सरोकार की मीडिया

test scroller


Click here for Myspace Layouts

Friday, October 26, 2012

समलैंगिकता का समाजशास्त्र


समलैंगिकता का समाजशास्त्र


ब्रिटिश सरकार द्वारा 1860 में बनाई गई भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को भारत में दंडनीय अपराध बनाया गया। धारा 377 के अंतर्गत यह इंगित किया गया कि कोई पुरुष, स्त्री, या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वैच्छया इन्द्रीय भोग नहीं करेगा, यदि वह इन कृत्यों में पाया जाता है तो आजीवन कारावास (जिसकी अवधि दस वर्ष तक की होगी) दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
भारत में इस धारा के अन्तर्गत न केवल पुरुष समलैंगिकता को अपितु किसी स्त्री या पशु के साथ भी अप्राकृतिक मैथुन को अत्यन्त गंभीर अपराध मानते हुए भारी दंड से दंडित करने का प्रावधान है। जबकि ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और अमरीका में इस तरह के अपराधों मानने वाले कानूनों को समाप्त किया जा चुका है।
समलैंगिकता की दृष्टि से देखा जाए तो इसका उद्भव प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में मृत्यु के भयानक तांडव को देखकर पश्चिम के लोग यह सोचकर भोगवादी हो गए कि जब जीवन का कोई ठिकाना ही नहीं है तब फिर नैतिकता को ताक पर रखकर क्यों नहीं जीवन का आनंद लिया जाए? इस सोच ने बड़ी तेजी से वहां के समाज में यौन-स्वच्छंदता को मान्यता प्रदान करने में मदद की। और इसी सोच से जन्म हुआ सार्वजनिक-समलैंगिकता के इस विषवृक्ष का। बेशक कहा जा सकता है कि समलैंगिक व्यवहार पहले भी समाज में प्रचलित था लेकिन ढके-छिपे रूप में, खुलकर समाज में प्रचलन नहीं था।
इस आलोच्य में कहें तो समलैंगिकता भारतीय समाज से निकल कर नहीं आई है। समलैंगिक की पृष्ठभूमि और तौर-तरीके से ही साफ स्पष्ट होता है कि इसकी प्रेरणा यूरोपीय या पश्चिमी समाज से आई है। उनके व्यवहार से साफ प्रतीत होता है कि यह एक ऐसे समाज की देन है जिसमें विषमता और असमानता के ज्यादा बुनियादी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलू लगभग हल कर लिए गए हैं। यह एक ऐसे समाज की समस्या लगती है जो सहज उपभोग से अघाया हुआ समाज है और स्वाभाविक संवेदनों से इतना ऊब गया है कि उसे नित नए और सनसनीखेज उपायों की जरूरत महसूस होती है। यह सनसनीखेज सोच पश्चिमी समाज समलैंगिकों की समानता की लड़ाई लड़ सकता है। परंतु भारतीय समाज में व्याप्त भुखमरी, बेरोजगारी और सब तरह की मजबूरियों में किसी प्रकार जीते हुए रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई लड़ने वाले अधिसंख्य लोग समलैंगिकों की समानता की लड़ाई नहीं लड़ सकते। लेकिन पश्चिमी में भी ईसाइयत ने अगर लैंगिक और मैथुनिक संबंधों पर इतना कट्टर रवैया नहीं अपनाया होता तो वहां भी समलैंगिकों को ऐसा संघर्ष नहीं करना पड़ता।
इस मामले में मीडया पर हुई बहस का विश्लेषण करें तो  वहां पर सवाल कुछ ऐसे ढंग से उठाए गए कि समलैंगिकों और समलैंगिकता का समर्थन करना प्रगतिशीलता और विकसित होने का सबूत हो और जो लोग सहज प्रकृतिक स्त्री पुरुष लैंगिकता का आग्रह कर रहे हों वे पुराणपंथी और पारंपरिक किस्म के घटिया लोग हों। इससे बड़ी मानसिक विकृति कोई हो नहीं सकती। किसी भी सभ्यता संस्कृति ने समलैंगिकता को प्राकृतिक मान कर उसका उत्सव नहीं मनाया.
लेकिन मीडिया इसे कुछ ऐसे पेश करता है जैसे समलैंगिकता को स्वीकार करना विकसित होना है। पश्चिम में यूरोप के विकसित समाज ने इसे मंजूर किया है तो यह निश्चित ही तरक्की की निशानी है। जो कि यूरोपीय समाज का धर्म है वहां के लोगों के मन में समलैंगिकता पर कैसी वितृष्णा भर रखी है और वहां इस वर्जना से मुक्त पाना कैसी स्वतंत्रता है। अगर कहा जाए तो भारत में पहले तो धर्म ही संगठित नहीं है फिर भी स्थानीयता और व्यक्तिमत्तता को बहुलता और विविधता ने खूब अच्छी तरह समो रखा है। ध्यातव्य है कि महाभारत के महावीर अर्जुन को जब पांडवों के वनवास में छद्म रूप में रहना था तो वे बृहन्नला बन कर रहे।
लेकिन मीडिया भारतीयता को भी पश्चिमी और अंग्रेजी रास्ते से ही स्वीकार करता है। और जब तक यूरोप और अंग्रेजी-समलैंगिकता और नपुंसकता की भारतीय समाज व्यवस्था में जगह को परिभाषित नहीं करती तब तक हम उन्हें ईसाइयत की नजर से ही देखते जाएंगे। हमारा यह दृष्टि दोष ही हमें यूरोप के सेकुलरज्म और भारत के सर्व धर्म समानत्व का अंतर नहीं समझने देता। ऊपर मैंने कहा है कि समलैंगिक समानता की भारतीय लड़ाई की प्रेरणा यूरोप में है तो इसीलिए कि मीडिया में भारतीय समलैंगिकता-नपुंसकलिंगता की समझ नहीं है। इसीलिए ऐसे वाक्य लिखे गए कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से भारत का भूमंडलीकरण हो गया और हम उन विकसित देशों की सूची में आ गए जो समलैंगिकता को अपराध नहीं मानते। यह कहने का मतलब यह भी नहीं कि भारतीय समाज समलैंगिकता को स्वीकार करता तो बल्कि भारतीय समाज में भी इसको सदियों से निषेध माना गया है।
