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Sunday, October 26, 2014

लोकतंत्र के लिए चुनौती भरे दिन

लोकतंत्र के लिए चुनौती भरे दिन
समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव और मक्का मस्जिद में हुए आतंकवादी हमले की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ, लगभग पांच साल पहले किसी गोपनीय वैठक में अपनी तस्वीर के सार्वजनिक हो जाने से चर्चा में रह चुके राजनाथ सिंह एक बार फिर गलत कारणों से चर्चा मे हैं। बेशक इस बार देश के गृहमंत्री के बतौर, जिन्हें पिछले दिनों तिरुअनन्तपुरम में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता संतोष ने सार्वजनिक तौर पर पगड़ी पहनाई। इसकी तस्वीरें देश भर के अखबारों में छपी हैं। संतोष पर 2008 में मााकपा के युवा संगठन डीवाईएफआई के कार्यकर्ता विष्णु की हत्या का आरोप है और इन दिनों वह जमानत पर छूटा है।
इस विवाद से कुछ अहम सवाल उठने लाजिमी हैं जो मौजूदा केन्द्र सरकार की वैचारिक और कार्यनीतिक दिशा का भी आभास करा देते हैं। मसलन हत्या जैसे गंभीर मामले के आरोपी का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह देश के गृहमंत्री तक सार्वजनिक तौर पर पहुंच जाए, उनके सर पर पगड़ी पहनाए और तस्वीरें खिंचवा ले? जबकि गृहमंत्री को जेड प्लस की सुरक्षा मिली हुई है। उनसे किसी अहम शक्सियतों को मिलने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। तो क्या यह गर्म जोशी भरी मुलाकात इसलिए संभव हो सकी कि राजनाथ सिंह और संतोष दोनों एक ही मातृ संगठन आरएसएस से जुड़े हैं? बहुत हद तक संभव लगने के बावजूद सामान्यतः ऐसा नही होता। क्योंकि किसी संगठन या पार्टी से जुड़े लोगों के संवैधानिक पदों पर पहुंच जाने के बाद अमूमन उनकी तरफ से ही संवैधानिक और सांगठनिक के फर्क को बरता जाता है। और वो अपने को संविधान के प्रति जवाबदेह मानता है न कि अपने संगठन के प्रति।
इसीलिए, प्रधानमंत्री या कोई भी मंत्री देश का प्रधानमंत्री या मंत्री होता है। अपनी पार्टी या संगठन का नही। इसलिए इन पदों पर पहुंचने वाले लोग अपने संगठन से जुड़े हत्या जैसे जघन्यतम अपराध के आरोपियों से सार्वजनिक रूप से मिलने से बचते हैं। यह दिखाने के लिए ही सही, लेकिन एक अच्छी परंपरा रही है।
इसलिए हत्या आरोपी संघ कार्यकर्ता के हाथों पगड़ी पहनना और मुस्कराते हुए फोटो खिंचवाना, इन दोनों के एक ही संगठन से जुड़े होने के कारण ही संभव नही हो सकता। यह तभी संभव है जब गृहमंत्री संवैधानिक और सांगठनिक के बीच के भेद बरतने की हमारी लोकतांत्रिक परंपरा से असहमत हों। वे दोनों के बीच के अंतर को मिटा देना चाहते हों।
