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Tuesday, December 18, 2012

बलात्कार के दोषियों को फांसी नहीं- सजा के तौर पर लिंग ही काट देना चाहिए



बलात्कार के दोषियों को फांसी नहीं-
सजा के तौर पर लिंग ही काट देना चाहिए

यह पहला मामला नहीं है बलात्कार का। जिस पर इतना हो-हल्ला मचा हुआ है। अगर बलात्कार की पृष्ठभूमि को देखें तो बलात्कार एक ऐसा जघन्य अपराध है, जो पीड़ित महिला को भीतर तक तोड़ देता है। मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़िता जीते जी मर जाती है। ‘‘सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि एक हत्यारा तो किसी व्यक्ति को केवल जान से मारता है, जबकि बलात्कारी पीड़िता की आत्मा को उसकी स्वयं की नज़रों में गिरा देता है।’’ और जीवन भर उसे उस अपराध की सज़ा भुगतनी पड़ती है जिसे उसने नहीं किया।
बलात्कार की घटना किसी एक क्षेत्र विशेष तक ही सीमित नहीं है। वस्तुतः दुनिया भर की औरतंे बलात्कार का शिकार होती हैं। बलात्कार की घटना अब शहरों की सीमाओं को लांघकर गांव-कस्बों में भी पहुंच गया है। ‘‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ें बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं।इस प्रकार भारत भर में प्रत्येक घंटे दो महिलायें बलात्कारी के हाथों अपनी अस्मत गंवा देती है। लेकिन, आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती। सच्चाई तो यह है कि बलात्कार के अधिकतर मामले थाने तक पहुंच ही नहीं पाते। इसका पहला कारण तो यह है कि पीड़ित स्त्री शर्म के चलते किसी को अपने साथ हुई बदसलूकी नहीं बताती। यदि वह अपने परिवार में इस अपराध को बताती भी है, तो परिवार वाले बदनामी के डर से मामले को घर की चारदीवारी के भीतर ही दबा देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार के बहुत कम मामले ही थाने तक पहुंच पाते हैं। बलात्कार के मामलों का एक शर्मनाक पहलू यह भी है कि केवल अनजान लोग ही बलात्कार नहीं करते, बल्कि परिचित और रिश्तेदारों के द्वारा भी बलात्कार की घटनाओं को अंज़ाम दिया जाता है। पड़ोसी, सहपाठी, शिक्षक और निकट रिश्तेदारों के साथ-साथ सौतेले पिता व भाई भी लड़की को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं। कुछ बलात्कारी मासूम बालिकाओं को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकते।
‘‘केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री ई.के. नयनार ने एक बार कहा था-आखिर यह बलात्कार है क्या? अमेरिका में प्रति मिनट एक बलात्कार होता है। यह चाय पीने के समान सामान्य है।’’ वैसे बलात्कार अधिकतर अनजान/अजनबी लोगों द्वारा किया जाता है, लेकिन अब ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जिनमें किसी परिचित को ही बलात्कार के रूप में पुष्टि की जाती है। इन परिचितों में प्रायः सहपाठी, सहकर्मी, अधिकारी, शिक्षित और नियोक्ता अधिक होते हैं। ‘‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’’ इस आलोक में सेंटर फॉर डेवेलपमेंट ऑफ वीमेन द्वारा किए गए एक अध्ययन से प्राप्त आंकड़े चैंकाने वाले थे। ‘‘रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन 42 महिलायें बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे देश में प्रत्येक 35 वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’’
