्तर पर करवट बदलने की प्रक्रिया जारी रही। सुबह 6 बजे कुछ-कुछ नींद ने अपने आगोश में लिया और फिर डोर बेल ने नींद को फाख्ता कर दिया। उठा.... दरवाजा खोला तो राकेश दरवाजे पर खड़ा था। मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने कहना शुरू कर दिया..... ‘‘कहां था..?? और तेरा मोबाइल कहां हैं...?? कल शाम से लगा रहा हूं। रात में भी आया था, पर कमरे पर ताला लगा हुआ था।‘‘ एक ही सांस में इतने सारे सवालात की झडियां। मैंने कहा ‘‘अंदर तो आ.... बताता हूं।‘‘ फिर राकेश को बताया कि मोबाइल बंद कर दिया था और रात्रि को बार चला गया था। किसी को तलाश करने..?? पर वो नहीं मिला। तो वापस आकर सो गया। मैंने उसके सामने ही फोन को ऑन किया। ऑन करते ही जैसे उसके अंदर जान आ गई हो। और वह ऑन हो गया। फोन को साइड मे रखकर पूछा ‘‘क्या लेगा...??? चाय, या कॉफी या सुबह-सुबह से.... .... .......‘‘‘‘नहीं. ....नहीं......... कुछ नहीं.............। तू जल्दी तैयार हो जा, कहीं जाना है..??‘‘‘‘कहां जाना है लड़की देखने क्या......??‘‘‘‘हां लड़की देखने......??‘‘ मैंने उससे मजाक किया, पर हकीकत में पता चला कि उसके घरवाले आए हुए हैं यहां लड़की को देखने, उसके रिश्ते के लिए। उसने कहा कि तैयार होकर आ जाना और वो चला गया। उसके जाने के तुरंत बाद फिर फोन भनभनाया, मैंने फोन उठाया, ‘‘हैलो कौन......??‘‘ इस बार जबाव आया ‘‘हैलो मैं..........।‘‘ आवाज जैसे जानी पहचानी सी लगी और फिर मैं आवाज पहचान गया। मन में एक उमंग, चेहरे पर मुस्कान, दिल जोर-जोर से बाहर आने को उतारू होने लगा। ‘‘हां जी बोलिए..........।‘‘‘‘मैं आपसे मिलना चाहती हूं, कल भी आपको फोन किया था पर हिम्मत नहीं हुई जब हिम्मत हुई तो आपका फोन बंद जा रहा था।‘‘ मैंने अपनी स्थिति से उसको अवगत करना मुनासिब नहीं समझा, कि कल तो मैं भी तुम्हें ही तलाशता रहा। ‘‘हां तो बताएं कहा मिलना चाहोगी........??‘‘‘‘आपके घर....................।‘‘
मैंने कहा ‘‘ठीक है मैं पता एसएमएस कर देता हूं आ जाएं।‘‘ मैंने एसएमएस किया तो पुनः कॉल आया कि ‘‘मैं 20 मिनट में पहुंचती हूं‘‘ और फोन कट हो गया। मैं जल्दी-जल्दी तैयार हुआ। ठीक 20 मिनट के बाद डोर बेल बजी। दरवाजा खोला तो वो ही हसीन चेहरा, वो ही खुशबू जिसको अपने भीतर अभी भी महसूस कर रहा था। वो वेधड़क कमरे में प्रविष्ट हुई और सोफे पर जाकर बैठ गई। मैं भी उसी के सामने सोफे पर बैठ गया। पूछा ‘‘क्या लेंगी आप...........??‘‘ जबाव आया ‘‘जो भी आप पिला दें।‘‘ मैंने कहा ‘‘ओके......।‘‘ इतना कहते ही उसने कहा कि ‘‘आप क्या पिएंगे मैं बनाती हूं।‘‘ मैंने कहा‘‘यह भी ठीक है‘‘ उसको कॉफी का सारा समान बताकर मैं पुनः सोफे पर आकर बैठ गया। पांच मिनट के अंतराल के बाद वो कॉफी बनाकर ले आई। एक प्याली उसने ली और एक हमें दी। कॉफी पीते-पीते मैंने हिम्मत करके उसका नाम पूछा तो उसने कहा कि ‘‘क्यों शादी करने का विचार है..........???? नाम में क्या रखा है......??? मैं तो आपको बस एक नजर जी भरकर देखने आई हूं, न जाने कौन-सी कशिश उस रात के बाद आपकी तरफ खींचे जा रही है।‘‘ मैंने भी अपनी स्थिति बयां की। कुछ देर वातावरण में सन्नाटा पसरा रहा। सन्नाटे को तोड़ने के लिए पूछा ‘‘क्या हुआ............???‘‘ उसने चुप्पी तोड़ी और उठकर जाने लगी। मैंने उसका हाथ पकड़ा तो वह पलटी और मेरे सीने से लग गई, किसी बच्चे की तरह। मैंने उसके चेहरे को हाथों में भर लिया और माथे पर एक चुबंन ले लिया, जिससे वह सिहर उठी। फिर हवा का धीरे-धीरे झोंका तूफान में तब्दील हुआ, फिर वीराना-सा सन्नाटा। शांत तूफान के बाद पता नहीं कब नींद ने अपनी आगोश में समेट लिया। गहरी नींद जिसकी तलाश मुझे वर्षों से थी। आंख खुली तो वह जा चुकी थी। उठा तो देखा टेवल पर एक खत पड़ा हुआ था। उसको उठाया और पढ़ने लगा.............