दरअसल, सरकार के ऊंचे पद पर बैठे लोगों के सोचने के नजरिए में आया यह छोटा लगने वाला बदलाव, वह सबसे अहम बदलाव है जिसे देश सोलह मई के बाद से ही यानी चुनाव परिणामों के घोषित होने से ही महसूस कर रहा है। यह बदलाव सिर्फ किसी एक मंत्रालय तक सीमित नहीं है। इसकी अभिव्यक्ति पूरे देश में हम महसूस कर सकते हैं, जहां संविधान की शपथ लेकर बनी सरकार को संघ परिवार, जिसका साहित्य भारतीय संविधान को पश्चिमी, आधुनिक और अपशकुनबताता रहा है, और उसके दूसरे अनुवांशिक संगठनों बजरंग दल और विहिप में रूपान्तरित होते हुए देखा जा सकता है। जहां संविधान के कस्टोडियन यानी जमानतदार न्यायपालिका को अपने हिसाब से ठीककिया जा रहा है।  जहां किसी अमित शाह के किसी हत्याकांड के मुकदमे में अदालत में पेश न होने पर वजह पूछने वाले जज को रातों-रात स्थानांतरित कर दिया जाता है। या फिर किसी प्रतिष्ठित पत्रकार को संघ की सांस्कृतिकविचारधारा में आकंठ डूबे गुंडों द्वारा सरेआम पीट दिया जाता है। लेकिन इन तमाम घटनाओं पर हम आज तक नही जान पाए कि सरकार की सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग क्या सोचते हैं? वे अपने गुरू भाइयोंकी करतूत से सहमत हैं या असहमत? सार्वजनिक तौर पर असहमतिजता देने और अंदर ही अंदर उनकेे साथ खड़ा होने की रणनीतिक मजबूरी जो पिछले गठबंधन वाली एनडीए सरकार में बनी रहती थी, उसे भी उन्होंने तिलांजलि दे दी है?
इन सब मसलों पर हम कुछ भी नही जानते, क्योंकि सरकार की ऊंची कुर्सियां मीडिया से बात नही करतीं। वे एक तानाशाही निजाम की तरह सिर्फ बोलती दिख रही हैं। वह भी सिर्फ एकल माध्यमों जैसे ट्वीटर पर। यानी एक भयानक तरह की चुप्पी है, जो साजिशी और सुनियोजित लगती है। उसमें एक खतरनाक किस्म की सड़ांध हैं। इसे छह दशकों के लोकतंत्र के तमाम बुरे अनुभवों के बावजूद पहली बार ही बिल्कुल स्पष्ट महसूस किया जा रहा है।
लेकिन ऐसा नही है कि वे सिर्फ अराजकतावादियों की तरह परंपराओं को नष्ट कर रहे हैं। वे नया गढ़ भी रहे हैं। जो उनके स्पष्ट फासीवादी प्रवृत्ति और एजेंडे को पुख्ता करता है। इसीलिए हम पाते हैं कि सरकार के बजाए संघ प्रमुख और उनके लोग खुलकर मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं, जो वे अपने को पहले सिर्फ एक सांस्कृतिकसंगठन होने के तर्क के साथ करने से बचते थे। यानी अलोकतांत्रिक तरीके से चलने वाला संगठन संघ परिवार देश की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया है। वह एजेंडा तय कर रहा है कि कौन भारतीय है, इतिहास की पुस्तकों में क्या पढ़ाया जाना चाहिए और किन्हे दुबारा हिन्दू बनाया जाना चाहिए। वहीं जनता द्वारा चुने गए लोग या तो प्रधानमंत्री की तरह कार्पोरेट के हरकारोंकी तरह आज दुनिया भर में दौड़ लगा रहे हैं तथा संघ के गुरू भाइयों के जघन्यतम अपराधों को सार्वजनिक तौर पर वैधता दे रहे हैं, गृह मंत्री की तरह।
ये बदलाव इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इससे न सिर्फ पूरा देश सांसत में फंसने जा रहा है बल्कि स्वयं लोकतंत्र के समक्ष भी एक चुनौती उत्पन्न होती दिख रही है। जो जाहिर है भारत के लिए अच्छे दिन नही हैं।
सभार-
गुफरान सिद्दीकी
पता-
द्वारा- एडवोकेट जबीहउल्ला
पहाड़गंज, घोसीयाना
फैजाबाद- 224001
मो-09335160542