महिलाओं के सतत विकास के लिए कार्य कर रहे एक गैर सरकारी स्वैचिछक संगठन स्वप्निल भारतद्वारा किए गये एक सर्वेक्षण, जिसमें राजधानी दिल्ली सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग सभी कुल शहरों को शामिल किया गया है, से पता चला कि महिलाओं के साथ बलात्कार या यौन उत्पीड़न के लगभग 71 फीसदी मामले परिवार के इर्द-गिर्द ही शक़्ल अख़्यितार करते हैं। बलात्कार के लगभग 42 फीसदी मामलों को मामा, चाचा अथवा चचेरे या ममेरे भाइयों द्वारा अंज़ाम दिया जाता है। 26 प्रतिशत मामलों में दोषी पारिवारिक मित्र या पड़ोसी होते हैं, जबकि नौकरों व ड्राइवरों द्वारा लगभग 23 फीसदी बलात्कार किए जाते हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल-कॉलजों के अध्यापकों द्वारा भी बलात्कार किए जाते हैं, जिनका प्रतिशत लगभग 10 के आसपास रहता है। इसी प्रकार बलात्कार के लगभग 5 फीसदी मामलों में खास दोस्त, मंगेतर या प्रेमी होते है। सर्वेक्षण का सबसे शर्मनाक तथ्य यह था कि लगभग चार प्रतिशत मामलों में लड़कियों के सगे पिता बलात्कार को अंज़ाम देते हैं।
हालांकि बलात्कार तो बलात्कार होता है चाहे जिस के द्वारा इस कृत्य को अंजाम दिया जाए। मगर हो-हल्ला मचाने से या दोषियों को फांसी की सजा सुनाने से क्या इस अपराध का समाज से खात्मा संभव है? विचार करने वाली बात है। अगर रिपोर्टें उठाकर देखी जाए तो महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों की हकीकत से पूरा भारत वाकिफ है, कि किस प्रकार महिलाओं के साथ अपराध की घटना दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं और यह आंकड़े केवल साल दर साल कागजों की शोभा बढ़ाने और रिपोर्ट तैयार करने के अलावा कोई काम नहीं आते। जिस पर केंद्र हो या राज्य की सरकारें या फिर पुलिस प्रशासन हमेशा मौन बना रहता हैं। शायद इसका एक कारण जो मेरी समझ में आ रहा है कि तरह की घटना इनके परिजनों के साथ घटित नहीं होती। यदि होती तो यह अभी तक गूंगा मशान बने नहीं बैठे रहते। और न ही पूरे मामले में लीपापोती करते।
लीपा-पोती से एक उत्तर प्रदेश की एक घटना याद आ रही है कि कुछ सालों पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के करीबी रहे मंत्री के रिश्तेदार द्वारा बलात्कार का मामला सामने आया था जिसकी पुरजोर तरीके से साम, दाम सभी से लीपा पोती की गई। और यह भी कहा गया कि कुछ लाख रूपए लेकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाए। यदि रूपयों से ही किसी महिला की इज्जत, उसका सम्मान वापस आ सकता है तो नेताओं को चाहिए कि अपनी बहू-बेटियों को बाजार में उतार दें ताकि रूपयों से उनकी इज्जत का सौदा किया जा सके! मेरी इस तरह की बातों से शायद नेताओं को मिर्ची लग सकती है पर मिर्ची की जलन है बर्दास्त तो करनी पडे़गी।
इनके साथ-साथ इस तरह की घटना महिला अधिकारों की रक्षा के लिए बना महिला आयोग पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है कि अधिकारों की लड़ाई और हक की बात करने वाला यह आयोग कहां तक अपने कार्यों को अंजाम देने में सक्षम हो पा रहा है। आंकड़ों की लिस्ट इनकी खुद ब खुद पोल खोल रही है।
आज सड़क से लेकर संसद में हुए बवाल और दोषियों को फांसी की सजा दिए जाने की बात, क्या पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए काफी है? नहीं कदापि नहीं। बलात्कार के दोषियों को फांसी देने के वजह उनका लिंग काट देना चाहिए और उनके माथे पर लिख देने चाहिए कि मैंने बलात्कार किया था और सजा के तौर पर मेरा लिंग काट दिया गया। इससे विकृत मानसिक प्रवृत्ति के लोग किसी नारी की आबरू को तार-तार करने से पहले 100 बार नहीं, लाख बार जरूर सोचेंगे कि बलात्कार की सजा सात साल या फांसी नहीं सीधा साफाया ही है।

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