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Friday, October 7, 2011

लिव इन रिलेशनशिप का समाजशास्त्र

लिव इन रिलेशनशिप का समाजशास्त्र

            वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज (संस्कृति) बदल रहा है और इस बदलाव के साथ-साथ प्यार व शादी की परिभाषाओं में भी बदलाव हो रहा है। यह बदलाव सदियों से चली आ रही विवाहिक परंपराओं की बंदिशों को तोड़ने का काम कर रहा है। इस बदलाव का कारण अधिकांश लोग पश्चिमी सभ्यता को मानते हैं। हम इस बदलाव को पूर्ण रूप से पश्चिमी सभ्यता पर नहीं मढ़ सकते। यदि हमको इस बदलाव को जानना है तो इसके मूल कारणों की तह तक जाना पड़ेगा, और देखना होगा कि वो कौन-से मूल कारण हैं जिसकी वजह से भारतीय संस्कृति में इस तरह का परिवर्तन हो रहा है। यह परिवर्तन कितना जायज है और कितना नाजायज, इस पर बहस नहीं करनी चाहिए। क्यों कि, जब बदलाव के मूल कारण ज्ञात हो जायेंगे, तो स्वत: ही हमें पता हो जायेगा कि यह जायज है या नाजायज।
           वैसे सदियों की परंपराओं की जकड़न को तोड़ती आज की युवा पीढ़ी का मकसद कुछ भी हो, पर परंपराओं की बेडि़यां तो टूट रही हैं। इस टूटती बेडियों को आज की युवा पीढ़ी स्वतंत्रता का नाम देती है, कि हम स्वतंत्र हो रहे हैं। परंतु, ये कैसी स्वतंत्रता है जो मां-बाप, रिश्ते–नाते, लाज, हया, आदर, सम्मान सभी को ताक पर रख हासिल की जा रही है। भारतीय संस्कृति में ऐसी स्वतंत्रता मान्य नहीं है। वो आज भी सामाजिक नैतिकता और मान-सम्मान को अपना गौरव मानती रही है। जिसका दोहन पश्चिमी सभ्यता ने कर दिया है। और, जिसके पद चिंहों पर आज की भारतीय युवा पीढ़ी निकल पड़ी है। ये कहां जा रही है, कहां तक पहुंचेगी, किसी को नहीं मालूम। शायद मालूम भी नहीं करना चाहते, क्योंकि ‘आज जीओ, कल किसने देखा’ है। इस तर्ज पर जिंदगी जी जा रही है। इस तरह के जीवन यापन के लिए युवा इन दिनों दोस्ती, लिव इन रिलेशनशिप और शारीरिक जरूरतों की पूति को तेजी से अपना ट्रेंड बनाने में लगे हुए हैं। जिसकी मान्यता भारतीय न्यायालय ने भी दे दी है.
          'लिव-इन रिलेशनशिप' से तात्पर्य एक ऐसे रिश्ते से है जिसमें महिला-पुरूष सामाजिक तौर पर बिना शादी के साथ रहते हैं और इनके मध्य संबंध निर्विवाद रूप से पति-पत्नी जैसे ही होते हैं। इस रिश्ते की खासियत यह है कि महिला-पुरूष का भाव एक-दूसरे के प्रति समर्पण का होता है। अंतर केवल इतना है कि वे सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुरूप शादी नहीं करते हैं। यह स्थिति वक्त के परिवर्तन के साथ-साथ आधुनिक संस्कृति का एक हिस्सा बन गई है। कहने का मतलब यह है कि आज की बदलती संस्कृति में युवक-युवतियां इतने आधुनिक हो गए हैं कि वे आपसी मेल-मिलाप, दोस्ती और सामाजिक रूढि़यों की जकड़ने से मुक्ति के लिए एक साथ पति-पत्नी के रूप में रहना खुद के लिए गौरव की बात समझते हैं। इस गौरव को चाहे तो हम इन लोगों की जरूरतों की पूर्ति का भी नाम दे सकते हैं।
          'लिव-इन रिलेशनशिप' एक प्रकार का दोस्ताना संबंध है जिसे विवाह की परिधि में नहीं रखा जा सकता। क्योंकि विवाह एक सामाजिक व पारिवारिक बंधन के साथ-साथ एक रिवाज भी है जिसकी अपनी एक आचार-संहिता है, मान-मर्यादा है, कानूनी प्रावधान हैं। वैसे लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिनों पहले परस्पर विरोधी फैसले दिए। इस फैसले में हाई कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को वॉक-इन, वॉक-आउट रिलेशनशिप की संज्ञा प्रदान की। इसके उलट सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक चलने वाले लिव-इन रिलेशन को शादी के बराबर दर्जा दिया और कहा कि इन संबंधों से उत्पन्न संतानों को भी पिता का जायज वारिस करार दिया जाएगा।