प्रिय.............
न जाने कौन सी डोर है जो मुझे आपके पास तक खींच लाई, जबकि मेरा रिश्ता आज कहीं तय होने वाला है। मैं चाह कर भी आपसे अब संबंध नहीं रख सकती, न ही आप से शादी कर सकती हूं। बस आपकी खूशबू को अपने दिल में लिए जा रहीं हूं। प्लीज कभी मिलने की कोशिश मत कीजिएगा। मैं अपने आपको रोक नहीं पाऊंगी। अब मेरी सारी खुशियां आपके हाथों में हैं चाहे संवार दो या उजाड़ दो..............??
तुम्हारी प्रिय..................
खत पढ़ते-पढ़ते आंखें डबडबा उठीं। आंखों ने आंसू को जैसे मुक्त कर दिया हो। कुछ देर उसी हालात में उसका पत्र हाथों में लिए बैठा रोता रहा। फिर अपने आपको संभाला और तैयार होकर राकेश के कमरे पे जा पहुंचा। जहां सब लोग निकलने की तैयार कर रहे थे। मैं भी साथ हो लिया। कुछ देर बाद हमारी गाड़ियां एक घर के पास जाकर ठहर गईं। अंदर से एक बुर्जुग आदमी आया उसने हम सबका अंदर आने के लिए स्वागत किया। अंदर आने के बद उस बुर्जुग ने सभी से बैठने के लिए आग्रह किया। कुछ देर वो आदमी और मित्र के घरवालें आपस में बातचीत करते रहे। फिर चाय नास्ता, मिठाईयां जो भी उस बुर्जुग पर बन पड़ा सब कुछ रख दिया। बातचीत का दौर फिर शुरू हुआ...........मैंने बीच में दखल देते हुए कहा कि ‘‘अंकल लड़की को दिखाईए जिससे मेरे मित्र की शादी तय होने वाली है।‘‘ तभी उस बुर्जुग ने कहा......‘‘..हू बुलाता हूं.........‘‘. उसने अपनी बेटी को आवाज दी............‘‘.दिव्या बेटा आओं...........।‘‘ जैसे ही वो आई मेरे तो पैरों के नीचे से मानों जमीन खिसक गई हो, आंखें पथरा गई हों, शरीर जम गया हो। दिल की धड़कन मानों थम-सी गईं हो।  यह तो वही थी...........? उसने मेरी तरफ देखा फिर आंखें नीचे कर लीं। सभी ने देखने और कुछ-कुछ पूछने के बाद रिश्ता पक्का कर दिया। मैं चाह कर भी कुछ न बोल पाया। उसकी नजरों की वो मिन्नतें, ‘‘अब मेरी खुशियां आपके हाथों में हैं चाहे तो जिंदगी बना दो या उजाड़ दो....।‘‘

 मैं खमोश ही रहा। रिश्ता अब तय हो चुका था। शादी की तारीख भी तय की जा चुकी थी। मैं बुत बना बैठा ही रहा। इसके बाद उस बुर्जुग ने हम सभी को विदा किया। मैं तो बुत की तरह अब भी सोफे से चिपका था। चाहकर भी खड़ा नहीं हो पा रहा था तभी राकेश ने कहा.......‘‘..यहीं रहने का विचार है क्या........????‘‘ मैंने कहा ‘‘नहीं‘‘ और उठ खड़ा हुआ। पर उस लड़की की निगाहें बार-बार यही कर रही थीं कि संबार दो या उजाड़ दो.....?? हम सभी वापस आ गए। दोस्त के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी शहद बनकर टपक रही थी। मैंने उससे कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा और अपने कमरे पर आ गया। कमरे में घुसते ही दिमाग पुनः उसकी निगाहें और खत पर जाकर ठहर गया। हालांकि दिगाम में एक बात और बार-बार टींस की तरह चुभ रही थी कि मुझको भी अपना जीवन साथी बना सकती थी..........?? तभी किसी का फोन आया फोन दिव्या का ही था। उसने सीधे ही कहा कि मैंने इसलिए फोन किया है कि जो तुम साच रहे हो कि ‘‘मैं तुम्हें क्यों नहीं अपना जीवन साथी चुन सकी, तो बता दूं कि एक स्त्री पुरुष के बारे में सब कुछ जानकर उसे स्वीकार कर लेती है परंतु एक पुरुष स्त्री के अतीत और वर्तमान को जानकर उसे कदापि स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए मैंने आपको अपना जीवन साथी नहीं चुना, क्योंकि वक्त के साथ-साथ धीरे-धीरे एक टींस तुम्हारे मन में हमेशा बनी रहती कि मैं कहीं तुम्हारी गैर मौजूदगी में तो नहीं....................????????????????????  