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Sunday, November 27, 2011

महिला अधिकार और मीडिया

महिला अधिकार और मीडिया

भारत को स्वतंत्र हुए 63 वर्ष हो चुके हैं। किसी भी देश की कानून-व्यवस्था के लिए 63 वर्ष कम नहीं आंके जा सकते। इसके साथ-साथ भारत के संविधान को भी 58 साल बीत चुके हैं। भारत के संविधान में दी गई गारंटी एवं निहित वादों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को जीने, स्वतंत्रता, समानता एवं निजी गरिमा के अधिकार विशेष रूप से प्रदान किए गए हैं। मानव अधिकार वह मूलभूत अधिकार है, जो मनुष्य को जन्म से ही मानवोचित होने के कारण प्रदान किए जाते हैं। सरकार बिना किसी विशेष परिस्थिति के इन अधिकारों को छीन नहीं सकती है। मनुष्य स्वभावतः अधिकारों के उपभोग करने का अभ्यस्त रहा है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह अधिक से अधिक अधिकारों से युक्त हो। इस प्रकार अधिकारों की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। ‘‘अधिकारों की उत्पत्ति का श्रेय इंग्लैंड के मैग्नाकार्टा को जाता है। मैग्नाकार्टा के अतंर्गत सन् 1215 में सम्राट् जॉन से इंग्लैंडवासियों ने अपने मूल अधिकार प्राप्त किये। जिससे सन् 1689 में ‘बिल ऑफ राइटस’ अस्तित्व में आया।’’
‘बिल ऑफ राइट्स’ के अस्तित्व में आने के बाद सन् 1789 में फ्रांस ने मूल अधिकारों की घोषणा की। 20वीं शताब्दी से पूर्व द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के कारण जनसमूह को अत्यधिक शारीरिक क्षति एवं वेदना को सहन करना पड़ा। इस तरह की पुर्नावृत्ति को रोकने के लिए मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को अंगीकार किया गया। 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के बाद ‘लीग ऑफ नेशन्स’ के वृहत राष्ट्र सोवियत रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और ग्रेट ब्रिटेन आदि देशों ने मानवाधिकारों से संबधित पृथक-पृथक चार्टर तैयार करके उन पर हस्ताक्षर किए।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति एवं विश्व स्तर पर शांति स्थापित हेतु तथा मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए ’‘संयुक्त राष्ट्र की महासभा में प्रस्ताव संख्या 217ए (iii) द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का उद्बोधन किया।’’ यही कारण है कि 10 दिसम्बर को सम्पूर्ण विश्व में ‘मानवाधिकार दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
 अन्तरराष्ट्रीय घोषणा पत्र में गरिमायुक्त जीवन - यापन के लिए ‘मानवाधिकार घोषणा पत्र’ 1948 में निम्नलिखित बिन्दुओं को उल्लेखित किया गया है-
•प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र पैदा होते हैं इसलिए प्रतिष्ठा एवं अधिकारों में भी समान हैं।
•प्रत्येक व्यक्ति में अपनी तर्क शक्ति एवं विवेक का गुण होता है। इसलिए उनके साथ पारस्परिक बन्धुत्व का व्यवहार होना चाहिए।
•प्रत्येक मुनष्य को जीवन, स्वतंत्रता तथा सुरक्षा का अधिकार है।
•न्यायालय के समक्ष सभी व्यक्ति समान होंगे।
•किसी भी मनुष्य को दास या गुलाम बनाकर नहीं रखा जाएगा।
•किसी भी मनुष्य के साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया जायेगा और न ही क्रूरतम दण्ड दिया जाएगा।
•प्रत्येक व्यक्ति को भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी।
