सरोकार की मीडिया

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Friday, December 9, 2011

शायद वो बेवफा न हो

शायद वो बेवफा न हो

आज के दौर में
वह और आगें निकल आया
जिसका मुझें डर था
हो गया
हर दिन,
हर पल
उसी की यादें सताती है
मंैने लाख आपने आप को समझाया
पर दिल, दिमाग ने
साथ नहीं दिया,
देता भी कैसे?
दिल, दिल के हाथों मजबूर था
दिमाग, उसकी यादों में खोया हुआ
क्या कारण थे बेवफाई के
मेरी समझ में नहीं आए
दिन-दिन करके
सालों गुजर गये,
समस्या जस-के-तस
सुलझने का नाम नहीं लेती
कभी-कभी सोचता हूं कि
क्यों किया था, प्यार
जब मालूम था
प्यार पूरा नहीं होता,
अब तो शरीर में जान नहीं बची,
दिल की धडक़नें
एहसास दिलाती है जिंदा होने का
मझधार में छोड़कर जाना था
जिंदा ही क्यों छोड़ा,
मार दिया होता जान से
न जान रहती,
न तुम्हारी यादें
इस तरह
रह-रहकर सताती
बहुत रोया उनकी यादों में,
उसकी तस्वीर को देखकर
अब तो आंखों से,
आंसुुओं ने भी साथ छोड़ दिया
जिस तरह उसने मुझे अकेला छोड़ दिया
बहुत सह लिया
अब तो सहा भी नहीं जाता,
यादें वक्त-वे-वक्त,
घावों को ताजा कर जाती हैं,
जो उसने दिए
पर जी रहा हूं
उनकी यादों में
कि वो बेवफा न थी,
शायद तुम्हारे ही प्यार में
कोई कमी रही होगी
 


 

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