वैसे मैं जानती हूं कि तुम भी मुझसे प्यार करते हो??? इसलिए तुम मेरा कभी अहित नहीं सोचोगे। अपना ख़्याल रखना....................।‘‘ इसके बाद मैंने वो शहर ही छोड़ दिया मन में एक मीठा सा दर्द लेकर..............................।।

Sunday, October 26, 2014

लोकतंत्र के लिए चुनौती भरे दिन

लोकतंत्र के लिए चुनौती भरे दिन
समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव और मक्का मस्जिद में हुए आतंकवादी हमले की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ, लगभग पांच साल पहले किसी गोपनीय वैठक में अपनी तस्वीर के सार्वजनिक हो जाने से चर्चा में रह चुके राजनाथ सिंह एक बार फिर गलत कारणों से चर्चा मे हैं। बेशक इस बार देश के गृहमंत्री के बतौर, जिन्हें पिछले दिनों तिरुअनन्तपुरम में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता संतोष ने सार्वजनिक तौर पर पगड़ी पहनाई। इसकी तस्वीरें देश भर के अखबारों में छपी हैं। संतोष पर 2008 में मााकपा के युवा संगठन डीवाईएफआई के कार्यकर्ता विष्णु की हत्या का आरोप है और इन दिनों वह जमानत पर छूटा है।
इस विवाद से कुछ अहम सवाल उठने लाजिमी हैं जो मौजूदा केन्द्र सरकार की वैचारिक और कार्यनीतिक दिशा का भी आभास करा देते हैं। मसलन हत्या जैसे गंभीर मामले के आरोपी का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह देश के गृहमंत्री तक सार्वजनिक तौर पर पहुंच जाए, उनके सर पर पगड़ी पहनाए और तस्वीरें खिंचवा ले? जबकि गृहमंत्री को जेड प्लस की सुरक्षा मिली हुई है। उनसे किसी अहम शक्सियतों को मिलने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। तो क्या यह गर्म जोशी भरी मुलाकात इसलिए संभव हो सकी कि राजनाथ सिंह और संतोष दोनों एक ही मातृ संगठन आरएसएस से जुड़े हैं? बहुत हद तक संभव लगने के बावजूद सामान्यतः ऐसा नही होता। क्योंकि किसी संगठन या पार्टी से जुड़े लोगों के संवैधानिक पदों पर पहुंच जाने के बाद अमूमन उनकी तरफ से ही संवैधानिक और सांगठनिक के फर्क को बरता जाता है। और वो अपने को संविधान के प्रति जवाबदेह मानता है न कि अपने संगठन के प्रति।
इसीलिए, प्रधानमंत्री या कोई भी मंत्री देश का प्रधानमंत्री या मंत्री होता है। अपनी पार्टी या संगठन का नही। इसलिए इन पदों पर पहुंचने वाले लोग अपने संगठन से जुड़े हत्या जैसे जघन्यतम अपराध के आरोपियों से सार्वजनिक रूप से मिलने से बचते हैं। यह दिखाने के लिए ही सही, लेकिन एक अच्छी परंपरा रही है।
इसलिए हत्या आरोपी संघ कार्यकर्ता के हाथों पगड़ी पहनना और मुस्कराते हुए फोटो खिंचवाना, इन दोनों के एक ही संगठन से जुड़े होने के कारण ही संभव नही हो सकता। यह तभी संभव है जब गृहमंत्री संवैधानिक और सांगठनिक के बीच के भेद बरतने की हमारी लोकतांत्रिक परंपरा से असहमत हों। वे दोनों के बीच के अंतर को मिटा देना चाहते हों।