•प्रत्येक व्यक्ति को स्वेच्छा से भ्रमण, शांतिपूर्ण सम्मेलन, व्यावसाय, वृत्ति अथवा किसी भी प्रकार का पेशा चुनने की स्वतंत्रता होगी।
•सभी व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास के लिए समुचित अवसर उपलब्ध होंगे।
•सभी व्यक्ति को शिक्षा पाने का अधिकार होगा तथा प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य एवं निःशुल्क दी जायेगी।
•प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति बनाने का पूर्ण अधिकार होगा।
•अभियुक्त को तब तक निर्दोष समझा जाएगा जब तक कि उसके खिलाफ दर्ज आरोप साबित नहीं हो जाते।
•प्रत्येक व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान किये जाएंगे।
•किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से गिरफ्तार नहीं किया जायेगा।
•सभी व्यक्ति को समान कार्य के लिए समान वेतन प्राप्त होगा।
•वयस्क पुरूष एवं स्त्रियों को राष्ट्रत्व तथा धर्म के बिना विवाह करने तथा कुटुम्ब स्थापित करने का अधिकार होगा।
•प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का उपयोग एवं स्वतंत्रताओं का उपभोग इस तरह करेगा जिससे किसी अन्य व्यक्तियों के अधिकारों एवं उसकी स्वतंत्रता बाधित न हो।
मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणों के साथ-साथ भारत के संविधान में भी मानव को निम्न अधिकार प्रदान किए गये हैं-
भारतीय संविधान में मौलिक मानवाधिकार
भारत में मूल अधिकारों की मांग सर्वप्रथम, संविधान संशोधन विधयेक 1985 के माध्यम से की गई, जिसे भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक शामिल किया गया है। मूल अधिकारों की कुल संख्या पूर्व में 7 थी जो कि वर्तमान में 6 है। सम्पत्ति के अधिकार को 1979 में 44वें संशोधन द्वारा हटा दिया गया है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार निम्नलिखित हैं-
1. समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)  इसके अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकार सम्मिलित होते है-
•विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण का अधिकार (अनुच्छेद 14)
•धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्म का स्थान, के आधार पर विभेद का प्रतिषेध (अनुच्छेद 15)
•लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16)
•अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17)
•उपाधियों का अंत (अनुच्छेद 18)
2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)  वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार का स्थान मूल अधिकारों मंे सर्वोच्च माना जाता है। स्वतंत्रता के अधिकार निम्नलिखित प्रकार के होते है -
•वाक् स्वातंत्र्य विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण (अनुच्छेद 19)
•अपराधों के लिए दोष सिद्ध के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20)
•प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (अनुच्छेद 21)
•कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद 22)
3. शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)  शोषण के विरूद्ध अधिकार निम्नलिखित हैं-
•मानव के दुव्र्यापार और बलात श्रम पर रोक (अनुच्छेद 23)
•कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (अनुच्छेद 24)
4. धर्म स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)  इस अधिकार के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को अग्रलिखित अधिकार प्रदान किए गए हैं-
