सरोकार की मीडिया

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Friday, May 21, 2010

ख़बरों की खबर वह रखते हैं

ख़बरों की खबर वह रखते हैं


अपनी खबर हमेशा ढकते हैं

दुनिया भर के दर्द को अपनी

ख़बर बनाने वाले

अपने वास्ते बेदर्द होते हैं

आंखों पर चश्मा चढ़ाए

कमीज की जेब पर पेन लटकाए

कभी-कभी हाथें में माइक थमाए

चहुं ओर देखते हैं अपने लिए ख़बर

स्वयं से होते बेख़बर

कभी खाने को तो कभी पीने को तरसे

कभी जलती धूप तो कभी पानी को तरसे

दूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैं

मुिश्कल से अपना छिपाते दर्द होते हैं

लाख चाहे कहो

आदमी से जमाना होता है

ख़बरची भी होता है आदमी

जिसे पेट के लिए कमाना होता है

दूसरो के दर्द की ख़बर देने के लिए

खुद का पी जाना होता है

भले ही वह एक क्यों न हो

उसका पिया दर्द भी

जमाने के लिए गरल होता

ख़बरो से अपने महल सजाने वाले

बादशाह चाहे

अपनी ख़बरों से जमाने को

जगाने की बात भले ही करते हों

पर बेख़बर अपने मातहतोंं के दर्द से होतें हैं

कभी-कभी अपना खून पसीना बहाने वाले ख़बरची

खोलतें हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोल

पर फिर भी नहीं देते ख़बर

अपने प्रति वह बेदर्द होते हैं।

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