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Sunday, April 11, 2010

प्रत्येक मौत इंसान को एक ही सीख देती है कि मैं ही सत्य हंू और मैं ही अमर

ऐसे तो जिन्दगी को हम देखे तो हमको दिखाई पड़ जाएगी कि मैं कुछ भी नहीं हूं इसे दिखाई पड़ने में कौन सी कठिनाई है मृत्यु रोज इसकी खबर लाती है कि हम कुछ भी नहीं है लेकिन हम मृत्यु को कभी गौर से नहीं देखते कि वह क्या खबर लाती है मृत्यु को तो हमने छिपाकर रख दिया है मरघट गांव के बाहर बना देते है ताकि दिखाई न पडे़, किसी दिन इंसान समझदार होगा तो मरघट गांव, शहर के चौराहे पर बना होगा कि रोज दिन में दस दफा निकलते आते-जाते दिखाई पड़े मौत का ख्याल आए कि मौत है अभी कोई लाश निकलेगी, मुर्दा निकलेगा , जब कोई लाश निकलती है तो हम बच्चों को घर के भीतर बुला लेते है कि मुर्दा निकल रहा है अन्दर आ जाओ। मुर्दा निकले और हममें समझ हो , तो सब बच्चों को बाहर इक्ठठा कर लेना चाहिए कि देखो यह आदमी मर गया ठीक इसी प्रकार हम सबको मर जाना है। केवल यह एक हकीकत है इसके अलावा दुनियां में सब निरंकार है मेरी मानें तो दुनियां में मृत्यु ही एक सत्य है इसके परे और दुनियां में कुछ भी नहीं बचता। आज का इंसान समझदार होते हुए भी नसमझ बना हुआ है वह यह जानता है कि मौत एक दिन किसी न किसी प्रकार से आयेगी और उसको सब कुछ यह इसी नशवान संसार में छोड़कर जाना पडे़गा। बावजूद इसके वह जीवन से इस कदर मौह करने लगता है और अपने आप को पूरी तरह से मोह-माया के चंगुल में जकड़ जाता है जैसे उसे कभी यह संसार छोड़कर जाना ही न हो।


कहते है कि जीवन और मरण सब प्रभु के हाथ में है कब किसकों भेज दे कब बुला लें ये तो सिर्फ उसी की लीला है वैसे एक जन्म लेने वाले बच्चों को कोई नहीं रोक सकता वो तो जन्म लेगा ही। ठीक उसी प्रकार जाने वाले को तो भगवान भी नहीं रोक पाते , उसे तो जाना ही है, पर जाने का रास्ता तो एक ही है वह है मौत।

प्रत्येक मौत इंसान को एक ही सीख देती है कि मैं ही सत्य हंू और मैं ही अमर।

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