    

लव जिहाद’ के झूठ का सच

लव जिहादके झूठ का सच
मेरठ का खरखौदा सामूहिक बलात्कार और धर्म परिवर्तन मामला, जिसे लव जिहादका नाम दिया गया, के झूठे होने की बात सामने आ रही है। पीड़िता ने खुद ही पुलिस के पास जाकर यह बयान दिया है कि न तो उसका अपहरण और बलात्कार किया गया था और न ही उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया था। बल्कि, वह अपनी मर्जी से दूसरे समुदाय के अपने प्रेमी के साथ गई थी। उसने अपने परिवार से ही जान का खतरा होने की शिकायत दर्ज कराई है। उसने यह भी बताया कि घरवालों को नेताओं से पैसे मिलते थे जो कि अब बंद हो गए हैं। ऐसे में उससे पूछा जाता था कि आखिर अब पैसा क्यों नहीं आ रहा? इस वजह से घरवाले उसके साथ मारपीट भी करते थे और उसे जान से मारने की साजिश भी रच रहे थे। इसलिए, वो घर से चुपचाप भाग आई है। वहीं एक न्यूज चैनल ने सात अगस्त 2014 को भाजपा के व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष विनीत अग्रवाल द्वारा पीड़ित लड़की की मां को पैसे देने की बात कहते हुए भाजपा को सवालों के घेरे में ला दिया है। अब आरोप और सबूत दोनों भाजपा को आईना दिखा रहे हैं। अब देखना है, सपा सरकार को कि क्या वह लव जिहादके नाम पर पीड़िता के परिजनों को पैसा देकर झूठा मामला बनाने वाले सांप्रदायिक नेता के खिलाफ कोई कार्यवाई करने की वह हिम्मत करती भी है या नहीं? इस झूठे आरोप में फंसाए गए मुस्लिमों, जिनकी देश की जेलों में आबादी से ज्यादा संख्या होने की नियति हो गई है, को अगर ताक पर रख भी दिया जाए तो क्या इस सवाल को आधार बनाकर पूरे मुस्लिम समुदाय और मदरसों पर जो आरोप लगाए गए थे, वह खत्म हो गए? यह एक बड़ा सवाल है?
तो वहीं, खरखौदा प्रकरण को लेकर जिन हिन्दुत्ववादी संगठनों ने लव जिहादका माहौल बनाकर इसे अन्र्तराष्ट्रीय साजिश करार दिया था, के मकसद की तफ्तीश अनिवार्य हो गई हैं। पूरे प्रकरण को उनके द्वारा दिखानेका और उसे हलकरने का क्या नजरिया था? ऐसा इसलिए कि इस प्रकरण की सच्चाई जो पहले भी सामने थी और आज भी है, से समाज में जो विघटन हुआ, उसे जोड़ना इतना आसान नहीं होगा। क्योंकि निर्मार्ण एक धीमी गति से चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है और विघ्वंस एक तीव्र आक्रोश की प्रतिक्रिया है। यह हमारे समाज के हर उस ढांचे को नेस्तानाबूत कर देना चाहती है, जो हमें जोड़ती है। यहां हिन्दुओं की बड़ी चिंताकरने वाले विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों से सवाल है कि अगर वे इस षडयंत्र में नहीं शामिल हैं तो हिन्दू धर्म की एक लड़की को मोहरा बनाकर उसे बदनाम करके राजनीति करने वाली भाजपा के खिलाफ क्या वह जाएगी? बहुसंख्यक हिन्दू समाज को बरगलाने वाले इन संगठनों की मांगों पर गौर करें तो इनकी सांप्रदायिक जेहनियत का पता चल जाएगा कि यह हिन्दू लड़कीको न्याय नहीं बल्की मुस्लिम समाज को उत्पीड़ित करने के लिए ऐसा कर रहे थे।
विश्व हिंदू परिषद ने पीड़िता को हिन्दू अध्यापिकाकहते हुए महिला उत्पीड़न की घटना को सांप्रदायिक रुप दिया। वहीं मदरसे में मौलवियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए, देशभर के मदरसों पर छापा मारकर खोई लड़कियों को तलाश करने की मांग की। ऐसा माहौल बनाया जैसे पूरे देश में जिन लड़कियों का अपहरण हो रहा है, उसके लिए मुस्लिम समाज और मदरसे ही जिम्मेदार हैं। विश्व हिंदू परिषद के अन्र्तराष्ट्रीयअध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने और आगे बढ़कर मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर व अन्य ऐसे मदरसों पर ताला लगाने की मांग करते हुए कहा कि मदरसे जिस इस्लामिक मूल संगठन से जुड़े हैं, उनके प्रमुखों और इन मदरसों के सभी मौलवियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। बजरंग दल ने मदरसों को बदनाम करने के लिए अफवाह फैलाई की चार और हिंदू लड़कियों की बरामदगी मदरसे से हुई।
विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने लव-जिहादसे लड़ने के लिए मेरठ बचाओ मंचतक का गठन कर दिया। हर बात के लिए इस्लाम को दोष देने वाले इन संगठनों ने इसे अन्र्तराष्ट्रीय साजिश करार देते हुए कहा कि मेरठ की हिन्दू अध्यापिकाअकेली इस गैंग की शिकार नहीं है। हिन्दू लड़कियों के साथ मदरसों में सामूहिक बलात्कार किया जा रहा है और उन्हें जबरन मुसलमान बनाकर अरबी शेखों के लिए दुबई भेजा रहा है।
सिर्फ यूपी के मदरसों में ही ऐसे जिहादी गुनाहहोते हैं ऐसा नहीं है, कहते हुए पूरे देश में लव जिहादका माहौल बनाया गया। विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाईन ने दावा किया कि केरल, तमिलनाडु, आंध्र, महाराष्ट्र, बंगाल समेत पूरे देश से उनके पास शिकायतें है। ऐसे में भारत का केंद्रीय गृह विभाग ऐसे मामलों में गंभीरता से संज्ञान लेकर देश के सभी मदरसों की तलाशी ले और ऐसी लड़कियों को मुक्त कराए।
बची-खुची कसर संचार माध्यमों ने घटना का नाट्य रुपांतरण कर पूरी कर दी। और हां कई ने तो नाट्य रुपान्तरण कर लव जिहादियोंके स्टिंग करने का दावा करते हुए, खूब टीआरपी बटोरी। चेहरे पर हल्की दाढ़ी दिखाते हुए, कैमरा उसके होठों पर जूम हो जाता और वह बताने लगता कि वह एक मुसलमान है। पर वह अपना हिंदू नाम बताता है और हिंदू लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसाने के लिए कलावा बांधे हुए हैं, ऐसा वह एक साजिश के तहत कर रहा है। इस तरह से अफवाह वाले कार्यक्रम और पीड़ित लड़कियों के फर्जी नाट्य रुपान्तरण से समाज में एक दूसरे के प्रति गहरी खाई, टीवी स्क्रीनों ने प्रायोजित की। स्क्रीनों पर चीखती आवाजें जो लव जिहादकी आड़ में एक पूरे समुदाय को हैवान के बतौर पेश कर रही थीं, को भूलना शायद मुश्किल होगा। लड़कियों के गायब होने, मानव अंग तस्करी और अमानवीय सेक्स व्यापार की घटनाओं व आकड़ों को एक सांप्रदायिक नजरिया दिया जा रहा था।
जिस मदरसे ने एक हिन्दू लड़की को आर्थिक सहयोग देने के लिए, बिना किसी धार्मिक भेद-भाव के उसे अध्यापिका के रुप में नियुक्त किया, वही उसका सबसे बड़ा गुनाह हो गया। हिन्दुत्वादी समूहों ने मदरसों के प्रति हीन भावना पैदा करते हुए प्रचारित किया कि ग्रेजुएट होकर भी मेरठ की हिन्दू लड़की को मदरसे जैसे स्थान पर नौकरी ढूंढने जाना पड़ता है। लव जिहादके बहाने वो अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की नीति पर निशाना साधते हुए, इसे बहुंसख्यकों के प्रति दोहरा रवैया बताकर, सांप्रदायिक विभाजन की अपनी रणनीति पर काम करते हैं। लव जिहादकी ओट लेकर अल्पसंख्यक आयोग की तरह हिन्दू मानवाधिकार आयोग की सख्त जरुरतकी बात कही जाने लगी। इसके लिए प्रचारित किया गया कि विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाईन का हिन्दू मानवाधिकार आयोग पहले से है। अब केंद्र सरकार इस आयोग को कानूनन मान्यता देकर उसे कार्मिक और कानूनी अधिकार दे देना चाहिए।
हिन्दू अस्मिता के नाम पर मेरठ बचाओं मंचजैसे संगठनो का निर्माण कर वे एक क्षेत्रिय आक्रामक अस्मितावादी सांप्रदायिकता को भड़काने की फिराक में हैं। खरखौदा प्रकरण की वास्तविकता के बाद वे थोड़ा ठहर भले सकते हैं। पर वे उस सांप्रदायिक जेहनियत के विस्तार में और तेजी लाएंगे, जिसे हमारे समाज में निहित पितृ सत्ता खाद-पानी देती है। वे इसको प्रचारित करेंगे कि एक हिंदू लड़की जो एक मुसलमान के पास चली गई थी को वापस लाने के लिए उन्होंने यह सब किया। जिसका, उनको समाज का रुढ़िवादी ढांचा मौन स्वीकृति देता है। ऐसे में हमें व्यापकता में प्रेम संबन्धों पर अपनी जेहनियत का विस्तार करना होगा। सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर 1857 की साझी शहादत और साझी विरासत की नगरी मेरठ को ठहर कर सोचना होगा, नहीं तो वो उसके इस ऐतिहासिक ढांचे का ध्वसं कर देंगे।
सभार-
राजीव कुमार यादव
 (Freelance Journalist)
C/o Adv. Md. Shoaib
110/46, Harinath Banerjee Street
Latuch Road, Naya Gaon East
Lucknow , UP
Mob. 09452800752
Email- 
rajeev.pucl@gmail.com