•अन्तःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप में मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25)
•धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26)
•किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करो के संदाय के बारे में स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27)
•कुछ शिक्षा - संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28)
5. सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 31)  भारत के संविधान में सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकार निम्न हैं-
•अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण (अनुच्छेद 29)
•अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार (अनुच्छेद 30)
•1978 में सम्पत्ति के अधिकार का विलोपन कर दिया गया है (अनुच्छेद 31)
6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32 से 35)  मूल अधिकार के रूप में संवैधानिक उपचारों का अधिकार निम्न हैं-
•मौलिक अधिकारों को न्यायालय में प्रवर्तित कराने का अधिकार। इसके तहत न्यायालय 5 प्रकार की रिट जारी कर सकता है (अनुच्छेद 32)
•संसद द्वारा मूल अधिकारों के उपांतरण की शक्ति (अनुच्छेद 33)
•संसद विधि द्वारा मार्शल लॉ के प्रवर्तन के दौरान मूल अधिकारों के उल्लंघन की क्षतिपूर्ति (अनुच्छेद 34)
इसके साथ ही भारतीय संविधान में लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषेध किया गया है। ‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(1) में मौलिक कत्र्तव्यों के अंतर्गत महिलाओं के प्रति सम्मान का विवेचन किया गया है। महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए बहुत से वैधानिक उपायों को उपबंधित किया गया हैं। यथा विशेष विवाह अधिनियम (1954), पारिवारिक न्यायालय अधिनियम (1954), दहेज निषेध अधिनियम (1961)। दहेज निषेध अधिनियम को 1984, 1986 में संशोधित किया गया। इसके अतिरिक्त बाल विवाह अधिनियम (1929, संशोधित- 1976), मेडिकल टमिनेशन ऑफ प्रैगनैंसी एक्ट (1971), समान पारिश्रमिक अधिनियम (1976), परिवार अधिकरण अधिनियम (1984), महिलाओं के अश्लील चित्रण पर रोक संबंधी अधिनियम (1986), बाल मजदूरी (प्रतिबंध तथा नियमन) अधिनियम (1986), सती निवारण अधिनियम (1987), प्रसव पूर्ण निदान सूचक तकनीक (1994), 73वां तथा 74वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम (1993), एवं घरेलू हिंसा अधिनियम, (2006) आदि महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने तथा उन्हें सशक्त बनाने के दृष्टिकोण से समय-समय पर पारित किया गया है। वर्ष 2006 में पारित ‘घरेलू दमन’ हिंसा कानून महिलाओं की हर प्रकार से शोषण, उत्पीड़न, दमन, हिंसा व अत्याचार से रक्षा के लिए बनाया गया है।’’ इन सभी कानूनों का मुख्य उद्देश्य समाज में महिलाओं की स्थिति को दृढ़ करना तथा उन्हें सम्मान एवं प्रतिष्ठा का उचित स्तर उपलब्ध कराना है।
मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषण, 1948 के सभी अधिकार महिला तथा पुरूष दोनों को समान रूप से प्राप्त है। जिसको इस प्रकार उल्लेखित किया गया है-
•लिंग के विभदे का अधिकार (अनच्छेद 2)
•विधि के समक्ष समान तथा समान संरक्षण का अधिकार ( अनच्छेद 7)
•वयस्क पुरूष तथा महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के विवाह करने का अधिकार (अनच्छेद 16(1))