दरअसल, सरकार के ऊंचे पद पर बैठे लोगों के सोचने के नजरिए में आया यह छोटा लगने वाला बदलाव, वह सबसे अहम बदलाव है जिसे देश सोलह मई के बाद से ही यानी चुनाव परिणामों के घोषित होने से ही महसूस कर रहा है। यह बदलाव सिर्फ किसी एक मंत्रालय तक सीमित नहीं है। इसकी अभिव्यक्ति पूरे देश में हम महसूस कर सकते हैं, जहां संविधान की शपथ लेकर बनी सरकार को संघ परिवार, जिसका साहित्य भारतीय संविधान को ’पश्चिमी, आधुनिक और अपशकुन’ बताता रहा है, और उसके दूसरे अनुवांशिक संगठनों बजरंग दल और विहिप में रूपान्तरित होते हुए देखा जा सकता है। जहां संविधान के कस्टोडियन यानी जमानतदार न्यायपालिका को अपने हिसाब से ’ठीक’ किया जा रहा है।  जहां किसी अमित शाह के किसी हत्याकांड के मुकदमे में अदालत में पेश न होने पर वजह पूछने वाले जज को रातों-रात स्थानांतरित कर दिया जाता है। या फिर किसी प्रतिष्ठित पत्रकार को संघ की ’सांस्कृतिक’ विचारधारा में आकंठ डूबे गुंडों द्वारा सरेआम पीट दिया जाता है। लेकिन इन तमाम घटनाओं पर हम आज तक नही जान पाए कि सरकार की सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग क्या सोचते हैं? वे अपने ’गुरू भाइयों’ की करतूत से सहमत हैं या असहमत? सार्वजनिक तौर पर ’असहमति’ जता देने और अंदर ही अंदर उनकेे साथ खड़ा होने की रणनीतिक मजबूरी जो पिछले गठबंधन वाली एनडीए सरकार में बनी रहती थी, उसे भी उन्होंने तिलांजलि दे दी है?
इन सब मसलों पर हम कुछ भी नही जानते, क्योंकि सरकार की ऊंची कुर्सियां मीडिया से बात नही करतीं। वे एक तानाशाही निजाम की तरह सिर्फ बोलती दिख रही हैं। वह भी सिर्फ एकल माध्यमों जैसे ट्वीटर पर। यानी एक भयानक तरह की चुप्पी है, जो साजिशी और सुनियोजित लगती है। उसमें एक खतरनाक किस्म की सड़ांध हैं। इसे छह दशकों के लोकतंत्र के तमाम बुरे अनुभवों के बावजूद पहली बार ही बिल्कुल स्पष्ट महसूस किया जा रहा है।
लेकिन ऐसा नही है कि वे सिर्फ अराजकतावादियों की तरह परंपराओं को नष्ट कर रहे हैं। वे नया गढ़ भी रहे हैं। जो उनके स्पष्ट फासीवादी प्रवृत्ति और एजेंडे को पुख्ता करता है। इसीलिए हम पाते हैं कि सरकार के बजाए संघ प्रमुख और उनके लोग खुलकर मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं, जो वे अपने को पहले सिर्फ एक ’सांस्कृतिक’ संगठन होने के तर्क के साथ करने से बचते थे। यानी अलोकतांत्रिक तरीके से चलने वाला संगठन संघ परिवार देश की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया है। वह एजेंडा तय कर रहा है कि कौन भारतीय है, इतिहास की पुस्तकों में क्या पढ़ाया जाना चाहिए और किन्हे दुबारा हिन्दू बनाया जाना चाहिए। वहीं जनता द्वारा चुने गए लोग या तो प्रधानमंत्री की तरह कार्पोरेट के ’हरकारों’ की तरह आज दुनिया भर में दौड़ लगा रहे हैं तथा संघ के गुरू भाइयों के जघन्यतम अपराधों को सार्वजनिक तौर पर वैधता दे रहे हैं, गृह मंत्री की तरह।
ये बदलाव इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इससे न सिर्फ पूरा देश सांसत में फंसने जा रहा है बल्कि स्वयं लोकतंत्र के समक्ष भी एक चुनौती उत्पन्न होती दिख रही है। जो जाहिर है भारत के लिए अच्छे दिन नही हैं।
सभार-
गुफरान सिद्दीकी
पता-
द्वारा- एडवोकेट जबीहउल्ला
पहाड़गंज, घोसीयाना
फैजाबाद- 224001
मो-09335160542