Wednesday, October 15, 2014

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा

अस्मितावादी चासनी में पिछड़ा
पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिवंगत भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे को मुख्यमंत्री बनाने का संकेत यह कहते हुए दिया कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम पंकजा के नेतृत्व में सभी पिछड़ी जातियों के लिए न्याय पाने का कार्य जारी रखेंगे। भाजपा पंकजा को मुख्यमंत्री बनाने जा रही है या नहीं इस बात से ज्यादा इस बात की तह में जाने की जरुरत है कि वह पिछड़ी जातियों को जो न्याय दिलाने की बात कह रही है उसकी परिभाषा क्या है? क्योंकि यह हो सकता है कि मुंडे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने के बाद उनकी बेटी चुनाव में आएं और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की बात करें। जिस विरासत में भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा भी निहित है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भाजपा के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद हिंदू राष्ट्र की जो बातें कहीं जा रही हैं, उसमें पिछड़ों को क्या न्याय मिलेगा, इसका विश्लेषण किया जाए। 
अमित शाह ने जिस तरह कहा कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग के एक शख्स को प्रधानमंत्री बनाया इसलिए उनकी सरकार की एक प्रमुख नीति पिछड़े वर्गों के लिए काम करने की है और आने वाले दिनों में वे महाराष्ट्र में भी इस नीति को आगे बढ़ाएंगे। तो ऐसे में पिछड़े वर्ग को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि चार महीने जिस मोदी सरकार को हो चुके हैं उसने उनके लिए क्या किया? रही बात महाराष्ट्र की पहली महिला मुख्यमंत्री या पहली महिला पिछड़े वर्ग की मुख्यमंत्री बनने की तो इस अस्मितावादी खोल से बाहर आकर सोचने की जरुरत है। क्योंकि महाराष्ट्र में मात्र 10 प्रतिशत महिला उम्मीदवरों को टिकट मिले हैं और उसमें भी कांग्रेस ने 27 को तो भाजपा ने सिर्फ 21 महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है।
सवाल यहां विचार नहीं अस्मिता का है, जिसको भाजपा एडेªस करके चुनावी लाभ लेना चाहती है। क्योंकि पिछड़े वर्ग के न्याय का विचार, सामाजिक न्याय का विचार है, भाजपा जिसके खिलाफ है। आज बृहदहिन्दुत्व के अंदर सभी प्रकार के वंचित समाज को समाहित करने की प्रक्रिया में वह इसे छुपा रही है। इतिहास से पिछड़े समाज को सबक लेने की जरुरत है कि यह वो नहीं है जिसको यह बता रही है। जिन पिछड़े वर्ग के शख्स को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही जा रही है उनके गुजरात मॉडल के इतिहास को जानने की आवश्यकता है, जहां भाजपा और दीगर भगवा संगठनों ने आरक्षण का विरोध किया है। संघ परिवार और उसके संगठन विद्यार्थी परिषद ने गुजरात के शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाया, यह बात किसी से छुपी नहीं है। अहमदाबाद जैसे शहरी इलाके को भी हिंसक विरोध का ठिकाना बनाया गया। शहरों, कस्बों के अलावां उन्नीस में से अट्ठारह जिलों में आरक्षण विरोधियों ने हिंसा की।
भाजपा को पिछड़ों से कोई परहेज नहीं है, उसे बस अपने सांप्रदायिक-गैर बराबरी वाले एजेण्डे को आगे बढ़ाने वाला चाहिए। चाहे वह दलित हो या फिर पिछड़ा। क्योंकि उसने यह देख लिया है कि जब तक वह एक शहरी और सवर्णवादी पार्टी बनकर रही तब तक उसे चुनावी प्रक्रिया में उतनी सफलता नहीं मिली जितनी उसने दलितों और पिछड़ों को जोड़कर अर्जित किया। पर यहां पिछड़ों को सोचने की जरुरत है कि जो भाजपा उनके प्रति इतनी लचीली हो गई है, समय-समय पर वह और उससे जुड़े संगठन कैसे आरक्षण का विरोध करने लगते हैं?
