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Thursday, February 2, 2012

बूढ़ा हो रहा हूं, मैं


बूढ़ा हो रहा हूं, मैं


हां बूढ़ा हो रहा हूं, मैं? यह एक गंभीर और विचारणीय विषय है, मेरे लिए। बूढ़ा होना? वैसे सभी के लिए भी यह एक चिंता का विषय है, क्योंकि समय के साथ-साथ हमारी उम्र भी बढ़ती जाती है और एक स्थिति ऐसी आती है कि हमारी कोशिकाएं क्षीण होने लगती हैं उनमें रोगों से लड़ने की शक्ति नहीं बचती। बाल सफेद हो जाते हैं चेहरे पे झुर्रियां पड़ जाती हैं। जिसे देखकर स्वतः ही समझा जा सकता है कि, यह सब बुढ़ापे के चिह्न हैं। बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रखने के साथ ही बच्चों द्वारा तिरस्कार का दंश भी झेलना पड़ता है। शायद यही बुढ़ापे की नियति है कि जिन बच्चों को खून-पसीना बहाकर, पाल-पोसकर बढ़ा किया जाता है वो बच्चें इस पढ़ाव पर साथ छोड़ देते हैं, और छोड़ देते हैं बुढ़ापे के लिए-अकेला। मैं भी अकेला होता जा रहा हूं। सभी मित्रों ने धीरे-धीरे साथ छोड़ दिया, रूकसत हो गये इस संसार से। बचे हुए हैं थोड़े अभी भी, उनमें से एक मैं भी हूं। तैयार हो रहा हूं, रूकसत होने के लिए। क्योंकि मैं बूढ़ा हो रहा हूं?
हां मैं, बूढ़ा हो रहा हूं, कि बूढ़ा होने के साथ-साथ जवान? यह खुद में एक विरोधाभास है। बूढ़ा वो भी जवान? हां मैं बूढ़ा हो रहा हूं फिर भी जवान हूं। मेरे चेहरे की झुर्रियां और बालों की सफेदी पर मत जाईये, निशानी है बुढ़ापे की। फिर भी मेरा दिल, दिनोंदिन जवां होता जा रहा है, सागर की लहरों की तरह। जो छू लेने चाहती हैं आशमां को, उठती हैं, गरती हैं, गिर के फिर उठती हैं, छू नहीं पाती आशमां को, पर कोशिशें निरंतर जारी हैं। हां ये बात और है कि वो उठती तो हैं एक मजबूती के साथ, पर किनारों से टकराके बिखर जाती हैं, खो देती है अपने अस्तित्व को। जो उनका हुआ करता था, कभी।
हां मैं बूढ़ा हो रहा हूं, तभी सागर और लहरों के बीच में आ गया। मैं लहरों की भांति उठने का प्रयास तो कर रहा हूं पर, खंड़-खंड़ में बिखरना नहीं चाहता? जैसे लहरें बिखर जाती हैं किनारों को छूकर। बूढ़ा जो होने लगा हूं। दिल बार-बार कहता है कि, इंसान शरीर से बूढ़ा हो सकता है, दिल से हमेशा जवां रहता है। इसी सोच ने इस उम्र में प्यार के चक्कर में फंसा दिया। हां बूढ़ापे में मुझे प्यार हो गया है वो भी..............? नाम के लिए तो पूरी जवानी लुटा दी। अब नाम में क्या रखा है चाहे मेरा हो या जिससे प्यार हो गया हो, उसका हो? प्यार तो हो गया, चलो जवानी में न सही बुढ़ापे में ही, हो तो गया। क्योंकि प्यार और बुढ़ापा छुपायें नहीं छिपता। तो सभी को मालूम हो गया कि मुझे बुढ़ापे में प्यार हो गया। दोस्तों ने समझाया, बहुत समझाया, ये उम्र नहीं है प्यार करने की? क्या करें? दिल है कि मानने को तैयार ही नहीं हुआ, और दिमाग फिर चलने लगा, कि ये लोग मुझसे और मेरे प्यार से ईष्या करने लगे हैं। तभी तो मुझे रोक रहे हैं, प्यार करने के लिए। मैंने भी जोश में आकर कह ही दिया। उम्र पच्चपन की जरूर हुई है दिल तो अभी भी बच्चपन का है।