जिसके के विरोध में नाज फौन्डेशन इंटरनैशनल नामक संस्था और समलिंगी अधिकारों के लिए काम करने वाले कुछ संगठनों ने पिछले कुछ समय से एक आन्दोलन छेड़ रखा है जिसने एक नयी बहस शुरू की है और जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी चल रही है। नाज फाऊंडेशन इंट. ने भारतीय दंड विधान की धारा 377 को अभियोज्य-अपराधमुक्त decriminalize करने की वकालत की है। और उन्होंने दलीले दी कि;-
·        आपसी सहमती से बनाया गया समलिंगी संबंध व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
·        समलिंगी संबंध प्राकृतिक और सामान्य है।
·        समलैंगिक को अधिकार है एक सामान्य नागरिक की तरह जीने और सुरक्षा का।
·        समलैंगिक एक अल्पसंख्यक समूह हैं।
·        विश्व में कई जगहों पर समलैंगिकता को मान्यता प्राप्त है और ऐसा भारत में भी होना चाहिए
इस विरोध के विपक्ष में गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि भारतीय संस्कृति में समलैंगिक सेक्स की इजाजत नहीं दी जा सकती। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने समलैंगिक संबंधों को अत्यंत ‘‘अनैतिक’’ और ‘‘सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ’’ करार देते हुए इन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने का उच्चतम न्यायालय में कड़ा विरोध किया। मंत्रालय की ओर से पैरवी कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने दलील दी कि भारतीय समाज अन्य देशों से भिन्न है और यह विदेशों का अनुकरण नहीं कर सकता। वहीं दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दो मर्द या औरत अगर अपनी सहमति से बंद कमरे के भीतर समलैंगिक यौन संबंध बनाते हैं तो ये अपराध नहीं है। हाई कोर्ट की इस घोषणा से पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत ऐसे संबंध बनाए जाने पर कड़ी सजा का भी प्रावधान था। इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने कहा था कि समलैंगिक रिश्ते बनाना कुदरत के खिलाफ है और इसे आपराधिक जुर्म करार दिया जाना चाहिए।
इसके पक्ष में उच्च न्यायालय ने कहा कि समलैंगिकता को बदलते समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। पीठ ने लिव इन रिलेशनशिप’, ‘सिंगल पेरेंटऔर सरोगेसी’ (किराए की कोख) का हवाला देते हुए कहा था कि पहले देश में बहुत सी चीजें जो पहले अस्वीकार्य थीं, अब समय के साथ स्वीकार्य हो गई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आते ही देश में कोई दर्जन भर समलिंगी विवाह हो चुके हैं, जिससे यहां का सामाजिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक ढांचे के चरमरा जाने का भय उत्पन्न हो गया है और प्रबुद्ध समाज स्वाभाविक रूप से बहुत चिंतित हो गया है।
इस संदर्भ में आरएमएल हॉस्पिटल में सायकायट्री डिपार्टमंट की अध्यक्ष डॉ. स्मिता देशपांडे कहती हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी ऐसा होता था, लेकिन तब कोई खुलकर बात नहीं करता था। लेकिन अब पश्चिमी देशों में इसे मान्यता मिलने के बाद लोग खुलकर सामने आने लगे हैं, और यह सही भी है, क्योंकि अगर कोई बात नहीं करेगा तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता है।
मेरे दृष्टिकोण से कहा जाए तो समलैंगिकता एक नैतिक असंतुलन है, एक अपराध और दुराचार है। इसमें संदेह नहीं कि यह बुराई मानव समाज में सदियों से मौजूद है। इनके उन्मूलन के प्रयास किये जाने चाहिए, न कि इन्हें सामाजिक स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए। कोई भी व्यक्ति जन्म से ही समलैंगिक नहीं होता, बल्कि लोग उचित मार्गदर्शन के अभाव में ये बुराइयां सीखते हैं। किशोरावस्था में अपनी नवीन और तीव्र कामेच्छा पर नियंत्रण न पाने के कारण ही लोग समलिंगी दुराचारों का शिकार हो जाते हैं ।
इस आलोच्य में समलैंगिकता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए खतरनाक है। यह एक घातक रोग (एड्स) का मुख्य कारण है। इसके अलावा यह महिला और पुरुष दोनों के लिए अपमानजनक भी है। भारतीय संस्कृति एक पुरुष को पुरुष और एक महिला को महिला बने रहने की शिक्षा देता है, जबकि समलैंगिकता एक पुरुष से उसका पुरुषत्व और एक महिला से उसका स्त्रीत्व छीन लेता है। यह अत्यंत अस्वाभाविक जीवनशैली है। जिस कारण समलैंगिकता पारिवारिक जीवन को विघटन की ओर ले जा रहा है।

No comments:

Post a Comment