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Sunday, October 7, 2012

भारत में भाषा समस्या


भारत में भाषा समस्या
किसी राष्ट्र के अनिवार्य घटकों में से एक एकसमान भाषा विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम एवं एकता के बल के रूप में उपयोगी एवं सुविधाजनक होती है। एक समान बोली में आत्मीयता एवं गहरे बंधन का भाव जगता है। ऐसा प्रायः देखा गया है कि भारत बिना किसी राष्ट्रीय भाषा का एक कोलाहल है। यह तथ्य यथार्थ से कोसों दूर है। भारत एक विशाल देश-लगभग एक महादेश के समान है जिसमें कई जातियों एवं समुदायों के लोग रहते हैं जिनकी अपनी मातृबोली होती है। इसने अतीत में कुछ एकसमान भाषाओं के माध्यम से विभिन्न वर्गों के लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया है। प्राचीन काल में संस्कृत ने यह भूमिका निभाई तथा इसके बाद प्राकृत भाषा ने कुछ हद तक यह कार्य किया। मुस्लिम काल के दौरान, विशेषकर मुगल काल में, फारसी पूरे देश की आधिकारिक भाषा बन गई, जबकि फारसी और हिंदी भाषा से उत्पन्न उर्दू आम लोगों की भाषा हो गई। समयांतराल में उर्दू ने आधिकारिक भाषा का स्थान ले लिया।
भारतीय परिदृश्य पर अंग्रेजों की उपस्थिति के बाद सारी बातें बदल गई। अपने शासन को सुगठित करने के लिए उन्होंने अंग्रजी भाषा शुरू की तथा वर्ष-दर-वर्ष अंग्रेजी काफी लोगप्रिय हो गई। इस भाषा ने उर्दू एवं अन्य मातृभाषाओं को उत्तरोत्तर प्रतिस्थापित कर अधिकारिक भाषा का स्थान ले लिया। प्रशासन एवं अन्य आधिकारिक कार्यों के उद्देश्य से अंग्रेजी पूरे देश में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाषा बन गई।
भारत की आंतरिक शक्ति एवं गहरी एकता के मुख्य माध्यमों के रूप में पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय भाषा का शीघ्र विकास करना होगा। हिंदी को हमारी आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है किंतु दुर्भाग्यवश इसे हमारे देशवासियों, विशेषकर दक्षिण भारत के हृदय में स्थान नहीं मिला है। वास्तव में अधिकारिक एवं शैक्षणिक माहौल में अंग्रेजी का हिंदी द्वारा प्रतिस्थापन से एक कटु एवं दूखद विवाद उत्पन्न हो गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पांच दशक से अधिक समय के बीत जाने के बाद भी हमें अभी ऐसी भाषा का विकास करना है जो समाज के सभी वर्गों द्वारा एक राष्ट्रीय भाषा के रूप में गर्मजोशी से स्वीकार्य हो। इसलिए भाषा समस्या का मूल प्रश्न वैसी भाषा का पता लगाना है जो समग्र राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए।
हिंदी की वकालत करने वालों का तर्क है कि यह भाषा देश के बहुत बड़े क्षेत्र में बोली एवं समझी जाती है जबकि अंग्रेजी अंग्रेज उपनिवेशक शासनों द्वारा थोपी गई भाषा है। उनकी दलील है कि हमारी अपनी समृद्ध एवं सुविकसित अखिल भारतीय भाषा, अर्थात् हिंदी की तुलना में अंग्रेजी का प्रयोग हमारे देश के आत्म-सम्मान की दृष्टि से असंगत है। दूसरी तरफ डाॅक्टर एवं इंजीनियर जैसे उच्च शिक्षित एवं कुशल व्यावसायिक लोगों का तर्क है कि विदेशी शासन की बुराइयों के बावजूद अंग्रेजी भाषा ने भारतीय राष्ट्रवाद के विचार की उत्पत्ति की तथा राष्ट्रीय भावनाओं के विकास एवं स्वतंत्रता प्राप्ति में सहायता की। उनकी दलील है कि अंग्रेजी उच्च शिक्ष, प्रौद्योगिकी तथा वैज्ञानिक अनुसंधान का साधन है तथा इसमें किसी प्रकार के व्यवधान की कोशिश हमारी शिक्षा को नुकशान पहुंचाना होगा तथा आधुनिक युग के सभी क्षेत्रों में देश को पीछे धकेलता है। तीसरे समूह का मानना है कि समान रूप से विकसित तथा संबंधित क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखने वाली विविध भाषाओं को संबंधित क्षेत्रों की राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता देनी चाहिए और हिंदी या अंग्रेजी की आवश्यकता नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को समान आदर मिलना चाहिए।
अंग्रेजी की भूमिका की प्रशंसा के लिए संपूर्ण कार्यबोध होना आवश्यक है। दो सौ वर्षों से अधिक समय से अंग्रेजी देश में प्रांत एवं केंद्र स्तर पर आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित है। यह उच्च शिक्षा, प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा उद्योग एवं वाणिज्य का माध्यम रही है। इस काल के दौरान मानव के विचारों, आविष्कारों एवं संगठनों में बड़े एवं क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। वहीं ब्रिटेन एवं अमेरिका इन परिवर्तनों के मुख्य केंद्र है और उनकी भाषा अंग्रेजी सभी आधुनिक विकास के लिए सर्वाधिक समृद्ध एवं सक्षम माध्यम है। अंग्रेजी शासन के दौरान संपूर्ण भारत को प्रशासन एवं व्यावसायिक उद्देश्य के लिए 1833 में अंग्रेजी भाषा को स्वीकार करके एकभाषी राष्ट्र में परिवर्तन कर दिया गया था। इसने अंग्रेजी को एक विशिष्ट शक्ति एंव महत्त्व प्रदान किया।
भारत में भाषाई समस्या काफी गंभीर हो गई है। संपूर्ण देश के लिए एकसमान भाषा की भावना को त्यागना ही शायद सर्वोत्तम उपाय है तथा अधिक गंभीर समस्याओं पर एकाग्रचित होकर ध्यान देना चाहिएं क्षेत्रीय भाषाएं स्वाधिकार से प्रगति करेंगी। भारतीय सिनेमा के सौजन्य से हिंदी संपूर्ण देश की बोलने की भाषा होगी तथा अंग्रेजी देश की आधिकारिक भाषा के रूप में फलती-फूलती रहेगी चाहे इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए या न किया जाए। इसलिए, हमें साहसपूर्वक एवं ईमानदारीपूर्वक इस कटु सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि अंग्रेजी अपने स्थान पर अटल है तथा इसे भावनात्मक आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता है।

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