•विवाह के लिए इच्छुक पक्षकारों को स्वतंत्र और पूर्ण सहमति से विवाह करने का अधिकार (महिलाएं विवाह के लिए अपने माता-पिता अथवा अन्य व्यक्तियों पर निर्भर नहीं है (अनच्छेद 16(2))
•समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार (अनच्छेद 23(2))
•विधवा महिलाओं को जीविकोपार्जन के अभाव में संरक्षा का अधिकार (अनच्छेद 25(1))
•मातृत्व विशेष देखभाल और सहायता का अधिकार (अनच्छेद 25(2))
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने अधिकारों को पाने तथा अधिकारों के हनन व अत्याचारों को रोकने की जद्दोजेहद में जीवन यापन की हैं। महिलाओं की स्थिति को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं की स्थिति क्या है? महिलाओं को महिला होने के कारण तथा समाज के विशिष्ट वर्ग से संबंध रखने के कारण महिलाओं को दोहरे शोषण का शिकार होना पड़ता है। महिलाएं आज उपभोक्ता, मैनेजर, वकील, डॉक्टर जैसे बहुआयामी भूमिकाएं निभा रही हैं परन्तु, अधिकतकर महिलाओं के कार्यों को सरल तथा महत्वहीन समझा जाता है। आज पग-पग पर वे तिरस्कृत, असुरक्षित एवं उत्पीड़ित हो रही हैं। महिलाओं पर जितने कहर वर्तमान समय में ढाये जाने लगे हैं, उतने कभी नहीं ढाये गये। महिला उत्पीड़न की घटनायें द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ रही हैं। महिलाओं को आये दिन अपहरण, छेड़छाड़, दहेज उत्पीड़न/ दहेज -हत्या, भू्रण हत्या, वेश्यावृत्ति और बलात्कार से रूबरू होना पड़ रहा है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘‘देश में प्रति 47 मिनट में एक नारी के साथ बलात्कार होता है। उल्लेखनीय है कि समाज की दृष्टि में पतित होने के भय से अधिकांश प्रकरण पंजीकृत ही नहीं किये जाते। दुर्भाग्यवश ये अधिकांश अपराध (लगभग 70 प्रतिशत) राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्यप्रदेश तथा बिहार राज्यों (हिंदी भाषी क्षेत्रों में ) होते हैं।‘’
आज सभ्य और शिक्षित समाज में जब नारी अधिकारों के विभिन्न प्रयास हो रहे हैं। सभी स्त्री पहले से अधिक जागरूक हो गयी हैं। हालांकि, आज भी बलात्कार की घटनाएं पुरजोर पर हैं। पुरूष अपने को स्त्री से श्रेष्ठ और शक्तिशाली मानता है और उस आक्रमण के योग्य और भोग्या मानता है। दरअसल हमारे समाज ने नैतिकता की रक्षा का पूरा बोझ महिलाओं पर ही डाल रखा है। पुरूष के लिए नैतिकता जैसे मूल्यों का कोई विधान नहीं है। इस असन्तुलित और पक्षपात-धारणा के कारण ही बलात्कार से उत्पन्न सभी प्रतिकूल प्रभाव स्त्री पर ही होते हैं। स्त्री में दोष देखने और पुरूष को दोष मुक्त रखने का हमारा दृष्टिकोण हमारे पुरूष प्रधान समाज की विरासत है। समाज के नैतिक बंधनों और मर्यादाओं में ह्रास के कारण बलात्कार जैसे अपराधों में वृद्धि हो रही है। बलात्कार एक ऐसा अपराध है, जिसमें हमारे असन्तुलित तथा तर्कहीन सामाजिक दृष्टिकोण के कारण अपराधी पुरूष नहीं, अपराध की शिकार स्त्री को सामाजिक प्रताड़ना और लज्जा सहना पड़ता है। और, उसका समाज में जीना मुश्किल हो जाता है।
स्वतंत्रता के पांच दशकों के इतिहास का यदि अवलोकन किया जाये, तो पायेंगे कि स्वतंत्रता का प्रयोग जितना पुरूषों ने किया है, उतना महिलाओं ने नहीं। क्या आज उसको समाज में समानता की वह स्थिति प्राप्त है, जिसका दावा हमारा समाज करता है? क्या भारत के राजनैतिक विकास में महिलाओं की भागीदारी उतनी है जितनी होनी चाहिए? क्या स्वतंत्रता के 63 वर्षों में महिला नेतृत्व तथा प्रतिनिधित्व की एक सशक्त पीढ़ी उभरकर सामने आयी है? दुर्भाग्य से समस्त प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं।
