सरोकार की मीडिया

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Saturday, April 9, 2011

हो सकता है सरकार पर मीडिया का कब्जा

संविधान का चौथा स्तंभ मीडिया बिकने की कगार पर खडा हैा गलोबलाइजेशन के युग में सब कुछ बदल गया हैा क्या सभ्यिता क्या संस्क़ंति किसकी रक्षा की जाए और कौन करें एक गंभीर चिंतन का विषय हो सकता है शायद ये हमारे समाज में चोट के दाग की तरह अपनी जगह निर्धारित कर चुका है

मीडिया की बात करें तो क्याख है मीडिया, इस पर विभिन्नत विद्वानों पत्रकारों ने अपनी अपनी राय से इसे नवाजा है कोइ्र इसे माडवाली थाली कहता है जिसमें तरह तरह के व्यंजनों खबरों को परोसा जाता है कोई इसे उंटनी का दूध कहता है तो कोई इसे बैंड बाजा कहता है जो विशेष अवसर पर बजाया जाता है हो हल्ला मचाता है कोई धोबी का कुत्ता कहता है जो न तो घर का होता है न ही घाट का

मीडिया की शुरूआत जन समाज में हकीकत से रूबरू करने के लिए हुएा परंतु जब से इलेक्टॉकनिक मीडिया ने अपना कदम रखा है सब कुछ बदल दिया है क्याइ दिखाना चाहिए क्या नहीं इस पर भी विचार करना छोड. दिया है. शील अश्लील, हिंसा भडकाउ खबरें सबको परोसा जा रहा है; क्या फर्क पडेगा यदि हिंसा भड्क ही जाएगी. मिल जायेगी एक और नई खबर. जिसे घंटों दिखाया जाएगा. क्योंकि ये बडी् खबर हैा एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि जब जन सरोकर से दूर हो सरकार तब बनती है बडी् खबर. बडी् खबर होती नहीं बना दी जाती है किसी को हाईलाइट करना हो या किसी की छवि को मिटाना हो, मीडिया सक्षम है ये सब करने में.

इन मीडिया घरानोंकी बागडोर बडे बडे राजनेता,उधोगपतियों के हाथ में है जो अपना कालाधन,काले कारनामों को छिपाने के लिए खोल लेते है एक चैनल. जिससे कोई इनके गिरेवान में हाथ नहीं डाल पाता. पुलिस प्रशासन,सरकार भी इनसें दूरी बनाकर ही चलता हैा और इन मालिकों की जिंदगी एसी कमरों, जाम के पैकों, धुएं के कस में कटती बडी ही सुहानी प्रतीत होती हैा इसी के साथ साथ पत्रकारों की क्याक बात की जाए, प्रकट हो रहें हैं एक भीड् की जमात का हिस्सात बनने. जो अपने को उपर बहुत ही उपर पहुंचाने के लिए कुछ भी दिखाते रहते हैा शायद इन पर दबाव भी है टीआरपी बढाने का. बना देते है आम खबरों को बडी खबर.

ये सोचने वाली बात है कि कभी आपने सुना हो कि किसी न्यूरज चैनल या न्यूज चैनल के मालिक एडीटर द्वारा कोई कृत्य किया हो और उसको किसी दूसरे समाचार चैनलों ने बडी खबर कह कर प्रसारित किया हो. ऐसा न तो कभी देखा है और न ही सुना हैा यहां ये कहावत लागू हो सकती है चोर चोर मौसेरे भाई. कौन किस पर कीचड उछालें.ये सब मुझें सोचने पर मजबूर जरूर करता है. कि न्यूचज चैनल खोल लेने से या एडीटर बन जाने से इन में अपराध करने की प्रवृत्ति क्या खत्म हो जाती है जो आजतक इन पर काई भी अपराधिक मामला सामने नहीं आया.