           मोटे तौर पर देखा जाए तो लिव-इन का तात्पर्य एक स्त्री और एक पुरुष का बिना विवाह किए सिर्फ आपसी रजामंदी से एक साथ रहना है। भारत में पारंपरिक रूप से ये रिश्ते प्रचलित नहीं हैं, जबकि आधुनिक पश्चिमी संस्कृति में नौजवान जोड़े अपनी सहमति और पूरे नैतिकता बोध के साथ लिव-इन करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य‍ में देखा जाए तो इस संबंध की शुरूआत शिक्षित और आर्थिक तौर पर स्वतंत्र, ऐसे लोगों ने की है, जो विवाह संस्थाओं की जकड़न से मुक्ति चाहते थे। हालांकि ऐसे कई कारणों से उच्च और उच्च मध्यवर्ग के शहरी युवा पीढ़ी में धीरे-धीरे लिव-इन रिलेशन का प्रचलन जोर पकड़ता जा रहा है। इस आलोक में दार्शनिक तौर से विवाह संस्थाओं से विद्रोह करने वाले भी लिव-इन रिलेशन में रह रहे हैं। ये लोग एक साथ रहने की आपसी सहमति और शादी की सहमति को बहुत सूक्ष्म नजरियें से देखते हैं। इसमें से कुछ लोग इस कारण से भी लिव-इन में रहना पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने रिश्ते को व्यक्तिगत मामला मानते हैं, जिसमें वे नहीं चाहते कि उनका संबंध राजनीतिक, धार्मिक या पितृ सत्तात्मक संस्थानों द्वारा नियंत्रित किया जाए।
          अगर लिव-इन के संपूर्ण धरातल को देखा जाए तो यह केवल-और-केवल शारीरिक पूर्ति से जुड़ा हुआ है। जिस पर समूचे विश्व में शोध हो रहे हैं कि शादी से पहले इनके रिश्ते् कितने करीब आ जाते हैं या वो सब कुछ हो चुका होता है जिसे भारतीय सभ्य समाज में शादी के बाद जायज मानते हैं। खैर इस सब कुछ में क्या कुछ शामिल है, यह किसी से छुपा नहीं है। यदि ये युवा चाहे तो सब कुछ हो जाने के बाद भी स्वेच्छा से, अपनी-अपनी इच्छाओं की पूर्ति तथा शारीरिक माँगों की पूर्ति करने के बाद परिवारिक पसंद से शादी-ब्याह कर सकते हैं, और एक नई जिंदगी की शुरूआत भी कर सकते हैं। इस तरह केवल शारीरिक सुख देने वाला रिश्ता केवल इन्हीं सुखों से आरंभ होकर शीघ्र ही खानापूर्ति तक सिमटकर खत्म हो जाता है। इससे आगे ये युवा पीढ़ी लिव-इन के संबंधों को प्यार, दोस्ती, अधिक समय तक बरकरार रखना, या विवाह जैसा कोई नाम नहीं देना चाहते हैं।
इस आलोक में भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों पर प्रश्न चिंह लगाने वाले लिव-इन रिलेशन, एक ओर भारतीय समाज में पश्चिमी संस्कृाति का दर्शन कराते हैं, तो दूसरी ओर भारतीय युवाओं को शर्मसार भी करती है। ये युवा पीढ़ी भारतीय समाज को गुमराह करने वाले अवैध संबंधों को बढ़ावा देकर और लिव इन रिलेशन में रहकर, केवल अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरी करते हैं और कर भी रहे हैं।
          इस परिप्रेक्ष्य में कहा जाये तो किस राह जा रहा है लिव इन रिलेशन, कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे महानगरों में आजकल इन रिश्तों ने काफी रफ्तार पकड़ ली है। लिव-इन रिलेशनशिप के मत में विद्वानों ने कहा कि ये रिश्ते कुछ समय के मेहमान होते है जो ज्या दा दिनों तक नहीं टिकते। गौरतलब है कि कुछ दशक पहले तक जिन रिश्तों को अमान्य माना जाता है वही रिश्ता आज की एक सचाई और फैशन बन चुके हैं. बहरहाल, विद्वान मानते हैं कि कम ही सही लेकिन भारतीय सामाजिक संस्कृरति और उच्चतम न्यायालय ने जिंदगी जीने के पश्चिमी तरीकों पर अपनी मोहर लगाई तो है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ये रिश्तेी सिर्फ अस्थायी इंतजामात हैं। जो शारीरिक जरूरतों की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते है। तभी तो क्या अंतर है दो घंटे और दो साल की रिलेशनशिप में !
