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Wednesday, October 15, 2014

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा
पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिवंगत भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे को मुख्यमंत्री बनाने का संकेत यह कहते हुए दिया कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम पंकजा के नेतृत्व में सभी पिछड़ी जातियों के लिए न्याय पाने का कार्य जारी रखेंगे। भाजपा पंकजा को मुख्यमंत्री बनाने जा रही है या नहीं इस बात से ज्यादा इस बात की तह में जाने की जरुरत है कि वह पिछड़ी जातियों को जो न्याय दिलाने की बात कह रही है उसकी परिभाषा क्या है? क्योंकि यह हो सकता है कि मुंडे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने के बाद उनकी बेटी चुनाव में आएं और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की बात करें। जिस विरासत में भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा भी निहित है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भाजपा के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद हिंदू राष्ट्र की जो बातें कहीं जा रही हैं, उसमें पिछड़ों को क्या न्याय मिलेगा, इसका विश्लेषण किया जाए। 
अमित शाह ने जिस तरह कहा कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग के एक शख्स को प्रधानमंत्री बनाया इसलिए उनकी सरकार की एक प्रमुख नीति पिछड़े वर्गों के लिए काम करने की है और आने वाले दिनों में वे महाराष्ट्र में भी इस नीति को आगे बढ़ाएंगे। तो ऐसे में पिछड़े वर्ग को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि चार महीने जिस मोदी सरकार को हो चुके हैं उसने उनके लिए क्या किया? रही बात महाराष्ट्र की पहली महिला मुख्यमंत्री या पहली महिला पिछड़े वर्ग की मुख्यमंत्री बनने की तो इस अस्मितावादी खोल से बाहर आकर सोचने की जरुरत है। क्योंकि महाराष्ट्र में मात्र 10 प्रतिशत महिला उम्मीदवरों को टिकट मिले हैं और उसमें भी कांग्रेस ने 27 को तो भाजपा ने सिर्फ 21 महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है।
सवाल यहां विचार नहीं अस्मिता का है, जिसको भाजपा एडेªस करके चुनावी लाभ लेना चाहती है। क्योंकि पिछड़े वर्ग के न्याय का विचार, सामाजिक न्याय का विचार है, भाजपा जिसके खिलाफ है। आज बृहदहिन्दुत्व के अंदर सभी प्रकार के वंचित समाज को समाहित करने की प्रक्रिया में वह इसे छुपा रही है। इतिहास से पिछड़े समाज को सबक लेने की जरुरत है कि यह वो नहीं है जिसको यह बता रही है। जिन पिछड़े वर्ग के शख्स को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही जा रही है उनके गुजरात मॉडल के इतिहास को जानने की आवश्यकता है, जहां भाजपा और दीगर भगवा संगठनों ने आरक्षण का विरोध किया है। संघ परिवार और उसके संगठन विद्यार्थी परिषद ने गुजरात के शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाया, यह बात किसी से छुपी नहीं है। अहमदाबाद जैसे शहरी इलाके को भी हिंसक विरोध का ठिकाना बनाया गया। शहरों, कस्बों के अलावां उन्नीस में से अट्ठारह जिलों में आरक्षण विरोधियों ने हिंसा की।
भाजपा को पिछड़ों से कोई परहेज नहीं है, उसे बस अपने सांप्रदायिक-गैर बराबरी वाले एजेण्डे को आगे बढ़ाने वाला चाहिए। चाहे वह दलित हो या फिर पिछड़ा। क्योंकि उसने यह देख लिया है कि जब तक वह एक शहरी और सवर्णवादी पार्टी बनकर रही तब तक उसे चुनावी प्रक्रिया में उतनी सफलता नहीं मिली जितनी उसने दलितों और पिछड़ों को जोड़कर अर्जित किया। पर यहां पिछड़ों को सोचने की जरुरत है कि जो भाजपा उनके प्रति इतनी लचीली हो गई है, समय-समय पर वह और उससे जुड़े संगठन कैसे आरक्षण का विरोध करने लगते हैं?
