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Tuesday, February 5, 2013

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आ जा??????


ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आ जा??????
एक व्यक्ति जो कुछ पल पहले तक हमारे साथ हंस बोल रहा था, खा-पी रहा था, उसके होने का एहसास था। और क्षणिक भर में सब कुछ यूं अचानक कैसे बदल जाता है एक हिच्की के साथ? इस अचानक आई हिच्की से दिल की धड़कन थम जाती है, आंखें बंद हो जाती हैं खून का बहाव रूक जाता है, हाथ-पैर काम करना बंद कर देते हैं। और उस जीवित प्राणी के शरीर में दौड़ने वाली ऊर्जा, जिसे हम आत्मा करते हैं शरीर का त्याग कर देती है। यानि जीविन इंसान अब मृत हो चुका है। उस एक हिच्की के साथ सब कुछ पीछे छूट जाता है। मां, बाप, भाई, बहन, पत्नी, बेटा-बेटी, सगे-संबंधी सब बंधनों से एक साथ मुक्ति। यह कैसी मुक्ति। जो कुछ पलों पहले तक हमारे साथ हुआ करता था अब वो नहीं है हमारे बीच। उसका यूं चुपचाप चले जाना इस दुनिया से और छोड़ जाना अपने पीछे परिजनों को रोते बिलखते। उसके जाने की यह असीम वेदना आंखों से और दिल से यूं निकलती है जिससे किसी पत्थर का भी दिल पिघल जाए। उस एक परिजन के बीच से जाने के उपरांत ऐसा प्रतीत होता है मानों उसके रूकसत होते ही हमारे शरीर में जान ही न बची हो। सब कुछ लुट चुका हो, और अब कुछ भी न बचा हो लुटने के लिए। अगर सब कुछ लुटा देने के बाद भी वो शख्स हमारे बीच में पुनः लौट पाता, तो परिजन अपना सब कुछ हंसी-खुशी से लुआ देते। परंतु ऐसा नहीं, ऐसा बार जाने के बाद वहां से कोई सदा लौट कर वापस नहीं आती।
जीवन-मृत्यु के काल चक्र के चक्रव्यूह से कोई भी अछूता नहीं रह सका है। जो इस संसार में एक बार आया है उसे जाना ही पड़ा है। किसी को पहले किसी को बाद में, जाना सभी को है। नियति भी यही कहती है। कि राजा हो या रंक अंत सब का एक सा होता है। यानि मृत्यु??
परंतु किसी की मृत्यु इतनी वेदना क्यों दे जाती है कि उसके जाने के बाद दिल-दिमाग धरातल में आकर ठहर जाता है। वेदना, चीखें, दुख के बादल अपने आप बरसने लगते हैं। इस दुख की घड़ी में किसी की सांत्वना भी मरहम का काम नहीं करती। क्योंकि वह तो चला जाता है और छोड़ जाता है एक शून्य जिसे कोई भर नहीं सकता। केवल एक ही प्रार्थना निकलती है कि ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आ जा??????

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