2006 के दौरान जब उच्च शिक्षा में आरक्षण का सवाल उभरा था तो यूथ फॉर इक्यूलिटी नाम के एक संगठन का प्रार्दुभाव हुआ। समानताकी बात करने वाला यह युवातब जागा जब सरकार ने 27 प्रतिशत पिछड़ों को उच्च शिक्षा में आरक्षण देने की बात कही। जिसमें 20 केन्द्रिय विश्वविद्यालय और एम्स व जिपमर जैसे 9 प्रिमियर मेडिकल कॉलेज शामिल थे। यह संगठन भारत में सभी तरह के जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण का विरोधी था। इस संगठन के प्रणेता शिव खेड़ा ने 2008 में इन्हीं विचारों के आधार पर भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी के गठन का ऐलान किया था। जाति और धर्म आधारित आरक्षण खत्म करने तथा तुष्टीकरणको समाप्त करने की मुहिम छेडने के साथ, वह देश की अखंडता के साथ खिलवाड करने वाली ऐसी ताकतों का किसी भी कीमत पर विरोध करेंगे ऐसा उन्होंने आहवान किया। श्री श्री रविशंकर ने भी खेड़ा को बधाई दी। अगर हम गौर करें तो ठीक ऐसी ही मिलते-जुलते प्रयोग स्वामी रामदेव ने भी किए जिसके मूल में आरक्षण विरोध निहित था।
हिन्दुत्वादी संगठनों ने वक्ती जरुरतों के अनुसार अपने को बदला है। वह दलित-पिछड़ों की अस्मिता जो छुआछूत या बराबरी के विचार तक सीमित है को कृत्रिम तरीके से हल कर अपने एजेण्डे में उनको सहयात्री बनाने की फिराक में रहती है। इसीलिए समय-समय पर धर्म या जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने की जो वह बात करती है, खुद को पर्दे के पीछे रखकर, खेड़ा-रामदेव जैसों का सहरा लेकर करती है। 2014 लोकसभा चुनावों में रामदेव को तो हर किसी ने इनके साथ देखा ही है, शिव खेड़ा ने भी भाजपा का प्रचार किया था। यह बहुत अन्र्तविरोधी बात है, एक तरफ मोदी ने अपने को पिछड़ा और राजनीतिक अछूत के रूप में पेश करते हुए यह ऐलान भी किया कि आगामी दशक पिछड़े समुदायों के सदस्यों का दशक होगा, वहीं दूसरी तरफ पिछड़ों के आरक्षण विरोधी उसके प्रचारक भी थे।यह अन्र्तविरोध साफ करता है कि भाजपा प्रोपोगंडा के बतौर पिछड़ों का इस्तेमाल कर रही है।
2013 में यूपी में त्रिस्तरीय आरक्षण को लेकर चले आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने आरक्षण विरोधियों का नेतृत्व किया, जिसमें भाजपा के विधायकों समेत अनेकों पदाधिकारी मौजूद रहते थे। वहीं आरक्षण समर्थकों के साथ अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। अब अगर उस पूरे आंदोलन की समीक्षा करें तो भाजपा ने अनुप्रिया के साथ गठबंधन करके न सिर्फ अपनी सीटें बढ़ायीं, बल्कि उन आरक्षण समर्थकों को भी साथ ले लिया। इसके लिए सिर्फ भाजपा को दोष देने से ज्यादा पिछड़े वर्ग को खुद में झांकना होगा कि उसके हक-हुकूक की लड़ाई में उसके अस्मितावादी लालच ने, उसके विचार को कैसे खत्म कर दिया है। सामाजिक न्याय सिर्फ किसी जाति तक आधारित नहीं है। वह एक व्यापक नजरिए की मांग करता है। जिसमें महिला, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी प्रकार का वंचित तबका शामिल हैं। सिर्फ अपना-अपना मानकर चलने पर वह उसी जातिवादी अस्मिता में घिर जाएगा, जो उसे धर्म की सकरी गली में लेकर चला जाएगा। जातियां, धर्म से निकली हैं और ऐसी जातियों को समाहित करने का बहुत परिपक्व अनुभव हिन्दुत्वादी राजनीति के पास है।
आभार-
राजीव यादव
द्वारा- मोहम्मद शुऐब (एडवोकेट)
110/46 हरिनाथ बनर्जी स्ट्रीट, नया गांव पूर्व
लाटूश रोड, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मो0- 09452800752


