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Sunday, August 16, 2015

आम आदमी बनाम अपराधी

आम आदमी बनाम अपराधी

अपराध हमारे समाज में सदियों से रहा है और रहेगा..... कोई भी व्‍यक्ति कभी पेट से अपराधी बनकर पैदा नहीं होता......हालात, पल, लम्‍हा, घड़ी और वक्‍त्‍ा अपराध की शक्‍ल इख्तियार कर लेते हैं आैर यही वक्‍त अपराधी को जन्‍म देता है। शक्‍ल इख्तियार किए हुए हालात जब उस व्‍यक्ति के समक्ष खड़े होते हैं तब व्‍यक्ति का दिमाग शून्‍य के धरातल में चला जाता है और उससे अपराध हो जाता है। अपराध होने के उपरांत वह व्‍यक्ति एक बार जरूर उसके द्वारा किए गए अपराध के बारे में आंकलन जरूर करता है कि वह कौन से कारण उसके द्वारा, उसके करीबियों द्वारा या समाज द्वारा उत्‍पन्‍न हुए जिसने उसे एक आम व्‍यक्ति से अपराध की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। अब वह उस अपराध की सजा और संपूर्ण जीवन का विश्‍लेषण करने लगता है कि अब क्‍या होगा उसका व उससे जुड़े हुए लोगों का। वहीं व्‍यक्ति द्वारा अपराध और सजा के लिए बनी कारागार में एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं हजारों अपराधियों का जमावड़ा एकत्रित होता है। एक ही छत के नीचे। तरह तरह के अपराधी, छोटे से लेकर बड़े-बड़े अपराधियों की मिलनगाह, जहां अपराधियों को उनके नंबरों से पहचाना जाता है। 
एक ही छत के नीचे अपराधियों का मिलन, क्‍या अपराध काे कम करता होगा, या फिर एक नई तरह की मनोवृत्ति उन लोगों के मस्तिष्‍क में पैदा होती होगी, तरह तरह के अपराधियों से मिलने के उपरांत। यह तो उन अपराधियों से जो सजा काट रहे हैं या काट चुके हैं उनसे मिलने के पश्‍चात ही इसका सही सही आंकलन करना संभव हो सकता है कि जब एक आम व्‍यक्ति अपराध करके अपराधी बनता है और वह उस जगह जहां अपराधियों का जमावड़ा लगा रहता है, उसके बीच में रहते हुए हर एक अपराधी क्‍या क्‍या सोचता है और किस तरह से आम आदमी जो अब अपराधी है उन अन्‍य अपराधियों के बीच में तालमेल बिठा पाता है। आैर सजा काटने के पश्‍चात उसके मन मस्तिष्‍क में किस तरह के विचार पनपते हैं, क्‍या वह खुद के द्वारा किए गए अपराध को भुला पाता है, उस सजा को भुला पाता है या फिर उन तमाम अपराधियों को जिनके साथ उसने वक्‍त बिताया है। 
कहते हैं आदमी जिस संगत में रहता है उसका आचरण भी ठीक वैसा ही हाे जाता है। जिसके साथ में वो समय गुजारता है। यानि कारागार में आदमी सजा काटने के बाद भी एक आदमी नहीं बन पाता, वहअपराधियों की बीच में रहकर अपराधी ही बनकर निकलता है। फिर कारागार की क्‍या आवश्‍यकता है जब वहां से आदमी अपराधी ही बनकर निकलता है। हां यदि सौ में से एक इंसान बनकर भी निकलता है तो क्‍या वह एक आम आदमी के जैसी जिंदगी जी सकता हूं। जबाव मिलेगा नहीं..... कभी नहीं.... एक अपराधी का ठप्‍पा लगने के बाद समाज उसे हमेशा ही अपराधी की दृष्टि से देखता है चाहे वह उस अपराध की सजा काटकर क्‍यों नहीं आया हो। 
अब सवाल उत्‍पन्‍न होते हैं कि क्‍या अपराधी एक आम आदमी बन सकता है, क्‍या कारागार में रहने के बाद वह आम आदमी बन पाया होगा........

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