ये बात तो सही है कि बुढ़ापे में दिमाग बहुत तेज गति से और दिल की धड़कन धीरे-धीरे धीमी होने लगती हैं तभी तो अपने बुढ़ापे के आगाज के साथ ही वो सारे काम करने शुरू कर दिये, जिन्हें सामाजिक और पारिवारिक दबाव के चलते पूरा नहीं कर सका। इसका एक कारण और है कि जब दीये का तेल खत्म होने लगता है तो एक बार लौ पुरजोर तरीक से जलती जरूर है और जलकर बुझ जाती है। शायद मेरे दीये का तेल भी खत्म होने वाला है, इसलिए मेरे जीवन की लौ फड़फड़ा रही है तभी तो जो काम जवानी में न कर सका, उनका पूरा करने चाह दिल में है। उसमें से एक प्यार भी है। आखिर मुझे भी प्यार हो ही गया। हो भी क्यों न? प्यार तो बांटने का नाम है। जगजीत सिंह ने गाया था कि, न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन, जो प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। अब मन की बात करू तो मन बहुत चंचल होता है एक ठहराव उसे कभी नहीं मिला। वो तो हिरण की भांति, कस्तूरी की तलाश में वन-वन भटकता रहा। भटकना ही उसके जीवन का एक मकसद है। और मेरा भी, हां भटकना नहीं पा लेना, उस प्यार को जो इस बुढ़ापे में हो गया है। कभी जवानी में, मैं भी सोचा करता था कि बुढ़ा होने के साथ-साथ बहुत-सारे रोग इस शरीर को हो जायेंगे, पर ये कभी नहीं सोचा था कि, इस बुढ़ापे में प्रेम का रोग भी हो जायेगा। हो गया क्या करें? ये इश्क की बात है, इसे अंदर की बात समझ सकते हैं कि कौन कहता है? कि बुड्ढे इश्क नहीं करते, बुड्ढे़ इश्क तो करते हैं पर लोग उन पर शक नहीं करते। मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, इश्क हुआ और लोगों के शक का शिकार भी हुआ। कुछ ने समझाया, कुछ ने बुढ़ा समझकर छोड़ दिया, कुछ ने धमकी भी दे डाली, कुछ ने तो यहां तक भी कहां कि बूढ़ा सटिया गया है। सुना सभी को सुना, फिर सोचा लोग दूसरों की बुराईयों को जल्दी ही पकड़ लेते हैं और अच्छाईयों को चने के झाड़ पे फांसी लगा देते हैं। हां चढ़ा सकते है फांसी पे, क्योंकि ये जनता है, बहती गंगा में हाथ धोना जानती है। एक भीड़ की जमात में मार तो सकती है किसी को, पर बचा नहीं सकती, देखती रहती है, तमाशबीन की तरह तमाशा। जैसे खेल खेला जा रहा हो बंदरों का, कभी-कभी तो इस तमाशबीनों से तालीयां भी नहीं बजती। इनका काम सिर्फ तमाशा देखने मात्र है, सिफ तमाशा।
हां बूढ़ा हो रहा हूं, मैं? तभी तो कहां से शुरू किया और कहा खत्म करना है ये भी नहीं सोच पा रहा हूं। फिर भी बहुत सालों से लिखने और पढ़ाने का काम कर रहा हूं तो कहीं-न-कहीं खत्म तो कर ही दूगां, आखिर हर फिल्म का दी एंड होता है, हां आज के परिपे्रक्ष्य में ये बात लागू नहीं होती, उसका पार्ट टू जरूरत न होने पर बना ही दिया जाता है। इस बुढ़ापे का क्या करें, दी एंड होने के बाद, इसका पार्ट टू भी नहीं बन सकता। और कौन बनाएगां? मेरा पार्ट टू।
अरे भई, आप लोगों को और नहीं पकाऊगां, सोच रहे होगें कितना पकाता है, हां यह तो बताना मैं, भूल ही गया कि मैं, बहुत अच्छा पका लेता हूं, हां भई खाना और क्या? अरे नहीं थोड़ा झेलने की क्षमता रखो, इतना झेल लिए, थोड़ा और। क्योंकि मैं बूढ़ा हो रहा हूं? और कुछ समय के बाद मैं इस संसार की पंचशाक्ति में वलीन हो जाउंगा। तब आपको न तो मेरे बुढ़ापे में हुए इश्क से एलर्जी होगी और न ही मेरे पकाने से। कुछ समय की बात और है, बस कुछ समय की। क्योंकि बूढ़ा हो रहा हूं, मैं? या जवान?

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