आज महिलाएं मीडिया की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही हैं, जबकि मीडिया लोलुप दृष्टि से। मीडिया अपनी चमक को और चमकीला बनाने के लिए नारी का उपभोग करता है, जबकि स्त्री अपनी वजूद को साबित करने के लिए मीडिया का उपयोग करने के वास्ते प्रतीक्षरत है। इस जुगलबंदी में मीडिया की नयम और उसका वर्तमान तो काफी हद तक स्पष्ट है, लेकिन स्त्री की मंशा और उसकी ऐतिहासिक स्थिति इससे काफी जटिल है। आंकड़ों की बात करें तो आधुनिक विश्व में सामजिक स्तर पर क्या विकसित, क्या विकासशील और क्या अविकसित सभी देशों में थोड़े बहुत हेरफेर के साथ महिला को पुरूष की तुलना में दोयम दर्जे का ही नागरिक माना जाता है। और, इसी आधार पर उनके साथ होने वाला व्यवहार और उत्पीड़न प्रायः सार्वभौमिक हैं। इसी दृष्टि से समूची दुनिया की महिलाओं के दुख, समस्याएं और परिस्थितियां लगभग एक जैसी है। पुरूष प्रधान समाज में महिला को अवर श्रेणी मंे रखना ही पुरूष के स्वामित्व और वर्चस्व को इंगित करता है। आधुनिक समाज में लगभग समस्त आर्थिक और सामाजिक जरूरतें पुरूष के अधीन हैं। ‘‘अनंत काल से पुरूष स्त्री पर अपना आधिपत्य जमा रखा है।’’ इस प्रकार पुरूष स्वयं को अधिकृत समझता है जबकि महिलाओं को अपने ऊपर अरक्षित।
भारतीय संस्कृति में पुरूष रक्षकों का एक ऐसा वर्ग है, जो स्त्री को अतिरंजित करके देवी की हद तक पहुंचाने और पूज्य सिद्ध करने का ढोंग करता है। महिलाओं की आकंक्षा बराबरी का मनुष्य माने जाने की है। हालांकि, स्त्री को मनुष्य की तत्सम इकाई न मानकर दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। इसी के चलते कहीं स्त्री को अबला, तो कहीं- कहीं एक मर्द के बराबर दो औरत तौली जाती है। पुरूष की ऐसी सोच ही महिला को निजी संपत्ति मानता है। आज स्त्री में मनुष्यबोध जाग्रत हो उठा है, वह अपनी निजता के प्रति सजग हुई है। और, पुरूष के बराबर ही स्वीकार किए जाने की उसकी आकांक्षाएं भी बेसब्र हुई हैं। इसी बेसब्री का परिणाम है कि महिला किसी - न - किसी तरीके से मीडिया के दर्पण में खुद को देखने की अभिलाषा से व्यग्र है। मीडिया उसकी इसी व्यग्रता को भुनाने के लिए उसे विविध आयामों में दिखाने की मुनाफाखोरी में इतरा रहा है। यहां कभी महिला की लाचारियां हैं, कभी आंसू, कभी उसका प्रेम, कभी उस पर हिंसा, तो कभी उसकी देहयष्टि। महिला के जितने भी आयाम हैं, वे सब के सब मीडिया के बिकाऊ माल हैं। नए जीवन मूल्यों की स्थापना और अपनी अस्मिता को उत्कीर्ण कराने के लिए संघर्षरत् महिलाओं का अवमूल्यन मीडिया का मुनाफा और शगल है, तो दूसरी ओर विकासमान समाज के लिए हैरतअंगेज!
आज की महिला अपने स्त्रीत्व के साथ वह सब कुछ  करके  अपनी दक्षता प्रमाणित कर रही है, जिस पर पुरूष वर्ग अपना एकाधिकार समझता रहा है। इससे पारंपरिक सोच के ढांचे में कैद समाज को कड़ी चुनौती मिल रही है। और, स्त्रियों पर हिंसा के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। घर हो या कार्यक्षेत्र- दोनों जगह स्त्रियों के उत्पीड़न लगभग एक जैसे होते हैं।
