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Saturday, December 3, 2011

शायद वो बेवफा न हो ?


शायद वो बेवफा न हो ?
आज के दौर में वह और आगें निकल आया जिसका मुझें डर था वो हो गया। मैंने बहुत कोशिश की समझाने की, जैसे बात न मानना उसकी फिदरत में शुमार हो गया था। सोचा था, कि उसकी चिंता करना छोड़ दूगां, ऐसा नहीं कर पाया।

हर दिन, हर पल उसी की यादें सताती है कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने तो मुझसे वादा किया था कि वो कभी ऐसा नहीं करेगी, क्या वादें इस तरह तोड़ दिये जाते है? जिस तरह नियमों को ताक पर रखकर। शायद मुझे उस पर ज्यादा ही भरोसा था, होता क्यों नहीं भरोसा न करने का कोई कारण मेरे पास न था। वैसे होता वही है जिस पर ज्यादा भरोसा करो वो ही भरोसे को तोड़ देता है। भरोसा तोड़ना उसकी आदत बन गया है मैंने लाख आपने आप को समझाया की भरोसा न किया जाए, पर दिल, दिमाग ने साथ नहीं दिया, देता भी कैसे? दिल, दिल के हाथों मजबूर था और दिमाग, उसकी यादों में खोया हुआ था। बार-बार, कई बार समझाने का प्रयास किया दिल को, पर दिल है कि मानने को तैयार ही न था कि वो बेवफा हो गया है।
हमने कोई समय सीमा का निर्धारण किया था कि इतने समय तक ही मैं आपके साथ हूं, जैसे ही समय सीमा समाप्त होगी मैं आपका साथ छोड़ दूंगी, ऐसा भी नहीं था। क्या कारण थे जो आज तक मेरी समझ में नहीं आए। हर दिन यही सोचकर उठता हूं कि शायद आज मुझे उसकी बेवफाई की मुख्य वजह मिल जाएगी और यही सोचकर रातों को नहीं सो पता कि आज का दिन भी निकल गया और वजह का दूर-दूर तक कुछ अता-पता नहीं चला। दिन-दिन करके आज सालों गुजर गये, वजह उसी स्थान पर खड़ी है जहां वर्षों पहले उसने छोड़ा था। समस्या जस-के-तस है सुलझने का नाम नहीं ले रही है।

कभी-कभी सोचता हूं कि क्यों प्यार किया था, जब मालूम था कि प्यार कभी भी पूरा नहीं होता, जिसका पहला शब्द ही अधूरा हो, वो कभी पूरा हो सकता है। इसके बावजूद भी प्यार करने का रिस्क उठाया था हमने। समाज से, परिवार से, एक नहीं बल्कि दो-दो परिवारों से, सजा के परिणामों को बिना सोचे। कहां गलती हुई सोच नहीं पा रहा हूं। एक समय ऐसा था जब हम साथ थे, तब दुनिया कितनी रंगीन लगती थी, मानों दो जहां की खुशियां हमारे दामन में आ गई हो। वो पल वो लम्हां, साथ रहना, साथ उठना, साथ सुख-दुःख बांटना। बिना एक-दूसरे के निवाला भी गले से नहीं उतरता था। एक पल के लिए आंखों से ओझल होते थे तो दिल की धड़कन मानों थम-सी जाती थी। आज वो ही दुनिया कितनी वीरान लगती है जैसे काटने को दौड़ रही हो। शरीर में जान नहीं बची, पर दिल की धकड़नें लगातार अपनी गति चल रही है जिससे अंदाजा लगता हूं कि अभी भी जिंदा हूं। वैसे जिंदा रहने का एक मक्सद यह भी है कि शायद कभी उससे मुलाकतत हो जाए और इस बेवफाई का कारण पता चल जाए। क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में? सब कुछ समर्पित कर और त्याग कर, केवल-और-केवल उसको चाहा था। क्या चाहने की इतनी बड़ी सजा मिलती है। वो तो खुश है किसी के साथ और हमको तिल-तिल मारने के लिए छोड़ गये। इसी तरह मझधार में छोड़कर जाना था तो जिंदा ही क्यों छोड़ा, मार दिया होता जान से। न जान रहती, न उसकी यादें इस तरह रह-रहकर सताती।

बहुत रोया हूं उसकी यादों में, उसकी तस्वीर को देखकर। अब तो आंखों से, आंशुओं ने भी साथ छोड़ दिया। जिस तरह उसने मुझे अकेला छोड़ दिया। मेरे एक गुरूजी थे वो हमेसा कहा करते थे कि सहना सीखों। जितना सहोंगे, उतना मजबूत बनोंगे। बहुत सह लिए अब तो सहा भी नहीं जाता, यादें वक्त-वे-वक्त, घावों को ताजा कर जाती हैं, जो उसने दिए। वैसे बहुत से लोग प्यार में धोखा खाने के बाद आत्महत्या कर लेते हैं। मैं तो इतना बेबस हूं कि आत्महत्या भी नहीं कर सकता, क्योंकि आत्महत्या कायर लोग करते है और मैं कायर नहीं हूं। जी रहा हूं उसकी याद में। कभी-कभी दिल कहता है कि दुनिया है दिल वालों की तूने मेरा दिल तोड़ दिया, तू किसी की हो गयी मुझे अकेला छोड़ दिया। शायद यही मेरी किस्मत में लिखा था कि कोई तुम्हारी जिंदगी में कुछ इस तरह आयेगी जो तुम्हारी जिंदगी बदल देगी। जिंदगी तो वास्तव में बदल गई। बदली हुई जिंदगी को मर-मरकर जी रहा हूं और हर बार यहीं दिल से कहता हूं कि वो बेवफा न थी, शायद तुम्हारे प्यार में कोई कमी रह गयी होगी तभी वो आज तुम्हारे साथ नहीं है।

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