शायद अपराध तो बहुत हुए होंगे. मीडिया ही दिखाने वाला है क्या दिखायेगा, कि मेरे न्यूज चैनल के मालिक, एडिटर फलां फलां मामले में फंसे हैं उन्होंकने ऐसा काम किया है जिससे मीडिया की गरिमा पर दाग लगनेकी संभावना बनी हुई है. हाल की घटना को लें, आजतक चैनल में रहें प्रभु चावला, बरखा दत्तह और भी बहुत से जाने माने नाम. जिन पर तरह तरह के घोटलों का आरोप लगता रहा. परंतु किसी न्यू ज चैनल या प्रिंट मीडिया ने इसको प्रकाशित नहीं किया. क्याआ ये बडी खबर नहीं थीं जाहिर है कौन अपने पैरोंपर कुलहाडी मारेगा. आज के युग में सभी पैसों के पीछे भाग रहे है वो जमाना अब लद गया, जब सच्चाई हर कीमत पर समाज के सामने रखी जाती थी. चाहे इसके लिए जिंदगी दांव पर लगानी हो या नौकरी.

ये बात कहने में कोई कोताही नहीं होगी कि मीडिया तो उधोगपतियों के हाथ का पालूत कुत्ता बन चुका है जो अपने मालिक के द्वारा डाली गई हड्डी पर जीवित रहता है. केवल अपने मालिक की भंजाता है, आखिर कुत्ता है वफादार तो होता है.

और क्या लिखूं लिखने के लिए बहुत कुछ है मैं भी मीडिया का शोधार्थी हॅू, देखता हॅू, सुनता हॅू, कि किस तरह खचडी पकायी जाती है क्याभ क्याश होता है. पैसे देकर, पैसे लेकर खबरों को दिखाया व बनाया जाता है. जिसे आजकल पेड न्यूज का दर्जा हासिल है. मीडिया द्वारा दिखाई जाने वाली बहुत सी खबरों को देखकर या पढकर कभी कभी जनता अपने आप को ढगा सा महसूस करती होगी.क्या खबर है कैसी खबर है कभी दुनिया नष्ट होने की बात की जाती है तो कभी लाइव आंतकवादियों का हमला दिखाया जाता है, हमारी आर्मी क्या कर रही है वो दिखाया जाता है. कोई फर्क नहीं पड्ता, किसी की भी जिंदगी क्योंर न दाव पर लग जाए. इनका क्या जाता है और कौन इनका क्या बिगाड सकता है. क्यों कि इन मीडिया पर किसी भी प्रकार को कोई दबाव नहीं है कोई कानून लागू नहीं है. सच्ची खबरें तो ठीक है, झूठी खबरों का भी पुलंदा इनके पास होता हैा जिस तरह बेकसूर को फसानेके लिए उस पर तरह तरह की यातना दी जाती है और पुलिस वालों के द्वारा लगा दिये जाते है बहुत से आरोप. आरोप, दिखा दिये जाते है. कोर्ट में कि इस आरोपी के पास से ये ये बरामद हुआ. .कोर्ट भी आंखों पर पट्टी बांधे सुना देतीहै सजा. ठीक इसी प्रकार मीडिया भी कभी कभी इस चालबाजी का प्रयोग कर ही लेता है और बढा लेता है अपनी टीआरपी.

छोडो्ं सभी को छोड देते हैं न तो मुझे कोई फर्क पडेगा न ही जनता को, जिसके घर में आग लगेगी वो ही उसे बुझाये, सही सोच अब विकसित होती जा रही है, कौन इस झमले में फंसे. और क्यों , ये कोई नई बात नहीं है मीडिया का आम जन पर हावी होना. ये अभी हाल ही में हावीनहीं हुआ हैा इसकों भी वर्षों लगें हैं अपनी पकड् बनाने में. और बनाता भी जा रहा है् संविधान के तीनों स्तंभों पर. अब क्यां बचा लोकतंत्र. उसको भी अपनी चपेट में ले चुका है. यदि ऐसा ही चलता रहा तो सरकार जनता के द्वारा नहीं बनायी जाएगी. मीडिया ही तय करेगा कि किस को मंत्री बनाया जाए, किस को प्रधानमंत्री, हालात अभी पूरी तरह से बिगडे नहीं है संभल सकते है नहीं तो एक दिन सरकार की बागडोर मीडिया के हाथों में होगी, और जैसा मीडिया चाहेगा वैसा ही चलेगी सरकार, यानि सरकार पर मीडिया का कब्जा हो सकता है. अभी वक्तय है सभंलने का नहीं तो पछताने और चिडिया के खेत चुग जाने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा.



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