           धयातव्य है कि दो घण्टे के लिव इन रिलेशनशिप में स्त्री–पुरुष शारीरिक संबंध बनाते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं माना जाएगा, क्योंकि इन रिश्तों को कानून तौर पर अमलीजामा पहना दिया गया है। हालांकि इस प्रकार की दो–दो घण्टे वाली रिलेशनशिप में कई लोगों से संबंध रखे जा सकते हैं। इस तरह के लिव-इन में रह रहे स्त्री–पुरुषों और वेश्यावृत्ति करने वालों में क्या अंतर रह जाएगा, मेरी समझ सीमा से बाहर की बात है। एक तरफ तो हमारे देश में वेश्यावृत्ति को अपराध माना जाता है, वही दूसरी तरफ विवाह किये बिना शारीरिक संबंध बनाने की छूट भी दे दी गई है। इससे अर्थ में यह साफ प्रतीत होता है कि जो शारीरिक जरूरतें थोड़ी अवधि के लिये बनाये जाये तो वेश्यावृत्ति मानी जायेंगी और यदि वही जरूरतों की पूर्ति लंबी अवधि के लिए की जाये तो उसे पवित्र कर्म माना जाये। ये कहा तक उचित है, सोचने वाली बात है।
          वैसे कुछ दिनों पहले अदालत ने ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के रिश्तों को जायज ठहराया है जिसके पक्ष-और-विपक्ष में बहुत-सी प्रतिक्रियाएं सामने आई। इन प्रतिक्रियाओं में बहुत व्यक्तियों का तर्क था कि यह फैसला शायद विवाह जैसी सदियों पुरानी संस्थांओं के अस्तित्व को खतरे में डाल देगा। हालांकि परिवर्तन कौन नहीं चाहता, परिवर्तन शाश्वत नियम है जो होता ही है। मगर उस परिवर्तन के लिए पूरा जनमानस तैयार है, यह देखने वाली बात है.
          हालांकि न्यायालय हो या कोई और, किसी भी सामाजिक मुद्दे पर विचार व्यक्त करने से पूर्व उसे इस बिन्दु पर जरूर ध्यान देना चाहिए कि क्या भारतीय समाज इस तरह की अनैतिक रिवाजों को स्वी्कार कर सकेगा? क्या हमारा समाज इतना नंगा हो चुका है कि उसे अनियंत्रित स्वतंत्रता की जरूरत महसूस होने लगी है? इस तरह की स्वतंत्रता और नंगापन समाज के ऐसे भोगीयों की उपज है जो तमाम तरह के दुष्कृत्यों में लिप्त रहते हुए भोग के नए-नए साधनों की खोज में लगे रहते हैं, उन्हें बस शारीरिक सुख चाहिए। ऐसी स्वतंत्रता और भोगवादी संस्कृति मेट्रोज़ जीवन की शैली में विकसित होती जा रही है। इस भोगवादी संस्कृति को बढावा उन युवा वर्ग से मिलता है जो घर-परिवार से दूर रहकर जॉब कर रहे हों या पढ़ाई। उन्हें अपनी शारीरिक-मानसिक भूख को मिटाने के लिए ऐसे अनैतिक संबंधों की जरूरत पड़ रही है। वैसे अधिकांश लड़कियां नासमझी में और कुछ तो अपनी भौतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लिव इन का सहारा लेती हैं।
          कुल मिलाकर यह मसला किसी नैसर्गिक आवश्यकता से नहीं जुड़ा है बल्कि भोगवाद का अतिरेक है। सार्वजनिक मंच पर रह-रहकर इस रिश्तों की बातें सुनने को मिल रही हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप वक्त और हालात की मांग है. अगर हम संविधान की बात करें तो वह स्वयं ही अनियंत्रित स्वतंत्रता को अस्वीकार कर लेता है। यानी लिव-इन रिलेशन ऐसी स्वतंत्रता है जो भारतीय संस्कृति को हानि पहुंचा रही है। उसे तो खुद ही निरस्त कर देना चाहिए। ताकि लिव इन जैसी स्वच्छंदता जो समाज की सुस्थापित व्यवस्था और संस्कृति को हानि पहुंचाने में सक्षम है, उसे मानवाधिकार के रूप में परिभाषित करना या वक्त-हालात की जरूरत बताकर प्रोत्साहित करना उचित नहीं है। क्योंकि जीवन का भटकाव मनुष्य को चिता की ओर ले जाता है, जिसका अंत बड़ा भयावह होता है।

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