सरोकार की मीडिया

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Tuesday, April 13, 2010

जो कोई उनसे करता है?

फिर शाम आये मेरे दर पर ले कर चाँद का पैगाम,

कर लो दोस्ती तुम हम से मेरी दोस्ती लिखी तेरे नाम.
हम ने कहा के जानते नही हम तुम को कैसे बना ले दोस्त हम,
कर ले कैसे दोस्ती तुम से क्यो दोस्ती लिखी मेरे नाम.
चाँद ने कहाँ के मै जानता तुम्हे,
तुम जानती नही मै देखता रहता तुम्हे,
तुम्हारे सुन्दर चेहरे पर मेरी रोशनी पडे सुबह शाम,
कर लो दोस्ती तुम हम से मेरी दोस्ती लिखी तेरे नाम.
दोस्त बनाने के लिये बहुत मिल जायेंगे,
पर समझ जाये अपने दोस्त को मन से ऐसा कोई मिलता नही,
तुम हम को समझोगे कैसे, जानोगे कैसे मेरे मन की बात,
कर लू कैसे दोस्ती तुमसे क्यों दोस्ती लिखी मेरे नाम.
चाँद ने कहा मै दूर हूं माना,
पास आ सकता नही ये है जाना,
दूर हो कर भी पास मै रहुंगा,
कभी भी तुम को यूं उदास ना देख सकुंगा,
कर लो दोस्ती तुम हम से मेरी दोस्ती लिखी तेरे नाम.
क्या इतनी ही दूर रहने वाले अपने दोस्त को समझ सकते है,
दोस्त के जज़्बात को ओर मन की बात को, किस हद तक जान सकते है,
क्या अपने दोस्त से इस तरहा ही दोस्ती निभा सकते है,
जो कोई उनसे करता है?

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