सरोकार की मीडिया

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Monday, April 26, 2010

कहीं इन नज़रों में

कहीं इन नज़रों में


तुम्हारा अक्स न देख ले जमाना

इसलिए हमने लोगों से

नज़रें मिलना छोड़ दिया

दिल की धड़कन में छिपे हो तुम

ये जान न ले कोई

इसलिए हमने दिल है हमारे सीने में

यह बताना छोड़ दिया

तुम्हारी याद तन्हाई में रूलाती है हमें

यह कह न सके कोई

इसलिए आंसु बहाना छोड़ दिया

दर्द-दे-मोहोब्बत के सिवा कोई और

दर्द छू सके न हमें

इसलिए हमने उन जख्मों को

दिखाना छोड़ दिया

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