Saturday, October 4, 2014

कचरे में पलती जिंदगियां......... और गांधी का स्वच्छ भारत

कचरे में पलती जिंदगियां......... और गांधी का स्वच्छ भारत






स्वच्छ भारत की संकल्पना हमारे प्रधानमंत्री जी ने की, पर गंदगी तो कहीं से न तो साफ हुई न तो साफ होती दिखी। गंदगी जस की तस बनी ही रही। हां यह और बात है कि छायाचित्रों में आने के लिए इन कर्मचारियों, नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। वैसे सफाइ्र करते हुए इनकी तस्वीरे बड़ी उम्दा किस्म की आई जैसे मानों सच में सफाई कर रहे हो। क्यों उम्दा नहीं आती, बकायदा कैमरा मैन बुलाए गए थे तस्वीरों को लेने के लिए............ ताकि उनका मीडिया में महीमा मंडन करवाया जा सके। और उनकी यह साजिश मीडिया ने कामयाब भी की..............छाप दी, चला दी.....मीडिया में....... झांडू के साथ उनकी तस्वीरें ताकि लगे की वो वास्तव में इस देश से गंदगी दूर करना चाहते हो। गंदगी साफ करनी है तो अपने घर के बाहर साफ कीजिए जहां हर रोज आप अपने घर को साफ करके कचड़ा फेंक देते हैं। गंदगी साफ करनी है तो अपने दिल को साफ करें जिसमें न जाने किस-किस प्रकार के कचड़े कई वर्षों से पड़े-पड़े सड़ रहे हैं। जिनमें पता नहीं कब से बू आ रही है। गंदगी साफ करनी है तो देश से अमीरी गरीबी का भेद मिटा कर करें जो सबसे बड़ी गंदगी को जन्म देती है। गंदगी साफ करनी है तो भूख को मिटा कर करें जो हर एक जुर्म का जन्म देती है।

अगर वास्तव में गांधी के सपना को मोदी पूरा करने चाहते थे तो उन मासूम बच्चों के बारे में भी जरा सी फिकर कर लेते जो कचरे में अपनी जिंदगी गुजार देते हैं, एक निवाले के खातिर। जरा सा आप लोग भी सोचिए.......अगर खुद से समय मिल जाए तो.......सिर्फ जरा सा..........  चंद तस्वीरे आप साझा कर रहा हूं। यह तस्‍वीरे 2 अक्टूबर के दिन सेवाग्राम रेलवे स्‍टेशन पर रेलवे कर्मचारियों एवं स्‍थाई नेता द्वारा सफाई का दिखावा करते तथा उसी दिन ट्रेन में बच्‍चों द्वारा मांगी जा रही भींख की कुछ तस्‍वीरें खींची थी। जिससे अंदाजा लगा सकते हैं कि सफाई कहां होनी चाहिए थी......?????????

Thursday, May 1, 2014

नीले गगन के तले, झांडियों में प्‍यार पले..........

नीले गगन के तले, झांडियों में प्‍यार पले..........