आधुनिक महिला समाज की आजादी के सपने देख रही है। मीडिया महिलाओं के अधिकारों तथा उन पर हो रहे अत्याचारों के मुद्दों को लेकर कोई स्तंभ स्थायी रूप से नहीं निकालता है। कोई लेख या इस तरह की सामग्री आती है, तो वह पूरक रूप में। महिला मुद्दों को लेकर कोई गंभीर और व्यापक प्रभाव डालने वाला प्रयास मीडिया में दिखाई नहीं देता है। जबकि, महिला से जुड़े तमाम मुद्दों को उठाया जा सकता है। मसलन ‘‘स्त्रियों की समस्याओं को उठाया जा सकता है। समाज में आज भी स्त्रियां असमानता, हिंसा, शोषण तथा पुरूष मानसिकता की शिकार होकर यातना झेलती हैं। कामकाजी स्त्रियों को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती हैं। घर और बाहर की जिम्मेदारियों का निर्वाह करती स्त्री के सामने नई-नई समस्याएं आती हैं, जिनका सामना उसे करना पड़ता है। दहेज प्रथा के बारे में बात करना अब घिसी-पिटी बात लगती है, परन्तु व्यावहारिक तौर पर आज भी स्त्रियों को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, जलाया जाता है। महिलाओं को अपने लिए अपनी अस्मिता व आत्मसम्मान के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। जितनी वह आगे बढ़ी हैं, स्वाधीन हुई हैं, उतनी ही असुरक्षित भी हुई हैं। उसे आर्थिक ही नहीं,दैहिक तथा मानसिक शोषण का भी शिकार होना पड़ रहा है।’’
भारतीय पत्रकारिता ने नारी अस्मिता का जितना मजाक उड़ाया है, उतना शायद और किसी ने नहीं। कोई भी ऐसा दिन नहीं जाता, जब महिला से बलात्कार की खबर किसी दैनिक में न छपती हो। खोजी पत्रकार तुरंत-फुरंत महिला के अनगित चित्र छाप देते हैं। अब, मीडिया जो ‘‘ बिकेगा वही छपेगा’’ के सिद्धांत पर चल रहा है। मीडिया की आलोचना इस बात को लेकर ज्यादा होती है कि वह मीडिया विषयक विशेषकर घरेलू हिंसा और सेक्स अपराध की घटनाओं का खुलासा महिलाओं के संरक्षण से ज्यादा उनके खबरों में दर्शकों को रस देने की दृष्टि से ज्यादा कर रहा है। इस स्थिति पर भी लगाम कसने की जरूरत है। महिलाओं के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए जो उपक्रम मीडिया कर सकता है, परन्तु ‘‘सभ्य समाज की ही तरह मीडिया भी इन औरतों से एक तरह का परहेज करता है, इनके स्वास्थ्य, रहन-सहन, मानवाधिकारों की चर्चा से हर अखबार -चैनल- पत्रिका बचना चाहते हैं। अगर कभी इनके हक या परिस्थितियों की बहसें शुरू होती भी हैं, तो उन खबरों, मुद्दों का फालोअप शायद ही मीडिया कभी करता है।’’
वस्तुतः मीडिया आज संक्रमण के दौर में है। अपने कंटेंट और प्रस्तुति के स्तर पर वह आज कई घटकों से संचालित हो रहा है, प्रभावित हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति, प्रशासन और भ्रष्टाचार के घातक त्रिभुज ने मीडिया को बुरी तरह से जकड़ लिया है। महिलाओं के संबंध में मीडिया के नजरिये में आए बदलाव के कारण को जानने के लिए हमें स्च्ळ के नतीजों को खंगालना आवश्यक हो जाता है। वैसे भी समाज की लेखनी यहां आकर कमजोर पड़ जाती है और वह किसी अन्य पहलु की तलाश में लग जाती है। और, आधुनिक नारी विमर्श, आंदोलन के रूप में सिमट कर रह जाता है।
सदंर्भ:-
1.बाबेल, डॉ. बसन्ती लाल - मानवाधिकार- पृ. 14
2.शर्मा, डॉ. शिवदत्त - मानवाधिकार- पृ. 42
3.बिसवाल, डॉ. तपन - मानवाधिकार जेंडर एवं पर्यावरण - पृ. 61
4.गृह मंत्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली
5.तिवारी, डॉ. आर. पी. एवं डॉ. डी.पी. शुक्ला- भारतीय नारी: वर्तमान समस्यायें और भावी समाधान- पृ. 29।
6. मार्च 4-11, 1995 राष्ट्रीय सहारा, समाचार पत्र
7.भट्ट, संदीप- वंचित स्त्रियों का विमर्श और मीडिया - पृ. 57

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