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Friday, June 10, 2011

मीडिया भी भ्रष्टा चार में लिप्त हो चुकी है

भ्रष्टाचार सरकार और जनता में समान रूप से अविश्वास पैदा करता है तथा दोनों के नैतिक बंधनों को तोड देता है. इससे नागरिक का दैनंदिन जीवन भी प्रभावित होता है. भ्रष्टाचार ही वह कारण है कि आज हमें मिलने वाला खाद्धान्नक, यहां तक कि दवाएं भी मिलावटी और नकली हैं. न सिर्फ इतना भ्रष्टाचार किसी राष्ट्र के भविष्य और विकास को भी प्रभावित करता है, जनकल्याण के लिए बनाई और लागू की जानेवाली विभिन्ना विकास योजनाओं में भ्रष्टाचार नामक छिदों के कारण आज जो अमरण अनशन और घरना प्रर्दशन हो रहा है इससे सरकार जरूर सकते में होगी.

वस्तुत सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की बीमारी के लक्ष्ण प्रकट हो चुके हैं. इस बीमारी का इलाज ढुढने के लिए मीडिया भी अपनी भूमिका में रही थी.और मीडिया ही भ्रष्टारचार की गांठों को खोलकर जनता के सामने असलियत रखती थी तथा दोषियों के चेहरे से नकाब उतार में मददगार साबित हो सकती हैं. परन्तु मीडिया भी इन्हीं की जमात में शामिल होती नजर आ रही है. इसका मुख्य कारण सरकार द्वारा मीडिया को दी जाने वाली सुख सुविधाओं से है. जिसके बलबूते पर सरकार इन चैनलों व अखबारों को अपने वश में करती जा रही है.

आज मीडिया की भूमिका में दोहरापन आ चुका है, उसे देखना और उसका इलाज करना भी जरूरी हो गया है. अगर भ्रष्टाचार को उजागर करने की बात करें तो कुछ बडे घोटालों या भ्रष्टाचार के मामले तो मीडिया ने बखूबी जनता के सामने लाए हैं, लेकिन देश के कमजोर और बेआवाज आम नागरिक के साथ हर दिन जो बेइंसाफी और ज्यादती के हजारों मामले घटित होते हैं, उनसे मीडिया आंखें चुरा लेता है.पिछले दो दशकों में पत्रकारिता के कामकाज का यह सर्वमान्य तरीका बना गया है कि पुलिस और प्रशासन द्वारा जारी की जाने वाली विज्ञाप्तियों को उनमें किए गए दावों और दिए गए विवरणों को तथ्यों की जांच पडताल के बिना ही प्रकाशित किया गया. क्योंकि भ्रष्टाचार के दलदल में मीडिया भी पूरी तरह से घस चुका है.ऐसे मीडिया के खिलाफ बहुत मामले भी प्रकाश में आते रहे हैं उनमें से एक मामला जिला स्तर पर सरकारी जमीन को कौडियों के भाव में लेने का भी है. एक और मामला लगभग पंद्रह वर्ष पुरान है जिसमें इंडियन एक्सजप्रेस के तत्कालीन संवाददाता ने मध्य प्रदेश में अखबारनवीसों को बडे पैमाने पर मकानों की मिल्कियत बांटने का भी है. इसके साथ साथ आज पेड न्यू ज का मामला भी रह रहकर सामने आता रहता है.

ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें मीडिया में कार्यरत संवाददाता, पत्रकार तथा मीडिया के सर्वेसर्वाओं का भी नाम आता है जो सरकार द्वारा या सरकार पर दबाव बनाकर उनसे अपना उल्लू सीधा करते हैं, और सरकार भी किसी पचडे में पडने के वजह इनकी मांगों को निसंकोच पूरा कर देती है. ये बात कहने में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए कि भ्रष्टा्चार के कालेधन में मीडिया भी लिप्त हो चुका है. जनसंचार के एक विद्वान ने सही कहा था कि संचार माध्याम जनता के मन मस्तिक पर सीधा प्रभाव करता है और इन मीडिया संस्थानों के हाथों में अपनी बागडोर सौंप देता है.जिसे आज मीडिया भ्रष्टाचार के मामलों को जनता के सामने रखने के बजह, खुद ही बागडोर सरकार के हाथों में दे चुका है.जब मीडिया सरकार का दल्ला बन चुका है तब क्या मीडिया समाज के सामने भ्रष्टाचार को उजागर कर सकेंगा.ये मात्र और मात्र सरकार के कालेधन में लिप्ते रहकर अपनी अयस्सीम के साधनों ही जुटाता रहेगा.यहा एक कहावत सही सबित हो सकती है कि मीडिया का काम बनना चाहिए, चाहे जनता भाड में क्यों न जाए.

सभार- हर्षदेव (क्राइम, कानून और रिपोर्टर)





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