प्‍यार....प्‍यार....प्‍यार कौन सा प्‍यार और कैसा प्‍यार................. तितली वाला या फूल वाला, नदी वाला या समुंदर वाला, चांद वाला या चांदनी वाला, धूप वाला या छांव वाला, दोस्‍त वाला या दुश्‍मन वाला, भूख वाला या दौलत वाला, रूह वाला या जिस्‍मानी......प्‍यार को अपने-अपने अनुसार परिभाषित किया जा सकता है। अलग-अलग जगहों पर परिस्थिति के अनुकूल। अलग-अलग परिस्थितियों के अनुरूप यह अपनी मूल विधा से उन्‍मुक्‍त होकर हर बंधन से परे चला जाता है। जहां इसका अस्तित्‍व वक्‍त और स्थिति के साथ स्‍वत: बदल जाता है। आज के दौर में बदलना ही इसकी नियति है। इस नियति में बदलाव के पीछे नैतिकता के पतन और जल्‍द जवां होती चाहत को मान सकते हैं क्‍योंकि नैतिकता के पतन और जल्‍द जवां होने की चाहत ने प्‍यार के वास्‍तविक मायने ही बदल दिए। आज प्‍यार आंखों से तो शुरू होता है पर दिल की गहराईयों में न उतरते हुए, झांडियों के झुरमुट में अपना दम तोड़ देता है। इस प्‍यार को रूहानी प्‍यार की संज्ञा तो कभी नहीं दी जा सकती,  हां इसके क्रियाकलापों को देखते हुए इसे जिस्‍मानी प्‍यार का दर्जा अवश्‍य दिया जा सकता है। जो पल-पल बदलते समय के साथ अपनी स्थिति बदलता रहता है। कभी इसकी बांहों में तो कभी उसकी बांहों में....... पनपता रहता है। एहसास नहीं होता इनको, क्‍योंकि यह लोग भावनात्‍मक बंधनों से पहले ही मुक्‍त हो चुके होते हैं। इनके बीच एक प्रकार का अदृश्‍य अनुबंध, जिसमें जब तक मन हो प्‍यार की पेंगे भरी जा सकती हैं और यदि किसी एक का मन उचटा नहीं, कि अनुबंध स्‍वत: ही खत्‍म। खत्‍म हुए इस अनुबंध पर चाहे तो आपसी संबंधों की सहमति के आधार पर कुछ समय के उपरांत पुन: अपनी स्‍वीकृति प्रदान कर सकते हैं, नहीं तो किसी अन्‍य के साथ अनुबंध करने की आजादी उनके पास हमेशा ही रहती है। यह युवा पीढ़ी का धधकता हुआ युवा जोश है, जो विकास के नए नमूने को यदाकदा इजाद करता रहता है। वैसे हमारे वैज्ञानिकों ने प्‍यार के मिलाप से उत्‍पन्‍न होने वाली झंझट से इस जवां पीढ़ी को बेफ्रिक कर दिया है। शायद वो युवा जोश को पहले ही भांप गए थे कि आने वाली पीढ़ी किस तरह अपना रंग बदलेगी। तभी तो गली-गली हर कूचे में बेफिक्री की दवा आसानी से उपलब्‍ध हो जाती है। यह प्‍यार को बरकरार रखने के तरीके और किसी अन्‍य प्रकार की झंझट से मुक्ति का आश्‍वासन अवश्‍य ही जवां चाहतों को दिला पाने में सक्षम है। क्‍योंकि प्‍यार के मायने बदल गए हैं......
आज प्‍यार का ढांचा खोखली नींव पर खड़ा किया जाता है या होने लगा है। उसमें भी मिलावट देखने को मिलने लगी है। क्‍योंकि यह झांडियों वाला प्‍यार है, अब यह पतंगों वाला प्‍यार नहीं रहा। अब तो यह दुपट्टें में छुपी अंतरंग अवस्‍था का वो कपड़े उतारू प्‍यार, सामाजिक मान-मर्यादा से परे, बंदर-बंदरियों सी हरकते करते हुए समाज को अपनी मोहब्‍बत का तमाशा दिखाते रहते हैं कि आओं देखों हमारी नग्‍नतापूर्ण मोहब्‍बत को, जिसे हम खुले आम बाजार में नीलाम कर रहे हैं। यह प्‍यार तो नहीं है पर प्‍यार जैसा प्रतीत कराने की वो नाकाम कोशिशें जिन्‍हें यह जवां जोड़े समाज पर थोपने का काम बखूबी कर रहे हैं। हां यह कुछ समय बाद हमारी रंगों में खून बनकर जरूर दौड़ने लगेगा। और हमारी आने वाली नई जवां पीढ़ी भी इस नैतिकता को और अधिक ताख पर रखकर खुलआम सड़कों पर अपनी जिस्‍मानी जरूरतों की पूर्ति करते हुए देखे जा सकेंगे।
अगर यह कहा जाए तो गलत नहीं होना चाहिए कि भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में प्‍यार ने नैतिकता का हनन पश्चिमी सभ्‍यता से भलीभूत होकर ही किया है। क्‍योंकि तमाशबीन प्‍यार भारतीय सभ्‍यता में कभी नहीं रहा। हां यह प्‍यार लुकछिप के भारतीय संस्‍कृति में हमेशा से फल फूलता रहा है, पर नग्‍नता से विमुक्‍त होकर। परंतु जिस तरह पश्चिमी संस्‍कृति में नंगापन अपने पुरजोर पर हावी है उसी नंगेपन के जहर ने भारतीय युवा वर्ग को भी अपनी चपेट में भी लिया है। नंगेपन के जहर की चपेट में आए युवा वर्ग से यह बात तो अवश्‍य ही साबित होती है कि भारतीय युवा वर्ग सकारात्‍मक की अपेक्षा नकारात्‍मक प्रवत्ति को शीघ्र ही आत्‍मसात कर लेते हैं बिना उसके प्रभावों को समझते हुए। और वो पश्चिमी संस्‍कृति के समान आजाद होने की ललक के चलते वहां के नंगे प्‍यार का धीरे-धीरे अपनाते जा रहे हैं, तभी तो चार दिवारी से निकलकर यह प्‍यार सड़कों के किनारे बने पार्कों की झाडियों, सुनसान पड़े खंडहरों, खुलेआम पत्‍थरों की जरा सी आड़ में पनपने लगा है।