2006 के दौरान जब उच्च शिक्षा में आरक्षण का सवाल उभरा था तो यूथ फॉर इक्यूलिटी नाम के एक संगठन का प्रार्दुभाव हुआ। समानताकी बात करने वाला यह युवातब जागा जब सरकार ने 27 प्रतिशत पिछड़ों को उच्च शिक्षा में आरक्षण देने की बात कही। जिसमें 20 केन्द्रिय विश्वविद्यालय और एम्स व जिपमर जैसे 9 प्रिमियर मेडिकल कॉलेज शामिल थे। यह संगठन भारत में सभी तरह के जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण का विरोधी था। इस संगठन के प्रणेता शिव खेड़ा ने 2008 में इन्हीं विचारों के आधार पर भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के गठन का ऐलान किया था। जाति और धर्म आधारित आरक्षण खत्म करने तथा तुष्टीकरणको समाप्त करने की मुहिम छेडने के साथ, वह देश की अखंडता के साथ खिलवाड करने वाली ऐसी ताकतों का किसी भी कीमत पर विरोध करेंगे ऐसा उन्होंने आहवान किया। श्री श्री रविशंकर ने भी खेड़ा को बधाई दी। अगर हम गौर करें तो ठीक ऐसी ही मिलते-जुलते प्रयोग स्वामी रामदेव ने भी किए जिसके मूल में आरक्षण विरोध निहित था।
हिन्दुत्वादी संगठनों ने वक्ती जरुरतों के अनुसार अपने को बदला है। वह दलित-पिछड़ों की अस्मिता जो छुआछूत या बराबरी के विचार तक सीमित है को कृत्रिम तरीके से हल कर अपने एजेण्डे में उनको सहयात्री बनाने की फिराक में रहती है। इसीलिए समय-समय पर धर्म या जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने की जो वह बात करती है, खुद को पर्दे के पीछे रखकर, खेड़ा-रामदेव जैसों का सहरा लेकर करती है। 2014 लोकसभा चुनावों में रामदेव को तो हर किसी ने इनके साथ देखा ही है, शिव खेड़ा ने भी भाजपा का प्रचार किया था। यह बहुत अन्र्तविरोधी बात है, एक तरफ मोदी ने अपने को पिछड़ा और राजनीतिक अछूत के रूप में पेश करते हुए यह ऐलान भी किया कि आगामी दशक पिछड़े समुदायों के सदस्यों का दशक होगा, वहीं दूसरी तरफ पिछड़ों के आरक्षण विरोधी उसके प्रचारक भी थे।यह अन्र्तविरोध साफ करता है कि भाजपा प्रोपोगंडा के बतौर पिछड़ों का इस्तेमाल कर रही है।
2013 में यूपी में त्रिस्तरीय आरक्षण को लेकर चले आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने आरक्षण विरोधियों का नेतृत्व किया, जिसमें भाजपा के विधायकों समेत अनेकों पदाधिकारी मौजूद रहते थे। वहीं आरक्षण समर्थकों के साथ अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। अब अगर उस पूरे आंदोलन की समीक्षा करें तो भाजपा ने अनुप्रिया के साथ गठबंधन करके न सिर्फ अपनी सीटें बढ़ायीं, बल्कि उन आरक्षण समर्थकों को भी साथ ले लिया। इसके लिए सिर्फ भाजपा को दोष देने से ज्यादा पिछड़े वर्ग को खुद में झांकना होगा कि उसके हक-हुकूक की लड़ाई में उसके अस्मितावादी लालच ने, उसके विचार को कैसे खत्म कर दिया है। सामाजिक न्याय सिर्फ किसी जाति तक आधारित नहीं है। वह एक व्यापक नजरिए की मांग करता है। जिसमें महिला, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी प्रकार का वंचित तबका शामिल हैं। सिर्फ अपना-अपना मानकर चलने पर वह उसी जातिवादी अस्मिता में घिर जाएगा, जो उसे धर्म की सकरी गली में लेकर चला जाएगा। जातियां, धर्म से निकली हैं और ऐसी जातियों को समाहित करने का बहुत परिपक्व अनुभव हिन्दुत्वादी राजनीति के पास है।
आभार-
राजीव यादव
द्वारा- मोहम्मद शुऐब (एडवोकेट)
110/46 हरिनाथ बनर्जी स्ट्रीट, नया गांव पूर्व
लाटूश रोड, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मो0- 09452800752


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